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Thursday, November 19, 2009

जजों की संपत्ति घोषणा के पहले प्रावधान तय हो - जस्टिस गर्ग

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के प्रथम कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रह चुके जस्टिस आर.एस.गर्ग नें बिलासपुर में कहा कि जजों को अपनी संपत्ति का खुलासा करने में कोई बुराई नहीं है मगर इसके लिए निश्चित प्रावधान तय होने चाहिए। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता, नैतिकता एवं दायित्वों की हर क्षेत्र में चर्चा होती है लेकिन मीडिया का क्या दायित्व है और उन दायित्वों से मीडिया यदि भटके तो उसे कौन रोके?

एक विवाह समारोह में शामिल होने आए जबलपुर उच्च न्यायालय के प्रशासनिक जस्टिस श्री गर्ग ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए न्यायाधीशों की संपत्ति सार्वजनिक किए जाने के प्रश्न पर कहा कि यदि जज 15-20 वर्ष पहले कोई संपत्ति खरीदी हो और उसका बाजार मूल्य का आंकलन आज की स्थिति में किया जाता है तो यह विरोधाभाष है, इसके लिए निश्चित प्रावधान होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सूचना के अधिकार के कारण हम लोगों ने जागरूकता बढ़ी है जिसके कारण देशभर में मुकदमों की संख्या में भी वृद्धि हुई है। उन्होंने बिलासपुर के बारे में कहा कि शहर अच्छा है यहां मुझे भरपूर स्नेह मिला है मगर प्रार्वधानों के कारण वे छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद पर नहीं आ सकते क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का यह प्रावधान है कि जो जज जिस राज्य में पहले पदस्थ रह चुका हो वह वहां का मुख्य न्यायाधीश नहीं बन सकता। पहले यहां तीन जज थे और आज संख्या बढ़कर नौ हो चुकी है भले ही मुकदमें की संख्या में वृद्धि हुई है। मीडिया की भूमिका को लेकर पूछे जाने पर जस्टिस गर्ग ने कहा कि 25 साल पहले मीडिया में जो आता था वह अब नहीं है उसकी जगह विज्ञापन ने ले ली है। आज मुख्यपृष्ठ पर अश्लीलता, फुहड़ता भरे चित्र व सनसनी खेज खबरें रहती है। पहले तो विज्ञापन के जगह तय रहते थे। मीडिया अपनी बातें खुद कहता है दूसरे विभागों में पी.आर ओ भी होते हैं हमारे तो यह भी नहीं है। आज कार्यपालिका न्यायपालिका व व्यवस्थापिका में पारदर्शिता, नैतिकता तथा उसके दायित्वों को लेकर बातें उठती हैं मगर मीडिया में यह कहां तक लागू है।

साभार देशबंधु 

Monday, November 9, 2009

छत्तीसगढ़ के चार न्यायाधीशों की सेवाएं समाप्त

छत्तीसगढ़ उच्‍च न्‍यायालय ने जिला न्यायालयों के चार न्यायाधीशों की सेवाएं समाप्त कर दी हैं। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय की सूचना के अनुसार अधीनस्थ न्यायालय के चार सिविल जज वर्ग दो को कल तत्काल प्रभाव से सेवा से हटा दिया गया है। दो वर्ष की परिवीक्षा अवधि में इनका कामकाज संतोषजनक नहीं पाये जाने के कारण उच्च न्यायालय ने तत्काल प्रभाव से इनकी सेवाएं समाप्त करने की अनुशंसा की थी।

जिन न्यायाधीशों की सेवाएं समाप्त की गई है उनमें कोरबा जिले के करतला में पदस्थ सत्येन्द्र कुमार मिश्र और बस्तर संभाग के बीजापुर में पदस्थ श्रीमती श्रद्धा आकाश श्रीवास्तव शामिल हैं। दो अन्य न्यायाधीशों में जांजगीर चाम्पा के नवागढ़ में पदस्थ यशपाल सिंह तथा दुर्ग जिला न्यायालय में पदस्थ कुमारी द्वारिका तिडके शामिल हैं।

Thursday, November 5, 2009

शिक्षाकर्मी भर्ती नियम को छत्‍तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती


राज्य शासन द्वारा पिछले महीने शिक्षाकर्मी भर्ती के लिए विज्ञापन प्रकाशित कराया  गया था। इसके अनुसार पंचायत व ग्रामीण विकास विभाग द्वारा प्रदेश के विभिन्न जनपद पंचायत व जिला पंचायतों के माध्यम से शिक्षाकर्मियों की भर्ती की जा रही है। इसके लिए व्यावसायिक परीक्षा मंडल द्वारा 29 नवंबर को लिखित परीक्षा आयोजित की जा रही है। परीक्षा भर्ती नियम के अनुसार शिक्षाकर्मी वर्ग-एक व दो के लिए स्नातक व स्नातकोत्तर की परीक्षा द्वितीय श्रेणी में पास होना जरूरी है। इससे कम अंक वालों को परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं है। भर्ती नियम को चुनौती देते हुए जशपुर निवासी बलराम यादव व अन्य दो लोगों ने वकील एएन भक्ता के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की है।

शिक्षाकर्मियों के भर्ती नियम को छत्‍तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। चीफ जस्टिस राजीव गुप्ता, जस्टिस एसके सिन्हा की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के बाद याचिका को स्वीकार कर राज्य शासन को नोटिस जारी किया है। याचिका में  कहा गया है कि इस नियम को बनाने से प्रदेश के हजारों छात्र-छात्राएं परीक्षा में बैठने से वंचित हो गए हैं। इसमें से अधिकतर आदिवासी वर्ग के हैं, जो तृतीय श्रेणी में परीक्षा पास होने के कारण शिक्षाकर्मी भर्ती में शामिल नहीं हो पाएंगे। सुनवाई के बाद कोर्ट ने नोटिस जारी कर राज्य शासन को निर्देशित किया है कि चार सप्ताह में जवाब दें कि आवेदकों के द्वितीय श्रेणी में पास होने की बाध्यता किस आधार पर तय की गई है।

फैसला देने वाले अपर सत्र न्यायाधीश को ही पक्षकार बना दिया

बिलासपुर जिला कोर्ट के एक अपर सत्र न्यायाधीश ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। उन्होंने खुद को एक मामले में पक्षकार बनाने का विरोध किया है। जस्टिस एनके अग्रवाल की सिंगल बेंच ने प्रतिवादी को याचिका से जज का नाम हटाने के लिए तीन दिन का समय दिया है। बिलासपुर निवासी लक्ष्मीचंद शाह ने अपने किराएदार से मकान खाली कराने के लिए भाड़ा नियंत्रण अधिकारी के समक्ष आवेदन किया था। भाड़ा नियंत्रण अधिकारी ने मकान मालिक के पक्ष में आदेश किया, जिसके खिलाफ किराएदार श्यामसुंदर शराफ ने अपर जिला सत्र न्यायाधीश के समक्ष अपील की। कोर्ट ने अपील स्वीकार कर उसके मकान खाली कराने पर रोक लगा दी। इसके खिलाफ मकान मालिक लक्ष्मी शाह ने जिला न्यायालय में पुनरीक्षण याचिका प्रस्तुत की। कोर्ट ने सुनवाई के बाद उसे खारिज कर दिया।

इसके खिलाफ मकान मालिक लक्ष्मी शाह ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी। इसमें अपर जिला सत्र न्यायाधीश को भी व्यक्तिगत तौर पर पक्षकार बनाया गया था। इस पर एडीजे ने वकील अमियकांत तिवारी के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर खुद को पक्षकार बनाने पर आपत्ति करते हुए नाम हटाने का अनुरोध किया। सुनवाई के बाद कोर्ट ने प्रतिवादी मकान मालिक को याचिका से एडीजे का नाम हटाने के लिए तीन दिन का समय दिया है।

Wednesday, November 4, 2009

राज्य औद्योगिक विकास निगम के प्रबंध संचालक को अवमानना नोटिस

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकास निगम (सीएसआईडीसी) के प्रबंध संचालक को अवमानना नोटिस जारी किया है। कोर्ट के आदेश के बाद भी जमीन संबंधी मामले का निराकरण न करने पर जस्टिस एसके सिन्हा की सिंगल बेंच ने नोटिस जारी कर 6 सप्ताह में जवाब देने को कहा है। तिफरा में सिरगिट्टी के पास एएस फन प्राइवेट लिमिटेड की ओर से अशोक अग्रवाल ने वाटर पार्क स्थापित करने के लिए जमीन मांगी थी। इस संदर्भ में उन्होंने सीएसआईडीसी को आवेदन किया। निगम ने आवेदक कंपनी को जमीन एलाट होने की जानकारी देते हुए इसके एवज में 40 लाख रुपए जमा करने के निर्देश दिए। आवेदक की ओर से 10 सितंबर 2008 को 40 लाख रुपए जमा कर दिए गए। रकम जमा करने के बाद लीज का निष्पादन होना था जिसके आधार पर एएस फन प्राइवेट लिमिटेड को जमीन मिलनी थी लेकिन निगम ने जमीन देने की प्रक्रिया पूरी नहीं की।


कंपनी की ओर से इस संबंध में विभाग को लगातार आवेदन दिया गया जिसका कोई असर नहीं हुआ। इसके खिलाफ श्री अग्रवाल ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि सीएसआईडीसी निर्धारित रकम जमा कराने के बाद भी जमीन नहीं दे रहा, जो अवैध है। कोर्ट ने सुनवाई के बाद 7 नवंबर 2008 को आदेश किया कि सीएसआईडीसी याचिकाकर्ता के आवेदन का दो सप्ताह में निराकरण करे। विभाग ने हाईकोर्ट में आवेदन किया कि दो सप्ताह में आवेदन का निराकरण संभव नहीं है।

Tuesday, November 3, 2009

छत्तीसगढ़ स्टेट बार कौंसिल द्वारा व्यावसायिक कदाचरण के आरोप पर तीन वकील निलंबित

छत्तीसगढ़ स्टेट बार कौंसिल ने व्यावसायिक कदाचरण के आरोप सिद्ध होने पर राज्य के तीन वकीलों को निलंबित कर दिया है। स्टेट बार कौंसिल अनुशासन समिति की रविवार को हुई बैठक में वकीलों के व्यावसायिक कदाचरण संबंधी मामले प्रस्तुत किए गए। इसमें समिति के अध्यक्ष पद्म कुमार अग्रवाल, सदस्य कोषराम साहू और सह सदस्य रजनीश निषाद की पीठ ने मामलों की सुनवाई की।

सुनवाई के बाद तीन वकील बिलासपुर के विजयशंकर तिवारी, दुर्ग के वकील नवजीत कुमार रमन और राजनांदगांव के वकील शफीर अहमद को व्यावसायिक कदाचरण का दोषी पाते हुए निलंबित कर दिया गया। इनमें से वकील श्री तिवारी पर अधिवक्ता कल्याण निधि के टिकट के मुद्दे पर वकीलों को गुमराह और भयभीत करने वाले बयान प्रकाशित कराने और बार कौंसिल की छवि धूमिल करने का प्रयास करने का आरोप लगाया गया। कौंसिल ने इसे प्रथम दृष्टया व्यावसायिक कदाचरण मानते हुए स्वप्रेरणा से संज्ञान लेकर अधिवक्ता अधिनियम 1961 की धारा 35 के तहत मामले को अनुशासन समिति के समक्ष प्रस्तुत किया। समिति ने मामले की छानबीन के बाद श्री तिवारी को व्यावसायिक कदाचरण का दोषी पाते हुए एक नवंबर से पांच साल की अवधि के लिए निलंबित कर दिया।

दूसरे मामले में राजनांदगांव जिले के डोंगरगांव निवासी वकील शफीर अहमद के खिलाफ एक अन्य वकील सुरेंद्र कुमार दुबे ने शिकायत की थी कि श्री अहमद ने डोंगरगांव तहसील में नोटरी की नियुक्ति के लिए फर्जी अनुभव प्रमाणपत्र और अन्य फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत किए। वकील होते हुए भी उन्होंने अपना लाइसेंस निरस्त कराए बिना वर्ष 2001-02 में नगर पंचायत डोंगरगांव के माध्यम से तालाबों का ठेका ले लिया।इस मामले की सुनवाई के बाद कदाचरण समिति ने आरोपों को सही पाते हुए वकील श्री अहमद का सात साल के लिए वकील के तौर पर प्रेक्टिस करने पर प्रतिबंध लगा दिया। तीसरा मामला दुर्ग जिले के वकील नवजीत कुमार रमन का है। दुर्ग निवासी भुवनेश्वर लाल वर्मा व अन्य ने वकील के खिलाफ शिकायत की थी कि वे लोक निर्माण विभाग के बेमेतरा संभाग में श्रमिक के तौर पर कार्यरत हैं।

आवेदक और उसके 35 साथियों ने परिवर्तनशील महंगाई भत्ते के दावे के लिए श्रम न्यायालय दुर्ग में वर्ष 2001 में याचिका प्रस्तुत की। इसमें उन्होंने वकील सत्येंद्रनाथ साधू को वकील नियुक्त किया।वकील नवजीत श्री साधु के सहायक बतौर काम करते थे। उनकी मौत के बाद नवजीत ने खुद को श्री साधु का पुत्र बताया। जिस आधार पर आवेदकों ने उन्हें नए सिरे से अपना वकील नियुक्त किया। इसके बाद से नवजीत कुमार मामले का जल्दी फैसला कराने सहित विभिन्न बहाने से काफी रकम ऐंठ ली। इसकी शिकायत बार कौंसिल से की गई। कौंसिल ने सुनवाई के बाद आरोप सही पाने के बाद वकील को तीन साल के लिए प्रेक्टिस करने पर रोक लगाने का आदेश जारी किया।
 

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