Oct 11, 2014

सीजे ने राह दिखाई, इन पर चलना चुनौती

शख्सियत : 
सोलर प्लांट, ऑनलाइन ऑर्डर, फास्ट ट्रैक कोर्ट समेत कई फैसलों के लिए जाने जाएंगे यतींद्र सिंह

-अनुपम सिंह

तारीख-9 दिसंबर 2012, समय- दोपहर करीब 3 बजे, जगह- पुराने हाईकोर्ट की लाइब्रेरी, कार्यक्रम- नए चीफ जस्टिस यतींद्र सिंह का हाईकोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा सम्मान समारोह... पहली बार वकीलों से रू-ब-रू होते हुए चीफ जस्टिस यतींद्र सिंह ने इस मौके पर कुछ घोषणाएं कीं। जजों, न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों की संपत्ति सार्वजनिक करने, फुलकोर्ट के मिनट्स वेबसाइट पर अपलोड करने या फिर हाईकोर्ट कैंपस को सोलर प्लांट से रोशन करने का मामला हो, सभी फैसलों, घोषणाओं पर अमल शुरू हो गया है।

फैसले और मिनट्स ऑनलाइन हुए- 9 दिसंबर 2012 को हुए समारोह में एक दिन पहले फुल कोर्ट के फैसले सार्वजनिक किए गए थे। इसके बाद अब तक फुल कोर्ट की जितनी भी मीटिंग्स हुई हैं, उनमें हुई चर्चा फैसलों की पूरी जानकारी वेबसाइट पर उपलब्ध करवाई जा रही है। हाईकोर्ट के फैसले भी ऑनलाइन हो रहे हैं।

रेलवे का रिजर्वेशन काउंटर खुलवाया- रिटायरमेंट से एक दिन पहले ही सीजे यतींद्र सिंह ने हाईकोर्ट कॉलोनी समेत क्षेत्र की जनता को रेलवे रिजर्वेशन काउंटर की सौगात दिलवाई। इसकी पहल उन्होंने खुद की थी और कहा था कि इसे सिर्फ कॉलोनी वालों के बजाय पूरे इलाके के लोगों के लिए खोला जाए।

12 साल के हो रहे छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के लिए ये फैसले कई मायने में ऐतिहासिक और मील का पत्थर हैं। न्यायपालिका क्षेत्र में पारदर्शिता के लिए इतने बड़े फैसले पहली बार लिए गए। इसमें से अधिकांश घोषणाओं पर अमल हो रहा है। सीजे ने 22 अक्टूबर 2012 को यहां ज्वॉइन किया था। वे 8 अक्टूबर को रिटायर हो रहे हैं। अब हाईकोर्ट प्रशासन के सामने इन्हें बरकरार रखना बड़ी चुनौती होगा।

घोषणाएं जिन पर अमल से बनी अलग पहचान

जजोंकी संपत्ति हुई ऑनलाइन- हाईकोर्ट और सब-ऑर्डिनेट कोर्ट के जजों, अधिकारियों और कर्मचारियों की संपत्ति की जानकारी वेबसाइट पर सार्वजनिक है। 10 जनवरी 2013 को सबसे पहले सीजे ने अपनी संपत्ति सार्वजनिक की। इसके बाद हाईकोर्ट समेत प्रदेश के सभी जजों ने ऐसा किया। हाईकोर्ट कर्मचारियों की संपत्ति की जानकारी वेबसाइट पर है।

हाईकोर्ट कॉलोनी आबाद हुई- छत्तीसगढ़ आने के बाद रायपुर से बिलासपुर आने के दौरान सीजे ने हाईकोर्ट की आवासीय कॉलोनी देखी। उन्होंने इसे शहर की सबसे सुंदर कॉलोनी बनाने की घोषणा की। 31 अक्टूबर 2012 को न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों से विकल्प मांगा गया। सबसे पहले खुद कॉलोनी में शिफ्ट हुए। यहां प्लेग्राउंड, इनडोर गेम्स की सुविधा, बच्चों और महिलाओं के लिए कंप्यूटर ट्रेनिंग की व्यवस्था की। कैंपस हरा करने बड़ी संख्या में पौधे लगवाए। साल में एक बार खास आयोजन भी हुए।

वकीलों को मिले चेंबर- हाईकोर्ट में बने चेंबर का मामला सालों से अधर में पड़ा था। वकील सालों से इनकी मांग कर रहे थे। कई बार कोशिश की गई, लेकिन आवंटन नहीं हो पाया। चेंबर आवंटन को लेकर महाधिवक्ता की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई। कमेटी ने नियम शर्तें तय की। प्रक्रिया पूरी होने के बाद वकीलों को चेंबर आवंटित कर दिए गए।

सोलर प्लांट से रोशन हो रही बिल्डिंग- हाईकोर्ट में छत्तीसगढ़ अक्षय ऊर्जा विकास निगम (क्रेडा) ने 500 किलोवॉट क्षमता के सोलर पॉवर प्लांट की स्थापना की है। 4 मार्च 2013 को इसकी घोषणा की गई थी। प्लांट में बैटरी बैंक नहीं है और यह सीधे बिजली सप्लाई के लिए लगाए गए पॉवर ग्रिड से जुड़ा है। यानी प्लांट में उत्पादन के बाद हाईकोर्ट को सीधे बिजली मिल रही है। बाकी बिजली पॉवर ग्रिड में जाती है। प्लांट से हर रोज 2000 यूनिट बिजली का उत्पादन हो रहा है, जिसका उपयोग हाईकोर्ट में किया जा रहा है। इससे करीब हर साल 40 लाख रुपए की बचत होगी।

दुष्कर्म मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट- दुष्कर्म से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना का निर्णय लिया गया। जजों की कमेटी ने दुष्कर्म के मामलों की जल्द सुनवाई और निपटारे के लिए प्रदेश की सभी निचली अदालतों में फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना करने की अनुशंसा की थी। फुल कोर्ट ने इन मामलों में अधीनस्थ अदालतों में ट्रायल के स्तर और हाईकोर्ट में अपील के स्तर पर मॉनिटरिंग करने का भी फैसला लिया है।

रायपुर और कोरबा में इवनिंग कोर्ट को मंजूरी- फुल कोर्ट ने प्रदेश में इवनिंग कोर्ट शुरू करने की दिशा में पहल करते हुए दि इवनिंग कोर्ट रूल्स 2013 को मंजूरी दी। इसके तहत राजानी रायपुर और कोरबा में फुल कोर्ट खोलने के लिए संबंधित जिला एवं सत्र न्यायाधीश को तारीख तय करने के निर्देश दिए गए।

ओपन सोर्स सिस्टम को बढ़ावा दिया- सीजे कंप्यूटर के एक्सपर्ट हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट की तर्ज पर उन्होंने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की वेबसाइट तैयार करवाई। उन्होंने ओपन सोर्स सिस्टम को बढ़ावा दिया, यानी इसके लिए साॅफ्टवेयर खरीदने की जरूरत नहीं है। इंटरनेट पर मुफ्त में उपलब्ध साॅफ्टवेयर का ज्यादातर उपयोग किया जा रहा है।

येभी रहे महत्वपूर्ण फैसले - छत्तीसगढ़स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमी की नई बिल्डिंग को मंजूरी / जजों के तबादले के लिए नई नीति जारी की गई / अधीनस्थ न्यायालयों में जजों के खाली पदों पर भर्ती की मंजूरी / राज्य के सभी जिला न्यायालयों में विजिलेंस सेल को मंजूरी / नक्सल क्षेत्रों में विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट का प्रस्ताव मंजूर / कई जिलों में फैमिली कोर्ट शुरू करने का प्रस्ताव मंजूर / 10 जिलों में स्पेशल एट्रोसिटी कोर्ट खोलने को मंजूरी / हाईकोर्ट में कवर्ड पाथ-वे की वकीलों की मांग मंजूर की आदि. 

Apr 2, 2014

पालकीवाला ने कहा था, तब सुप्रीम कोर्ट के जजों में नहीं था नैतिक साहस

भास्कर न्यूज बिलासपुर

खुलासा
छत्तीसगढ़ के चीफ जस्टिस ने इमरजेंसी के दौरान के खोले राज, प्रसिद्ध कानूनविद् के निजी पत्र को किया सार्वजनिक
- पत्र में इमरजेंसी के दौरान सुप्रीम कोर्ट के कई जजों की कार्यप्रणाली पर उठाए थे सवाल
- सीजे ने जजों से किया आह्वान, जस्टिस खन्ना जैसा बनें
- ट्रेनिंग के समापन पर सीजे का दिया वक्तव्य हुआ ऑनलाइन

प्रदेश के चीफ जस्टिस यतींद्र सिंह को प्रसिद्ध वकील ननी पालकीवाला ने १३ जनवरी १९९७ को लिखे गए पत्र में साफगोई से कहा था कि इमरजेंसी के दौरान सुप्रीम कोर्ट के कई जजों में नैतिक साहस नहीं था। इस वजह से ही उन्होंने इमरजेंसी के केस में पैरवी नहीं की थी। सीजे ने यह खुलासा जजों को दिए गए लेक्चर में किया। उन्होंने पालकीवाला के पत्र को पहली बार सार्वजनिक किया, जिसमें लिखा था कि तब सुप्रीम कोर्ट में ऐसे जजों की बेंच थी, जो सरकार के पक्ष में किसी भी तरह का फैसला दे सकती थी।

चीफ जस्टिस यतींद्र सिंह ने नए जजों से जस्टिस एचआर खन्ना जैसा जज बनने का आह्वान किया। इमरजेंसी में जस्टिस खन्ना के एक फैसले ने उन्हें दूसरे जजों की तुलना में ज्यादा फेमस किया। देश के १० राज्यों से शहर आए जजों के ट्रेनिंग प्रोग्राम के समापन पर उन्होंने इमरजेंसी के दिनों के उदाहरणों से कानून का शासन और अदालतों की भूमिका बताई। सीजे ने कहा कि उस समय देश के अधिकांश हाईकोर्ट की भूमिका सुप्रीम कोर्ट से बेहतर थी। शेषत्नपेज ९
इमरजेंसी के दिनों से समझा जा सकता है कि कानून का शासन किसे नहीं कहते। ऐसा अंग्रेजों के शासन के दौरान भी नहीं हुआ, जब पुलिस, ब्यूरोके्रसी सहित नागरिकों के सभी अधिकार छीन लिए गए थे। झूठे आरोपों पर लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। आरोप निराधार होने के बाद भी अदालतों ने जमानत याचिकाएं मंजूर नहीं की। कई को जमानत मंजूर होने के बाद भी रिहा नहीं किया गया। उन्होंने बताया कि किस तरह मीसा के जरिए लोगों को संविधान से मिली आजादी और जीवन के अधिकार छीन लिए गए थे। उस दौरान अदालतों ने अपनी भूमिका नजरअंदाज कर इमरजेंसी लगाने वालों की मदद की।

ननी पालकीवाला से पूछा था, केस क्यों नहीं लड़ा
इमरजेंसी लगाने में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एडीएम जबलपुर विरुद्ध शिवकांत शुक्ला के मामले में दिए गए फैसले का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस मामले में पैरवी नहीं करने को लेकर सीजे ने इलाहाबाद में अपने वकालत के दिनों में सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध वकील रहे ननी पालकीवाला को पत्र लिखा था। इसमें उन्होंने पालकीवाला से इस केस की पैरवी नहीं करने की वजह पूछी थी। १२ दिसंबर १९९६ में लिखे गए पत्र का पालकीवाला ने एक माह के भीतर जवाब दिया।

कौन थे ननी पालकीवाला
ननी पालकीवाला को 20वीं शताब्दी के सबसे बड़े वकीलों में गिना जाता है। उनकी जीवनी पर एक पुस्तक नानी ए. पालकीवाला-ए लाइफ प्रकाशित हुई है। इस पुस्तक को एम. वी. कामथ ने लिखा है। पालकीवाला ने बहुत सारे महत्वपूर्ण पदों जैसे अटार्नी जनरल, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश तक का पद ठुकरा दिया। वे भारत सरकार की तरफ से अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में वकील रहे, पर सरकारी पद के तौर पर उन्होंने मात्र अमेरिका के राजदूत बनने का पद स्वीकार किया, जो उन्हें आपातकाल के बाद 1977 में दिया गया था। पालकीवाला ने अपना पूरा पैसा दान में दे दिया।

पालकीवाला ने कहा..
इमरजेंसी के दिनों से समझा जा सकता है कि कानून का शासन किसे नहीं कहते। ऐसा अंग्रेजों के शासन के दौरान भी नहीं हुआ, जब पुलिस, ब्यूरोके्रसी सहित नागरिकों के सभी अधिकार छीन लिए गए थे। झूठे आरोपों पर लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। आरोप निराधार होने के बाद भी अदालतों ने जमानत याचिकाएं मंजूर नहीं की। कई को जमानत मंजूर होने के बाद भी रिहा नहीं किया गया। उन्होंने बताया कि किस तरह मीसा के जरिए लोगों को संविधान से मिली आजादी और जीवन के अधिकार छीन लिए गए थे। उस दौरान अदालतों ने अपनी भूमिका नजरअंदाज कर इमरजेंसी लगाने वालों की मदद की।

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