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Jul 8, 2010

६२ वर्ष में सेवानिवृत्त आदेश निरस्त : जल संसाधन विभाग के गेंगमैनों का मामला

बिलासपुर हाईकोर्ट की डिविजन बैंच ने जलसंसाधन विभाग के गेंगमैनों के ६२ वर्ष में सेवानिवृत्ति के आदेश को खारिज कर दिया है। एकल बैंच के निर्णय पर शासन की अपील के बाद हाईकोर्ट ने यह आदेश दिया है।

दुर्ग निवासी केसराम पटेल ने वर्ष २००८ में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल कर कहा कि वह जल संसाधन विभाग दुर्ग में स्थाई गेंगमैन है। उसने ६० के बजाय ६२ वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त करने की मांग की। हाईकोर्ट की एकलपीठ ने सुनवाई के बाद उसे स्थाई गेंगमैन मानते हुए ६२ वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त करने का आदेश पारित किया। इसके बाद जल संसाधन विभाग के कई गेंगमैनों ने ६२ वर्ष की आयु में रिटायर करने के लिए आवेदन लगाया। एकलपीठ के इस आदेश के खिलाफ शासन ने हाईकोर्ट की युगलपीठ में अपील की। इसमें बताया गया कि केसराम पटेल कभी भी जल संसाधन विभाग में स्थाई गेंगमैन नहीं रहा। वह दैनिक वेतनभोगी के रूप में लेबर का काम कर रहा था। जस्टिस आईएम कुद्दुसी एवं जस्टिस प्रशांत मिश्रा की युगलपीठ ने शासन के तर्क से सहमत होते हुए एकलपीठ के आदेश को खारिज कर दिया। अगली सुनवाई के लिए प्रकरण को फिर से एकलपीठ में भेजा गया है।

हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद शासन को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। आदेश को आधार बताते हुए कई अपात्र लोगों ने भी ६२ वर्ष की आयु में रिटायर्ड करने के लिए आवेदन लगा कर इसका लाभ प्राप्त कर लिया है। ज्ञात हो कि स्थाई कर्मचारियों को ग्रेच्युटी एवं पेंशन भुगतान करना होता है।

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सृजनगाथा के चौथे आयोजन में ब्‍लॉगर संजीत त्रिपाठी सम्मानित
पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी 'विप्र'

मेजर पेनाल्टी के लिए जांच जरूरी : कर्मचारी की याचिका पर हाईकोर्ट की युगलपीठ का निर्णय

बिलासपुर हाईकोर्ट के जस्टिस आईएम कुद्दुसी एवं जस्टिस एनके अग्रवाल की युगलपीठ ने किसी भी कर्मचारी पर मेजर पेनाल्टी लगाने से पहले विभागीय जांच को जरूरी बताया है।

छत्तीसगढ़ स्टेट वेयर हाउस कार्पोरेशन की सूरजपुर शाखा में जूनियर टेक्नीशियन के पद पर आरएस नयन कार्यरत हैं। अनियमितता के मामले में १३ जनवरी २००६ को उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। उन्होंने १५ जनवरी को अपना जवाब प्रस्तुत किया। इसके बाद २७ अप्रैल को कार्पोरेशन के प्रबंध संचालक ने उनकी तीन वेतनवृद्धि रोकने का आदेश दिया। उन्होंने इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। याचिका पर सुनवाई के दौरान तत्कालीन चीफ जस्टिस एसआर नायक एवं जस्टिस वीके श्रीवास्तव की युगलपीठ ने प्रबंध संचालक के आदेश पर स्थगनादेश पारित किया। अंतिम निर्णय के लिए हाईकोर्ट में याचिका लंबित थी। इस प्रकरण में १७ जून २०१० को जस्टिस आईएम कुद्दुसी एवं जस्टिस एनके अग्रवाल की युगलपीठ में अंतिम सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए सीनियर अधिवक्ता प्रशांत जायसवाल ने कहा कि छत्तीसगढ़ स्टेट वेयर हाउस कार्पोरेशन स्टॉफ रेग्यूलेशन १९६२ के अनुसार अनियमितता पाए जाने पर कार्पोरेशन को कार्रवाई करने का अधिकार है, किन्तु रेग्युलेशन के खंड २२ में इस शस्ती को दो भागों में बांटा गया है। पहले भाग में मेजर पेनाल्टी तथा दूसरे में माइनर पेनाल्टी को रखा गया है। कर्मचारी की तीन वेतनवृद्धि रोकना मेजर पेनाल्टी है। इसके लिए विभागीय जांच जरूरी है, लेकिन कर्मचारी को सिर्र्फ नोटिस दिया गया था। उन्होंने अपने तर्क में उच्चतम न्यायालय के तीन जजों द्वारा कुलवंत सिंह गिल विरुद्ध शासन के प्रकरण में पारित आदेश का हवाला दिया, जिसमें मेजर पेनाल्टी के लिए विभागीय जांच को जरूरी बताया गया है। मामले की सुनवाई के बाद जस्टिस आईएम कुद्दुसी व जस्टिस एनके अग्रवाल की युगलपीठ ने बिना विभागीय जांच के तीन वेतनवृद्धि रोकने के आदेश को खारिज कर दिया है।


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Jul 7, 2010

शिक्षक को प्रमोशन देने का आदेश

बिलासपुर हाईकोर्ट ने अनुदान प्राप्त स्कूल के शिक्षक को व्याख्याता के पद पर प्रमोशन देने का आदेश दिया है। प्रकरण के अनुसार रायपुर निवासी जीएस मक्कड़ की नियुक्ति अनुदान प्राप्त एसएस कालीबाड़ी स्कूल में व्याख्याता पद के विपरीत उच्च श्रेणी शिक्षक के पद पर १९८५ में हुई थी। पूरी योग्यता होने के बाद भी व्याख्याता पद की भर्ती में प्रतिबंध होने के कारण वे यूटीडी के पद पर कार्यरत रहे। १९९१ में उनकी फ्रेश नियुक्ति की गई। इसके बाद विधिवत्‌ उन्हें १९९३ में प्रमोशन देकर व्याख्याता बना दिया गया। 

प्रबंधन ने व्याख्याता पद को अनुमोदन के लिए डीपीआई को प्रेषित किया। डीपीआई ने यह कहते हुए पद को अनुमोदन करने से इनकार कर दिया कि उनका प्रमोशन कला संकाय में हुआ है। अनुमोदन नहीं किए जाने पर उन्होंने अधिवक्ता अजय श्रीवास्तव के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका पेश की। जिसमें कहा गया कि २६ अगस्त १९७१ के आदेश में संस्था को यह अधिकार है कि गणित, विज्ञान व कला में परिर्वतन कर व्याख्याता के पद पर प्रमोशन दिया जा सकता है। जस्टिस आईएम कुद्दुसी व जस्टिस एनके अग्रवाल ने अधिवक्ता के तर्क से सहमत होते हुए डीपीआई को याचिकाकर्ता के पद को अनुमोदित करने का आदेश दिया है। डीपीआई से अनुमोदन नहीं मिलने के कारण श्री मक्कड़ व्याख्याता होते हुए भी उच्च श्रेणी शिक्षक के पद पर काम कर रहे थे।

Jul 1, 2010

हाईकोर्ट ने भाजपा व कांग्रेस से मांगा जवाब : राम मंदिर आखिर चुनावी मुद्दा क्यों ?

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दो अलग-अलग मामलों में भाजपा और कांग्रेस पार्टी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में चुनाव के समय मतदाताओं को लुभाने के लिए सस्ता चावल देने की योजना के साथ ही राम मंदिर को चुनावी मुद्दा बनाने पर आपत्ति की गई है।

जस्टिस आईएम कुद्दुशी व जस्टिस एनके अग्रवाल की युगलपीठ में बुधवार को दो महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई हुई। हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता वीजी तामस्कर द्वारा दायर दो अलग-अलग याचिकाओं में राजनीतिक दल भाजपा और कांग्रेस द्वारा लोकसभा चुनाव के दौरान मतदाताओं को लुभाने के लिए एक और दो रुपए किलो में चावल, गेहूं व फ्री में नमक देने की घोषणा को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि आचार संहिता लागू होने के बाद किसी भी पार्टी द्वारा इस तरह की घोषणा करने का मतलब मतदाताओं को अपने पक्ष में मत डालने के लिए प्रलोभन देना है। इस तरह की घोषणाओं से राजनीतिक दलों ने मतदाताओं को तीन ग्रुप में बांट दिया है, जिसमें पहला ग्रुप उन लोगों का है, जो इनकम टैक्स देते हैं, दूसरे ग्रुप में नान इनकम टैक्सपेयी और तीसरे ग्रुप में बीपीएल कार्डधारी आ जाते हैं। याचिका के अनुसार संविधान किसी राजनीतिक पार्टी को यह अधिकार नहीं देता कि वे समाज को बांटे। याचिका में भाजपा द्वारा चुनाव के दौरान अयोध्या में राम मंदिर बनाने के मुद्दे को संकल्प पत्र में शामिल करने पर कड़ी आपत्ति की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मसले पर किसी तरह के निर्माण कार्य के साथ ही राजनीतिक टिप्पणी करने पर भी रोक लगाई है, लेकिन भाजपा के तात्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवानी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को दरकिनार कर राम मंदिर के मसले पर अखबारों में बयानबाजी की है। उनका यह कृत्य सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन है। बुधवार को हाईकोर्ट की युगलपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई ११ अगस्त को होगी। मालूम हो कि चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में गरीबों को दो रुपए किलो में चावल और फ्री में नमक देने की घोषणा की थी। इस घोषणा के बाद कांग्रेस पार्टी ने भी एक रुपए किलो में चावल और दो रुपए किलो में गेहूं देने की घोषणा कर दी। दोनों पार्टियों द्वारा की गई ऐसी घोषणाओं को श्री तामस्कर ने संविधान में दिए गए प्रावधानों का उल्लंघन बताया है।

Jun 25, 2010

प्रदेश में दंत चिकित्सा के क्षेत्र में एमडीएस कोर्स लिए काउंसिलिंग का आदेश

बिलासपुर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने छत्तीसगढ़ डेंटल कॉलेज राजनांदगांव में राज्य सरकार कोटे से एमडीएस कोर्स की दो नई सीटों के लिए काउंसिलिंग कराने के निर्देश दिए हैं। काउंसिलिंग ३० जून तक की जानी है। याचिका पर २८ जून को पुनः सुनवाई होगी।

दंत चिकित्सा के क्षेत्र में एमडीएस कोर्स स्नातकोत्तर संचालित करने वाला प्रदेश में छत्तीसगढ़ डेंटल कॉलेज राजनांदगांव एक मात्र है। केंद्र सरकार व डेंटल कौंसिल ऑफ इंडिया से मान्यता प्राप्त कर वर्ष २००९-२०१० से ४ सीटों के साथ एमडीएस कोर्स प्रारंभ किया गया है। सभी कॉलेजों में एमडीएस कोर्स में प्रवेश के लिए डीसीआई ने एमडीएस रेगुलेशन २००७ नियम बनाया है। नियम के अनुसार एमडीएस की आधी सीट राज्य सरकार के अधीन होती है। आधी सीट प्रबंधन के पास रहती है। राज्य सरकार प्री-पीजी परीक्षा आयोजित कर काउंसिलिंग के माध्यम से सीट को भरती है। वर्ष २००९ में दो सीटों को राज्य सरकार ने भरी। २०१० में उक्त सीट को भरने १४ मई को विज्ञापन प्रकाशित कराया गया। उस समय तक कॉलेज के पास एमडीएस की ४ सीटें ही उपलब्ध थीं। २५ मई को परीक्षा आयोजित कर २६ मई को परिणाम की घोषणा की गई। परीक्षा में याचिकाकर्ता डॉ. श्वेता सिंह अनुसूचित जनजाति वर्ग में प्रथम स्थान पर तथा संयुक्त मेरिट में ११वें स्थान पर रहीं। राज्य सरकार ने २७ मई को काउंसिलिंग कर दो विद्यार्थियों को प्रवेश दिया। अगले दिन केंद्र सरकार ने छत्तीसगढ़ डेंटल कॉलेज राजनांदगांव में एमडीएस की ४ सीटें बढ़ा दीं। इसकी सूचना राज्य सरकार को ७ जून को मिली। वहीं, डीसीआई द्वारा पूर्व निर्धारित प्रवेश की अंतिम तिथि ३१ मई निकल गई थी। संचालक चिकित्सा शिक्षा ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर मार्गदर्शन मांगा, लेकिन वहां से कोई मार्गदर्शन नहीं मिल पाया था।

इसी बीच सर्वोच्च न्यायालय ने एक आदेश पारित कर स्नातकोत्तर प्रवेश के लिए अंतिम तिथि ३० जून तय कर दी है। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के तहत राज्य सरकार को बढ़ी हुई दो सीटों के लिए काउंसिलिंग करनी थी, पर इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया जा रहा था। इस बीच प्रबंधन ने काउंसिलिंग कर दो सीटों में प्रवेश दे दिया और राज्य सरकार कोटे की सीटों को भी अपना मानते हुए काउंसिलिंग की तैयारी में है। इस बात को लेकर याचिकाकर्ता डॉ. श्वेता सिंह ने अधिवक्ता जितेंद्र पाली, वरुण शर्मा के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इसमें कहा गया कि याचिकाकर्ता अजजा कोटे में प्रथम स्थान पर है। इस कारण उक्त सीट में चयन के योग्य है। याचिका पर जस्टिस आईएम कुद्दुसी व जस्टिस एनके अग्रवाल की युगलपीठ ने सुनवाई करते हुए शासकीय अधिवक्ता को उचित निर्देश लेने एवं राज्य सरकार को काउंसिलिंग सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार ३० जून से पहले पूरी करने के निर्देश दिए हैं।

कलेक्टर को सेवा समाप्त करने का कोई अधिकार नहीं : शिक्षाकर्मी को करें बहाल

गलत अनुभव प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने के आरोप में सेवा समाप्त किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए बिलासपुर हाईकोर्ट ने शिक्षाकर्मी को सेवा में बहाल करने और रुके हुए वेतन का भुगतान करने का आदेश दिया है।

दुर्ग जिले के नवागढ़ ब्लॉक के संबलपुर में शिक्षाकर्मी वर्ग ३ के पद पर २० जुलाई २००७ को उत्तर कुमार यादव की नियुक्ति हुई। इसके बाद वह लगातार स्कूल में बच्चों को पढ़ाता रहा। ७ माह बाद १६ फरवरी २००८ को दुर्ग कलेक्टर ने गलत अनुभव प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने पर उसकी सेवा समाप्त करने का आदेश दिया। इसके खिलाफ उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिसे सिंगल बेंच ने खरिज कर दिया। इस पर उसने अधिवक्ता दिनेश तिवारी के माध्यम से डिवीजन बेंच में रिट अपील पेश की। इसमें कहा गया कि वह एकल शिक्षक वाले स्कूल में कार्यरत्‌ रहा। वहां उसे रिलीफ करने कोई तैयार नहीं था। इसके कारण अनुभव प्रमाणपत्र में पांच अधिकारियों के हस्ताक्षर कराए गए। उसकी नियुक्ति जनपद पंचायत नवागढ़ ने की है। इस आधार पर कलेक्टर को सेवा समाप्त करने का कोई अधिकार नहीं है।

जस्टिस आईएम कुद्दुसी एवं जस्टिस प्रशांत मिश्रा की युगलपीठ में बुधवार को अपील पर सुनवाई हुई। उन्होंने याचिकाकर्ता को पुनः बहाल करने तथा रुके हुए वेतन का लाभ देने का आदेश दिया है।

Jun 23, 2010

एक चुनाव याचिका पर हो रही ७ साल से सुनवाई

बिलासपुर हाईकोर्ट में एक चुनाव याचिका पर पिछले सात साल से सुनवाई हो रही है। जिस वक्त यह याचिका दायर की गई थी, विधानसभा का वह कार्यकाल कब का खत्म हो चुका है। दूसरे कार्यकाल को लगभग डेढ़ वर्ष भी पूरे होने जा रहा है। डिवीजन बेंच ने एक बार फिर सुनवाई की तिथि बढ़ा दी है। अब याचिका पर सुनवाई १२ जुलाई को होगी।

सन्‌ २००३ के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने नंदकुमार साय को अपना उम्मीदवार बनाया था। कांग्रेस की ओर से पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी उम्मीदवार थे। विधानसभा चुनाव में २० हजार से अधिक मतों से पराजित होने के बाद श्री साय ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर उनकी जाति को चुनौती दी। याचिकाकर्ता ने कहा था कि श्री जोगी गैर आदिवासी हैं। मरवाही विधानसभा की सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित रखी गई है। आदिवासी विकास परिषद के निर्णय का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने दलील दी है कि परिषद के अनुसार श्री जोगी आदिवासी नहीं है। लिहाजा उनके निर्वाचन को शून्य घोषित किया जाए। मंगलवार को इस मामले की सुनवाई जस्टिस आईएम कुद्दुसी व जस्टिस नवलकिशोर अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई। डिवीजन बेंच ने चुनाव याचिका पर सुनवाई के लिए १२ जुलाई की तिथि निर्धारित की है। यहां यह बताना लाजिमी है कि श्री साय द्वारा विधानसभा चुनाव के तत्काल बाद श्री जोगी के खिलाफ चुनाव याचिका दायर की थी। पिछले ७ साल से इस याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई हो रही है। इस दौरान एक और विधानसभा चुनाव सम्पन्न हो गया। सन्‌ २००३ में भी श्री जोगी मरवाही विधानसभा सीट से विधायक निर्वाचित हुए थे। वर्तमान कार्यकाल में भी वे इसी सीट से विधायक हैं। हालांकि श्री साय द्वारा दायर इस याचिका की विधानसभा चुनाव के निर्वाचन को शून्य घोषित करने जैसी मांग की कोई औचित्य नहीं है, पर इस याचिका पर हाईकोर्ट द्वारा दिए जाने वाले फैसले के दूरगामी राजनीतिक परिणाम सामने आएंगे। श्री जोगी के जाति को लेकर विवाद की स्थिति बनी हुई है। हाईकोर्ट में चुनाव याचिका के अलावा भाजपा नेता संतकुमार नेताम द्वारा उनकी जाति को सीधे तौर पर चुनौती देते हुए हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया गया है। श्री जोगी के जाति संबंधी मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है।

Jun 20, 2010

छग खनिज नियम को चुनौती देने वाली याचिका खारिज

बिलासपुर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सुनवाई करते हुए छग खनिज नियम २००९ को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। याचिकाकर्ता ने खनिज विभाग द्वारा जारी किए गए नोटिस के बाद नियम को चुनौती दी थी।

मामला राजनादगांव का है। यहां की निवासी व खदान तथा क्रेशर संचालिका पुष्पलता ओसवाल को खनिज विभाग ने छग खनिज नियम २००९ (खनन, परिवहन तथा भंडारण) का हवाला देते हुए खदान के बाहर खनिज का भंडारण और परिवहन करने की स्थिति में लाइसेंस लेने की अनिवार्यता रख दी थी। नोटिस में कहा गया था कि लीज वाली जमीन के बाद परिवहन व भंडारण करने की स्थिति में छग खनिज नियम प्रभावशील होगा। लिहाजा दूसरा लाइसेंस की जरूरत पड़ेगी। खनिज विभाग के नोटिस के बाद याचिकाकर्ता ने नियम को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें कहा गया था कि उसका क्रेशर लीज एरिया में लगा हुआ है। खनिज का भंडारण व परिवहन भी वह लीज सीमा के भीतर ही कर रही है। उसे दूसरी परमिट की जरूरत नहीं है। इस मामले की सुनवाई शुक्रवार को जस्टिस आईएम कुद्दुसी व जस्टिस प्रशांत मिश्रा की डिवीजन बेंच में हुई। डिवीजन बेंच ने छग खनिज नियम को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है।

Jun 19, 2010

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पीजी मेडिकल प्रवेश की दूसरी कांउसिलिंग पर रोक एमसीआई का आदेश रद्द

बिलासपुर हाईकोर्ट ने एमसीआई के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें पं. जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में २० जून के बाद होने वाली काउंसिलिंग पर एमसीआई ने रोक लगा दी थी। कोर्ट ने मेडिकल कॉलेज को काउंसिलिंग आयोजित करने के निर्देश दिए हैं। वर्ष २००९ में पं. जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज रायपुर में पीजी के लिए काउंसिलिंग हुई थी। इसमें कॉलेज के मेरिटोरियस डॉक्टर वंचित हो गए थे। इस पर डॉक्टरों ने हाईकोर्ट में वाद दायर किया। कोर्ट ने प्रकरण को निराकृत कर दिया। इसके बाद आगामी २० जून को द्वितीय काउंसिलिंग करने की तारीख तय की गई।एमसीआई ने एक पत्र जारी कर २० जून के बाद पीजी के लिए काउंसिलिंग करने पर सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का हवाला देते हुए रोक लगा दी। एमसीआई के आदेश के खिलाफ डॉ. वासुदेव, डॉ. केएल उरांव सहित ९ डॉक्टरों ने अधिवक्ता सेमकोशी व वैभव शुक्ला के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इस पर सोमवार को जस्टिस आईएम कुद्दुसी व जस्टिस एनके अग्रवाल की संयुक्त पीठ में सुनवाई हुई।

याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए उन्होंने अपने आदेश में कहा कि शिक्षण सत्र व विद्यार्थियों के हित में प्रबंधन तय समय के बाद भी काउंसिलिंग कर सकता है। उन्होंने एमसीआई के आदेश को निरस्त करते हुए काउंसिलिंग करने का आदेश दिया है।हाईकोर्ट ने एमसीआई के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें पं. जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में २० जून के बाद होने वाली काउंसिलिंग पर एमसीआई ने रोक लगा दी थी। कोर्ट ने मेडिकल कॉलेज को काउंसिलिंग आयोजित करने के निर्देश दिए हैं। वर्ष २००९ में पं. जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज रायपुर में पीजी के लिए काउंसिलिंग हुई थी। इसमें कॉलेज के मेरिटोरियस डॉक्टर वंचित हो गए थे। इस पर डॉक्टरों ने हाईकोर्ट में वाद दायर किया। कोर्ट ने प्रकरण को निराकृत कर दिया। इसके बाद आगामी २० जून को द्वितीय काउंसिलिंग करने की तारीख तय की गई।एमसीआई ने एक पत्र जारी कर २० जून के बाद पीजी के लिए काउंसिलिंग करने पर सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का हवाला देते हुए रोक लगा दी। एमसीआई के आदेश के खिलाफ डॉ. वासुदेव, डॉ. केएल उरांव सहित ९ डॉक्टरों ने अधिवक्ता सेमकोशी व वैभव शुक्ला के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इस पर सोमवार को जस्टिस आईएम कुद्दुसी व जस्टिस एनके अग्रवाल की संयुक्त पीठ में सुनवाई हुई।

याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए उन्होंने अपने आदेश में कहा कि शिक्षण सत्र व विद्यार्थियों के हित में प्रबंधन तय समय के बाद भी काउंसिलिंग कर सकता है। उन्होंने एमसीआई के आदेश को निरस्त करते हुए काउंसिलिंग करने का आदेश दिया है।

विदित हो कि मेडिकल शिक्षा विभाग ने बीते १४ मार्च को चिकित्सा स्नातकोत्तर प्रवेश के लिए प्री-पीजी प्रवेश परीक्षा आयोजित की थी। इसके बाद १५ मार्च को मॉडल आंसर जारी किया गया। इसमें १० उत्तरों को गलत करार देते हुए परीक्षार्थियों ने आपत्ति दर्ज कराई। इसके बाद १९ अप्रैल को दूसरा मॉडल आंसर जारी किया गया। इसमें १०० प्रश्नों में से ८ के उत्तर ही नहीं थे और १० प्रश्नों के उत्तर गलत होने के आरोप लगाए गए। इसके बाद भी प्रावीण्य सूची जारी कर दी गई। इस पर डॉ. अरुण कुमार खेड़िया व डॉ. ठंडाराम पटेल ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इसमें बताया गया कि प्रावीण्य सूची में डॉ. खेड़िया का रैंक ९ तथा डॉ. पटेल का रैंक १७ है। याचिका में १० प्रश्नों के गलत उत्तर को भी प्रस्तुत किया गया। इसके सही जवाब भी बताए गए हैं। हाईकोर्ट ने राज्य शासन एवं डायरेक्टर मेडिकल एजुकेशन को नोटिस जारी कर ६ सप्ताह में जवाब प्रस्तुत करने का आदेश दिया था। याचिका को १४ जून से प्रारंभ होने वाले सप्ताह में सुनवाई के लिए रखा गया।

जस्टिस आईएम कुद्दुसी एवं जस्टिस एनके अग्रवाल की युगलपीठ में सोमवार को याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान शासन व चिकित्सा शिक्षा विभाग की ओर से जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि पहली काउंसिलिंग ३१ मई को हो गई है। दूसरी काउंसिलिंग जून के अंतिम सप्ताह में रखी गई है। याचिकाकर्ताओं के वकील के तर्क से सहमत होते हुए युगलपीठ ने प्रकरण को निराकृत कर डायरेक्टर मेडिकल एजुकेशन को आदेश दिया है कि याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत उत्तरों का प्रतिपरीक्षण किया जाए। यदि इनका उत्तर सही है, तो उत्तरपुस्तिका का पुनर्मूल्यांकन करने के बाद काउंसिलिग की जाए।

Jun 18, 2010

बीएसपी में जूनियर अफसर प्रमोशन पर स्टे - हाईकोर्ट ने दी तीन हफ्ते की मोहलत

जूनियर ऑफिसर प्रमोशन मामले में कुछ बीएसपी कर्मियों ने हाईकोर्ट बिलासपुर से स्टे देने की मांग की थी। इस मामले में बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मैनेजमेंट को तीन हफ्ते की मोहलत दी है। अंतिम सुनवाई ९ जुलाई को होगी।

जूनियर ऑफिसर प्रमोशन की लिखित परीक्षा की घोषणा के साथ ही इस मामले में कुछ कर्मियों द्वारा स्टे मांगे जाने की संभावना जताई जा रही थी। तत्संबंध में मैनेजमेंट को भी अंदेशा था कि कुछ कर्मी प्रमोशन प्रक्रिया पर स्टे की मांग कर सकते हैं। इस अंदेशे के चलते मैनेजमेंट ने हाईकोर्ट में केविएट लगा दिया था। मैनेजमेंट ने केविएट के संबंध में ६ जून को बाकायदा सूचना का भी प्रकाशन कराया था।

आज हाईकोर्ट के डिविजनल बेंच में जस्टिस कुद्दीसी व जस्टिस नवलकिशोर अग्रवाल ने कर्मियों द्वारा मांगे गए स्टे के आधार पर प्रकरण क्रमांक डब्ल्यूबीसी २६५८५ के तहत मामले को सुना। कर्मियों की ओर से उनके अधिवक्ता द्वारा दलील दी गई कि जूनियर अफसर मामले में पुराने प्रकरण पर सुनवाई चल रही है और जब तक इस प्रकरण का अंतिम निर्णय नहीं आ जाता तब तक नई प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए। तत्संबंध में हाईकोर्ट ने मैनेजमेंट को तीन हफ्ते का समय दिया है। मैनेजमेंट ने इस मामले में बीपी मिश्रा को अपना अधिवक्ता नियुक्त किया है जबकि कर्मियों की ओर से अधिवक्ता वीजी तामस्कर इस मामले की पैरवी कर रहे हैं। जिन कर्मियों द्वारा स्टे मांगा गया है उनमें हृषिकेश प्रसाद, वी. शेखर, टीएन सिंह, ए.वी. सिंह, ए.वी. दयाशंकर आदि शामिल हैं।

जूनियर अफसर प्रमोशन की लिखित परीक्षा के ठीक पूर्व इस संबंध में हाईकोर्ट में आपत्ति उठाए जाने से यह मामले फिर एक बार दिलचस्प हो चला है। पूर्व में हुए प्रमोशन को लेकर असंतुष्ट कर्मी चाहते हैं कि संपन्ना प्रमोशन प्रक्रिया की जांच होनी चाहिए। बीएसपी कर्मी ए.वी. दयाशंकर समेत करीब १९२ कर्मियों द्वारा तत्संबंध में हाईकोर्ट में दायर की गई याचिका पर अभी अंतिम निर्णय आना बाकी है। इस बीच मैनेजमेंट ने लिखित परीक्षा की घोषणा कर दी। इससे असंतुष्ट कर्मी बेहद गुस्साए हुए हैं।

Mar 26, 2010

जस्टिस आईएम कुद्दुसी ने आज कार्यभार सम्हाल

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस आईएम कुद्दुसी ने आज कार्यभार सम्हाल लिया है। जस्टिस कुद्दुसी ने शुक्रवार की सुबह आयोजित समारोह में शपथ ली। उनके साथ ही हाईकोर्ट में जजों की संख्या 12 हो गई है। जस्टिस आईएम कुद्दुसी गुरुवार को शहर पहुंचे। इससे पूर्व वे उड़ीसा हाईकोर्ट के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश का पद संभाल रहे थे। छत्तीसगढ़ भवन में रजिस्ट्रार जनरल रवींद्र श्रीवास्तव व अन्य अधिकारियों ने उनकी अगवानी की। शुक्रवार की सुबह वे हाईकोर्ट पहुंचे, जहां उनके सम्मान में समारोह (ओवेशन) का आयोजन किया गया।

चीफ जस्टिस राजीव गुप्ता ने उन्हे पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। उड़ीसा हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस की यहां पदस्थापना के साथ ही हाईकोर्ट में एक बार फिर से रोस्टर में बदलाव किया गया है। चीफ जस्टिस राजीव गुप्ता के निर्देश पर रजिस्ट्रार जनरल ने नया रोस्टर लागू किया है, जो शुक्रवार से प्रभावी होगा। इस रोस्टर के तहत अब हाईकोर्ट में नियमित रूप से पांच अलग-अलग डिवीजन बेंच में प्रकरणों की सुनवाई होगी। नवपदस्थ जस्टिस कुद्दुसी व जस्टिस प्रशांत मिश्रा के साथ डिवीजन बेंच में बैठेंगे। उनकी बेंच में सर्विस प्रकरणों के साथ ही रीट अपील की सुनवाई होगी। इसके साथ ही हाईकोर्ट में पूर्व से चल रहे चार डिवीजन बेंच को यथावत रखा गया है। इसके तहत चीफ जस्टिस श्री गुप्ता की दो डिवीजन बेंच में जस्टिस सुनीलकुमार सिन्हा और जस्टिस आरएन चंद्राकर बैठते हैं। इसी तरह जस्टिस धीरेंद्र मिश्रा व जस्टिस आरएन चंद्राकर की डिवीजन बेंच व जस्टिस टीपी शर्मा व जस्टिस आरएल झंवर की डिवीजन बेंच में मामलों की सुनवाई होती थी।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट स्थापना के बाद से जजों की कमी की समस्या से जूझता रहा है  धीरे-धीरे कर यहां जजों की संख्या बढ़ती गई। बीच में यहां जजों की संख्या बढ़ी थी, लेकिन एक के बाद एक जजों के रिटायमेंट के बाद संख्या घटकर चार हो गई थी। इसके बाद यहां स्वीकृत पदों की संख्या बढ़ाई गई। करीब दो साल पहले हाईकोर्ट में जजों की संख्या ११ तक पहुंच गई थी, लेकिन इस बीच फिर दो जज रिटायर हो गए। पिछले साल यहां बेंच व बार कोटे से जजों की नियुक्ति की गई। इसके बाद जजों की संख्या फिर ११ हो गई है। जस्टिस कुद्दुसी के तबादले के बाद पहली बार हाईकोर्ट में जजों की संख्या बारह तक पहुंच गई है। ऐसा माना जा रहा है कि नए हाईकोर्ट भवन में कामकाज शुरू होने के बाद सभी स्वीकृत पदों पर जजों की नियुक्ति कर दी जाएगी।

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