Showing posts with label वरूण शर्मा. Show all posts
Showing posts with label वरूण शर्मा. Show all posts

Aug 9, 2012

सरकारी पदों पर भर्ती में बिना विज्ञापन निकाले नहीं, सबको मिले अधिकार

माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में राज्य शासनसमुंद, जगदलपुर, दुर्ग आदि कार्यालयों में हुई। वर्ष 2010 में वाणिज्य कर आयुक्त ने आदेश जारी किया कि वाणिज्य कर कार्यालयों में डाक वाहकों के पद पर सीधी भर्त२े यह स्पष्ट कहा है कि सरकारी नियुक्तियों पर सबका अधिकार है और कोई भी भर्ती बिना सबको भाग लेने का मौका दिए की जाना असंवैधानिक और अवैध है।

याचिकाकर्ता वीरू यादव, गजानंद लहरे, प्रीतम नामदेव, रविकांत चेलक एन. रामू तथा अन्य कई की नियुक्ति डाक वाहक या प्रोसेस सर्वर के रूप में कलेक्टर दर पर वर्ष 2008 में वाणिज्य कर विभाग के रायपुर, महासमुंद, जगदलपुर, दुर्ग आदि कार्यालयों में हुई। वर्ष 2010 में वाणिज्य कर आयुक्त ने आदेश जारी किया कि वाणिज्य कर कार्यालयों में डाक वाहकों के पद पर सीधी भर्ती रोजगार कार्यालय से नाम मंगवाकर की जाएगी।

उपसंभागायुक्त वाणिज्य कर ने भी सीधे रोजगार कार्यालय को पत्र लिखकर नाम भेजने को कहा। याचिकाकर्ता जो कि इस आस में कि सीधी भर्ती होने पर उन्हें भी सभी की तरह खुली प्रतियोगिता में भाग लेकर नियमित भर्ती का मौका मिल पाएगा इस निर्णय से उक्त पदों पर भर्ती होने से वंचित हो गए। विभाग के उक्त कृत्य से व्यथित होकर याचिकाकर्ताओं ने अधिवक्ता जितेंद्र पाली तथा वरुण शर्मा की ओर से याचिका प्रस्तुत की। माननीय उच्च न्यायालय ने याचिका स्वीकार करते हुए नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगा दी तथा राज्य शासन व अन्य प्रतिवादियों को जवाब प्रस्तुत करने को कहा। उक्त याचिका में राज्य शासन तथा वाणिज्यकर विभाग ने जवाब प्रस्तुत कर यह तर्क लिया कि याचिकाकर्ता दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी हैं अतः उन्हें कोई अधिकार नहीं है और रोजगार कार्यालय से नाम मंगवाने का निर्णय प्रशासकीय निर्णय है।

वर्ष 2008 में माननीय उच्च न्यायालय ने दरबार सिंह पोर्ते विरुद्ध छग शासन के फैसले में ऐसी ही स्थिति का विचारण करते हुए यह धारित किया है कि केवल रोजगार कार्यालय से नाम मंगवा लेने से खुली प्रतियोगिता की संवैधानिक आवश्कयता पूर्ण नहीं होती। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 के परिपालन में यह राज्य शासन का दायित्व है कि आमजनता को खुला निमंत्रण (विज्ञापन द्वारा) देकर भर्ती की जानी चाहिए।

उक्त मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क रखा गया कि केवल रोजगार कार्यालय से नाम मंगवाने से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 व 16 द्वारा प्रस्तावित आवश्कयताएं पूर्ण नहीं होती हैं तथा ऐसा करना शासकीय पदों पर नियुक्ति की संवैधानिक व्यवस्था तथा योजना के विरुद्ध हैं। माननीय सर्वोच्च न्यायालय तथा माननीय छग उच्च न्यायालय के द्वारा भी ऐसी भर्तियों को नियम विरुद्ध बताया गया है। माननीय उच्च न्यायालय ने मामले की अंतिम सुनवाई करते हुए वाणिज्यकर आयुक्त के रोजगार कार्यालय से नाम मंगवाकर भर्ती किए जाने के आदेश दिनांक 04 जनवरी 2010 को निरस्त करते हुए नियमानुसार संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप भर्ती करने का निर्देश दिया है। उक्त आदेश के निरस्त होने के फलस्वरूप उपरोक्त आदेश के पालन में शुरू की गई भर्ती प्रक्रिया स्वयमेव निरस्त हो गई है। उक्त आदेश से अब वाणिज्य कर विभाग के रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, महासमुंद, जगदलपुर आदि सभी वृत्तों में डाकवाहकों की नियुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

Aug 8, 2012

सेवा निवृत्ति के पश्चात कटौती अवैध, पूरा पैसा लौटाए विभाग

याचिका कर्ता मन्नूलाल देवांगन केलो परियोजना जल संसाधन विभाग से सहायक अभियंता के पद पर कार्य करते हुए वर्ष 2007 में सेवा निवृत्त हुए। जनवरी 2008 में विभाग ने याचिका कर्ता का पेंशन अदायगी आदेश जारी किया जिसके द्वारा याचिका कर्ता की पेंशन राशि से 44933 रू की वसूली किये जाने का निर्देश दिया गया ।उक्त वसूली आदेश जारी किये जाने के पूर्व याचिका कर्ता को कोई नोटिस अथवा सूचना नही दी गई और ना ही याचिकाकर्ता को कोई कारण बताया गया की  वसूली क्यों की जा रही हैं। याचिकाकर्ता ने विभाग को अभ्यावेदन प्रस्तुत कर यह निवेदन किया कि इस तरह की एकतरफा वसूली अवैध है तथा माननीय सर्वोच्च न्यायालय तथा माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के द्वारा ऐसी वसूलियों को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ बताया हैं। विभाग द्वारा कोई सुनवाई नही किये जाने पर याचिकाकर्ता ने अधिवक्ता जितेन्द्र पाली तथा वरुण शर्मा के माध्यम से याचिका प्रस्तुत की जिसमे माननीय उच्च न्यायालय ने राज्य शासन तथा जल संसाधन विभाग को नोटिस जारी करते हुए यह पुछा था कि लोगों को कोर्ट जाने हेतु विवष क्यो किया जा रहा है। उक्त याचिका की अंतिम सुनवाई करते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता के खिलाफ की गई वसूली को अवैध ठहराते हुए याचिकाकर्ता को सम्पूर्ण राशि लौटाये जाने का निर्देश विभाग को दिया है।

निजी डेंटल कालेज ने षासकीय कोटे के छात्रों को निकाला, हाईकोर्ट ने नोटिस जारी कर जवाब मांगा

याचिकाकर्ता अदिति जैन व अन्य दंत चिकित्सा में स्नातक हैं। छग डेंटल कालेज एंड
रिसर्च इंस्टीट्यूट राजनांदगांव में स्थित एक निजी डेंटल कालेज है जहां दंत चिकित्सा में स्नातक तथा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम पढ़ाए जाते हैं। उक्त निजी कालेज को राज्य शासन ने वर्ष 2008 में केवल एक वर्ष के लिए अल्पसंख्यक संस्था की मान्यता दी थी।

राज्य शासन ने वर्ष 2012 में दंत चिकित्सा के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम एमडीएस कोर्स में प्रवेश हेतु नियम बनाए। उक्त नियमो में राज्य शासन ने यह स्पष्ट किया कि सभी पाठ्यक्रमों में प्रवेश शासकीय नियमानुसार ही होगा। राज्य शासन के द्वारा छत्तीसगढ़ आयुश तथा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय को प्रवेश परीक्षा करवाने हेतु अधिकृत किया। यह उल्लेखनीय है कि दंत चिकित्सा तथा उससे संबंधित पाठ्यक्रम डेंटल काउंसिल आफ इंडिया यानि डीसीआई के द्वारा नियंत्रित होते हैं जोकि केंद्र शासन की एक सशक्त संस्था है। डीसीआई ने एमडीएस पाठ्यक्रम हेतु रेगुलेशन अर्थान नियमावली 2007 जारी की है जिसके अनुसार किसी भी कालेज में दंत चिकित्सा के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में 50 प्रतिषत सीटें शासकीय कोटे से भरी जानी आवश्यक हैं। डीसीआई के दिशानिर्देशों के विपरीत कोई भी प्रवेश नहीं हो सकता।

इसी वर्ष 9 मई 2012 को राज्य शासन ने संचालक चिकित्सा शिक्षा को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि छग डेंटल कालेज ने कोई अल्पसंख्यक स्वरूप का प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया है तथा उक्त संस्था में 50 प्रतिषत सीटें षासकीय कोटे से भरी जाएंगी। उक्त आदेश का कोई विरोध छग डेंटल कालेज ने नहीं किया। इसी बीच दिनांक 24 मई 2012 को स्नातकोत्तर प्रवेश परीक्षा आयोजित हुई जिसमें सभी याचिकाकर्ता सम्मिलित हुए और सभी ने प्रावीण्य में स्थान प्राप्त किया। उक्त परीक्षा के पश्चात काउंसिलिंग दिनांक 30 मई को रखी गई। उसी दिन छग डेंटल कालेज ने एक प्रेस सूचना जारी करते हुए यह कहा कि माननीय छग उच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसार छग डेंटल कालेज में कोई शायकीय कोटे की सीट नहीं है तथा छात्र उनके कालेज में काउंसिलिंग से प्रवेश न लें। उक्त प्रेस नोट के जवाब में संचालक चिकित्सा शिक्षा ने तत्काल छग डेंटल कालेज को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि कालेज के द्वारा अपने अल्पसंख्यक होने के संबंध में कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया है इसलिए शासन को कालेज का अल्पसंख्यक संस्थान होना मान्य नहीं है और शासकीय कोटे से प्रवेश देना होगा।

याचिकाकर्ताओं ने दिनांक 30 मई 2012 को आयोजित काउंसिलिंग में छग डेंटल कालेज को प्रवेश हेतु चुना और कालेज ने सभी याचिकाकर्ताओं का प्रवेश मान्य करते हुए उनसे फीस आदि जमा करवा कर प्रवेश दे दिया। साथ ही यह पत्र भी दे दिया कि उनके कालेज में शासकीय कोटे की कोई सीट नहीं है अतः सभी याचिकाकर्ता अपनी स्वयं की जिम्मेदारी पर प्रवेश लें। सभी याचिकाकर्ता उक्त कालेज में डेढ़ महीने तक पढ़ते भी रहे। दिनांक 18 जुलाई 2012 को
राज्य शासन ने कालेज को पत्र लिखकर कहा कि आपके पास 17 सीटें हैं और आपने 22 छात्रों को प्रवेश दिया है अतः 5 सीटों के प्रवेश रद्द करें। उक्त आदेश का बहाना लेकर कालेज ने सभी याचिकाकर्ता जोकि नियमानुसार शासकीय कोटे के छात्र थे उनका प्रवेश रद्द कर दिया।

याचिकाकर्ताओं ने अधिवक्ता जितेंद्र पाली तथा वरुण शर्मा के माध्यम से माननीय उच्च न्यायालय में याचिका प्रस्तुत की जिसमें माननीय उच्च न्यायालय ने राज्य शासन, डीसीआई, संचालक चिकित्सा शिक्षा तथा छग डेंटल कालेज को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

Feb 2, 2012

प्रतिबंध अवधि में स्थानांतरण उचित नहीं, शासन के आदेश पर यथास्थिति

माननीय उच्च न्यायालय छत्तीसगढ के न्यायमूर्ति श्री सतीश अग्निहोत्री जी की एकलपीठ ने वन विभाग द्वारा जारी स्थानांतरण आदेश पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश करते हुए सचिव वन विभाग, प्रधान मुख्य वन संरक्षक तथा वन संरक्षक कार्य आयोजना वनमंडल जांजगीर चांपा को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है।

याचिकाकर्ता सी.पी भारद्वाज की पोस्टिंग कार्यआयोजना जांजगीर चांपा में वर्ष 2008 में की गई थी। कार्य आयोजना का कार्य पूर्ण हो जाने पर याचिकाकर्ता का स्थानांतरण करते हुए वर्ष 2010 में सक्ती भेजा गया। याचिकाकर्ता की सेवानिवृत्ति में एक वर्ष से कम अवधि बचे होने के बावजूद दिनांक 07.01.2012 को नए स्थानांतरण आदेश जारी करते हुए पुनः कार्य आयोजना जांजगीर चांपा भेज दिया गया जिसका कार्य पूर्ण हो चुका है। उक्त स्थानांतरण आदेश में याचिकाकर्ता के अतिरिक्त 35 अन्य का भी स्थानांतरण किया गया।

अधिवक्ता जितेन्द्र पाली
याचिकाकर्ता ने उक्त स्थानांतरण आदेश को अधिवक्ता जितेन्द्र पाली, वरुण शर्मा के माध्यम से माननीय उच्च न्यायालय में चुनौती दी। तर्क यह था कि स्थानांतरण जोकि शासकीय सेवा की एक अनिवार्य घटना है तथा नियोजक के रूप में शासन का विशेष अधिकार है स्थानांतरण नीति से नियंत्रित होता है। छत्तीसगढ़ शासन ने इस सत्र 2011-12 के लिए स्थानांतरण नीति निर्धारित की है जिसमें स्थानांतरण करने की अंतिम तिथि 15 जुलाई 2011 नियत की गई है तथा उसके पश्चात स्थानांतरण पर प्रतिबंध रखा गया है। दिनांक 08 अगस्त 2011 को एक और आदेश जारी कर राज्य शासन ने यह व्यवस्था दी है कि प्रतिबंध अवधि में अत्यंत आवश्यक परिस्थिति में प्रमुख सचिव के समन्वय में मुख्य मंत्री से अनुमति पश्चात ही स्थानांतरण किए जाने है।

याचिकाकर्ता के स्थानांतरण हेतु कोई अत्यंत आवश्यक परिस्थिति उपलब्ध नहीं है। माननीय उच्च न्यायालय ने बड़ी संख्या में स्थानांतरण को अत्यंत आवश्यक परिस्थिति हेतु दी गई सुविधा का दुरूपयोग पाते हुए याचिकाकर्ता के स्थानांतरण पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश करते हुए राज्य शासन तथा अन्य प्रतिवादियों से जवाब मांगा है। राज्य शासन द्वारा स्थानांतरण की अंतिम तिथि नियत करने के पीछे मंशा यही थी कि लोकसेवकों को अनावश्यक रूप से सत्र के बीच में होने वाले स्थानांतरणों से परेशान न होना पड़े।

बिना किसी विधिक आधार के नागरिकों के अधिकार नहीं छीन सकती सरकार

माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की माननीय न्यायमूर्ति श्री सुनील कुमार सिन्हा तथा राधेश्याम शर्मा की खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 162 की व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया है कि सरकार उक्त अनुच्छेद में प्राप्त शक्तियां बिना किसी विधिक आधार के नागरिकों के अधिकारों का हनन करने के लिए प्रयोग नहीं कर सकती।

याचिकाकर्ता जयंत किशोर, अर्पिता शुक्ला, पूजा तिवारी, भेवेन्द्र कुमार तथा अन्य ने माननीय उच्च न्यायालय में संचालक तकनीकी शिक्षा के परिपत्र दिनांक 12.07.2010 तथा 20.08.2010 को चुनौती दी जिसके तहत राज्य शासन ने सभी विश्वविद्यालयों को आदेश जारी किया था कि ऐसे अभ्यर्थी जिन्होंने इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा पीइटी, एआईइइइ आदि में शून्य अथवा ऋणात्मक अंक प्राप्त किए हैं उन्हें किसी बीई कोर्स में प्रवेश की पात्रता नहीं होगी। सभी याचिकाकर्ताओं ने अलग अलग निजी महाविद्यालयों में मैनेजमेंट कोटा की महंगी सीटों में उक्त परिपत्रों के जारी होने से पहले ही प्रवेश ले लिया था। स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय ने उक्त परिपत्रों के आधार पर सभी याचिकाकर्ताओं का नामांकन करने से इन्कार कर दिया। माननीय उच्च न्यायालय ने याचिका की आरंभिक सुनवाई में अंतरिम आदेश जारी करते हुए सभी याचिकाकर्ताओं को परीक्षा में बैठाने का आदेश दिया। माननीय न्यायालय के अंतरिम आदेशों के तहत सभी याचिकाकर्ता तीसरे सेमेस्टर तक पढ़ाई पूर्ण कर चुके थे।

अधिवक्ता जितेन्द्र पाली
मामले की अंतिम सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता संदीप दुबे, मनोज परांजपे, जितेन्द्र पाली, वरूण शर्मा ने तर्क रखा कि छत्तीसगढ़ इंजीनियरिंग स्नातक पाठ्यक्रम प्रवेश नियम,2010 के नियम 2.4 1⁄4ए1⁄2 के तहत सभी निजी इंजीनियरिंग कालेजों में 15 प्रतिशत सीटें मैनेजमेंट अथवा प्रबंधन कोटा होता है। उक्त प्रबंधन कोटे में छग तथा बाहर के राज्यों के छात्र भी पीईटी अथवा एआईइइइ जैसी प्रवेश परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर प्रवेश हेतु पात्र होते हैं। उक्त प्रबंधन कोटे में प्रवेश हेतु काउंसिलिंग कालेज स्तर पर होती है। उक्त प्रवेश नियम में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि पीइटी, एआइइइइ में कितने अंक न्यूनतम होंगे। अतः संचालक तकनीकी शिक्षा का परिपत्र नियम विरूद्ध है तथा याचिकाकर्ताओं के शिक्षा के मूल अधिकारों का हनन करता है। उक्त परिपत्र सक्षम अधिकारी द्वारा जारी नही किया गया है। राज्य शासन ने अपने द्वारा जारी परिपत्रों का पुरजोर समर्थन करते हुए यह तर्क
रखा कि संविधान के अनुच्छेद 162 के अंतर्गत राज्य शासन को परिपत्र जारी करने का अधिकार है। उक्त परिपत्र शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के उद्देश्य से जारी किए गए हैं।

माननीय उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय की नजीरों पर विचार करते हुए तथा अनुच्छेद 162 की व्याख्या करते हुए यह धारित किया है कि अनुच्छेद 162 के अंतर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग केवल उन स्थानों पर हो सकता है जहां संसद अथवा विधानसभा द्वारा पारित कोई कानून उपलब्ध न हो। जहां कोई कानून उपलब्ध हो वहां उस कानून के विपरीत कोई भी परिपत्र अनुच्छेद 162 के अंतर्गत जारी नहीं किया जा सकता। राज्य शासन इस प्रकरण में कोई भी ऐसा विधिक आधार प्रस्तुत नहीं कर सका जिसके तहत परिपत्र जारी किया गया है। वर्ष 2011-12 में जारी प्रवेश नियम में न्यूनतम अंक का प्रावधान रखा गया है परंतु वर्ष 2010 में प्रवेश लिए अभ्यर्थियों पर केवल आधारहीन परिपत्र के द्वारा रोक लगाना अनुचित है तथा संविधान की मूल आस्था के खिलाफ है। इस प्रकार माननीय उच्च न्यायालय ने सभी याचिकाकर्ताओं का प्रवेश वैध ठहराया है। स्वामी विवेकानंद विवि को भी निर्देशित किया है कि याचिकाकर्ताओं का नामांकन कर उन्हें बी.ई कोर्स बिना किसी बाधा के पूर्ण कराने के आदेश जारी किए हैं।

राज्य शासन की अपील खारिज

माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने गुरूवार को राज्य शासन द्वारा प्रस्तुत की गई उस अपील को खारिज कर दिया है जिसमें राज्य शासन ने मंडल संयोजकों को मुख्य कार्यपालन अधिकारी विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी के पद पर पदोन्नति दिए जाने संबंधी माननीय उच्च न्यायालय के एकल पीठ के आदेश को चुनौती दी थी। मंडल संयोजकों के पद पर पिछले 20 से 25 वर्षों से अधिक अवधि तक कार्य करने के पश्चात एक भी पदोन्नति न मिलने से क्षुब्ध मंडल संयोजकों की याचिका स्वीकार करते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने वर्ष 2010 में राज्य शासन के अजा अजजा कल्याण विभाग को मंडल संयोजकों की पदोन्नति हेतु 4 माह में डीपीसी आयोजित करने का आदेश जारी किया था। उक्त आदेश का परिपालन न करने के कारण राज्य शासन को अवमानना की कार्यवाही भी झेलनी पड़ी जिसमें क्षमा मांगते हुए राज्य शासन ने आदेश समझने में भूल होने का कारण बताते हुए और समय चाहा जो माननीय उच्च न्यायालय ने न्यायहित में दिया। समय मिलने के बाद भी राज्य शासन ने पदोन्नति की कार्यवाही नहीं की तथा माननीय उच्च न्यायालय की खंडपीठ में अपील प्रस्तुत की जिसे बाद में यह कह कर वापस ले लिया कि वे एकल पीठ के समक्ष पुनरीक्षण याचिका प्रस्तुत करना चाहते हैं।

एकल पीठ ने पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी उसे लेकर राज्य शासन ने पुनः अपील दायर की जिसमें एकलपीठ के द्वारा पारित आदेश तथा पुनरीक्षण आदेश को चुनौती दी गई थी। मंडल संयोजकों की ओर से अधिवक्ता जितेन्द्र पाली, वरूण शर्मा ने मंडल संयोजकों का पक्ष रखा । माननीय न्यायालय ने राज्य शासन से प्रश्न किया की नियमानुसार कार्यवाही करने में क्या कठिनाई है। अंततः निचले सभी आदेशों को सही पाते हुए तथा राज्य शासन के तर्कों की सुनवाई करते हुए माननीय न्यायमूर्ति श्री सुनील सिन्हा तथा राधेश्याम शर्मा ने राज्य शासन की अपील खारिज कर दी है तथा जिससे मंडल संयोजकों की पदोन्नति विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी तथा मुख्य कार्यपालन अधिकारी के पद पर होने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

Mar 11, 2011

गरीबों की जमीन पर सूर्यकुण्ड नहीं नगर निगम की योजना हाईकोर्ट ने की ध्वस्त


माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति श्री मनिन्द्र मोहन श्रीवास्तव की एकलपीठ ने भिलाई नगर निगम की महत्वाकांक्षी योजना पर न्यायदण्ड चलाते हुए गरीबों की जमीन पर बनने वाले सूर्यकुण्ड की योजना पर विराम लगा दिया है।

वर्ष 1970 में भिलाई नगर के प्रारंभिक दिनों में तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार ने गरीबों के हितों को ध्यान में रखते हुए तत्कालीन साडा भिलाई के माध्यम से शारदा आवासीय योजना लागू की जिसमें याचिकाकर्ता रामसिया गुप्ता व अन्य को वर्ष 1977 में आवासीय प्लाट लीज एग्रीमेंट करके साडा द्वारा दिए गए। साडा भिलाई के भिलाई नगर निगम में विलयन के बाद भी वर्ष 2003 तक प्लाट बांटे गए। इसी बीच राजनीतिक परिदृश्य बदल जाने के बाद भिलाई नगर निगम के कुछ विघ्नसंतोशी पार्शदों को तत्कालीन विधायक श्री बदरूद्दीन कुरैशी द्वारा गरीबों के लिए किए जा रहे प्रयासों से तकलीफ होने लगी । वर्ष 2003 में शारदा आवासीय योजना को खत्म कराने के उद्देश्य से कुछ पार्शदों ने निगम की बैठक में उक्त मुद्दे को उठाया जिसे राज्य सरकार ने अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए स्थगित कर दिया। इसी बीच वर्ष 2004 में निगम की 10/05/2004 को होने जा रही बैठक किन्हीं कारणों से टल गई और 27/05/2004 को रखी गई । छत्तीसगढ़ नगरपालिक निगम अधिनियम की धारा 31 के अनुसार किसी भी टल जाने वाली बैठक के पुनः आहूत होने पर केवल वही मुद्दे विचार किए जा सकते हैं जिन पर पहले विचार होना था और कोई नया मुद्दा विचार में नहीं लिया जा सकता। इस विधिक प्रावधान को नजरअंदाज करते हुए कुछ पार्शदों के अभ्यावेदन को स्वीकार करते हुए निगम आयुक्त ने शारदा आवासीय योजना का मुद्दा 27/05/2004 की बैठक में एजेंडे में शामिल करवा लिया और यह प्रस्ताव पारित कर दिया गया कि जिन हितग्राहियों ने अपने प्लाटों में निर्माण नहीं किया है उनके लीज एग्रीमेंट निरस्त कर दिए जाएं। यही नहीं तत्परता दिखाते हुए निगम आयुक्त ने राज्य सरकार को पहले दिए गए स्थगन के बारे में बताए बिना उक्त प्रस्ताव पर सहमति भी प्राप्त कर ली।
उक्त अवैध कार्य को अंजाम देते हुए निगम ने याचिकाकर्ता समेत अनेक लोगों के लीज एग्रीमेंट निरस्त करते हुए उक्त भूमि पर सरोवर धरोहर योजना के तहत सूर्यकुण्ड बनाने की योजना पर कलेक्टर से सहमति प्राप्त कर टेंडर जारी कर दिया। घर से बेघर होने जा रहे निम्न आयु वर्ग के गरीब लोगों की तरफ से वर्ष 2004 में माननीय छग उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई जिसमें दिनांक 06/10/2004 को माननीय उच्च न्यायालय ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया। वर्ष 2008 में उच्च न्यायालय ने पृथक याचिका प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता के साथ याचिकाकर्ताओं को उक्त जनहित याचिका को वापस लेने का आदेश पारित किया। इसके पश्चात याचिकाकर्ता रामसिया गुप्ता व अन्य ने अधिवक्ता जितेंद्र पाली तथा वरूण शर्मा तथा याचिकाकर्ता राजेंद्र शर्मा ने अधिवक्ता आशीश सुराना के माध्यम से याचिका प्रस्तुत की तथा तर्क रखा कि टली हुई बैठक में लिया गया निर्णय विधिमान्य नहीं है साथ ही राज्य शासन को धोखे में रखकर ली गई सहमति भी अवैध है।
नगर निगम भिलाई की ओर से याचिका के संबंध में आपत्ति की गई की लीज एग्रीमेंट सिविल वाद की विषयवस्तु है और याचिका खारिज की जानी चाहिए। हितग्राहियों तथा याचिकाकर्ताओं ने प्लाट लेने के बाद कोई निर्माण नहीं किया इसलिए शारदा आवासीय योजना बनने के 5 वर्ष बाद स्वतः समाप्त हो गई और अब कुछ नहीं किया जा सकता। माननीय उच्च न्यायालय ने समस्त तर्कों तथा प्रकरण के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए यह धारित किया कि जब प्रशासन का कोई आदेश संविधान के मौलिक अधिकारों का हनन करता हो तथा मनमाना हो तो उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अंतर्गत कार्यवाही करने में सक्षम है तथा याचिकाकर्ता अपने प्लाट में निर्माण कार्य इसलिए भी नहीं कर पाए कि निगम द्वारा प्लाट में पहुंच मार्ग, बिजली आदि की कोई व्यवस्था नहीं की। माननीय उच्च न्यायालय ने धारा 31 के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए यह धारित किया की शारदा आवासीय योजना का मुद्दा बैठक में रखा जाना अवैध है तथा राज्य सरकार की सहमति भी अवैध है। इस प्रकार याचिकाकर्ताओं का लीज एग्रीमेंट निरस्त किया जाने वाला आदेश भी अवैध है।

My Blog List