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Aug 9, 2012

सरकारी पदों पर भर्ती में बिना विज्ञापन निकाले नहीं, सबको मिले अधिकार

माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में राज्य शासनसमुंद, जगदलपुर, दुर्ग आदि कार्यालयों में हुई। वर्ष 2010 में वाणिज्य कर आयुक्त ने आदेश जारी किया कि वाणिज्य कर कार्यालयों में डाक वाहकों के पद पर सीधी भर्त२े यह स्पष्ट कहा है कि सरकारी नियुक्तियों पर सबका अधिकार है और कोई भी भर्ती बिना सबको भाग लेने का मौका दिए की जाना असंवैधानिक और अवैध है।

याचिकाकर्ता वीरू यादव, गजानंद लहरे, प्रीतम नामदेव, रविकांत चेलक एन. रामू तथा अन्य कई की नियुक्ति डाक वाहक या प्रोसेस सर्वर के रूप में कलेक्टर दर पर वर्ष 2008 में वाणिज्य कर विभाग के रायपुर, महासमुंद, जगदलपुर, दुर्ग आदि कार्यालयों में हुई। वर्ष 2010 में वाणिज्य कर आयुक्त ने आदेश जारी किया कि वाणिज्य कर कार्यालयों में डाक वाहकों के पद पर सीधी भर्ती रोजगार कार्यालय से नाम मंगवाकर की जाएगी।

उपसंभागायुक्त वाणिज्य कर ने भी सीधे रोजगार कार्यालय को पत्र लिखकर नाम भेजने को कहा। याचिकाकर्ता जो कि इस आस में कि सीधी भर्ती होने पर उन्हें भी सभी की तरह खुली प्रतियोगिता में भाग लेकर नियमित भर्ती का मौका मिल पाएगा इस निर्णय से उक्त पदों पर भर्ती होने से वंचित हो गए। विभाग के उक्त कृत्य से व्यथित होकर याचिकाकर्ताओं ने अधिवक्ता जितेंद्र पाली तथा वरुण शर्मा की ओर से याचिका प्रस्तुत की। माननीय उच्च न्यायालय ने याचिका स्वीकार करते हुए नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगा दी तथा राज्य शासन व अन्य प्रतिवादियों को जवाब प्रस्तुत करने को कहा। उक्त याचिका में राज्य शासन तथा वाणिज्यकर विभाग ने जवाब प्रस्तुत कर यह तर्क लिया कि याचिकाकर्ता दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी हैं अतः उन्हें कोई अधिकार नहीं है और रोजगार कार्यालय से नाम मंगवाने का निर्णय प्रशासकीय निर्णय है।

वर्ष 2008 में माननीय उच्च न्यायालय ने दरबार सिंह पोर्ते विरुद्ध छग शासन के फैसले में ऐसी ही स्थिति का विचारण करते हुए यह धारित किया है कि केवल रोजगार कार्यालय से नाम मंगवा लेने से खुली प्रतियोगिता की संवैधानिक आवश्कयता पूर्ण नहीं होती। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 के परिपालन में यह राज्य शासन का दायित्व है कि आमजनता को खुला निमंत्रण (विज्ञापन द्वारा) देकर भर्ती की जानी चाहिए।

उक्त मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क रखा गया कि केवल रोजगार कार्यालय से नाम मंगवाने से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 व 16 द्वारा प्रस्तावित आवश्कयताएं पूर्ण नहीं होती हैं तथा ऐसा करना शासकीय पदों पर नियुक्ति की संवैधानिक व्यवस्था तथा योजना के विरुद्ध हैं। माननीय सर्वोच्च न्यायालय तथा माननीय छग उच्च न्यायालय के द्वारा भी ऐसी भर्तियों को नियम विरुद्ध बताया गया है। माननीय उच्च न्यायालय ने मामले की अंतिम सुनवाई करते हुए वाणिज्यकर आयुक्त के रोजगार कार्यालय से नाम मंगवाकर भर्ती किए जाने के आदेश दिनांक 04 जनवरी 2010 को निरस्त करते हुए नियमानुसार संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप भर्ती करने का निर्देश दिया है। उक्त आदेश के निरस्त होने के फलस्वरूप उपरोक्त आदेश के पालन में शुरू की गई भर्ती प्रक्रिया स्वयमेव निरस्त हो गई है। उक्त आदेश से अब वाणिज्य कर विभाग के रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, महासमुंद, जगदलपुर आदि सभी वृत्तों में डाकवाहकों की नियुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

Aug 8, 2012

सेवा निवृत्ति के पश्चात कटौती अवैध, पूरा पैसा लौटाए विभाग

याचिका कर्ता मन्नूलाल देवांगन केलो परियोजना जल संसाधन विभाग से सहायक अभियंता के पद पर कार्य करते हुए वर्ष 2007 में सेवा निवृत्त हुए। जनवरी 2008 में विभाग ने याचिका कर्ता का पेंशन अदायगी आदेश जारी किया जिसके द्वारा याचिका कर्ता की पेंशन राशि से 44933 रू की वसूली किये जाने का निर्देश दिया गया ।उक्त वसूली आदेश जारी किये जाने के पूर्व याचिका कर्ता को कोई नोटिस अथवा सूचना नही दी गई और ना ही याचिकाकर्ता को कोई कारण बताया गया की  वसूली क्यों की जा रही हैं। याचिकाकर्ता ने विभाग को अभ्यावेदन प्रस्तुत कर यह निवेदन किया कि इस तरह की एकतरफा वसूली अवैध है तथा माननीय सर्वोच्च न्यायालय तथा माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के द्वारा ऐसी वसूलियों को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ बताया हैं। विभाग द्वारा कोई सुनवाई नही किये जाने पर याचिकाकर्ता ने अधिवक्ता जितेन्द्र पाली तथा वरुण शर्मा के माध्यम से याचिका प्रस्तुत की जिसमे माननीय उच्च न्यायालय ने राज्य शासन तथा जल संसाधन विभाग को नोटिस जारी करते हुए यह पुछा था कि लोगों को कोर्ट जाने हेतु विवष क्यो किया जा रहा है। उक्त याचिका की अंतिम सुनवाई करते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता के खिलाफ की गई वसूली को अवैध ठहराते हुए याचिकाकर्ता को सम्पूर्ण राशि लौटाये जाने का निर्देश विभाग को दिया है।

निजी डेंटल कालेज ने षासकीय कोटे के छात्रों को निकाला, हाईकोर्ट ने नोटिस जारी कर जवाब मांगा

याचिकाकर्ता अदिति जैन व अन्य दंत चिकित्सा में स्नातक हैं। छग डेंटल कालेज एंड
रिसर्च इंस्टीट्यूट राजनांदगांव में स्थित एक निजी डेंटल कालेज है जहां दंत चिकित्सा में स्नातक तथा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम पढ़ाए जाते हैं। उक्त निजी कालेज को राज्य शासन ने वर्ष 2008 में केवल एक वर्ष के लिए अल्पसंख्यक संस्था की मान्यता दी थी।

राज्य शासन ने वर्ष 2012 में दंत चिकित्सा के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम एमडीएस कोर्स में प्रवेश हेतु नियम बनाए। उक्त नियमो में राज्य शासन ने यह स्पष्ट किया कि सभी पाठ्यक्रमों में प्रवेश शासकीय नियमानुसार ही होगा। राज्य शासन के द्वारा छत्तीसगढ़ आयुश तथा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय को प्रवेश परीक्षा करवाने हेतु अधिकृत किया। यह उल्लेखनीय है कि दंत चिकित्सा तथा उससे संबंधित पाठ्यक्रम डेंटल काउंसिल आफ इंडिया यानि डीसीआई के द्वारा नियंत्रित होते हैं जोकि केंद्र शासन की एक सशक्त संस्था है। डीसीआई ने एमडीएस पाठ्यक्रम हेतु रेगुलेशन अर्थान नियमावली 2007 जारी की है जिसके अनुसार किसी भी कालेज में दंत चिकित्सा के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में 50 प्रतिषत सीटें शासकीय कोटे से भरी जानी आवश्यक हैं। डीसीआई के दिशानिर्देशों के विपरीत कोई भी प्रवेश नहीं हो सकता।

इसी वर्ष 9 मई 2012 को राज्य शासन ने संचालक चिकित्सा शिक्षा को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि छग डेंटल कालेज ने कोई अल्पसंख्यक स्वरूप का प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया है तथा उक्त संस्था में 50 प्रतिषत सीटें षासकीय कोटे से भरी जाएंगी। उक्त आदेश का कोई विरोध छग डेंटल कालेज ने नहीं किया। इसी बीच दिनांक 24 मई 2012 को स्नातकोत्तर प्रवेश परीक्षा आयोजित हुई जिसमें सभी याचिकाकर्ता सम्मिलित हुए और सभी ने प्रावीण्य में स्थान प्राप्त किया। उक्त परीक्षा के पश्चात काउंसिलिंग दिनांक 30 मई को रखी गई। उसी दिन छग डेंटल कालेज ने एक प्रेस सूचना जारी करते हुए यह कहा कि माननीय छग उच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसार छग डेंटल कालेज में कोई शायकीय कोटे की सीट नहीं है तथा छात्र उनके कालेज में काउंसिलिंग से प्रवेश न लें। उक्त प्रेस नोट के जवाब में संचालक चिकित्सा शिक्षा ने तत्काल छग डेंटल कालेज को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि कालेज के द्वारा अपने अल्पसंख्यक होने के संबंध में कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया है इसलिए शासन को कालेज का अल्पसंख्यक संस्थान होना मान्य नहीं है और शासकीय कोटे से प्रवेश देना होगा।

याचिकाकर्ताओं ने दिनांक 30 मई 2012 को आयोजित काउंसिलिंग में छग डेंटल कालेज को प्रवेश हेतु चुना और कालेज ने सभी याचिकाकर्ताओं का प्रवेश मान्य करते हुए उनसे फीस आदि जमा करवा कर प्रवेश दे दिया। साथ ही यह पत्र भी दे दिया कि उनके कालेज में शासकीय कोटे की कोई सीट नहीं है अतः सभी याचिकाकर्ता अपनी स्वयं की जिम्मेदारी पर प्रवेश लें। सभी याचिकाकर्ता उक्त कालेज में डेढ़ महीने तक पढ़ते भी रहे। दिनांक 18 जुलाई 2012 को
राज्य शासन ने कालेज को पत्र लिखकर कहा कि आपके पास 17 सीटें हैं और आपने 22 छात्रों को प्रवेश दिया है अतः 5 सीटों के प्रवेश रद्द करें। उक्त आदेश का बहाना लेकर कालेज ने सभी याचिकाकर्ता जोकि नियमानुसार शासकीय कोटे के छात्र थे उनका प्रवेश रद्द कर दिया।

याचिकाकर्ताओं ने अधिवक्ता जितेंद्र पाली तथा वरुण शर्मा के माध्यम से माननीय उच्च न्यायालय में याचिका प्रस्तुत की जिसमें माननीय उच्च न्यायालय ने राज्य शासन, डीसीआई, संचालक चिकित्सा शिक्षा तथा छग डेंटल कालेज को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

Feb 2, 2012

प्रतिबंध अवधि में स्थानांतरण उचित नहीं, शासन के आदेश पर यथास्थिति

माननीय उच्च न्यायालय छत्तीसगढ के न्यायमूर्ति श्री सतीश अग्निहोत्री जी की एकलपीठ ने वन विभाग द्वारा जारी स्थानांतरण आदेश पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश करते हुए सचिव वन विभाग, प्रधान मुख्य वन संरक्षक तथा वन संरक्षक कार्य आयोजना वनमंडल जांजगीर चांपा को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है।

याचिकाकर्ता सी.पी भारद्वाज की पोस्टिंग कार्यआयोजना जांजगीर चांपा में वर्ष 2008 में की गई थी। कार्य आयोजना का कार्य पूर्ण हो जाने पर याचिकाकर्ता का स्थानांतरण करते हुए वर्ष 2010 में सक्ती भेजा गया। याचिकाकर्ता की सेवानिवृत्ति में एक वर्ष से कम अवधि बचे होने के बावजूद दिनांक 07.01.2012 को नए स्थानांतरण आदेश जारी करते हुए पुनः कार्य आयोजना जांजगीर चांपा भेज दिया गया जिसका कार्य पूर्ण हो चुका है। उक्त स्थानांतरण आदेश में याचिकाकर्ता के अतिरिक्त 35 अन्य का भी स्थानांतरण किया गया।

अधिवक्ता जितेन्द्र पाली
याचिकाकर्ता ने उक्त स्थानांतरण आदेश को अधिवक्ता जितेन्द्र पाली, वरुण शर्मा के माध्यम से माननीय उच्च न्यायालय में चुनौती दी। तर्क यह था कि स्थानांतरण जोकि शासकीय सेवा की एक अनिवार्य घटना है तथा नियोजक के रूप में शासन का विशेष अधिकार है स्थानांतरण नीति से नियंत्रित होता है। छत्तीसगढ़ शासन ने इस सत्र 2011-12 के लिए स्थानांतरण नीति निर्धारित की है जिसमें स्थानांतरण करने की अंतिम तिथि 15 जुलाई 2011 नियत की गई है तथा उसके पश्चात स्थानांतरण पर प्रतिबंध रखा गया है। दिनांक 08 अगस्त 2011 को एक और आदेश जारी कर राज्य शासन ने यह व्यवस्था दी है कि प्रतिबंध अवधि में अत्यंत आवश्यक परिस्थिति में प्रमुख सचिव के समन्वय में मुख्य मंत्री से अनुमति पश्चात ही स्थानांतरण किए जाने है।

याचिकाकर्ता के स्थानांतरण हेतु कोई अत्यंत आवश्यक परिस्थिति उपलब्ध नहीं है। माननीय उच्च न्यायालय ने बड़ी संख्या में स्थानांतरण को अत्यंत आवश्यक परिस्थिति हेतु दी गई सुविधा का दुरूपयोग पाते हुए याचिकाकर्ता के स्थानांतरण पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश करते हुए राज्य शासन तथा अन्य प्रतिवादियों से जवाब मांगा है। राज्य शासन द्वारा स्थानांतरण की अंतिम तिथि नियत करने के पीछे मंशा यही थी कि लोकसेवकों को अनावश्यक रूप से सत्र के बीच में होने वाले स्थानांतरणों से परेशान न होना पड़े।

बिना किसी विधिक आधार के नागरिकों के अधिकार नहीं छीन सकती सरकार

माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की माननीय न्यायमूर्ति श्री सुनील कुमार सिन्हा तथा राधेश्याम शर्मा की खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 162 की व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया है कि सरकार उक्त अनुच्छेद में प्राप्त शक्तियां बिना किसी विधिक आधार के नागरिकों के अधिकारों का हनन करने के लिए प्रयोग नहीं कर सकती।

याचिकाकर्ता जयंत किशोर, अर्पिता शुक्ला, पूजा तिवारी, भेवेन्द्र कुमार तथा अन्य ने माननीय उच्च न्यायालय में संचालक तकनीकी शिक्षा के परिपत्र दिनांक 12.07.2010 तथा 20.08.2010 को चुनौती दी जिसके तहत राज्य शासन ने सभी विश्वविद्यालयों को आदेश जारी किया था कि ऐसे अभ्यर्थी जिन्होंने इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा पीइटी, एआईइइइ आदि में शून्य अथवा ऋणात्मक अंक प्राप्त किए हैं उन्हें किसी बीई कोर्स में प्रवेश की पात्रता नहीं होगी। सभी याचिकाकर्ताओं ने अलग अलग निजी महाविद्यालयों में मैनेजमेंट कोटा की महंगी सीटों में उक्त परिपत्रों के जारी होने से पहले ही प्रवेश ले लिया था। स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय ने उक्त परिपत्रों के आधार पर सभी याचिकाकर्ताओं का नामांकन करने से इन्कार कर दिया। माननीय उच्च न्यायालय ने याचिका की आरंभिक सुनवाई में अंतरिम आदेश जारी करते हुए सभी याचिकाकर्ताओं को परीक्षा में बैठाने का आदेश दिया। माननीय न्यायालय के अंतरिम आदेशों के तहत सभी याचिकाकर्ता तीसरे सेमेस्टर तक पढ़ाई पूर्ण कर चुके थे।

अधिवक्ता जितेन्द्र पाली
मामले की अंतिम सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता संदीप दुबे, मनोज परांजपे, जितेन्द्र पाली, वरूण शर्मा ने तर्क रखा कि छत्तीसगढ़ इंजीनियरिंग स्नातक पाठ्यक्रम प्रवेश नियम,2010 के नियम 2.4 1⁄4ए1⁄2 के तहत सभी निजी इंजीनियरिंग कालेजों में 15 प्रतिशत सीटें मैनेजमेंट अथवा प्रबंधन कोटा होता है। उक्त प्रबंधन कोटे में छग तथा बाहर के राज्यों के छात्र भी पीईटी अथवा एआईइइइ जैसी प्रवेश परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर प्रवेश हेतु पात्र होते हैं। उक्त प्रबंधन कोटे में प्रवेश हेतु काउंसिलिंग कालेज स्तर पर होती है। उक्त प्रवेश नियम में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि पीइटी, एआइइइइ में कितने अंक न्यूनतम होंगे। अतः संचालक तकनीकी शिक्षा का परिपत्र नियम विरूद्ध है तथा याचिकाकर्ताओं के शिक्षा के मूल अधिकारों का हनन करता है। उक्त परिपत्र सक्षम अधिकारी द्वारा जारी नही किया गया है। राज्य शासन ने अपने द्वारा जारी परिपत्रों का पुरजोर समर्थन करते हुए यह तर्क
रखा कि संविधान के अनुच्छेद 162 के अंतर्गत राज्य शासन को परिपत्र जारी करने का अधिकार है। उक्त परिपत्र शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के उद्देश्य से जारी किए गए हैं।

माननीय उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय की नजीरों पर विचार करते हुए तथा अनुच्छेद 162 की व्याख्या करते हुए यह धारित किया है कि अनुच्छेद 162 के अंतर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग केवल उन स्थानों पर हो सकता है जहां संसद अथवा विधानसभा द्वारा पारित कोई कानून उपलब्ध न हो। जहां कोई कानून उपलब्ध हो वहां उस कानून के विपरीत कोई भी परिपत्र अनुच्छेद 162 के अंतर्गत जारी नहीं किया जा सकता। राज्य शासन इस प्रकरण में कोई भी ऐसा विधिक आधार प्रस्तुत नहीं कर सका जिसके तहत परिपत्र जारी किया गया है। वर्ष 2011-12 में जारी प्रवेश नियम में न्यूनतम अंक का प्रावधान रखा गया है परंतु वर्ष 2010 में प्रवेश लिए अभ्यर्थियों पर केवल आधारहीन परिपत्र के द्वारा रोक लगाना अनुचित है तथा संविधान की मूल आस्था के खिलाफ है। इस प्रकार माननीय उच्च न्यायालय ने सभी याचिकाकर्ताओं का प्रवेश वैध ठहराया है। स्वामी विवेकानंद विवि को भी निर्देशित किया है कि याचिकाकर्ताओं का नामांकन कर उन्हें बी.ई कोर्स बिना किसी बाधा के पूर्ण कराने के आदेश जारी किए हैं।

राज्य शासन की अपील खारिज

माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने गुरूवार को राज्य शासन द्वारा प्रस्तुत की गई उस अपील को खारिज कर दिया है जिसमें राज्य शासन ने मंडल संयोजकों को मुख्य कार्यपालन अधिकारी विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी के पद पर पदोन्नति दिए जाने संबंधी माननीय उच्च न्यायालय के एकल पीठ के आदेश को चुनौती दी थी। मंडल संयोजकों के पद पर पिछले 20 से 25 वर्षों से अधिक अवधि तक कार्य करने के पश्चात एक भी पदोन्नति न मिलने से क्षुब्ध मंडल संयोजकों की याचिका स्वीकार करते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने वर्ष 2010 में राज्य शासन के अजा अजजा कल्याण विभाग को मंडल संयोजकों की पदोन्नति हेतु 4 माह में डीपीसी आयोजित करने का आदेश जारी किया था। उक्त आदेश का परिपालन न करने के कारण राज्य शासन को अवमानना की कार्यवाही भी झेलनी पड़ी जिसमें क्षमा मांगते हुए राज्य शासन ने आदेश समझने में भूल होने का कारण बताते हुए और समय चाहा जो माननीय उच्च न्यायालय ने न्यायहित में दिया। समय मिलने के बाद भी राज्य शासन ने पदोन्नति की कार्यवाही नहीं की तथा माननीय उच्च न्यायालय की खंडपीठ में अपील प्रस्तुत की जिसे बाद में यह कह कर वापस ले लिया कि वे एकल पीठ के समक्ष पुनरीक्षण याचिका प्रस्तुत करना चाहते हैं।

एकल पीठ ने पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी उसे लेकर राज्य शासन ने पुनः अपील दायर की जिसमें एकलपीठ के द्वारा पारित आदेश तथा पुनरीक्षण आदेश को चुनौती दी गई थी। मंडल संयोजकों की ओर से अधिवक्ता जितेन्द्र पाली, वरूण शर्मा ने मंडल संयोजकों का पक्ष रखा । माननीय न्यायालय ने राज्य शासन से प्रश्न किया की नियमानुसार कार्यवाही करने में क्या कठिनाई है। अंततः निचले सभी आदेशों को सही पाते हुए तथा राज्य शासन के तर्कों की सुनवाई करते हुए माननीय न्यायमूर्ति श्री सुनील सिन्हा तथा राधेश्याम शर्मा ने राज्य शासन की अपील खारिज कर दी है तथा जिससे मंडल संयोजकों की पदोन्नति विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी तथा मुख्य कार्यपालन अधिकारी के पद पर होने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

Nov 18, 2011

नया रायपुर योजना पर जवाब दे सरकार, किसानों की कीमत पर शहरीकरण क्‍यों

छत्‍तीसगढ़ उच्‍च न्‍यायालय ने शुक्रवार को नयी राजधानी प्रभावित किसान विकास समिति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्‍य शासन, नया रायपुर विकास प्राधिकरण, कलेक्‍टर रायपुर, केंद्र शासन आदि को नोटिस जारी किया है साथ ही स्‍थगन आवेदन पर सुनवाई हेतु मामले को सुनवाई हेतु अगले सप्‍ताह की तिथि दी है । 




छत्‍तीसगढ़ शासन की बहुचर्चित तथा महत्‍वाकांक्षी नयी राजधानी योजना छत्‍तीसगढ़ राज्‍य बनने के साथ ही चर्चा में आ गई थी। वर्ष 2002 में ही किसानों के हितों को द‍रकिनार करते हुए आवास एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी आदेश के तहत रायपुर शहर के जय स्‍तंभ चौक को केंद्र मानकर 30 किमी की परिधि में आने वाले सभी गांवों में जमीन खरीद बिक्री पर रोक लगा दी गई । पहले राजधानी क्षेत्र फिर नया रायपुर विकास प्राधिकरण नारडा बना कर 61 गांवों की उपजाउ जमीन हथियाने हेतु नया रायपुर विकास योजना 2031 लागू की गई । 2005 में यह आदेश जारी किया की बिक्री पर रोक नारडा के पक्ष में जमीन बेचने पर लागू नहीं होगी। वर्ष 2007 में जबरिया अधिग्रहण की अधिसूचना जारी की गई जिसका किसानों द्वारा विरोध किया गया। किसानों के विरोध को देखते हुए नारडा तथा राजस्‍व अधिकारियों ने किसानों को यह कहकर धमकाया कि हमारे कहे अनुसार जमीन नारडा को बेच दो नहीं तो अधिग्रहण करने पर कौडियों के दाम पर जमीन छीन लेंगे। सहमे किसानों ने सरकारी अधिकारियों के दबाव में औने पौने जमीन नारडा को बेच दी। जिन गांवों में विरोध ज्‍यादा था वहां भूअधिग्रहण कानून का बेजा इस्‍तमाल करते हुए धारा 4 की अधिसूचना प्रकाशित की गई तथा आपात स्थिति होने के प्रावधानों का डंडा दिखाते हुए किसानों को यह कहा गया कि अब तो भूमि सरकार की हो गई है अब भी नारडा को बेच दो नहीं तो जमीन गई समझो। 

जिन किसानों ने जमीन बेचने में ही भलाई समझी उनकी जमीनों को अधिग्रहण क्षेत्र से बाहर कर नारडा ने खरीद ली। किसान ठगे गए । नारडा जमीन हथियाने में इस तरह मशगूल रहा कि कई गांवों में आज तक भूअधिग्रहण के अवार्ड तक पारित नहीं हुआ और भू अर्जन की धमकी के आधार पर जमीन हथियाने का धंधा जारी है। गांव के गांव उजड़ गए हैं जो आधे बचे हैं उनकी निस्‍तार भूमि तक नारडा ने नहीं छोड़ी है और भूमि हुडको के पास बंधक बना कर अमीरों के आशियाने बनाए जाने की योजना जारी है। कई किसानों की भूमि अधिग्रहण किए बिना ही निर्माण कार्य कर लिया गया है। लुभावनी पुनर्वास नीति दिखा कर किसानों को ठगा गया है। जमीन खो देने के बाद जब किसानों ने बदले में पुर्नवास हेतु जमीन मांगी तो नारडा ने टका सा जवाद दे दिया कि भूमि के बदले भूमि देने की कोई योजना नहीं है। 




किसान सपरिवार गांव छोड़कर शहरों में मजदूरी करने को बाध्‍य हो गए हैं। वेदांता जैसे धनी समूहों को 1 रूपए की दर पर भूमि आबंटित की गई है किसानों के सैकड़ों अभ्‍यावेदनों पर सरकारी धूल पड़ी हुई है। पांच सितारा होटल, गोल्‍फ कोर्स, थीम टाउनशिप जैसे अमीरों के शौक पूरे करने के लिए महानदी के निकटवर्ती सर्वाधिक उपजाउ क्षेत्र को लगभग नष्‍ट कर दिया गया है। पर्यावरण नियमों को ताक पर रखकर बिना उचित पर्यावरण सहमति लिए योजना को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है जिससे खेती योग्‍य भूमि की कमी होने की संभावना है। 

 किसानों ने सभी तरफ से दरवाजे बंद देखकर माननीय उच्‍च न्‍यायालय में वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता श्री कनक तिवारी, अधिवक्‍ता जितेंद्र पाली तथा वरूण शर्मा के माध्‍यम से याचिका प्रस्‍तुत की जिसकी सुनवाई करते हुए माननीय न्‍यायमूर्ति श्री सतीश अग्निहोत्री जी की एकल पीठ ने संज्ञान लेते हुए सभी प्रतिवादियों से जवाब प्रस्‍तुत करने को कहा है। साथ ही अंतरिम आदेश की सुनवाई हेतु मामले को अगले सप्‍ताह लगाने का आदेश पारित किया है।




Aug 30, 2011

कमल विहार योजना के अंतर्गत याचिकाकर्ताओ की भूमि पर उच्‍च न्‍यायालय का पहला स्‍थगन

याचिकाकर्ता राजेन्‍द्र शंकर शुक्‍ला व अन्‍य की निजी भूमि ग्राम डूमरतराई रायपुर में स्थित है। राज्‍य शासन ने वर्ष 2008 में कमल विहार इंटीग्रेटेड टाउनशिप के नाम से एक योजना बनाई जिसमें कुल 416 एकड़ भूमि पर विकास कर एक छोटी टाउनशिप बनाई जानी थी। उक्‍त योजना को राज्‍य सरकार से अनुमति मिल गई थी। वर्ष 2009 में रायपुर विकास प्राधिकरण आरडीए के कहने पर उक्‍त योजना का आकार बढ़ाकर 2300 एकड़ कर दिया गया तथा इस आशय की अधिसूचना जारी कर दी गई । उक्‍त अधिसूचना के द्वारा दावाआपत्ति मंगवाई गई जिसमें याचिकाकर्ता समेत लगभग 2500 लोगों ने उक्‍त योजना के विरोध में आपत्ति दर्ज करवाई। इसी दौरान जून 2010 में आरडीए ने बैठक कर उक्‍त योजना को अंतिम रूप दे दिया तथा उक्‍त योजना जोकि एक छोटी योजना होनी थी उसे कमल विहार नगर विकास योजना का रूप दे दिया। उक्‍त योजना छग नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम 1973 के प्रावधानों के विपरीत होने से याचिकाकर्ता तथा अन्‍य प्रभावित लोगों ने अपने अपने स्‍तर पर विरोध दर्ज कराया। उक्‍त योजना की सबसे बड़ी खामी यह थी कि संबंधित ग्राम पंचायतों तथा नगर निगम से जोनल प्‍लान मंगाए बिना ही नगर विकास योजना को लागू कर दिया गया है जोकि अवैध है। 




राज्‍य शासन ने आपत्तियों की सुनवाई किए बगैर आनन फानन में अधिसूचना जारी करते हुए योजना के क्रियान्‍वयन हेतु निविदाएं आमंत्रित करना आरंभ कर दिया। याचिकाकर्ताओं द्वारा बताया गया है कि राज्‍य शासन के व्‍यवहार से क्षुब्‍ध याचिकाकर्ताओं ने वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता श्री कनक तिवारी के माध्‍यम से माननीय उच्‍च न्‍यायालय बिलासपुर में पी.सैम कोशी, जितेन्‍द्र पाली तथा वरुण शर्मा के द्वारा याचिका प्रस्‍तुत की। उक्‍त याचिका की प्रारंभिक सुनवाइयों में उच्‍च न्‍यायालय ने राज्‍य शासन, आरडीए तथा संबंधित ग्राम पंचायतों को प्रतिउत्‍तर प्रस्‍तुत करने हेतु समय दिया परंतु 4 माह से अधिक का समय बीतने पर भी राज्‍य शासन तथा आरडीए की ओर से कोई उत्‍तर प्रस्‍तुत नहीं किया गया। 




सुनवाई की तारीख आने पर आरडीए द्वारा आनन फानन में अन्‍य याचिका में प्रस्‍तुत जवाब को अपनाने संबंधी आवेदन दिया गया। राज्‍य शासन द्वारा जवाब प्रस्‍तुत करने हेतु अवसर की मांग की गई तथा बताया गया कि केवल अधोसंरचनात्‍मक कार्यों हेतु निविदाएं जारी की गई हैं । याचिका की सुनवाई करते हुए माननीय न्‍यायमूर्ति श्री सतीश अग्निहोत्री जी की एकलपीठ ने बिना विधिक अधिग्रहण किए निजी भूमि पर प्रवेश करना विधिविरुद्ध पाते हुए तथा राज्‍य शासन को य‍ह निर्देश जारी किया है कि याचिकाकर्ताओं की भूमि पर कमल विहार योजना से संबंधित कोई भी निर्माण कार्य भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही किए बिना न किया जाए। 




माननीय उच्‍च न्‍यायालय ने कमल विहार योजना के विरुद्ध दायर सभी याचिकाओं की सुनवाई की अगली तारीख 21 सितंबर तय की है।

Jun 27, 2011

मुख्‍य सचिव, प्रधान मुख्‍य वन संरक्षक और प्रधान वन संरक्षक को नोटिस जारी


माननीय उच्‍च न्‍यायालय, बिलासपुर ने लोक आयोग की सिफारिश के आधार पर बिना सम्‍यक विचार किए विभागीय जांच आरंभ करने पर छग शासन के मुख्‍य सचिव तथा प्रधान मुख्‍य वन संरक्षक व अन्‍य को नोटिस जारी कर जवाब प्रस्‍तुत करने का आदेश पारित किया है।
अधिवक्‍ता जितेन्‍द्र पाली




याचिकाकर्ता तपेश कुमार झा वर्तमान में छत्‍तीसगढ़ पर्यटन मंडल में प्रबंध निदेशक के पद पर पदस्‍थ हैं। वर्ष 2007 में शिकायत के आधार पर लोक आयोग ने याचिकाकर्ता के विरूद्ध जांच आरंभ की। याचिकाकर्ता के खिलाफ यह आरोप लगाया गया कि मार्च 2004 में वनमंडलाधिकारी पद पर रहते हुए याचिकाकर्ता ने फर्जी मस्‍टर रोल बनाकर मजदूरी का भुगतान दर्शाया है ज‍बकि मजदूरों ने काम ही नहीं किया। याचिकाकर्ता ने लोक आयोग के समक्ष उपस्थित होकर अपना जवाब प्रस्तुत किया तथा विधिक प्रावधानों सहित यह निवेदन किया कि वनमंडलाधिकारी के रूप में याचिकाकर्ता का कार्य केवल निचले अधिकारियों के द्वारा दिए जाने वाले मस्‍टर रोलों पर सत्‍यापन व हस्‍ताक्षर करना होता है। वन वित्‍तीय संहिता के नियम 83 (2) के अनुसार वनमंडलाधिकारी को परिक्षेत्र अधिकारी द्वारा सूक्ष्‍म जांच की गई है ऐसी प्रत्‍याशा में सत्‍यापन करना होता है। राज्‍य शासन ने अपनी प्रारंभिक जांच में उक्‍त तर्क को स्‍वीकार कर याचिकाकर्ता को निर्दोष माना। परंतु लोक आयोग ने विधिक प्रावधानों को नजरअंदाज करते हुए याचिकाकर्ता को विभाग प्रमुख होने के कारण गबन का दोषी मानते हुए मुख्‍य सचिव से याचिकाकर्ता को दीर्घ शास्ति  ऐसी सिफारिश कर डाली। याचिकाकर्ता ने लोक आयोग से पुनर्विचार करने का इस आधार पर आग्रह किया कि लोक आयोग के द्वारा वन वित्‍तीय नियम के खंड 1 कार्य का संपादन नियम 4 के उपनियम 6 को आधार मानकर आदेश जारी किया है जोकि वर्तमान मस्‍टर रोल प्रकरण में लागू नहीं होता है तथा मस्‍टर रोल के भुगतान हेतु नियम अलग है। याचिकाकर्ता ने यह भी निवेदन किया कि अपने अनुशंसा के आदेश में लोक आयोग ने यह माना है कि हालांकि नियमानुसार याचिकाकर्ता का सीधा दायित्‍व नहीं है पर उच्‍च अधिकारी होने के कारण वे अपने दायित्‍व से नहीं बच सकते। उक्‍त पुनर्विलोकन याचिका पर लोक आयोग ने कोई निर्णय नहीं दिया ।





राज्‍य शासन ने उक्‍त अवैध सिफारिश पर आंख मूंदकर विश्‍वास करते हुए याचिकाकर्ता के विरूद्ध विभागीय जांच संस्थित कर दी। याचिकाकर्ता ने विवश होकर अधिवक्‍ता जितेंद्र पाली तथा वरुण शर्मा के माध्‍यम से माननीय उच्‍च न्‍यायालय में याचिका प्रस्‍तुत की है। उच्‍च न्‍यायालय की माननीय न्‍यायमूर्ति श्री मनींद्र मोहन श्रीवास्‍तव की एकलपीठ ने याचिका की सुनवाई करते हुए राज्‍य शासन, प्रधान मुख्‍य वन संरक्षक तथा  प्रधान वन संरक्षक को नोटिस जारी किया है।

Mar 11, 2011

गरीबों की जमीन पर सूर्यकुण्ड नहीं नगर निगम की योजना हाईकोर्ट ने की ध्वस्त


माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति श्री मनिन्द्र मोहन श्रीवास्तव की एकलपीठ ने भिलाई नगर निगम की महत्वाकांक्षी योजना पर न्यायदण्ड चलाते हुए गरीबों की जमीन पर बनने वाले सूर्यकुण्ड की योजना पर विराम लगा दिया है।

वर्ष 1970 में भिलाई नगर के प्रारंभिक दिनों में तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार ने गरीबों के हितों को ध्यान में रखते हुए तत्कालीन साडा भिलाई के माध्यम से शारदा आवासीय योजना लागू की जिसमें याचिकाकर्ता रामसिया गुप्ता व अन्य को वर्ष 1977 में आवासीय प्लाट लीज एग्रीमेंट करके साडा द्वारा दिए गए। साडा भिलाई के भिलाई नगर निगम में विलयन के बाद भी वर्ष 2003 तक प्लाट बांटे गए। इसी बीच राजनीतिक परिदृश्य बदल जाने के बाद भिलाई नगर निगम के कुछ विघ्नसंतोशी पार्शदों को तत्कालीन विधायक श्री बदरूद्दीन कुरैशी द्वारा गरीबों के लिए किए जा रहे प्रयासों से तकलीफ होने लगी । वर्ष 2003 में शारदा आवासीय योजना को खत्म कराने के उद्देश्य से कुछ पार्शदों ने निगम की बैठक में उक्त मुद्दे को उठाया जिसे राज्य सरकार ने अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए स्थगित कर दिया। इसी बीच वर्ष 2004 में निगम की 10/05/2004 को होने जा रही बैठक किन्हीं कारणों से टल गई और 27/05/2004 को रखी गई । छत्तीसगढ़ नगरपालिक निगम अधिनियम की धारा 31 के अनुसार किसी भी टल जाने वाली बैठक के पुनः आहूत होने पर केवल वही मुद्दे विचार किए जा सकते हैं जिन पर पहले विचार होना था और कोई नया मुद्दा विचार में नहीं लिया जा सकता। इस विधिक प्रावधान को नजरअंदाज करते हुए कुछ पार्शदों के अभ्यावेदन को स्वीकार करते हुए निगम आयुक्त ने शारदा आवासीय योजना का मुद्दा 27/05/2004 की बैठक में एजेंडे में शामिल करवा लिया और यह प्रस्ताव पारित कर दिया गया कि जिन हितग्राहियों ने अपने प्लाटों में निर्माण नहीं किया है उनके लीज एग्रीमेंट निरस्त कर दिए जाएं। यही नहीं तत्परता दिखाते हुए निगम आयुक्त ने राज्य सरकार को पहले दिए गए स्थगन के बारे में बताए बिना उक्त प्रस्ताव पर सहमति भी प्राप्त कर ली।
उक्त अवैध कार्य को अंजाम देते हुए निगम ने याचिकाकर्ता समेत अनेक लोगों के लीज एग्रीमेंट निरस्त करते हुए उक्त भूमि पर सरोवर धरोहर योजना के तहत सूर्यकुण्ड बनाने की योजना पर कलेक्टर से सहमति प्राप्त कर टेंडर जारी कर दिया। घर से बेघर होने जा रहे निम्न आयु वर्ग के गरीब लोगों की तरफ से वर्ष 2004 में माननीय छग उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई जिसमें दिनांक 06/10/2004 को माननीय उच्च न्यायालय ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया। वर्ष 2008 में उच्च न्यायालय ने पृथक याचिका प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता के साथ याचिकाकर्ताओं को उक्त जनहित याचिका को वापस लेने का आदेश पारित किया। इसके पश्चात याचिकाकर्ता रामसिया गुप्ता व अन्य ने अधिवक्ता जितेंद्र पाली तथा वरूण शर्मा तथा याचिकाकर्ता राजेंद्र शर्मा ने अधिवक्ता आशीश सुराना के माध्यम से याचिका प्रस्तुत की तथा तर्क रखा कि टली हुई बैठक में लिया गया निर्णय विधिमान्य नहीं है साथ ही राज्य शासन को धोखे में रखकर ली गई सहमति भी अवैध है।
नगर निगम भिलाई की ओर से याचिका के संबंध में आपत्ति की गई की लीज एग्रीमेंट सिविल वाद की विषयवस्तु है और याचिका खारिज की जानी चाहिए। हितग्राहियों तथा याचिकाकर्ताओं ने प्लाट लेने के बाद कोई निर्माण नहीं किया इसलिए शारदा आवासीय योजना बनने के 5 वर्ष बाद स्वतः समाप्त हो गई और अब कुछ नहीं किया जा सकता। माननीय उच्च न्यायालय ने समस्त तर्कों तथा प्रकरण के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए यह धारित किया कि जब प्रशासन का कोई आदेश संविधान के मौलिक अधिकारों का हनन करता हो तथा मनमाना हो तो उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अंतर्गत कार्यवाही करने में सक्षम है तथा याचिकाकर्ता अपने प्लाट में निर्माण कार्य इसलिए भी नहीं कर पाए कि निगम द्वारा प्लाट में पहुंच मार्ग, बिजली आदि की कोई व्यवस्था नहीं की। माननीय उच्च न्यायालय ने धारा 31 के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए यह धारित किया की शारदा आवासीय योजना का मुद्दा बैठक में रखा जाना अवैध है तथा राज्य सरकार की सहमति भी अवैध है। इस प्रकार याचिकाकर्ताओं का लीज एग्रीमेंट निरस्त किया जाने वाला आदेश भी अवैध है।

Sep 4, 2010

सहकारिता सचिव से जवाब तलब : मंत्री के नोटिस के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका

गृह निर्माण समिति के निष्कासित सदस्यों के आवेदन पर मंत्री द्वारा नोटिस जारी किए जाने के खिलाफ समिति ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई है। इस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सहकारिता सचिव व शासन को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

स्मृति गृह निर्माण सहकारी समिति भिलाई के अध्यक्ष राजीव चौबे ने समिति के संचालक मंडल के सदस्य एचआर शर्मा सहित ४ सदस्यों को निष्कासित किया है। इसके खिलाफ चारों सदस्यों ने उप पंजीयक सहकारिता के समक्ष वाद प्रस्तुत किया। इस पर समिति को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया। जवाब से संतुष्ट होने के बाद उप पंजीयक ने वाद को खारिज कर दिया। इसके बाद उन्होंने संयुक्त पंजीयक के समक्ष अपील की। यहां से अपील खारिज होने के बाद निष्कासित सदस्यों ने सहकारिता मंत्री को आवेदन दिया। इस पर मंत्री ने समिति को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। समिति के अध्यक्ष ने अधिवक्ता जितेंद्र पाली एवं वरुण शर्मा के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका लगाई है। इसमें कहा गया है कि निष्कासित सदस्यों के संबंध में मंत्री को जवाब तलब व कार्रवाई करने का कोई अधिकार नहीं है। हाईकोर्ट ने याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए शासन एवं सहकारिता सचिव को नोटिस जारी किया है।

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रौशनी में आदिम जिन्दगी : भाग 1
रौशनी में आदिम जिन्दगी : भाग 2
रौशनी में आदिम जिन्दगी : भाग 3
रौशनी में आदिम जिन्दगी : भाग 4

Jul 28, 2010

स्थानांतरण पर शासन को नोटिस

वरिष्ठ कृषि अधिकारी का स्थानांतरण कर उनके स्थान पर कनिष्ठ को पदस्थ किए जाने के खिलाफ दाखिल याचिका पर बिलासपुर हाईकोर्ट ने शासन से जवाब मांगा है। प्रकरण के लंबित होने तक यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया गया है।

कृषि विभाग के कृषि उवर्रक गुण नियंत्रण प्रयोगशाला में अनूप कुमार चतुर्वेदानी १३ नवंबर २००९ से वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। संचालक कृषि ने १५ जुलाई २०१० को इनका स्थानांतरण उपसंचालक कृषि दुर्ग करने आदेश जारी किया। इस आदेश को उन्होंने अधिवक्ता जितेन्द्र पाली एवं वरुण शर्मा के माध्यम से हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचिका में कहा गया है कि प्रयोगशाला में पदस्थापना ८ माह पूरा नहीं हुआ है, समय से पूर्व स्थानांतरण किया जाना अनुचित है। इसके अलावा महासमुंद में पदस्थ ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी बसंत कुमार साहू स्वयं के व्यय स्थानांतरण पर प्रयोगशाला आने के लिए उपसंचालक कृषि को आवेदन दिया था। इस पर उपसंचालक ने संचालक कृषि को पत्र लिखा, इसी आधार पर उनका समय से पहले स्थानांतरण किया गया। कनिष्ठ कर्मचारी को वरिष्ठ के स्थान पर पदस्थ किया जा रहा है।

ने याचिका पर सुनवाई करते हुए शासन को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इसके अलावा याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत प्रदान करते हुए यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है।

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Jun 29, 2010

दो दिनों में मामला निपटाने हाईकोर्ट ने दिया आदेश

नियमों की गलत व्याख्या कर प्री-पीजी मेडिकल प्रवेश के लिए अधिक अंक देने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए बिलासपुर हाईकोर्ट ने शासन को दो दिनों के भीतर प्रकरण को निराकृत करने का आदेश दिया है।

डॉ. अनिल विवेक ने अधिवक्ता जितेंद्र पाली एवं वरुण शर्मा के माध्यम से प्री-पीजी मेडिकल परीक्षा में अभ्यर्थियों को बोनस अंक देने के नियम को चुनौती दी है। इसमें कहा गया है कि छत्तीसगढ़ शासन ने प्री-पीजी प्रवेश के लिए १४ मार्च २०१० को परीक्षा आयोजित की थी। ९ अप्रैल को इसके नतीजे घोषित किए गए। छत्तीसगढ़ चिकित्सा स्नातकोत्तर प्रवेश नियम २००४ के नियम ९ में उल्लेख है कि समान्य वर्ग के अभ्यर्थियों को ५० प्रतिशत अंक, एससी, एसटी के लिए ४० प्रतिशत अंक प्राप्त करना अनिवार्य है। इसके अलावा शासकीय सेवा में कार्यरत्‌ चिकित्सकों को २० प्रतिशत अतिरिक्त बोनस अंक दिया जाना है। शासन ने बोनस अंक देने की गलत व्याख्या करते हुए बोनस अंक दिया है। इसके कारण कई लोगों को दूसरे अभ्यार्थियों से अधिक अंक प्राप्त हुए हैं। सोमवार को याचिका पर सुनवाई हुई। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को २ जून तक राज्य शासन के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत करने तथा शासन को ३० जून तक अभ्यावेदन को निराकृत करने का आदेश दिया है।

Jun 19, 2010

नियुक्ति रद्द करने पर पुनर्विचार के निर्देश : बीजापुर जिले की जपं भोपलपटनम का मामला

जस्टिस एमएम श्रीवास्तव की एकलपीठ ने शिक्षाकर्मी वर्ग-३ की नियुक्ति निरस्त किए जाने के खिलाफ दाखिल याचिका को निराकृत करते हुए भोपलपटनम जनपद सीईओ को उसकी नियुक्ति निरस्त करने पर पुनर्विचार करने के निर्देश दिए हैं।

ज्ञात होकि शशिप्रभा सिंह की नियुक्ति बीजापुर जिले की जनपद पंचायत भोपलपटनम में शिक्षाकर्मी वर्ग ३ के पद पर वर्ष २००६ में हुई थी। २००८ में उसे नियमित भी कर दिया गया। शिक्षाकर्मी वर्ग-३ की नियुक्ति में गड़बड़ी की शिकायत पर कलेक्टर ने जांच आरंभ की। जांच रिपोर्ट के आधार पर १४ शिक्षाकर्मियों को अलग-अलग कारण बताते हुए नोटिस जारी किया गया। शशिप्रभा सिंह को वर्ष २००९ में मिले नोटिस में कहा गया कि उसने खेलकूद का प्रमाणपत्र आवेदन में संलग्न नहीं किया है। इसके बाद भी उसे बोनस अंक का लाभ मिला है। इस पर उसने बताया कि आवेदन जमा करने के बाद उसने पावती ली थी। इसे जवाब के साथ उसने प्रस्तुत किया। इसके बाद भी अक्टूबर २००९ में उसकी नियुक्ति नियम विरुद्ध होने तथा नियुक्ति निरस्त करने योग्य होने की बात कहते हुए नोटिस दिया गया। इस पर उसने सूचना के अधिकार के तहत नियुक्ति संबंधी दस्तावेज एकत्र करने करने में समय लगने का हवाला देते हुए कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा। कलेक्टर द्वारा असहमति व्यक्त करने पर उसने हाईकोर्ट में याचिका लगाई। इसमें उक्त नोटिस तथा प्रक्रिया को पूर्वाग्रह से ग्रस्त होने के कारण निरस्त करने की मांग की गई है।

प्रकरण हाईकोर्ट में लंबित होने के बाद भी भोपलपटनम ब्लॉक के सीईओ ने उसकी सेवा समाप्त कर दी। इसी दौरान सेवा से अलग हुए अन्य शिक्षाकर्मियों की याचिका पर हाईकोर्ट ने सीईओ को सेवा समाप्त करने के आदेश को प्रभाव में नही लाते हुए संपूर्ण प्रकरण पर पुनर्विचार करने का आदेश दिया। हाईकोर्ट के इस आदेश पर सीईओ को शशिप्रभा के प्रकरण में भी पुनर्विचार किया जाना था, किन्तु सीईओ ने अन्य शिक्षाकर्मियों को सेवा में बहाल किया गया, जबकि शशिप्रभा को यह कहकर भगा दिया गया कि उसके प्रकरण में हाईकोर्ट से कोई आदेश नहीं आया है। इस पर उसने अधिवक्ता जितेंद्र पाली, वरुण शर्मा, अभिनव करडेकर के माध्यम से हाईकोर्ट में पुनः याचिका लगाई। इस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस एमएम श्रीवास्तव ने भोपालपट्टनम ब्लॉक के सीईओ को प्रकरण पर भी पुनर्विचार करने के निर्देश देते हुए याचिका को निराकृत कर दिया।

Apr 18, 2010

देना बैंक प्रबंधन ने मांगा जवाब

कैशियर को गबन के आरोप में सेवामुक्त करने के मामले में बिलासपुर हाईकोर्ट ने देना बैंक छत्तीसगढ की महासमुंद शाखा के प्रबंधक सहित अन्य अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। जानकारी के अनुसार दैना बैंक की महासमुंद शाखा में कैशियर सीताराम बेहड़ा ने २४ फरवरी २००४ को बैंक में अधिक भीड़ होने के कारण भूलवश एक ग्राहक को एक लाख २० हजार रुपए अतिरिक्त भुगतान कर दिया था। शाम को हिसाब करने के दौरान उन्हें इसकी जानकारी हुई। श्री बेहड़ा ने तुरंत शाखा प्रबंधक को सूचना दी। दूसरे दिन उन्होंने रुपए का प्रबंध कर शाखा प्रबंधक को दिया। इसके बाद अतिरिक्त रकम ले जाने वाले ग्राहक की तलाश कर उन्होंने रुपए वापस ले लिए। बावजूद इसके शाखा प्रबंधक ने उन्हें निलंबित कर विभागीय जांच कराई। मामले की रिपोर्ट थाने में भी दर्ज कराई गई। इस प्रकार कर्मचारी के खिलाफ दोहरी कार्रवाई चलने लगी। उन्होंने बैंक के उच्चाधिकारियों से निलंबन की कार्रवाई पर रोक लगाकर नौकरी में पुनः वापस लेने की अपील की, लेकिन उनके आवेदन पर कार्रवाई नहीं हुई।

समिति ने जांच पूर्ण कर उसे बर्खास्त करने की अनुशंसा की। इसके बाद वर्ष २००५ में उसे बर्खास्त कर दिया गया। मामले की अपील करने पर बर्खास्तगी के आदेश को अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बदल दिया गया। प्रबंधन की इस कार्रवाई के खिलाफ उन्होंने अधिवक्ता जितेंद्र पाली, मतीन सिद्दकी व वरुण शर्मा के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में कहा गया कि उच्चतम न्यायालय ने अपने एक निर्णय में कहा है कि यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ पुलिस तथा विभागीय कार्रवाई एक साथ चल रही हो तो सामान्यता विभागीय कार्रवाई रोकी जानी चाहिए। यदि न्यायालयीन आदेश आने में देरी होने की संभावना हो तो विभागीय कार्रवाई को उस स्तर तक पूर्ण करना चाहिए कि कर्मचारी न्यायालय से बरी हो तो उसे तत्काल काम पर वापस लिया जा सके।

इसी तरह यदि वह दोषी पाया जाता है तो कर्मचारी से तत्काल मुक्ति पाई जा सके। देना बैंक प्रबंधन ने इस विधिक सिद्धांत की अनदेखी कर कर्मचारी के खिलाफ मनमानी कार्रवाई की है। मामले की सुनवाई जस्टिस सतीश अग्निहोत्री की एकलपीठ में हुई। याचिकाकार्ता का तर्क सुनने के बाद जस्टिस अग्निहोत्री ने देना बैंक के शाखा प्रबंधक सहित सभी अनावेदकों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

Apr 13, 2010

पंचायत सचिव को हाईकोर्ट का नोटिस

शिक्षाकर्मी की याचिका पर सुनवाई करते हुए बिलासपुर हाईकोर्ट ने 36गढ पंचायत एवं ग्रामीण विकास के सचिव तथा संचालक पंचायत को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता ने संचालक पंचायत द्वारा अनुभव प्रमाणपत्र को फर्जी करार देने को चुनौती दी है।

मामला बिलासपुर जिले की जनपद पंचायत मस्तूरी का है। यहां के तुलसीराम श्रीवास ने वकील मतीन सिद्दीकी व जितेंद्र पाली के जरिए हाईकोर्ट में याचिका दायर कर शिकायत की है कि १३ जुलाई २००६ को जनपद पंचायत मस्तूरी में शिक्षाकर्मी वर्ग तीन के पद पर उसकी नियुक्ति की गई थी। याचिका के अनुसार मस्तूरी सीईओ ने ३१ अगस्त २००७ को उसे सेवा समाप्ति का आदेश थमा दिया। इसमें उसके द्वारा पेश किए गए अनुभव प्रमाणपत्र को फर्जी करार दिया गया था। सीईओ के आदेश के खिलाफ अतिरिक्त कलेक्टर के कोर्ट में आवदेन लगाया गया था। अतिरिक्त कलेक्टर ने सीईओ के आदेश को यथावत रखा। अतिरिक्त कलेक्टर के आदेश को संचालक पंचायत के यहां चुनौती दी गई थी। संचालक पंचायत ने अतिरिक्त कलेक्टर के आदेश को सही ठहराया। याचिकाकर्ता ने संचालक पंचायत की शिकायत करते हुए कहा है कि सही तरीके से उनके पक्षों को सुने बिना एकतरफा फैसला दे दिया गया है। याचिका के अनुसार उसने मस्तूरी ब्लॉक के दर्राभाठा स्कूल में बतौर जनभागीदारी शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं। जिला शिक्षाधिकारी के कार्यालय में जिले के जनभागीदारी स्कूलों व वहां पढ़ाने वाले शिक्षकों की सूची में उसका नाम भी शामिल है। इसके बाद भी उसके द्वारा पेश किए गए अनुभव प्रमाणपत्र को फर्जी करार देना गलत है। इस मामले की सुनवाई हाईकोर्ट की सिंगल बेंच में हुई। हाईकोर्ट ने पंचायत एवं ग्रामीण विकास के सचिव के अलावा संचालक पंचायत, एडिशनल कलेक्टर बिलासपुर व सीईओ जनपद पंचायत मस्तूरी को नोटिस जारी कर जवाब पेश करने के निर्देश दिए हैं। याचिकाकर्ता ने इन सभी आला अधिकारियों को पक्षकार बनाया है।

Apr 8, 2010

सिम्स वापस करें अधिक राशि

बिलासपुर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सिम्स प्रबंधन व राज्य शासन को पेमेंट सीट के रूप में विद्यार्थियों से ज्यादा वसूल की गई फीस को वापस करने का फरमान जारी किया है। डिवीजन बेंच के फैसले से एमबीबीएस २००३-०४ बेच के विद्यार्थियों को बड़ी राहत मिली है। सिम्स प्रबंधन ने पेमेंट सीट में प्रवेश देने के एवज में प्रति छात्र १ लाख ४० रूपए वसूले थे।

वर्ष २००३-०४ बेच के राजेश अग्रवाल, रिंपल बच्चू, आनंद भट्टर सहित अन्य ने वकील कनक तिवारी,जितेंद्र पाली व मतीन सिद्दीकी के जरिए हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि गुヒ घासीदास यूनिवर्सिटी ने बिलासपुर में छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) के नाम से मेडिकल कॉलेज का संचालन प्रारंभ किया। तब १०० सीटें निर्धारित की गई थीं। वर्ष २००३ में छग शासन ने छग चिकित्सा तथा दंत चिकित्सा स्नातक प्रवेश नियम पारित किया। प्रवेश नियम ४ के अनुसार कुल सीटों की १५ प्रतिशत सीटें आल इंडिया परीक्षाओं से आए विद्यार्थियों के लिए तथा ३ फीसदी सीटें केंद्रीय कोटा की है। शेष ८२ सीटों का आबंटन पेमेंट तथा फ्री के रूप में किया गया था। शासन के निर्देशों को धता बताते हुए यूनिवर्सिटी ने ५० प्रतिशत सीटों को पेमेंट व ५० प्रतिशत सीट को फ्री घोषित कर दिया। फ्री सीटों में से ७ को आल इंडिया तथा १ को केंद्रीय कोटा की सीट निर्धारित कर दी गर्ठ। याचिकाकर्ताओं ने शासन के निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि सिम्स को इस बात के निर्देश दिए गए थे कि २००३ में पेमेंट सीट में प्रवेश लिए १० विद्यार्थियों को आरक्षण नियमों का पालन करते हुए फ्री सीट में प्रवेश की सुविधा दी जाए। इसके बाद भी सिम्स ने याचिकाकर्ताओं को मेरिट में होने के बाद भी फ्री के बजाय पेमेंट सीट में प्रवेश दे दिया। साथ ही सिम्स प्रबंधन ने याचिकाकर्ता छात्रों को भारी भरकम फीस जमा करने का आदेश भी जारी कर दिया। हाईकोर्ट ने प्रकरण की प्रारंभिक सुनवाई के बाद छात्रहित में ५० फीसदी फीस जमा करने के निर्देश सिम्स प्रबंधन को दिए थे। सिंगल बेंच के आदेश को चुनौती देते हुए यूनिवर्सिटी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। इसी बीच १ दिसंबर २००७ को राज्य शासन ने सिम्स का अधिग्रहण कर लिया। ३० मार्च २००९ को संचालक चिकित्सा शिक्षा ने सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र प्रस्तुत कर आल इंडिया कोटा व केंद्रीय कोटा की सभी सीटों को फ्री सीट करने का खुलासा किया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता छात्रों ने हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में गुहार लगाई थी। इस मामले की सुनवाई जस्टिस धीरेंद्र मिश्रा व जस्टिस आरएन चंद्राकर की डिवीजन में सुनवाई हुई। डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता छात्रों से पेमेंट सीट के रूप में वसूली गई फीस को वापस करने का फरमान सिम्स प्रबंधन व शासन को जारी किया है।

Apr 5, 2010

भिलाई स्थित मैत्री कॉलेज के बीएड प्रशिक्षार्थियों को मिली राहत

बिलासपुर हाईकोर्ट ने पं. रविशंकर यूनिवर्सिटी को आदेशित किया है कि भिलाई स्थित मैत्री कॉलेज के बीएड के विद्यार्थियों को परीक्षा में शामिल करें। यूनिवर्सिटी ने कार्यपरिषद की बैठक का हवाला देते हुए उन्हें परीक्षा में शामिल करने से इनकार कर दिया था।

भिलाई स्थित मैत्री कॉलेज प्रबंधन व बीएड के विद्यार्थियों ने हाईकोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं दायर की थीं। इसमें कहा गया है कि कॉलेज को राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद से मान्यता मिली है। पहले यहां १०० सीट की अनुमति दी गई थी। इसके बाद २००९ से १०० अतिरिक्त सीटों पर प्रवेश की अनुमति मिल गई है। इसके आधार पर यहां २०० विद्यार्थियों को प्रवेश दिया जाना था, लेकिन पं. रविशंकर यूनिवर्सिटी ने राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा निर्धारित सीटों को मानने से इनकार करते हुए अतिरिक्त १०० सीटों की मान्यता नहीं दी। इसके लिए कार्यपरिषद की बैठक में हुए निर्णय का हवाला दिया गया। इस पर कॉलेज प्रबंधन ने यूनिवर्सिटी के निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने यूनिवर्सिटी व राज्य शासन को संबद्धता देने का आदेश दिया था। इसके परिपालन में राज्य शैक्षिक अनुसंधान प्रशिक्षण परिषद ने प्रवेश के लिए अलग से काउंसिलिंग आयोजित की। इस दौरान ५१ विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया। बाद में कॉलेज में ५० छात्र-छात्राओं ने ही दाखिला लिया। याचिका में कहा गया कि कॉलेज प्रबंधन ने १५० विद्यार्थियों का नामांकन के साथ ही परीक्षा फार्म व शुल्क तय समय पर जमा कर दिया था, लेकिन यूनिवर्सिटी ने कॉलेज को मान्यता देने से इनकार करते हुए विद्यार्थियों का नामांकन पत्र जमा नहीं किया और न ही उनके परीक्षा फार्म स्वीकार किए गए। इसके चलते छात्रों को परीक्षा से वंचित होना पड़ रहा है और यूनिवर्सिटी प्रवेशपत्र भी नहीं दे रही है। याचिका में मामले में हाईकोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए आदेश का हवाला दिया गया। साथ ही विद्यार्थियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए परीक्षा में शामिल कराने की मांग की गई। प्रकरण की सुनवाई करते हुए जस्टिस सुनीलकुमार सिन्हा ने सभी विद्यार्थियों को परीक्षा में शामिल करने के लिए पं. रविशंकर यूनिवर्सिटी को निर्देशित किया है। याचिकाकर्ता छात्रों की तरफ से वकील मनोज परांजपे और कॉलेज प्रबंधन की तरफ से वकील जितेंद्र पाली, मतीन सिद्दीकी और वरूण शर्मा ने पैरवी की।

Mar 30, 2010

एक हजार फीस को बढ़ाकर एक लाख करने के संशोधन आदेश को हाईकोर्ट ने किया निरस्‍त

छत्‍तीसगढ़ प्रदेश के किसी भी पेट्रोल पंप को संचालित करने के लिए पंप संचालक को राज्य सरकार से अनुमति लेनी होती है। इसके लिए राज्य सरकार लाइसेंस जारी करती है और हर साल उसका नवीनीकरण भी कराना होता है। राज्य सरकार ने 20 फरवरी 2006 को अनुस्‍थापन तथा नियंत्रण आदेश 1980 में संशोधन करते हुए लाइसेंस फीस में 100 गुना की वृद्धि कर दी। पहले यह फीस 1000 रुपए थी, जिसे बढ़ाकर एक लाख रुपए कर दिया गया। इसके अलावा नवीनीकरण, डुप्‍लीकेट व सुरक्षा निधि की राशि भी इसी हिसाब से बढ़ा दी गई।

संशोधन के खिलाफ छग पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन ने बिलासपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में कहा गया कि सरकार लाइसेंस फीस के एवज में किसी तरह की सुविधाएं मुहैया नहीं कराती है। सरकार के पास नियंत्रण के लिए अलग से कोई विभाग भी नहीं है। इसके अलावा संशोधन से आम जनता को किसी तरह का फायदा पहुंचे, ऐसा भी नहीं है। याचिका में इस बात का भी जिक्र किया गया कि जब मप्र शासन ने संशोधन कर फीस में वृद्धि की तो सिर्फ 10 फीसदी फीस बढ़ाई गई। याचिका पर उसी समय हाईकोर्ट ने स्थगन दे दिया था। मामले में अंतिम सुनवाई करते हुए सोमवार को हाईकोर्ट ने उक्त संशोधन आदेश को निरस्त कर दिया। इस मामले में एसोसिएशन की ओर से अधिवक्ता जितेंद्र पाली, मतीन सिद्दीकी और वरूण शर्मा ने पैरवी की। इस तरह छत्‍तीसगढ़ राज्य सरकार द्वारा दो साल पहले लाइसेंस फीस में की गई 100 गुना वृद्धि का संशोधन आदेश हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया है। छग पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सोमवार को संशोधन आदेश को निरस्त किया है।

Mar 28, 2010

आरक्षकों के चयन पर रोक : प्रतीक्षा सूची के आवेदकों की याचिका पर हाईकोर्ट ने दिया स्थगन

बिलासपुर हाईकोर्ट ने रायपुर की तरह बिलासपुर, कोरबा व जशपुर जिले में भी आरक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया पर आगामी आदेश तक रोक लगा दी है। याचिकाकर्ता दुष्यंत सिंह सोनवानी सहित अन्य ने अपनी याचिकाओं में कहा है कि व्यावसायिक परीक्षा मंडल ने 2008 में प्रदेश के विभिन्न जिलों में आरक्षक भर्ती के लिए परीक्षा आयोजित की थी। इसमें चयनित आवेदकों को संबंधित जिलों में नियुक्ति भी दी गई। इसके साथ ही व्यापमं ने प्रतीक्षा सूची भी जारी की थी। इस सूची को एक साल के लिए वैध माना गया था। बाद में पद रिक्त होने पर प्रतीक्षा सूची में शामिल आवेदकों को नियुक्ति देने का निर्णय लिया गया। याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि उन्होंने रायपुर जिले से परीक्षा दी थी। रायपुर एसपी ने प्रतीक्षा सूची में शामिल आवेदकों को 2 जून 2009 को नियुक्ति आदेश जारी किया और उन्हें 8 जून को कार्यालय में सभी दस्तावेजों के साथ उपस्थित होने कहा, लेकिन जिस दिन आवेदकों को बुलाया गया था, उसी दिन सूचना पटल पर नियुक्ति प्रक्रिया निरस्त होने की सूचना चस्पा कर दी गई।

अचानक नियुक्ति निरस्त होने से घबराए आवेदकों ने जानकारी मांगी, तो उन्हें पता चला कि अब प्रतीक्षा सूची निरस्त कर दी गई और नए सिरे से भर्ती के लिए विज्ञापन जारी कर दिया गया है। इससे परेशान होकर वेटिंग लिस्ट के उम्मीदवारों ने हाईकोर्ट की शरण ली। हाईकोर्ट ने प्रारंभिक सुनवाई के दौरान रायपुर एसपी सहित अन्य को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। इस बीच कोर्ट ने चयन प्रक्रिया पर रोक लगा दी थी। इधर, बिलासपुर के दिव्यकिरण खलखो, कोरबा के दिलीप रात्रे व जशपुर के जन्मेजय सिंह ने भी हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कर दीं। मामले में हाईकोर्ट ने राज्य शासन को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। शासन का जवाब आने के बाद 22 मार्च को फिर से प्रकरण की सुनवाई हुई। इस दौरान कोर्ट ने पूछा कि प्रदेश में आरक्षकों के कितने पद रिक्त हैं। शासन ने यह जानकारी देने के लिए समय मांगा, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर अगली सुनवाई के लिए 13 अप्रैल की तिथि तय की है। इस दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट के ध्यान में यह बात लाया कि बिलासपुर, कोरबा व जशपुर में आरक्षकों की चयन प्रक्रिया जारी है। इस पर हाईकोर्ट ने आगामी आदेश तक चयन प्रक्रिया पर रोक लगा दी। मामले में याचिकाकर्ता की तरफ से वकील जितेंद्र पाली, मतीन सिद्दीकी व वरुण शर्मा ने पैरवी की।

Mar 23, 2010

योग्यता को दरकिनार करने पर कोर्ट को हस्तक्षेप करने का है पूरा अधिकार

मंडल संयोजकों की याचिका पर हुई सुनवाई

विकासखंड शिक्षाधिकारी के पद पर पदोन्नति से वंचित मंडल संयोजकों की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की पदोन्नति के लिए डीपीसी की बैठक बुलाने का आदेश दिया है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि पदोन्नति के लिए विचारण हर कर्मचारी का अधिकार है।
सुजान सिंह कंवर व अन्य मंडल संयोजकों ने वकील जितेंद्र पाली व मतीन सिद्दीकी के जरिए हाईकोर्ट में याचिका दायर कर गुहार लगाई थी कि वे सन्‌ १९९० से आदिम जाति कल्याण विभाग में कार्यरत्‌ हैं। सेवा शर्तें आदिम जाति कल्याण व पिछड़ा वर्ग सेवा भर्ती नियम १९६९ के प्रावधानों के अनुसार हैं। वर्ष १९९४ में मप्र सरकार ने नियमों में संशोधन करते हुए यह प्रावधान जोड़ दिया कि प्राचार्यों की पदोन्नति विकासखंड शिक्षाधिकारी के पद पर ६० अनुपात ४० में होगी। संशोधन के बाद मंडल संयोजकों की बीईओ के पद पर पदोन्नति के रास्ते बंद हो गए। प्रदेश सरकार ने उक्त नियमों में वर्ष २००६ में पुनः संशोधन करते हुए बीईओ के पद को पहले संयोजकों से ही भरने का निर्णय लिया। इसी के तहत १३ फरवरी ०८ को विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक हुई। इसमें क्षेत्रीय संयोजकों की पदोन्नति मुख्य कार्यपालन अधिकारी के पद पर करने का निर्णय लिया गया।

याचिकाकर्ताओं ने शिकायत करते हुए कहा कि बैठक में उनके विषय में विचार ही नहीं किया गया। याचिका के अनुसार १८ वर्षों से मंडल संयोजक के पद पर कार्य करने के बाद उन्हें पदोन्नति से वंचित किया जा रहा है। सोमवार को इस मामले की सुनवाई जस्टिस सतीश अग्निहोत्री की सिंगल बेंच में हुई। जस्टिस श्री अग्निहोत्री ने राज्य शासन को निर्देश दिए कि याचिकाकर्ताओं की पदोन्नति के लिए तत्काल डीपीसी की बैठक बुलाएं। उक्त प्रक्रिया चार महीने के भीतर पूर्ण करने का आदेश दिया गया है।

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