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Feb 2, 2012

प्रतिबंध अवधि में स्थानांतरण उचित नहीं, शासन के आदेश पर यथास्थिति

माननीय उच्च न्यायालय छत्तीसगढ के न्यायमूर्ति श्री सतीश अग्निहोत्री जी की एकलपीठ ने वन विभाग द्वारा जारी स्थानांतरण आदेश पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश करते हुए सचिव वन विभाग, प्रधान मुख्य वन संरक्षक तथा वन संरक्षक कार्य आयोजना वनमंडल जांजगीर चांपा को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है।

याचिकाकर्ता सी.पी भारद्वाज की पोस्टिंग कार्यआयोजना जांजगीर चांपा में वर्ष 2008 में की गई थी। कार्य आयोजना का कार्य पूर्ण हो जाने पर याचिकाकर्ता का स्थानांतरण करते हुए वर्ष 2010 में सक्ती भेजा गया। याचिकाकर्ता की सेवानिवृत्ति में एक वर्ष से कम अवधि बचे होने के बावजूद दिनांक 07.01.2012 को नए स्थानांतरण आदेश जारी करते हुए पुनः कार्य आयोजना जांजगीर चांपा भेज दिया गया जिसका कार्य पूर्ण हो चुका है। उक्त स्थानांतरण आदेश में याचिकाकर्ता के अतिरिक्त 35 अन्य का भी स्थानांतरण किया गया।

अधिवक्ता जितेन्द्र पाली
याचिकाकर्ता ने उक्त स्थानांतरण आदेश को अधिवक्ता जितेन्द्र पाली, वरुण शर्मा के माध्यम से माननीय उच्च न्यायालय में चुनौती दी। तर्क यह था कि स्थानांतरण जोकि शासकीय सेवा की एक अनिवार्य घटना है तथा नियोजक के रूप में शासन का विशेष अधिकार है स्थानांतरण नीति से नियंत्रित होता है। छत्तीसगढ़ शासन ने इस सत्र 2011-12 के लिए स्थानांतरण नीति निर्धारित की है जिसमें स्थानांतरण करने की अंतिम तिथि 15 जुलाई 2011 नियत की गई है तथा उसके पश्चात स्थानांतरण पर प्रतिबंध रखा गया है। दिनांक 08 अगस्त 2011 को एक और आदेश जारी कर राज्य शासन ने यह व्यवस्था दी है कि प्रतिबंध अवधि में अत्यंत आवश्यक परिस्थिति में प्रमुख सचिव के समन्वय में मुख्य मंत्री से अनुमति पश्चात ही स्थानांतरण किए जाने है।

याचिकाकर्ता के स्थानांतरण हेतु कोई अत्यंत आवश्यक परिस्थिति उपलब्ध नहीं है। माननीय उच्च न्यायालय ने बड़ी संख्या में स्थानांतरण को अत्यंत आवश्यक परिस्थिति हेतु दी गई सुविधा का दुरूपयोग पाते हुए याचिकाकर्ता के स्थानांतरण पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश करते हुए राज्य शासन तथा अन्य प्रतिवादियों से जवाब मांगा है। राज्य शासन द्वारा स्थानांतरण की अंतिम तिथि नियत करने के पीछे मंशा यही थी कि लोकसेवकों को अनावश्यक रूप से सत्र के बीच में होने वाले स्थानांतरणों से परेशान न होना पड़े।

बिना किसी विधिक आधार के नागरिकों के अधिकार नहीं छीन सकती सरकार

माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की माननीय न्यायमूर्ति श्री सुनील कुमार सिन्हा तथा राधेश्याम शर्मा की खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 162 की व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया है कि सरकार उक्त अनुच्छेद में प्राप्त शक्तियां बिना किसी विधिक आधार के नागरिकों के अधिकारों का हनन करने के लिए प्रयोग नहीं कर सकती।

याचिकाकर्ता जयंत किशोर, अर्पिता शुक्ला, पूजा तिवारी, भेवेन्द्र कुमार तथा अन्य ने माननीय उच्च न्यायालय में संचालक तकनीकी शिक्षा के परिपत्र दिनांक 12.07.2010 तथा 20.08.2010 को चुनौती दी जिसके तहत राज्य शासन ने सभी विश्वविद्यालयों को आदेश जारी किया था कि ऐसे अभ्यर्थी जिन्होंने इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा पीइटी, एआईइइइ आदि में शून्य अथवा ऋणात्मक अंक प्राप्त किए हैं उन्हें किसी बीई कोर्स में प्रवेश की पात्रता नहीं होगी। सभी याचिकाकर्ताओं ने अलग अलग निजी महाविद्यालयों में मैनेजमेंट कोटा की महंगी सीटों में उक्त परिपत्रों के जारी होने से पहले ही प्रवेश ले लिया था। स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय ने उक्त परिपत्रों के आधार पर सभी याचिकाकर्ताओं का नामांकन करने से इन्कार कर दिया। माननीय उच्च न्यायालय ने याचिका की आरंभिक सुनवाई में अंतरिम आदेश जारी करते हुए सभी याचिकाकर्ताओं को परीक्षा में बैठाने का आदेश दिया। माननीय न्यायालय के अंतरिम आदेशों के तहत सभी याचिकाकर्ता तीसरे सेमेस्टर तक पढ़ाई पूर्ण कर चुके थे।

अधिवक्ता जितेन्द्र पाली
मामले की अंतिम सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता संदीप दुबे, मनोज परांजपे, जितेन्द्र पाली, वरूण शर्मा ने तर्क रखा कि छत्तीसगढ़ इंजीनियरिंग स्नातक पाठ्यक्रम प्रवेश नियम,2010 के नियम 2.4 1⁄4ए1⁄2 के तहत सभी निजी इंजीनियरिंग कालेजों में 15 प्रतिशत सीटें मैनेजमेंट अथवा प्रबंधन कोटा होता है। उक्त प्रबंधन कोटे में छग तथा बाहर के राज्यों के छात्र भी पीईटी अथवा एआईइइइ जैसी प्रवेश परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर प्रवेश हेतु पात्र होते हैं। उक्त प्रबंधन कोटे में प्रवेश हेतु काउंसिलिंग कालेज स्तर पर होती है। उक्त प्रवेश नियम में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि पीइटी, एआइइइइ में कितने अंक न्यूनतम होंगे। अतः संचालक तकनीकी शिक्षा का परिपत्र नियम विरूद्ध है तथा याचिकाकर्ताओं के शिक्षा के मूल अधिकारों का हनन करता है। उक्त परिपत्र सक्षम अधिकारी द्वारा जारी नही किया गया है। राज्य शासन ने अपने द्वारा जारी परिपत्रों का पुरजोर समर्थन करते हुए यह तर्क
रखा कि संविधान के अनुच्छेद 162 के अंतर्गत राज्य शासन को परिपत्र जारी करने का अधिकार है। उक्त परिपत्र शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के उद्देश्य से जारी किए गए हैं।

माननीय उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय की नजीरों पर विचार करते हुए तथा अनुच्छेद 162 की व्याख्या करते हुए यह धारित किया है कि अनुच्छेद 162 के अंतर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग केवल उन स्थानों पर हो सकता है जहां संसद अथवा विधानसभा द्वारा पारित कोई कानून उपलब्ध न हो। जहां कोई कानून उपलब्ध हो वहां उस कानून के विपरीत कोई भी परिपत्र अनुच्छेद 162 के अंतर्गत जारी नहीं किया जा सकता। राज्य शासन इस प्रकरण में कोई भी ऐसा विधिक आधार प्रस्तुत नहीं कर सका जिसके तहत परिपत्र जारी किया गया है। वर्ष 2011-12 में जारी प्रवेश नियम में न्यूनतम अंक का प्रावधान रखा गया है परंतु वर्ष 2010 में प्रवेश लिए अभ्यर्थियों पर केवल आधारहीन परिपत्र के द्वारा रोक लगाना अनुचित है तथा संविधान की मूल आस्था के खिलाफ है। इस प्रकार माननीय उच्च न्यायालय ने सभी याचिकाकर्ताओं का प्रवेश वैध ठहराया है। स्वामी विवेकानंद विवि को भी निर्देशित किया है कि याचिकाकर्ताओं का नामांकन कर उन्हें बी.ई कोर्स बिना किसी बाधा के पूर्ण कराने के आदेश जारी किए हैं।

राज्य शासन की अपील खारिज

माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने गुरूवार को राज्य शासन द्वारा प्रस्तुत की गई उस अपील को खारिज कर दिया है जिसमें राज्य शासन ने मंडल संयोजकों को मुख्य कार्यपालन अधिकारी विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी के पद पर पदोन्नति दिए जाने संबंधी माननीय उच्च न्यायालय के एकल पीठ के आदेश को चुनौती दी थी। मंडल संयोजकों के पद पर पिछले 20 से 25 वर्षों से अधिक अवधि तक कार्य करने के पश्चात एक भी पदोन्नति न मिलने से क्षुब्ध मंडल संयोजकों की याचिका स्वीकार करते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने वर्ष 2010 में राज्य शासन के अजा अजजा कल्याण विभाग को मंडल संयोजकों की पदोन्नति हेतु 4 माह में डीपीसी आयोजित करने का आदेश जारी किया था। उक्त आदेश का परिपालन न करने के कारण राज्य शासन को अवमानना की कार्यवाही भी झेलनी पड़ी जिसमें क्षमा मांगते हुए राज्य शासन ने आदेश समझने में भूल होने का कारण बताते हुए और समय चाहा जो माननीय उच्च न्यायालय ने न्यायहित में दिया। समय मिलने के बाद भी राज्य शासन ने पदोन्नति की कार्यवाही नहीं की तथा माननीय उच्च न्यायालय की खंडपीठ में अपील प्रस्तुत की जिसे बाद में यह कह कर वापस ले लिया कि वे एकल पीठ के समक्ष पुनरीक्षण याचिका प्रस्तुत करना चाहते हैं।

एकल पीठ ने पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी उसे लेकर राज्य शासन ने पुनः अपील दायर की जिसमें एकलपीठ के द्वारा पारित आदेश तथा पुनरीक्षण आदेश को चुनौती दी गई थी। मंडल संयोजकों की ओर से अधिवक्ता जितेन्द्र पाली, वरूण शर्मा ने मंडल संयोजकों का पक्ष रखा । माननीय न्यायालय ने राज्य शासन से प्रश्न किया की नियमानुसार कार्यवाही करने में क्या कठिनाई है। अंततः निचले सभी आदेशों को सही पाते हुए तथा राज्य शासन के तर्कों की सुनवाई करते हुए माननीय न्यायमूर्ति श्री सुनील सिन्हा तथा राधेश्याम शर्मा ने राज्य शासन की अपील खारिज कर दी है तथा जिससे मंडल संयोजकों की पदोन्नति विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी तथा मुख्य कार्यपालन अधिकारी के पद पर होने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

Aug 12, 2010

जांजगीर डीईओ को अवमानना नोटिस

बिलासपुर हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी जांजगीर-चांपा डीईओ ने सहायक शिक्षक के प्रकरण को निराकृत नहीं किया। कोर्ट ने उसे अवमानना मानते हुए जांजगीर-चांपा डीईओ को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। जांजगीर निवासी शंकरलाल कुर्रे की वर्ष १९८२ में सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्ति हुई थी। कुछ समय तक काम लेने के बाद उसे सेवा से अलग कर दिया गया। १९९८ में सेवा से पृथक हुए कई शिक्षकों की पुनः नियुक्तियां की गईं, लेकिन शंकरलाल कुर्रे इससे वंचित हो गया। उसने फिर से नियुक्ति पाने के लिए आवेदन दिया, लेकिन उसके आवेदन पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस पर उसने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका लगाई। हाईकोर्ट ने २००६ में याचिका को निराकृत करते हुए जांजगीर-चांपा डीईओ को याचिकाकर्ता के प्रकरण पर निर्णय लेकर कार्रवाई करने का आदेश दिया। हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी उसके आवेदन पर ४ वर्ष तक कोई निर्णय नहीं लिया गया। इस पर उन्होंने अधिवक्ता अनुपम दुबे के माध्यम से हाईकोर्ट में डीईओ के खिलाफ अवमानना याचिका दाखिल की। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सुनील सिन्हा ने जांजगीर-चांपा डीईओ एके भार्गव को अवमानना नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

आरंभ में पढ़ें : -
एक थी नारायणी कहानी संग्रह
लेह अब यादें ही शेष हैं

Jun 18, 2010

कोयला उत्‍खनन : जनहित याचिका खारिज

बिलासपुर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस राजीव गुप्ता एवं जस्टिस सुनील सिन्हा की युगलपीठ ने एसईसीएल के खिलाफ कोयला उत्खनन के लिए ग्राम लाट में भूमि अधिग्रहण कर मुआवजा नहीं देने संबंधी दायर जनहित याचिका को खारिज कर दिया।

शासन ने अपने जवाब में याचिका को जनहित के बजाय स्वहित में दाखिल करना बताया है। एसईसीएल ने रायगढ़ जिले के ग्राम लाट में कोयला उत्खनन के लिए भूमि अधिग्रहित की है। यहां के हेतराम राठिया व रूपराम राठिया ने एसईसीएल के खिलाफ हाईकोर्ट में जनहित याचिका लगाई थी। इसमें बताया गया था कि अधिग्रहण की गई का मुआवजा प्रभावितों को नहीं दिया गया है। अधिग्रहण के बाद शेष 161 हेक्टेयर भूमि का कोई उपयोग नहीं हो रहा है। इसके कारण से बची हुई भूमि को भी अधिग्रहित करने की मांग की गई। याचिका की प्रारंभिक सुनवाई में हाईकोर्ट ने राज्य शासन, एसईसीएल प्रबंधन को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। इस पर गुरूवार को चीफ जस्टिस श्री गुप्ता तथा जस्टिस श्री सिन्हा की युगलपीठ में सुनवाई हुई। इस दौरान उत्तरवादियों के अधिवक्ताओं ने कोर्ट को बताया कि अधिग्रहित भूमि के सभी प्रभावितों को उचित मुआवजा दे दिया गया है। याचिका जनहित के बजाय स्वहित से जुड़ी हुई है। उन्होंने तर्क प्रस्तुत करते हुए याचिका को खारिज करने की मांग की। इससे सहमत होते हुए युगलपीठ ने जनहित याचिका को खारिज कर दिया।

Apr 7, 2010

एचपी और इंडियन ऑयल को नोटिस

गैस एजेंसी संचालक की याचिका पर सुनवाई करते हुए बिलासपुर हाईकोर्ट ने केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय सहित एचपी व इंडियन ऑयल को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

मामला १० साल पुराना है। २ जुलाई १९९२ को केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय ने अधिसूचना जारी कर अनुसूचित जाति,जनजाति वर्ग के अलावा ओबीसी वर्ग के लोगों को घरेलू गैस एजेंसी देने का निर्णय लिया था। मूलभूत ढांचा निर्माण की जिम्मेदारी एचपी व इंडियन ऑयल को दी गई थी। इसी के मद्देनजर इंडियन ऑयल ने साईं गैस तथा एचपी ने लाफागढ़ को एजेंसी बनाया था। एचपी ने लाफागढ़ को ५ लाख ३० हजार ३६५ रूपए व इंडियन ऑयल ने साईं गैस को १० लाख २४ हजार ८०१ रूपए का फंड जारी किया था। इसी बीच केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय ने अपनी पॉलिसी बदल दी। इसकी सूचना एचपी व इंडियन ऑयल को भी दी गई। पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा पॉलिसी बदलने के साथ ही एचपी ने अपने द्वारा तय किए गए एजेंसी लाफागढ़ पर प्रति सिलेंडर एक रूपए का ब्याज लगाकर ४३ लाख ९३ हजार २५७ रूपए का रिकवरी आदेश जारी कर दिया। याचिकाकर्ता एजेंसी संचालक ने बताया कि एचपी गैस ने १ अप्रैल २००६ तक रिकवरी की राशि वसूल ली है। याचिका के अनुसार इसके बाद भी वसूली की कार्रवाई कंपनी द्वारा की जा रही है। सोमवार को इस मामले की सुनवाई जस्टिस सुनील सिन्हा की सिंगल बेंच में हुई। जस्टिस श्री सिन्हा ने केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय के अलावा एचपी व इंडियन ऑयल कंपनी को नोटिस जारी कर जवाब पेश करने के निर्देश दिए हैं।

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