Nov 18, 2008

राज ठाकरे

सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को महाराष्ट्र सरकार को राज्य में राज ठाकरे के नेतृत्व में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना, मनसे द्वारा उत्तर भारतीयों और गैर-मराठियों के खिलाफ चलाए गए हिंसक अभियान को रोकने के लिए कारगर कदम उठाने में कथित तौर पर असफल रहने के लिए नोटिस जारी किया ।

परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने बिहारी युवक राहुल राज, जो विवादास्पद पुलिस मुठभेड़ में मारा गया था और उत्तर प्रदेश के एक व्यक्ति की पिछले महीने मुंबई की रेल में हुई हत्या की न्यायिक जांच कराने की अपील ठुकरा दी ।

यह आदेश मुख्य न्यायाधीश के.जी बालाकृष्णन की अध्यक्षता में न्यायिक पीठ ने जारी किये, जो महाराष्ट्र में मनसे द्वारा हाल में कथित तौर पर की गई हिंसा और बिहार तथा झारखंड जैसे अन्य राज्यों में इसके बाद हुई प्रतिक्रियाओं और प्रदर्शनों से संबंधित दो अलग-अलग जनहित याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी ।

वकील सुग्रीव दुबे ने आरोप लगाया था कि हाल ही में जब श्री राज ठाकरे द्वारा भड़काए जाने पर भीड़ ने दो उत्तर भारतीय डॉक्टर भाइयों- 35-वर्षीय अजय और 33-वर्षीय विजय दुबे की हत्या की थी, तो राज्य पुलिस मूक दर्शक बनी रही थी । अदालत ने महाराष्ट्र सरकार से इस आरोप का जवाब देने के लिए कहा है ।

श्री दुबे, जो दिल्ली स्थित व्यापारी सलेक चंद जैन की ओर से पैरवी कर रहे थे, ने कहा कि मनसे द्वारा उत्तर भारतीयों पर किये गए कथित हमलों के कारण देश में अन्यत्र उससे संबंधित प्रतिक्रियाएं हुई हैं, जिनसे राष्ट्र की एकता और अखंडता के नष्ट होने का खतरा है ।

वकील ने यह भी कहा कि राज्य में संवैधानिक संकट है और केंद्र भी मूक दर्शक बना रहा तथा उसने राज्य के अधिकारियों को आवश्यक निर्देश देने के लिए संविधान की धारा-355 के तहत अपने अधिकारों का प्रयोग नहीं किया, लेकिन पीठ ने गृह मंत्रालय के खिलाफ कोई निर्देश जारी नहीं किया । 
उधर महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री आर.आर पाटिल ने सोमवार को मुंबई में कहा कि महाराष्ट्र सरकार इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी नोटिस का जवाब देगी । उन्होंने कहा कि हम विस्तृत जवाब देंगे और अपनी स्थिति का खुलासा करेंगे ।

श्री पाटिल, जो गृह मंत्रालय भी देखते हैं, ने पत्रकारों को बताया कि कानून एवं न्याय विभाग को इस मुद्दे पर विवरण तैयार करने के लिए कहा जाएगा ।

Nov 8, 2008

दिल्ली उच्च न्यायालय नें दिया समलिंगी यौन संबंध को मान्‍यता

दिल्‍ली उच्च न्यायालय की खंडपीठ में प्रस्‍तुत  एक याचिका में समलिंगी संगठनों द्वारा समलिंगी यौन संबंधों पर से कानूनी पाबंदी हटाने की मांग की गई थी, इसकी सुनवाई के दौरान यह स्‍पस्‍ट किया गया कि भारत में समलिंगी यौन संबंध कानूनी रूप से अवैध हैं. किन्‍तु दिल्ली उच्च न्यायालय ने समलिंगी यौन संबंधों को कानूनी मान्यता देते हुए कहा है कि ऐसे संबंधों को अस्वास्थ्यकर नहीं कहा जा सकता.

न्यायालय ने विश्व स्वास्थ्य संगठन का हवाला देते हुए कहा कि, कई देशों ने समलिंगी यौन संबंधों को मान्यता दी है, लेकिन वहाँ पर किसी ने भी इससे कोई बिमारी होने का दावा नहीं किया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन भी यह नहीं कहता कि यह अस्वास्थ्यकर है. लोग तो हर जगह एक जैसे ही होते हैं.”

समाचार - 

दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 (अप्राकृतिक यौन संबंध) को समाप्त करने की माँग करने वाली नाज फाउंडेशन की याचिका पर शुक्रवार को फैसला सुरक्षित रखा।

मुख्य न्यायाधीश एपी शाह और न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर की खंडपीठ ने सभी पक्षों की लंबी जिरह सुनने के बाद फैसला सुरक्षित किया। इस मामले पर पिछले कई दिनों से दिन-प्रतिदिन सुनवाई हो रही थी।

नाज फाउंडेशन की ओर से वकील आनंद ग्रोवर ने कहा कि आईपीसी की धारा 377 ब्रिटिश राज में इंग्लैंड के समलैंगिक यौन संबंध के कानून की तर्ज पर 1860 में लागू की गई थी, लेकिन अब बदलते समय के अनुरूप कानून को समाप्त किए जाने की आवश्यकता है।

केन्द्र सरकार धारा 377 को बरकरार रखने के पक्ष में है। अतिरिक्त सालिसिटर जनरल पीपी मल्होत्रा ने धारा 377 समाप्त करने का विरोध किया। उन्होंने कहा कि इससे एचआईवी के फैलने की आशंका बढ़ जाएगी।

मल्होत्रा ने कहा देश में असामान्य यौन संबंधों को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। परम्परागत मूल्यों का हमारा लंबा इतिहास है, ऐसा होने से इन मूल्यों में गिरावट आएगी। उन्होंने अपने तर्क के समर्थन में एक धार्मिक उद्धरण का भी उल्लेख किया।

इससे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार से कहा कि स्वास्थ्य और समाज को समलैंगिक यौन संबंधों से होने वाले नुकसान के अपने दावे की पुष्टि के लिए और वैज्ञानिक प्रमाण प्रस्तुत करे।

नाज फाउंडेशन के एक समलैंगिक अधिकार कार्यकर्ता की अप्राकृतिक यौन संबंधों को औपनिवेश काल का कानून बताते हुए दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश एमपी शाह और न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर ने समलैंगिक यौन संबंधों पर प्रतिबंध लगाने के लिए सरकार को और वैज्ञानिक तथ्य प्रस्तुत करने को कहा है।

न्यायालय ने धारा 377 (अप्राकृतिक यौन संबंध) को भारतीय दंड संहिता में बनाए रखने के लिए अपर्याप्त तथ्य प्रस्तुत करने के लिए केन्द्र सरकार की खिंचाई भी की। धारा 377 ब्रिटिश राज में 1860 में इंग्लैंड के कानून की तर्ज पर लागू की गई थी।

 
नई सदी में अब ऐसे भी मामलों पर रूचिकर बहस और चर्चा योग्‍य निर्णय आ रहे हैं जिसे कामुक पत्र पत्रिकाओं एवं साईटों पर नमक मिर्च के साथ प्रस्‍तुत किया जा सके ।  इन्‍हीं मामलों में भारत का विकास कुछ ज्‍यादा हो रहा है ........

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