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Jul 8, 2010

सीएमओ को हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत

आर्थिक अनियमितता की शिकायत पर मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी के खिलाफ लोक आयोग की रिपोर्ट को बिलासपुर हाईकोर्ट ने उचित माना है। हाईकोर्ट ने रिपोर्ट पर रोक लगाने संबंधी याचिका को अस्वीकार कर दिया है। 

डॉ.आरएन नेताम राजनांदगांव में मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी के पद पर पदस्थ रहे। उनके खिलाफ जिले में दवा व उपकरण खरीदी में आर्थिक अनियमितता करने की शिकायत की गई। शासन ने जांच के लिए शिकायत को छत्तीसगढ़ लोक आयोग भेजा। लोक आयोग ने १ फरवरी २०१० को अपनी जांच रिपोर्ट इस अनुशंसा के साथ सौंपा कि शासन सीएमओ के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करे। रिपोर्ट आने के बाद डॉ.नेताम को सीएमओ के पद से हटाकर मुख्यालय में पदस्थ किया गया। आयोग की रिपोर्ट पर रोक लगाने डॉ.नेताम ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इसमें लोक आयोग की रिपोर्ट पर रोक लगाने की मांग की गई। लाखों के इस आर्थिक अनियमितता से जुड़े प्रकरण की जस्टिस एमएम श्रीवास्तव की एकलपीठ में सुनवाई हुई। शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता किशोर भादुड़ी तथा लोक आयोग की ओर से सुमेश बजाज ने तर्क प्रस्तुत किया। आयोग की रिपोर्ट पर रोक नहीं लगाने तर्क दिया गया। लंबी बहस के बाद एकलपीठ ने सीएमओ को अंतरिम राहत उपलब्ध कराने संबंधी आवेदन को अस्वीकार कर आयोग की रिपोर्ट को उचित ठहराया है।बिलासपुर। सेवानिवृत्त कांकेर सीएमओ की पेंशन राशि से १० प्रतिशत की कटौती करने संबंधी शासन के आदेश पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है।


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सृजनगाथा के चौथे आयोजन में ब्‍लॉगर संजीत त्रिपाठी सम्मानित
पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी 'विप्र'

Jul 3, 2010

रोके गए परिणाम जारी करने का आदेश : हाईकोर्ट ने शासन से मांगा जवाब

दंत चिकित्सक की संविदा नियुक्ति तिथि को आगे बढ़ाने संबंधी आवेदन पर विचार नहीं कर नई नियुक्ति के लिए विज्ञापन प्रकाशित किए जाने के मामले में बिलासपुर हाईकोर्ट की एकलपीठ ने शासन को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

छत्तीसगढ़ शासन लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा चिकित्सा शिक्षा विभाग ने १६ नवंबर २००३ की अनुमति के आधार पर मार्च को डॉ. कमल किशोर राय की संविदा नियुक्ति २ वर्ष के लिए की थी। इस बीच राज्य शासन ने संविदा भर्ती नियम २००४ बनाया। इधर, दंत चिकित्सक डॉ. राय को २२ दिसंबर २००४ को पुनः संविदा नियुक्ति दी गई। २००१ से ५ मई २०१० तक उनकी संविदा नियुक्ति को बढ़ाई गई। सेवा अवधि पूर्ण होने से पहले उन्होंने २० अप्रैल २०१० को संविदा अवधि बढ़ाने के लिए आवेदन दिया। इस पर विचार किए बिना राज्य शासन ने ११ जून २०१० को दंत चिकित्सक के पदों में संविदा नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया। इसमें डॉ. राय के धारित पद को भी शामिल किया गया। उक्त भर्ती प्रक्रिया में उम्र सीमा ३५ वर्ष तथा संविदा में कार्यरत्‌ अनुभव रखने वालों को चयन में प्राथमिकता दिए जाने का प्रावधान रखा गया। डॉ. राय ने ९ वर्ष तक संविदा में सेवा देने के बाद निर्धारित आयु सीमा को पार कर लिया है। विज्ञापन से व्यथित होकर उन्होंने अधिवक्ता जितेंद्र पाली, वरुण शर्मा के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका पेश की। इसमें कहा गया कि स्थापित सिद्धांत है कि संविदा में कार्यरत्‌ कर्मचारी को नियमित नियुक्ति द्वारा ही हटाया जा सकता है। इस पद में किसी अन्य कर्मचारी की संविदा नियुक्ति नहीं की जा सकती। याचिका पर जस्टिस एमएम श्रीवास्तव की एकलपीठ में सुनवाई हुई। पीठ ने याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर शासन को नोटिस जारी कर ४ सप्ताह में जवाब प्रस्तुत करने का आदेश दिया है।

Jun 25, 2010

नेत्रहीन को मिली हाईकोर्ट से राहत : अस्थाई जाति प्रमाण पत्र को स्थाई करने का आदेश

स्थाई जाति प्रमाण पत्र बनवाने भटक रहे तखतपुर के नेत्रहीन युवक को बिलासपुर हाईकोर्ट से राहत मिली। जस्टिस एमएम श्रीवास्तव ने अस्थाई जाति प्रमाण पत्र को स्थाई करने का आदेश दिया है।

सूत्रों के मुताबिक तखतपुर निवासी अनुसूचित जाति वर्ग का युवक ओंकार करेलिया नेत्रहीन है। उसने स्थाई जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए तहसील कार्यालय तखतपुर में मिसल बंदोबस्त रिकार्ड के लिए आवेदन दिया। मिसल बंदोबस्त में उसके नाम पर भूमि नहीं होने पर स्थाई जाति प्रमाण पत्र जारी नहीं किया गया। इसके बाद उसने ७ अप्रैल २०१० को मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह को पत्र लिख कर गुहार लगाई। इसके बाद भी कोई कार्रवाई नहीं होने पर उसने अधिवक्ता केके सिंह के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। याचिका में उसके नाम भूमि नहीं होने तथा मिसल बंदोबस्त रिकार्ड में भी नाम नहीं होने के कारण स्थाई जाति प्रमाण पत्र नहीं बनाए जाने तथा पूर्व में जारी किए गए अस्थाई जाति प्रमाण पत्र को स्थाई करने की मांग की। प्रकरण में जस्टिस एमएम श्रीवास्तव की एकलपीठ में सुनवाई हुई। सुनवाई उपरांत उन्होंने पूर्व में जारी अस्थाई जाति प्रमाण पत्र के आधार पर मिसल बंदोबस्त रिकार्ड की अनिवार्यता को शिथिल करते हुए स्थाई जाति प्रमाण पत्र जारी करने का आदेश दिया है। उल्लेखनीय है राज्य शासन ने फर्जी जाति प्रमाण पत्र के बढ़ते प्रकरणों को ध्यान में रखते हुए मिसल बंदोबस्त रिकार्ड में नाम को अनिवार्य कर दिया है। इसके आधार पर जाति प्रमाण पत्र जारी किया जा रहा है। 

जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए पहले अवलोकन फिर नकल आदि के लिए व्‍यावहारिक रूप में पुराना मिसल बंदोबस्‍त रिकार्ड बार बार खोला जा रहा है जिसके कारण लगभग लगभग हर जिले का मिसल जीर्ण शीर्ण हो गया है ।  आगामी वर्षों में जाति के अतिरिक्‍त राजस्‍व अभिलेखों की जानकारी के लिए यह रिकार्ड उपलब्‍ध नहीं हो पायेगा जिससे वकीलों को पुराने अधिकार अभिलेख, दस्‍तावेज सर्च में दिक्‍कत आयेगी। 

Jun 19, 2010

नियुक्ति रद्द करने पर पुनर्विचार के निर्देश : बीजापुर जिले की जपं भोपलपटनम का मामला

जस्टिस एमएम श्रीवास्तव की एकलपीठ ने शिक्षाकर्मी वर्ग-३ की नियुक्ति निरस्त किए जाने के खिलाफ दाखिल याचिका को निराकृत करते हुए भोपलपटनम जनपद सीईओ को उसकी नियुक्ति निरस्त करने पर पुनर्विचार करने के निर्देश दिए हैं।

ज्ञात होकि शशिप्रभा सिंह की नियुक्ति बीजापुर जिले की जनपद पंचायत भोपलपटनम में शिक्षाकर्मी वर्ग ३ के पद पर वर्ष २००६ में हुई थी। २००८ में उसे नियमित भी कर दिया गया। शिक्षाकर्मी वर्ग-३ की नियुक्ति में गड़बड़ी की शिकायत पर कलेक्टर ने जांच आरंभ की। जांच रिपोर्ट के आधार पर १४ शिक्षाकर्मियों को अलग-अलग कारण बताते हुए नोटिस जारी किया गया। शशिप्रभा सिंह को वर्ष २००९ में मिले नोटिस में कहा गया कि उसने खेलकूद का प्रमाणपत्र आवेदन में संलग्न नहीं किया है। इसके बाद भी उसे बोनस अंक का लाभ मिला है। इस पर उसने बताया कि आवेदन जमा करने के बाद उसने पावती ली थी। इसे जवाब के साथ उसने प्रस्तुत किया। इसके बाद भी अक्टूबर २००९ में उसकी नियुक्ति नियम विरुद्ध होने तथा नियुक्ति निरस्त करने योग्य होने की बात कहते हुए नोटिस दिया गया। इस पर उसने सूचना के अधिकार के तहत नियुक्ति संबंधी दस्तावेज एकत्र करने करने में समय लगने का हवाला देते हुए कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा। कलेक्टर द्वारा असहमति व्यक्त करने पर उसने हाईकोर्ट में याचिका लगाई। इसमें उक्त नोटिस तथा प्रक्रिया को पूर्वाग्रह से ग्रस्त होने के कारण निरस्त करने की मांग की गई है।

प्रकरण हाईकोर्ट में लंबित होने के बाद भी भोपलपटनम ब्लॉक के सीईओ ने उसकी सेवा समाप्त कर दी। इसी दौरान सेवा से अलग हुए अन्य शिक्षाकर्मियों की याचिका पर हाईकोर्ट ने सीईओ को सेवा समाप्त करने के आदेश को प्रभाव में नही लाते हुए संपूर्ण प्रकरण पर पुनर्विचार करने का आदेश दिया। हाईकोर्ट के इस आदेश पर सीईओ को शशिप्रभा के प्रकरण में भी पुनर्विचार किया जाना था, किन्तु सीईओ ने अन्य शिक्षाकर्मियों को सेवा में बहाल किया गया, जबकि शशिप्रभा को यह कहकर भगा दिया गया कि उसके प्रकरण में हाईकोर्ट से कोई आदेश नहीं आया है। इस पर उसने अधिवक्ता जितेंद्र पाली, वरुण शर्मा, अभिनव करडेकर के माध्यम से हाईकोर्ट में पुनः याचिका लगाई। इस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस एमएम श्रीवास्तव ने भोपालपट्टनम ब्लॉक के सीईओ को प्रकरण पर भी पुनर्विचार करने के निर्देश देते हुए याचिका को निराकृत कर दिया।

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