ये होते हैं मध्यस्थ: मध्यस्थ उन वकीलों को नियुक्त किया जाता है जो वकील के तौर पर 15 सालों से ज्यादा समय से कार्य कर रहे हैं और जिन्होंने मध्यस्थता संबंधी 40 घंटे का प्रशिक्षण लिया हो। इस योग्यता के आधार पर हाईकोर्ट मध्यस्थ नियुक्त करता है। रिटायर्ड जज या वरिष्ठ अफसर को भी मध्यस्थ नियुक्त किया जा सकता है।
उच्च न्यायालय मध्यस्थता समिति
बिलासपुर हाईकोर्ट व जिला न्यायालयों में लंबित मामलों को सुलझाने में मध्यस्थता कारगर साबित हो रही है। जनवरी 2008 में हाईकोर्ट में मध्यस्थता केंद्र शुरू होने के बाद राज्य के सभी 16 जिलों के जिला न्यायालय में भी एक-एक मध्यस्थता केंद्र स्थापित किए गए हैं। इनकी स्थापना के बाद राज्य में अब तक 177 मामले मध्यस्थता के माध्यम से निराकृत हो चुके हैं। सस्ता और जल्दी न्याय दिलाने के लिए मध्यस्थता अधिनियम बनाया गया है। इस अधिनियम के अनुसार मध्यस्थता उन सभी मामलों में की जा सकती है, जो किसी भी न्यायालय में लंबित हो। इसके लिए दोनों पक्षकार आपसी सहमति से किसी मध्यस्थ (जो अदालत से मान्य हो) को अपना विवाद निराकृत करने के लिए अधिकृत करते हैं।वह दोनों पक्षों को स्वतंत्र तौर पर सुनकर समझौते के लिए मनाने की कोशिश करता है। सभी पक्ष अगर मान जाते हैं तो इस समझौते को लिखित में तैयार करने के बाद संबंधित कोर्ट में प्रस्तुत किया जाता है। इस समझौते के आधार पर कोर्ट आदेश पारित कर देते हैं। मध्यस्थता के बाद हुआ समझौता अंतिम होता है। इसमें पक्षकारों के बीच विवाद खत्म होने के साथ ही समय और खर्च की बचत होती है। आपसी सहमति से होने के कारण पक्षकार इसमें अपील भी नहीं करते।
हाईकोर्ट की मानेटरिंग कमेटी : हाईकोर्ट में 12 जनवरी 2008 को मध्यस्थता केंद्र की स्थापना के साथ ही वर्तमान चीफ जस्टिस राजीव गुप्ता के निर्देश पर इस केंद्र की मानिटरिंग के लिए कमेटी भी गठित की गई है। इसके अध्यक्ष जस्टिस धीरेंद्र मिश्रा व सदस्य जस्टिस टीपी शर्मा व जस्टिर आरएन चंद्राकर हैं। इस कमेटी के निर्देश पर राज्य में दो बार 40-40 घंटे का मध्यस्थता प्रशिक्षण आयोजित किया जा चुका है। पहला प्रशिक्षण कार्यक्रम रायपुर व दुर्ग में 19 से 21 सितंबर व 14 से 16 नवंबर 2009 में आयोजित किया गया। इसका उद्घाटन सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सी जोसेफ ने किया था। मध्यस्थता की बारीकियों से परिचित कराने के लिए 40 घंटे का द्वितीय प्रशिक्षण रायपुर में ही 11 से 13 सितंबर और 2 व 3 अक्टूबर 2010 को आयोजित किया गया। दोनों शिविरों में अब तक राज्य में 46 वकीलों व 20 न्यायिक अधिकारियों को मध्यस्थता प्रशिक्षण दिया जा चुका है।
तीसरा प्रशिक्षण कार्यक्रम 19 से : हाईकोर्ट मीडिएशन सेंटर की मानिटरिंग कमेटी द्वारा तीसरा मध्यस्थता प्रशिक्षण कार्यक्रम विधिक सेवा केंद्र के न्याय सदन में 19 फरवरी और 12 व 13 मार्च को आयोजित किया जाएगा। इसमें हाईकोर्ट के साथ ही जगदलपुर, दंतेवाड़ा, धमतरी, कांकेर, महासमुंद, कोरिया, रायगढ़, जांजगीर-चांपा और राजनांदगांव से 30 वकील शामिल होंगे। इसमें प्रशिक्षक के तौर पर दिल्ली उच्च न्यायिक सेवा के सदस्य व मास्टर ट्रेनर डा. सुधीर जैन, दिल्ली हाईकोर्ट के वकील संजय कुमार व श्रीमती नगीना जैन उपस्थित रहेंगे। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हाईकोर्ट के जस्टिस धीरेंद्र मिश्रा, अध्यक्ष जस्टिस सुनील कुमार सिन्हा व विशिष्ट अतिथि के तौर पर जस्टिस आरएन चंद्राकर उपस्थित रहेंगे।

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ReplyDeleteन्यायाधीश सामान्यतः न्याय सदन में 2-3 घन्टे प्रतिदिन बैठक करते हैं।उच्चतम न्यायालय के आंकडों के अनुसार वर्श 2009 में क्रमषः मद्रास, उडी़सा एवं गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायाधीषों ने 5005, 4583, एवं 3746 प्रकरण प्रति न्यायाधीष से प्रकरणों का निपटारा किया है जबकि भारत के समस्त उच्च न्यायालयों का आलोच्य अवधि में प्रति न्यायाधीष औसत मात्र 2537 प्रकरण रहा है। दूसरी ओर क्रमषः उतराखण्ड, दिल्ली और गौहाटी उच्च न्यायालयों का आलोच्य अवधि में यह औसत 1140, 1258 एवं 1301 आता है।
ReplyDeleteसम्पूर्ण भारतवर्श के उच्च न्यायालयों के औसत निश्पादन के आधार पर वर्ष में दायर कुल 1779482 प्रकरणों के लिए 701 न्यायाधीषों की समस्त उच्च न्यायालयों में आवश्यकता है। समस्त उच्च न्यायालयों में कुल 272 न्यायाधीष अधिषेश हैं जिन्हें बकाया मामलों के निस्तारण में संलग्न किया जा सकता है।अधिनस्थ न्यायालयों में भी केरल, मद्रास एवं पंजाब के न्यायाधीषों ने आलोच्य अवधि में प्रति न्यायाधीष क्रमषः 2575, 1842 एवं 1575 प्रकरणों का निस्तारण किया है जबकि समस्त भारतीय न्यायाधीषों का यह औसत 1142प्रकरण है। समस्त भारत के अधीनस्थ न्यायालयों के औसत निपटान की दृश्टि से वर्श में दायर कुल 16965198 प्रकरणों के लिए कुल 14856 न्यायाधीषों की अधीनस्थ न्यायालयों में आवष्यकता है। सर्वोत्तम निस्तारण के आधार पर समस्त भारतीय अधीनस्थ न्यायालयों में 7507 न्यायाधीष अधिषेश हैं जिनका उपयोग बकाया मामलों के निपटान में किया जा सकता है। विडम्बना यह है कि सम्पूर्ण देष में एक समान मौलिक कानून-संविधान, व्यवहार प्रक्रिया संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता, साक्ष्य अधिनियम व दण्ड संहिता- के उपरान्त न्यायालयों द्वारा अपनायी जाने वाली मनमानी व स्वंभू प्रक्रिया व परम्पराओं के कारण निस्तारण में गंभीर अन्तर है।दैवीय कार्य करने वाले संवैधानिक न्यायालयों द्वारा एक ही प्रकरण (भ्रश्टाचार निर्मूलन संगठन) में रू0 25000/- से लेकर रू0 40,00,000/- तक खर्चे व क्षतिपूर्ति मूल्यांकन किया जाना भारतीय न्यायपालिका के लिए आष्चर्यजनक तथ्य नहीं है।सर्वोच्च न्यायालय ने भी तारक सिंह के प्रकरण में कहा है कि हमें स्मरण रखना चाहिए बाहरी तूफान की तुलना में अन्दरूनी कठफोड़ों से अधिक भय है।लोक अदालत तो इस बात का प्रतिक है कि हमारी व्यवस्था न्याय देने में विफल है और अंततोगत्वा निर्बल पक्ष को अपने हित की बलि देकर समझोता कारण पड़ा | लोक अदालत कोई उदीयमान सितारा नहीं अपितु एक दाग है |