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Jul 4, 2010

छत्‍तीसगढ़ के चौंथे न्‍याय सदन का लोकार्पण

छत्‍तीसगढ़ राज्य हाईकोर्ट के न्यायाधीश और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण बिलासपुर के कार्यवाहक अध्यक्ष जस्टिस धीरेन्द्र मिश्रा ने कल दुर्ग के जेल और बार रुम का निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने दस्तावेजों की जांच की और आवश्यक निर्देश भी दिए।

 जस्टिस श्री मिश्रा शनिवार को श्रम न्यायालय परिसर दुर्ग में नवनिर्मित न्याय सदन का लोकार्पण करने आए थे। भवन का लोकार्पण के मौके पर श्री मिश्रा ने कहा कि समाज के सभी वर्ग को एक ही छत के नीचे विधिक सेवा उपलब्ध कराने तथा न्यायालयीन प्रकरणों के निराकरण में गति लाने में सदन की महती भूमिका होगी।


उन्होंने बताया कि यह राज्य का चौथा न्याय सदन भवन है। आने वाले दो वर्षों में प्रदेश के अन्य सभी जिलों में इसकी स्थापना हो जाएगी। न्यायमूर्ति श्री मिश्रा ने बताया कि लोगों को मुफ्त कानूनी सहायता एवं सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए न्यायपालिका द्वारा राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण गठित किया गया है। इनके माध्यम से समाज के हर वर्ग को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास जारी है। उन्होंने कहा कि इसकी सफलता के लिए स्वयं सेवी संगठनों, नाट्य संस्थायें व जनप्रतिनिधियों का सहयोग जरुरी है। उन्होंने कहा कि प्रचार माध्यमों के द्वारा हमें समाज के शिक्षित वर्ग तक कानून के संबंध में जानकारी पहुंचाने में कामयाबी मिली है लेकिन आज भी हमें विधिक सेवा कार्यक्रमों को ग्रामीण जनता के बीच प्रत्येक पंचायतों तक पहुंचाना है। उन्होंने उपस्थितजनों से अपील की है कि हम ऐसा समाज बनाएं जिसमें अपराध के प्रति लोगो में भय हो तथा दण्ड देने वाले न्यायपालिका के प्रति विश्वास हो।

जिला न्यायाधीश अशोक पण्डा ने जनप्रतिनिधियों को मार्गदर्शक के रुप में न्याय की प्रथम सीढ़ी निरुपित करते हुए विधिक साक्षरता शिविरों में बताए कानून सेवाओं को विस्तृत रुप से जन-जन तक पहुंचाने का आग्रह किया। कार्यक्रम में जिला अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष संजय अग्रवाल, सचिव शिवशंकर सिंह और महापौर डॉ. एस.के. तमेर ने विधिक सेवा कार्यक्रमों के संचालन में जनप्रतिनिधियों के योगदान पर अपने विचार व्यक्त किए। इससे पूर्व मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति श्री मिश्रा ने मुख्य प्रवेश द्वार पर फीता काटकर न्याय सदन भवन का लोकार्पण किया। इस अवसर पर जिला उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष महेन्द्र राठौर, छत्तीसगढ़ राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सदस्य सचिव आनंद सिंघल, संयुक्त कलेक्टर धरमवीर शर्मा, अधिवक्तागण, नागरिक उपस्थित थे।

Jun 26, 2010

बिलासपुर डीएवी स्कूल की याचिका निराकृत

बिलासपुर हाईकोर्ट ने स्व.श्रीमती बेलादेवी मेमोरियल चेरेटिबल सोसायटी द्वारा अनुबंध समाप्त करने को चुनौती देने वाली डीएवी स्कूल की याचिका सुनवाई के बाद निराकृत कर दिया है। जस्टिस धीरेन्द्र मिश्रा की एकलपीठ ने जिला न्यायालय को एक माह के भीतर मामले का निराकरण करने का निर्देश जारी किया है।

सूत्रों के अनुसार स्व.श्रीमती बेलादेवी मेमोरियल चेरेटिबल सोसायटी एवं डीएवी कालेज ट्रस्ट व मेनेजमेंट सोसायटी के बीच 2001 में अनुबंध हुआ था। अनुबंध के अनुसार आरएसबी कंपाउण्ड सरकंडा में डीएव्ही स्कूल का संचालन हो रहा था। इस बीच स्व.बेलादेवी मेमोरियल चेरेटिबल सोसायटी ने डीएवी से कक्षाएं बढ़ाने का आग्रह किया। कक्षाएं नहीं बढ़ाए जाने पर स्व.बेलादेवी चेरेटिबल सोसायटी ने 13 जून 2009 को डीएवी स्कूल को नोटिस जारी कर 31 मार्च 2010 तक स्कूल बंद करने की बात कही। डीएवी स्कूल ने नोटिस पर कोई ध्यान नहीं दिया। इस पर स्व.बेलादेवी चेरेटिबल सोसायटी ने हुए अनुबंध को निरस्त करते हुए स्कूल बंद कर मार्डन एजुकेशन एकेडेमी नाम से अपना स्कूल शुरू कर दिया। इस पर डीएव्ही स्कूल ने अंतरिम राहत के लिए जिला न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत किया। जिला न्यायालय द्वारा आवेदन खारिज होने पर डीएव्ही स्कूल ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। जस्टिस धीरेन्द्र मिश्रा की एकलपीठ ने प्रकरण की सुनवाई के बाद याचिका को निराकृत करते हुए जिला न्यायालय को एक माह के भीतर मामले का निराकरण करने का निर्देश जारी किया है।

Apr 21, 2010

फिरौती की रकम लेने के बाद भी दिया घटना को अंजाम

एसईसीएल के इंजीनियर का अपहरण कर हत्या व फिरौती की रकम लेने के बाद पुत्र को भी मौत के घाट उतारने वाले आरोपी की जमानत अर्जी को बिलासपुर हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया।

गाजीपुर उत्तरप्रदेश निवासी जगदीश प्रसाद मिश्रा एसईसीएल कोरबा में इंजीनियर थे। फरवरी २००९ में वे अचानक लापता हो गए। इसके कुछ दिन बाद उसके पुत्र राहुल शर्मा के पास अपहरण करने वाले का फोन आया। इस दौरान उसने फिरौती में ४० लाख रुपए की मांग की। राहुल ने कोरबा पुलिस में पिता के अपहरण होने व फिरौती में चालीस लाख रुपए मांगने की रिपोर्ट लिखाई। इस पर पुलिस ने अपहृत को मुक्त कराने यूपी व पश्चिम बंगाल के कई शहरों में छापा मारा। इसके बाद भी पुलिस को कोई सफलता नहीं मिली। कई दिनों के प्रयास के बाद राहुल अपहरणकर्ता को चालीस लाख रुपए देने के लिए पश्चिम बंगाल गया। वहां अपहरण करने वालों ने रुपए लेकर उसकी हत्या कर दी। 

युवक की हत्या के आरोप में पश्चिम बंगाल पुलिस ने गाजीपुर निवासी कृष्ण प्रसाद सिंह उर्फ हरेकृष्ण सहित ५ आरोपियों को गिरफ्तार किया। इसी बीच गाजीपुर में एक व्यक्ति की लाश मिली। उसकी पहचान अपहृत एसईसीएल कोरबा के इंजीनियर जगदीश प्रसाद मिश्रा के रूप में हुई। पुत्र के हत्यारों को पकड़ने के बाद कोरबा पुलिस अपहरण कर हत्या करने वाले एक और आरोपी गाजीपुर निवासी विजय बहादुर को गिरफ्तार किया। आरोपियों को अपहृत पिता व उसका पुत्र दोनों पहचानते थे। पकड़े जाने के भय से आरोपियों ने दोनों की हत्या कर दी थी। कोरबा जेल में बंद आरोपी कृष्ण प्रसाद सिंह सहित सभी ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में जमानत के लिए आवेदन लगाए। इस पर जस्टिस धीरेंद्र मिश्रा के न्यायालय में सुनवाई हुई। शासन की ओर से शासकीय अधिवक्ता बीके ग्वालरे ने जमानत दिए जाने का विरोध किया। अपराध की गंभीरता को देखते हुए जस्टिस श्री मिश्रा ने अर्जी को खारिज कर दिया।

Apr 18, 2010

पति-पत्नी के विवाद में फंस गए बच्चों को हाईकोर्ट ने दिलाई ममता की छांव

पति-पत्नी के विवाद में फंसे मासूम बच्चों को बिलासपुर हाईकोर्ट के आदेश पर मां मिल गई है। विवाद के बाद पति मासूमों को बलपूर्वक अपने पास ले गया था। छत्‍तीसगढ के रायगढ़ निवासी मनोज यादव का पत्नी शकुन बाई यादव के साथ विवाद हो गया था। इस पर मनोज ने परिवार न्यायालय में वाद प्रस्तुत किया। उसने वाद में एकता (५) व तुषार यादव (७) वर्षीय मासूम बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए नैचुरल गार्जियनशिप देने की मांग की। परिवार न्यायालय ने दोनों बच्चों को पिता को देने का आदेश दिया। इसके बाद मनोज दोनों बच्चों को अपने साथ ले गया। बच्चों से अलग होने के बाद मां शकुन बाई ने अधिवक्ता निशा व अमित सिंह के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका पेश की। इसमें दोनों बच्चों को दिलाने की मांग की गई।

इस पर हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी। हाईकोर्ट के आदेश पर मां दोनों बच्चों को अपने पास ले गई थी। इसके बाद पति बलपूर्वक बच्चों को फिर से अपने साथ ले गया। शकुन ने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई। कोई कार्रवाई नहीं होने पर उसने पुनः हाईकोर्ट में वाद दायर किया। जस्टिस द्रीरेंद्र मिश्रा एवं जस्टिस प्रशांत मिश्रा की डिवीजन बेंच में प्रकरण की सुनवाई हुई। उन्होंने बच्चों के छोटे होने के तर्क को स्वीकार करते हुए दोनों को मां को सौंपने का आदेश दिया। इस प्रकार हाईकोर्ट के आदेश पर मासूम बच्चों को फिर से मां मिल गई है।

Apr 15, 2010

नक्सलियों की जमानत अर्जी खारिज

छत्‍तीसगढ बस्तर के दो भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या के आरोप में जेल में बंद दो नक्सलियों की जमानत याचिका को हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने खारिज कर दिया है। दोनों नक्सली संगठन संघम के सदस्य हैं।

पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा के दो जिला स्तरीय कार्यकर्ता उमेश राठौर व सूर्यप्रकाश चौहान पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार-प्रसार करने के लिए सुकमा के ग्राम बड़े गुड़रा गए हुए थे। यहां के थोथापारा में ग्रामीणों को एकत्र कर दोनों कार्यकर्ता रायमशविरा कर ही रहे थे कि उसी समय किसी ने उनके गांव में आने की सूचना नक्सलियों को दे दी। ७०-८० की संख्या में हथियारबंद संघम सदस्य गांव पहुंचे और थोथापारा में बैठक ले रहे श्री राठौर व श्री चौहान को घेर लिया। इसके बाद नक्सलियों ने भाजपा के दोनों प्रमुख कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी। वारदात को अंजाम देने के बाद नक्सलियों ने भाजपा कार्यकर्ताओं की मारूति वैन को भी आग के हवाले कर दिया। जाते-जाते ग्रामीणों को संघम सदस्यों ने धमकाया भी था। घटना की सूचना श्री राठौर के भाई ने स्थानीय पुलिस को दी। जांच के दौरान ग्रामीणों ने पुलिस के सामने कई संघम सदस्यों की संलिप्तता की जानकारी दी। दो संघम सदस्य हांदाराम व रघुनाथ पुलिस के हत्थे चढ़ गए। जेल में बंद हांदाराम व रघुनाथ ने अपने वकील के जरिए जमानत के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इस मामले की सुनवाई जस्टिस धीरेंद्र मिश्रा की सिंगल बेंच में हुई। उन्होंने प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए दोनों नक्सलियों की जमानत अर्जी को खारिज कर दिया है।

Apr 8, 2010

कोर्ट में दायर याचिका निकली फर्जी : १० वर्षों के न्यायालयीन इतिहास में यह पहला मामला

नक्‍सल क्षेत्र दंतेवाड़ा जिले के एर्राबोर थाने का मामला
छत्तीसगढ हाईकोर्ट के १० वर्षों के न्यायालयीन इतिहास में यह पहला मामला है जब याचिकाकर्ता ने कोर्ट में उपस्थित होकर किसी तरह की याचिका दायर करने से ही इनकार कर दिया। जिस याचिका पर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में सुनवाई हो रही है उसमें एर्राबोर पुलिस पर आरोप लगाया है कि उसके पिता व बहन को गायब कर दिया गया है। पिछले सात महीने से इस याचिका पर डिवीजन बेंच में सुनवाई चल रही थी।

  • कोर्ट में आया अनुवादक

सिन्ना चूंकि हिंदी न तो बोल पाता है और न ही समझ पाता है। वह गोडी बोली बोलता और समझता है। इसे देखते हुए कोर्ट ने अनुवादक की व्यवस्था करने के निर्देश शासन को दिए थे। लिहाजा, अनुवादक के माध्यम से कोर्ट ने अपना सवाल किया। इस दौरान उन्होंने इस तरह का खुलासा किया।
यह चर्चित मामला दंतेवाड़ा जिले के एर्राबोर थाने की लेदरा ग्राम पंचायत के ग्राम दरभागुड़ा का है। यहां के निवासी विंगोसिन्ना ने १८ सितंबर २००९ को अपने वकील के जरिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। याचिका में पुलिस पर आरोप लगाते हुए कहा था कि अप्रैल-मई २००८ को उसके पिता वेकोदुल्ला व बहन वेको बजरे को पुलिस बलात्‌ उठाकर ले गई। याचिकाकर्ता ने कहा कि जिस वक्त पुलिस वहां पहुंची तो उसके परिवार के अन्य सदस्य जंगल की ओर भाग गए। लिहाजा, पुलिस उसे पकड़ नहीं पाई। याचिका में पिता व बहन को पुलिस के चंगुल से छुड़ाने के लिए पुलिस महानिदेशक व पुलिस अधीक्षक से शिकायत करने पर कोई कार्रवाई नहीं करने का आरोप भी लगाया गया है। इस मामले की सुनवाई डिवीजन बेंच में चल रही थी। इसी बीच १ फरवरी २०१० को याचिकाकर्ता के वकील ने हाईकोर्ट में इस बात की जानकारी दी कि याचिकाकर्ता से उसका कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है।

  • चेतना परिषद पर लगाया आरोप

सिन्ना ने आदिवासी चेतना परिषद के पदाधिकारियों पर आरोप लगाते हुए कहा कि उसके अलावा कई और आदिवासियों को चेतना परिषद के पदाधिकारी दो बार बिलासपुर लेकर आए थे। इसी दौरान कई दस्तावेजों पर उसके हस्ताक्षर लिए गए थे। किस बात के लिए हस्ताक्षर लिए गए थे इसकी जानकारी उसे नहीं है।
वकील की शिकायत को गंभीरता से लेते हुए डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता की खोजबीन करने व कोर्ट में उपस्थित करने के लिए शासन को नोटिस जारी किया था। डिवीजन बेंच के निर्देश के बाद पुलिस ने २३ मार्च २०१० को याचिकाकर्ता विंगोसिन्ना को डिवीजन बेंच के समक्ष पेश किया। याचिकाकर्ता के वकील ने अपने मुवक्किल के रूप में उसकी पहचान की। डिवीजन बेंच द्वारा पूछताछ के दौरान याचिककर्ता ने कोर्ट के समक्ष सनसनीखेज खुलासा करते हुए कहा कि उसने किसी तरह की कोई याचिका हाईकोर्ट में दायर ही नहीं की है। और न ही पुलिस पर किसी तरह का आरोप लगाया है। विंगोसिन्ना ने इस बात की जानकारी कोर्ट को दी कि उसके पिता व बहन पिछले कुछ दिनों से गायब हैं। इस पर जस्टिस धीरेंद्र मिश्रा व जस्टिस आरएन चंद्राकर की डिवीजन बेंच ने दंतेवाड़ा एसपी को सिन्ना के पिता व बहन की खोजबीन करने के निर्देश दिए। साथ ही याचिका को निराकृत कर दिया है।

सिम्स वापस करें अधिक राशि

बिलासपुर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सिम्स प्रबंधन व राज्य शासन को पेमेंट सीट के रूप में विद्यार्थियों से ज्यादा वसूल की गई फीस को वापस करने का फरमान जारी किया है। डिवीजन बेंच के फैसले से एमबीबीएस २००३-०४ बेच के विद्यार्थियों को बड़ी राहत मिली है। सिम्स प्रबंधन ने पेमेंट सीट में प्रवेश देने के एवज में प्रति छात्र १ लाख ४० रूपए वसूले थे।

वर्ष २००३-०४ बेच के राजेश अग्रवाल, रिंपल बच्चू, आनंद भट्टर सहित अन्य ने वकील कनक तिवारी,जितेंद्र पाली व मतीन सिद्दीकी के जरिए हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि गुヒ घासीदास यूनिवर्सिटी ने बिलासपुर में छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) के नाम से मेडिकल कॉलेज का संचालन प्रारंभ किया। तब १०० सीटें निर्धारित की गई थीं। वर्ष २००३ में छग शासन ने छग चिकित्सा तथा दंत चिकित्सा स्नातक प्रवेश नियम पारित किया। प्रवेश नियम ४ के अनुसार कुल सीटों की १५ प्रतिशत सीटें आल इंडिया परीक्षाओं से आए विद्यार्थियों के लिए तथा ३ फीसदी सीटें केंद्रीय कोटा की है। शेष ८२ सीटों का आबंटन पेमेंट तथा फ्री के रूप में किया गया था। शासन के निर्देशों को धता बताते हुए यूनिवर्सिटी ने ५० प्रतिशत सीटों को पेमेंट व ५० प्रतिशत सीट को फ्री घोषित कर दिया। फ्री सीटों में से ७ को आल इंडिया तथा १ को केंद्रीय कोटा की सीट निर्धारित कर दी गर्ठ। याचिकाकर्ताओं ने शासन के निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि सिम्स को इस बात के निर्देश दिए गए थे कि २००३ में पेमेंट सीट में प्रवेश लिए १० विद्यार्थियों को आरक्षण नियमों का पालन करते हुए फ्री सीट में प्रवेश की सुविधा दी जाए। इसके बाद भी सिम्स ने याचिकाकर्ताओं को मेरिट में होने के बाद भी फ्री के बजाय पेमेंट सीट में प्रवेश दे दिया। साथ ही सिम्स प्रबंधन ने याचिकाकर्ता छात्रों को भारी भरकम फीस जमा करने का आदेश भी जारी कर दिया। हाईकोर्ट ने प्रकरण की प्रारंभिक सुनवाई के बाद छात्रहित में ५० फीसदी फीस जमा करने के निर्देश सिम्स प्रबंधन को दिए थे। सिंगल बेंच के आदेश को चुनौती देते हुए यूनिवर्सिटी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। इसी बीच १ दिसंबर २००७ को राज्य शासन ने सिम्स का अधिग्रहण कर लिया। ३० मार्च २००९ को संचालक चिकित्सा शिक्षा ने सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र प्रस्तुत कर आल इंडिया कोटा व केंद्रीय कोटा की सभी सीटों को फ्री सीट करने का खुलासा किया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता छात्रों ने हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में गुहार लगाई थी। इस मामले की सुनवाई जस्टिस धीरेंद्र मिश्रा व जस्टिस आरएन चंद्राकर की डिवीजन में सुनवाई हुई। डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता छात्रों से पेमेंट सीट के रूप में वसूली गई फीस को वापस करने का फरमान सिम्स प्रबंधन व शासन को जारी किया है।

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