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Dec 2, 2007

छत्तीसगढ (म.प्र.) भू-राजस्व संहिता, १९५९ : धारा संक्षिप्‍त

अध्याय-१

१. संक्षिप्त नाम, विस्तार तथा प्रारम्भ
२. परिभाषाएँ

अध्याय-२ राजस्व मंडल (बोर्ड)

३. राजस्व मंडल का गठन
४. राजस्व मंडल का प्रधान स्थान तथा उसकी बैठकों के अन्य स्थान
५. मंडल के सदस्यों की सेवा शर्ते
६. वेतन तथा भत्ते
७. मण्डल की अधिकारिता
८. मण्डल की अधीक्षण सम्बन्धी शक्तियां
९. एक सदस्यीय तथा बहुत सदस्यीय न्यायपीठों द्वारा अधिकारिता का प्रयोग
१०. संहिता के प्रारम्भ होने के समय विचाराधीन मामले

Sanjeev Tiwari, Advocate
Chambers of Om Sai Associates (Advocates and Legal Consultants)Office - 1st floor, Gaur Complex, Rajendra Park Chowk, Durg, Chhattisgarh.Rec. - Suryodaya Nagar, Khandelwal Colony, Durg, Chhattisgarh.

अध्याय-३ राजस्व अधिकारी, उनके वर्ग तथा शक्तियां

११. राजस्व पदाधिकारी
१२. राजस्व पदाधिकारियों पर नियंत्रण
१३. सम्भागों, जिलों, उपखंडों तथा तहसीलों को परिवर्तित करने, उनकी रचना करने या उन्हें समाप्त करने की शक्ति
१४. लुप्त
१५. लुप्त
१६. कलेक्टर को नियुक्त करने की शक्ति
१७. अपर कलेक्टर को नियुक्त करने की शक्ति
१८. सहायक कलेक्टरों, संयुक्त कलेक्टरों तथा डिप्टी कलेक्टरों की नियुक्ति और शक्तियां
१९. तहसीलदारों, अपर तहसीलदारों तथा नायब तहसीलदारों की नियुक्ति
२०. भू-अभिलेखों अधीक्षक तथा सहायक भू-अभिलेख अधीक्षकों की नियुक्ति
२१. अन्य पदाधिकारी
२२. उपखंड अधिकारी
२३. राजस्व अधिकारियों की अधीनस्थता
२४. राज्य सरकार द्वारा राजस्व अधिकारियों की शक्तियों का पदाधिकारियों तथा अन्य व्यक्तियों को प्रदत्त किया जाना ।
२५. स्थानान्तरण होने पर प्रयोगनीय शक्तियां
२६. अस्थायी रिक्ति होने की दशा में कलेक्टर




अध्याय-४ राजस्व पदाधिकारियों तथा राजस्व न्यायालयों की प्रक्रिया

२७. जांच करने के लिये स्थान
२८. भूमि पर प्रवेश करने तथा उसका सर्वेक्षण करने की शक्ति
२९. मामलों की अन्तरित करने की शक्ति
३०. अधीनस्थों को तथा उनके पास से मामले अन्तरिम करने की शक्ति
३१. मण्डल तथा राजस्व अधिकारियों को न्यायालयों की प्रास्थिति प्रदान किया जाना
३२. राजस्व न्यायालय की अन्तर्निहित शक्ति
३३. व्यक्तियों के हाजिर होने तथा दस्तावेज पेश करने की अपेक्षा करने तथा साक्ष्य लेने की राजस्व अधिकारियों की शक्तियां
३४. साक्षी को हाजिरी के लिये विवश करना
३५. पक्षकार की अनुपस्थिति में सुनवाई
३६. सुनवाई का स्थगन
३७. व्यय दिलाने की शक्ति
३८. स्थावर सम्पत्ति का कब्जा परिदत्त करने विषयक आदेश को निष्पादित(तामिल) करने की रीति
३९. वे व्यक्ति जिनके द्वारा, राजस्व अधिकारियों के समक्ष उपसंजाति (हाजिरी) की जा सकेगी और आवेदन किये जा सकेंगे ।
४०. अनुसूची १ में के नियों का प्रभाव
४१. मंडल को नियम बनाने की शक्ति
४२. राजस्व पदाधिकारियों के आदेश-भूल या अनियमितता के कारण कब उल्टे जा सकेंगे
४३. इस संहिता में स्पष्ट उपबन्ध न होने की दशा में व्यवहार-प्रक्रिया संहिता का लागू होना ।




अध्याय-५ अपील, पुनरीक्षण तथा पुनर्विलोकन

४४. अपील तथा अपीलीय अधिकारी
४५. कतिपय लम्बित कार्यवाहियों का बन्दोबस्त आयुक्त को अन्तरण
४६. कतिपय आदेशों के विरुद्ध कोई अपील नहीं होगी
४७. अपीलों की परिसीमा
४८. याचिका (अरजी) के साथ उस आदेश की प्रतिलिपि होगी जिसके कि सम्बन्ध में आपत्ति की गई है ।
४९. अपील प्राधिकारी की शक्ति
५०. पुनरीक्षण
५१. आदेशों का पुनर्विलोकन
५२. आदेशों के निष्पादन का रोका जाना
५३. लिमिटेशन एक्ट का लागू होना
५४. लम्बित पुनरीक्षण
५४-ए लुप्त
५५. अध्याय का लागू होना
५६. आदेश का अर्थान्वयन




अध्याय-६ भूमि का राजस्व

५७. समस्त भूमियों में राज्य का स्वामित्व
५८. भू-राजस्व के भुगतान के लिये भूमि का दायित्व
५८-अ. कतिपय भूमियों को भू-राजस्व की देनकी से छूट दी जायेगी ।
५९. जिस प्रयोजन के लिये भूमि उपयोग में लाइ जाए उसी के अनुसार भू-राजस्व में फेरफार-
५९-ए. निर्धारण कब प्रभावशील होगा
५९-बी. कोड के प्रवृत्त होने के पूर्व व्यपवर्तित भूमि पर पुन: निर्धारण संशोधन अधिनियम क्र. १५/१९७५ के उद्देश्य
६०. निर्धारण किसके द्वारा नियत किया जायेगा ।




अध्याय-७ नगरेतर क्षेत्रों में राजस्व सर्वेक्षण तथा बन्दोबस्त

६१.इस अध्याय का नगरेतर क्षेत्रों में की भूमियों का लागू होना
६२. बन्दोबस्त आयुक्त की नियुक्ति
६३. अपर बन्दोबस्त आयुक्तों की नियुक्ति और उनकी शक्तियां तथा कर्तव्य
६४. बन्दोबस्त अधिकारी, उप बन्दोबस्त अधिकारियों तथा सहायक बन्दोबस्त अधिकारियों की नियुक्ति
६५. बन्दोबस्त अधिकारी उपबंदोबस्त अधिकारी तथा सहायक बन्दोबस्त अधिकारी की शक्तियां
६६. राजस्व सर्वेक्षण की परिभाषा
६७. प्रस्थापित राजस्व सर्वेक्षण की अधिसूचना
६८. सर्वेक्षण-संख्यांको तथा ग्रामों की विरचना
६९. व्यपवर्तित की गई या विशेष रुप से समनुदेशित की गई भूमि का पृथक सीमांकन
७०. सर्वेक्षण-संख्यांकों को पुनर्क्रमांकित या उप-विभाजित करने की शक्ति
७१. अभिलेखों में सर्वेक्षण-संख्यांकों तथा उपखंडों की प्रविष्टि
७२. ग्राम की आबादी का अवधारण
७३. ग्रामों को विभाजित करने या संयोजित करने या उनमें से किसी क्षेत्र को अपवर्जित करने की बन्दोबस्त अधिकारी की शक्ति
७४. ग्रामों के समूह बनाना
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७५. बन्दोबस्त की परिभाषा
७६. प्रस्तावित बन्दोबस्त की अधिसूचना
७७. निर्धारण दरों का नियत किया जाना
७८. निर्धारण की दर के लिये अधिकतम तथा न्यूनतम सीमाएँ
७९. उचित निर्धारण का नियत किया जाना
८०. समस्त भूमियां निर्धारण के दायित्वधीन होंगी
८१. निर्धारण के सिद्धांत
८२. बन्दोबस्त का आख्यापन
८३. बन्दोबस्त का प्रारंभ
८४. अधिकारों को त्यागने वाले भूमिस्वामी की वृद्धि से माफी
८५. बन्दोबस्त की अवधि
८६. अधूरी कार्यवाहियों को पूरा करने की कलेक्टर की शक्ति
८७. कृषि के लाभों तथा भूमि के मूल्य के संबंध में जांच
८८. नक्शें तथा अभिलेख रखने का कर्तव्य बन्दोबस्त अधिकारी की अन्तरित करने की शक्ति
८९. गलतियों को ठीक करने की उपखंड अधिकारी की शक्ति
९०. बन्दोबस्त आदि की अवधि के दौरान कलेक्टर की शक्ति
९१. बन्दोबस्त की अवधि के दौरान बन्दोबस्त अधिकारी को, शक्ति प्रदान करने की शक्ति
९१-क. नियम बनाने की शक्ति




अध्याय-८ नगरीय क्षेत्रों में भूमि का निर्धारण तथा पुनर्निर्घारण

९२. इस अध्याय के उपबन्ध नगरीय क्षेत्रों में की भूमि को लागू होंगे
९३. भूमियों को भू-खंड संख्यांकों में विभाजित करने की कलेक्टर की शक्तियां
९४. भू-खंड संख्यांकों को पुनर्क्रमांकित करने या उपविभाजित करने की कलेक्टर की शक्तियां
९५. भू-खंड संख्यांकों तथा उपखंडों का क्षेत्रफल तथा निर्धारण अभिलेखों में दर्ज किया जायेगा
९६. निर्धारण के लिये नगर का क्षेत्रखंडों में विरचित किया जायेगा ।
९७. कलेक्टर द्वारा निर्धारण का मानक दर का नियत किया जाना तथा मानक दरों का प्रकाशन
९८. निर्धारण की मानक दरों का नियत किया जाना
९९. निर्धारण की दर के लिये अधिकतम तथा न्यूनतम सीमाएँ
१००. कलेक्टर भू-खंड पर निर्धारण विहित की गई दर से करेगा
१०१. बन्दोबस्त की अवधि
१०२. नियत किया गया निर्धारण भू-राजस्व या लगान होगा
१०३. पूर्व के बन्दोबस्त या पट्टों के अधीन नियत किया गया भू-राजस्व या लगान चालू रहेगा ।
१०४. पटवारी के हल्कों की विरचना तथा उनमें पटवारियों की नियुक्ति
१०५. राजस्व निरीक्षकों के हलकों की विरचना
१०६. राजस्व निरीक्षकों आदि की नियुक्ति
१०७. खेत का नक्शा
१०८. अधिकार-अभिलेख
१०९. अधिकारों के अर्जन की रिपोर्ट की जायेगी
११०. क्षेत्र पुस्तक तथा अन्य सुसंगत भू-अभिलेखों में अधिकार अर्जन बाबत नामान्तरण
१११. सिविल न्यायालयों की अधिकारिता
११२. अन्तरणों के संबंध में रजिस्ट््रीकर्ता अधिकारियों द्वारा प्रज्ञापन
११३. लेखन संबंधी गलतियों का शुद्धिकरण
११४. भू-अभिलेख
११४-ए. किसान किताब
११५. खसरा तथा किन्हीं अन्य भू-अभिलेखों में गलत प्रविष्टि का वरिष्ठ पदाधिकारियों द्वारा शुद्धिकरण
११६. खसरा या किन्हीं अन्य भू-अभिलेखों में की प्रविष्टि के बारे में विवाद
११७. भू-अभिलेखों में की प्रविष्टियों के बारे में उपधारणा
११८. हक के बारे में जानकारी देने की बाध्यता
११९. जानकारी देने में उपेक्षा करने के लिये शास्ति
१२०. नक्शे तथा अधिकार-अभिलेख तैयार करने में सहायता की अध्यपेक्षा
१२१. भू-अभिलेखों के लिये नियम बनाने की शक्ति
१२२. इस अध्याय के उपबन्धों से छूट
१२३. संहिता के प्रारंभ होने के समय अधिकार अभिलेख




अध्याय-१० सीमाएं, तथा सीमाचिन्ह, सर्वेक्षण चिन्ह

१२४. ग्रामों तथा सर्वेक्षण-संख्यांकों या भू-खंड संख्यांकों के सीमा चिन्हों का सन्निर्माण
१२५. ग्रामों, सर्वेक्षण संख्यांकों के बीच सीमाआें के बारे में विवाद
१२६. संदोष कब्जा रखने वाले व्यक्तियों को बेदखली
१२७. सीमांकन तथा सीमा पंक्तियों का अनुरक्षण
१२८. सीमा चिन्हों या सर्वेक्षण चिन्हों की मरम्मत कराने के लिये बाध्य करना ।
१२९. सर्वेक्षण संख्यांक या उपखंड या भू-खंड संख्यांक को सीमांकन
१३०. सीमा चिन्हों या सर्वेक्षण चिन्हों को विनष्ट करने, क्षति पहुँचाने या हटाने के लिये शास्ति (पेनाल्टी)
१३१. मार्गाधिकार तथा अन्य प्रायवेट सुखाचार सम्बन्धी अधिकार
१३२. मार्ग आदि पर बाधा उपस्थित करने के लिये शास्ति
१३३. बाधा का हटाया जाना
१३४. कतिपय कार्यो के लिये पुनरावृति विरत रहने के लिये बन्ध-पत्र का निष्पादन
१३५. सड़क, पथ आदि के लिये भूमि का अर्जन
१३६. इस अध्याय के प्रवर्तन से छूट देने की शक्ति
१३७. भू-राजस्व भूमि पर प्रथम भार होगा ।
१३८. भू-राजस्व के भुगतान के लिये उत्तरदायित्व
१३९. भू-राजस्व कब्जा रखने वाले किसी भी व्यक्ति से वसूल किया जायेगा
१४०. तारीख जिसको भू-राजस्व शोध्य होगा तथा देना होगा ।
१४१. बकाया तथा बकायादार की परिभाषाएँ
१४२. पटेल, पटवारी, ग्राम सभा या ग्राम पंचायत रसीद देने के लिये आबद्ध होंगे
१४३. भू-राजस्व के भुगतान में व्यक्तिक्रम के लिये शास्ति
१४४. फसलों के मारे जाने पर भू-राजस्व की माफी या उसका निलम्बन
१४५. प्रमाणित लेखा बकाया तथा बकायादार के बारे में साक्ष्य होगा
१४६. मांग की सूचना
१४७. बकाया की वसूली के लिये आदेशिका
१४८. खर्चे बकाया के भाग के रुप में वसूल किये जा सकेंगे
१४९. अन्य जिलों में आदेशिकाआें का प्रवर्तन
१५०. अभ्यापति के साथ भुगतान तथा वसूली के लिये बाद
१५१. विक्रय आगामों का आयोजन
१५२. बकाया के लिये बेची गई भूमिविल्लंगमों (एन्कमर्बेसेज) से मुक्त होगी
१५३. क्रेता का हक
१५४. क्रेता विक्रय के पूर्व शोध्य भू-राजस्व के लिये दायी नहीं होगा
१५४-ए. उस खाते को, जिसके सम्बंध में बकाया शोध्य हो,
या बकायादार किसी अन्य खाते का पट्टे पर देने की तहसीलदार की शक्तियां
१५५. भू-राजस्व के बकाया के तौर पर वसूली योग्य धन
१५६. प्रतिभू से धनों की वसूली




अध्याय-१२ भू-धारणाधिकारी (भू-धारी)

१५७. भू-धारणाधिकारी (भूधृति) का वर्ग
१५८. भूमिस्वामी
१५९. भूमिस्वामियों द्वारा देय भू-राजस्व
१६०. भू-राजस्व का भुगतान करने के दायित्व से दी गई छू ट का प्रतिसंहरण
१६१. बन्दोबस्त चालू रहने के दौरान राजस्व में कमी
१६२. कलेक्टर द्वारा भूमि का निवर्तन (लुप्त)
१६३. भूस्वामी अधिकार प्रदान किये जाने के लिये लम्बित आवेदन
१६४. न्यागमन
१६५. अन्तरण के अधिकार
१६६. कतिपय अन्तरणों के मामलों में समपहरण
१६७. भूमि का विनिमय
१६८. पट्टे
१६९. अनाधिकृत पट्टा आदि
१७०. धारा १६५ उल्लंघन में किये गये अन्तरण का परिवर्जन
१७०-ए. कतिपय अन्तरणों का अपास्त किया जाना
१७०-ख. आदिम जनजाति के सदस्य की ऐसी भूमि का जो कपट द्वारा अन्तरित की गई थी प्रतिवर्तन
१७०-ग. अनुज्ञा के बिना धारा १७०-ए या १७० ख के अधीन की कार्यवाहियों में अधिवक्ता का उपसंजात न होना
१७०-घ. द्वितीय अपील का वर्जन
१७१. सुधार करने का अधिकार
१७२. भूमि का व्यपवर्तन
१७३. त्यजन
१७४. त्यजन किये गये उपखंड का निपटारा
१७५. त्यजन की गई भूमि के लिये मार्ग का अधिकार
१७६. खाते का परित्याग
१७७. खाते का निपटारा
१७८. खाते का विभाजन
१७८-ए. भूमि स्वामी के जीवनकाल में भूमि का बंटवारा
१७९. खाते में के वृक्षों पर अधिकार
१८०. वृक्षों के अन्तरण पर निर्बन्धन




अध्याय-१३ सरकारी पट्टेदार तथा सेवा भूमि

१८१. सरकारी पट्टेदार
१८२. सरकारी पट्टेदार के अधिकार तथा दायित्व
१८३. सेवा भूमि
१८४. सिरोंज क्षेत्र में की सेवा भूमि का उस दशा में निपटारा जबकि सेवाओं की आगे आवश्यकता न हो




अध्याय-१४- मौरुसी (दखलकार) कृषक

१८५. मौरुसी कृषक
१८६. अधिकतम लगान
१८७. परिवर्तन
१८८. लगान
१८९. कतिपय मामलों में भूमिस्वामी द्वारा पुनर्ग्रहण
१९०. मौरुसी कृषकों को भूमिस्वामी अधिकारों का प्रदान किया जाना
१९१. मौरुसी कृषक को भूमि वापस दिलाया जाना
१९२. मौरुसी कृषक अधिकारों का न्यागमन
१९३. कृषकाधिकार की समाप्ति
१९४. ऐसी मौरुसी कृषक को जिसका कि कृषिकाधिकार समाप्त कर दिया गया हो, लागू होने वाले उपलब्ध
१९५. मौरुसी कृषक के अन्तरण सम्बन्धी अधिकार
१९६. सुधार करने के मौरुसी कृषक के अधिकार
१९७. मौरुसी कृषक द्वारा किये गये अन्तरणों को अपास्त कराने के लिये आवेदन करने का कतिपय व्यक्तियों का अधिकार
१९८. अभ्यर्पण
१९९. रसीद
२००. रसीन न देने या अधिक वसूली के लिये शास्ति
२०१. भू-राजस्व की माफी तथा उसके निलम्बन के परिणामस्वरुप लगान की माफी तथा उसका निलम्बन
२०२. दोषपूर्ण ढंग से बेदखल किये गये मौरुसी कृषक का पुन:स्थापन




अधयाय-१५ जलोढ तथा जलप्लावन

२०३. जलोढ तथा जलप्लावन
२०४. निर्धारण करने तथा विवादों को विनिश्चित करने की शक्ति

अध्याय-१६

२०५. परिभाषाएँ
२०६. चकबन्दी कार्यवाहियों का शुरु किया जाना
२०७. आवेदन का नामन्जूर किया जाना
२०८. आवेदन का ग्रहण किया जाना
२०९. खातों की चकबन्दी के लिये स्कीम का तैयार किया जाना
२१०. स्कीम की पुष्टि
२११. पुष्टि हो जाने पर प्रक्रिया
२१२. खातों के कब्जे के संबंध में भूमिस्वामियों के अधिकार
२१३. भूमिस्वामियों के उनके खातों में के अधिकारों का अन्तरण
२१४. अन्तरण प्रभावान्वित करने के लिये लिखत आवश्यक नहीं होगी
२१५. स्कीम को कार्यान्वित करने के खर्चे
२१६. प्रतिकर तथा खर्चे की वसूली
२१७. विभाजन कार्यवाहियों का चकबन्दी कार्यवाहियों से चालू रहने के दौरान निलम्बन
२१८. कार्यवाहियों के दौरान सम्पत्ति का अन्तरण
२१९. चकबन्दी के पश्चात भूस्वामियों के अधिकार पूर्ववत् बने रहेंगे
२२०. भूमिस्वामियों के विल्लंगम
२२१. नियम बनाने की शक्ति




अध्याय-१७ ग्राम अधिकारी

२२२. पटेलों की नियुक्ति
२२३. पटेलों का पारिश्रमिक
२२४. पटेलों के कर्तव्य
२२५. किसी विधी के अधीन भू-धारकों पर अधिरोपित कर्तव्य पटेलों पर अधिरोपित कर्तव्य का हटाया जाना
२२६. पटेलों का हटाया जाना
२२७. पटेलों को दण्ड
२२८. प्रतिस्थानी पटेल की नियुक्ति
२२९. ग्राम पं्रबंध का सौंपा जाना
२३०. कोटवारों की नियुक्ति तथा उनके कर्तव्य
२३१. कोटवारों का पारिश्रमिक
ग. ग्राम सभा
२३२. ग्राम सभा

अध्याय-१८ आबाद तथा दखल रहित भूमि में और उसकी उपज में अधिकार

२३३. दखल रहित भूमि का अभिलेख
२३४. निस्तार पत्रक का तैयार किया जाना
२३५. विषय जिनका विस्तार पत्रक में उपबंध किया जायेगा
२३६. निस्तार पत्रक में कतिपय विषयों के लिये उपबन्ध
२३७. निस्तार अधिकारों के प्रयोग के लिये कलेक्टर द्वारा भूमि का पृथक रखा जाना
२३८. दूसरे ग्राम की बंजर भूमि के अधिकार
२३९. दखलरहित भूमि भाठा भूमि तथा बड़े झाड़/छोटे झाड़ के जंगल में रोपित फलदार वृक्षों और अन्य फलदार वृक्षों में अधिकार
२४०. कतिपय वृक्षों के काटे जाने का प्रतिषेध
२४१. सरकारी वनों से इमारती लकड़ी की चोरी रोकने के उपाय
२४२. वाजिब उल अर्ज
२४३. आबादी
२४४. आबादी स्थलों का निपटारा
२४५. भू-राजस्व संहिता बिना गृह स्थल धारण करने का अधिकार
२४६. आबादी के गृहस्थल धारण करने वाले व्यक्तियों का अधिकार
२४७. खनिजों के सम्बन्ध में सरकार का हक
२४८. अप्राधिकृत रुप से भूमि पर कब्जा कर लेने के लिये शास्ति
२४९. मछली पकड़ने, आखेट करने आदि का विनियमन
२५०. अनुचित रुप से बे-कब्जा किये गये भूमि स्वामी का पुन: स्थापन
२५०-क. धारा २५० के अधीन कब्जा वापस न दिया जाने पर सिविल कारागार में परिरोध
२५०-ख. भूमि के आबंटिती के पक्ष में भूमि खाली न करना अपराध होगा
२५१. तालाबों का राज्य शासन में निहित होना
२५२. लोकोपयोगी निर्माण कार्यो का अनुरक्षण
२५३. उपबन्धों के उल्लंघन के लिये दण्ड
२५४. ग्राम सभा के कर्तव्यों का पटेल द्वारा पालन किया जाना




अध्याय-१९ प्रकीर्ण

२५५. खेती तथा प्रबन्ध के मापदण्डों का विहित किया जाना
२५६. नक्शों तथा भूअभिलेखों का निरीक्षण तथा उनकी प्रतिलिपियाँ
२५७. राजस्व प्राधिकारियों की अनन्य अधिकारिता
२५७-ए, कतिपय कार्यवाहियों के सबूत का भारत तथा विधि व्यवसायियों का वर्जन
२५८. नियम बनाने की साधारण शक्ति
२५९. कतिपय भूधृतियों के प्रति निर्देश
२६०. ऐसी विधियों के प्रति निर्देश जो किसी भी क्षेत्र में प्रवृत्त न हो
२६१. निरसन तथा व्यावृति
२६२. अस्थायी उपबन्ध
२६३. कठिनाईयों का निराकरण करने की शक्ति
२६४. संहिता कतिपय मामलों में लागू नहीं होगी ।

(यह सामान्‍य जानकारी के लिए है, इसका किसी भी प्रकार का न्‍यायालयीन उद्धरण के रूप में प्रयोग वर्जित है)




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Aug 7, 2007

फ्लैट किरायानामा / किराया अनुबंध पत्र

यह अनुबंध फ्लैट मालिक .............................. आ. .................................... निवासी ..................................
आगे प्रथम पक्ष कहलायेगा तथा kiraayedaर ............... आ ........................................ निवासी .............................................................. जो आगे द्वितीय पक्ष कहलायेगा, के मध्य आज दिनांक ......... को निम्नानुसार लिखी गई :-




१. यह कि फ्लैट क्र. .......... के तृतीय तल में स्थित है.

२. यह कि उक्त फ्लैट क्र. .......... को किरायेदार द्वितीय पक्ष नें निवास हेतु किराये पर लिया है जिसका किराया रु. .........../- अक्षरी .............. रु. मात्र माहवार होगा तथा किरायेदारी अंग्रेजी माह की पहली तारीख से शुरु होकर उसी माह की अंतिम तारीख को खत्म होगी.

३. यह कि द्वितीय पक्ष, प्रथम पक्ष को अग्रिम रुप से हर माह की पांच तारीख तक अनिवार्य रुप से चेक के द्वारा किराया पटा देगा. इस हेतु से द्वितीय पक्ष, प्रथम पक्ष को प्रत्येक माह के किराये की राशि के रुप में चेक क्र. ............................. से .............................. तक, बैंक ....................................., का चेक अग्रिम रुप से प्रदान कर रहा है . यदि किरायेदार द्वितीय पक्ष के द्वारा लगातार दो माह तक किराया का भुगतान नहीं किया जाता है तो प्रथम पक्ष फ्लैट मालिक को यह अधिकार होगा कि वह उक्त फ्लैट क्र. .......... को अपने कब्जे में ले लेगा ऐसी स्थिति में उस फ्लैट में रखे गये सामानों की किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी प्रथम पक्ष की नहीं होगी इसमें द्वितीय पक्ष को कोई आपत्ति नहीं होगी और न ही वह कोई उजर या दावा कर सकेगा.

४. यह कि द्वितीय पक्ष उक्त फ्लैट क्र. ..........को निवास हेतु उपयोग में लायेगा तथा फ्लैट को बिना प्रथम पक्ष के लिखित रजामंदी के कोई तब्दीली नही करेगा, तब्दीली या तोड़फोड़ होने पर निष्कासन व नुकसानी का देनदार होगा .





५. यह कि द्वितीय पक्ष उक्त फ्लैट क्र. .......... को किसी अन्य को सबलेट नही कर सकेगा और न ही कोई भागीदारी या किसी अन्य प्रयोजन हेतु रखेगा और न ही वहां कोई ऐसा कार्य व्यवसाय करेगा जिससे कि प्रथम पक्ष को आपत्ति हो.

६. यह कि द्वितीय पक्ष उक्त फ्लैट क्र. ..........में लगे विद्युत कनेक्सन व फिक्चर एवं अन्य सामान जो प्रथम पक्ष के द्वारा उपलब्ध कराये गये हैं, में फेरबदल या तब्दीली नहीं कर सकेगा ऐसा करने के लिये उसे प्रथम पक्ष से अनुमति प्राप्त करना होगा.

७. यह कि उक्त फ्लैट क्र. ..........में लगे विद्युत मीटर का किरायेदारी अवधि का जो भी बिल आवेगा उसका भुगतान नियमित रुप से नियत समय में विद्युत मंडल को करना होगा . बिल का भुगतान नही करने पर जमा सुरक्षा राशि से उक्त बिल का भुगतान कर फ्लैट का कब्जा वापस ले लिया जावेगा.

८. यह किराये का अनुबंध ग्यारह माह के लिए प्रभावशील रहेगा जो कि .......................... से प्रारंभ होकर ................................. को समाप्त होगा, उपरोक्त ग्यारह माह पूर्ण होने के पूर्व द्वितीय पक्ष के अनुरोध पर यदि प्रथम पक्ष उक्त दुकान को पुन: द्वितीय पक्ष को किराये में देने हेतु राजी होगा तब द्वितीय पक्ष अगले ग्यारह माह के लिये नया अनुबंध करा कर किराये में ले सकता है .

९. यह कि प्रथम पक्ष जब भी उक्त फ्लैट क्र. ..........को खाली कराना चाहेगा तो एक माह की पूर्व नोटिस देकर उक्त फ्लैट को अपने आधिपत्य में ले सकता है ऐसी स्थिति में द्वितीय पक्ष उस समय तक देय किराया, विद्युत शुल्क व अन्य शुल्क प्रथम पक्ष को पटा देगा व उक्त फ्लैट का कब्जा प्रथम पक्ष को दे देगा. ऐसे ही जब भी द्वितीय पक्ष उक्त फ्लैट को खाली करना चाहेगा तब एक माह पूर्व नोटिस देकर समस्त देनदारियों को प्रदान कर फ्लैट खाली कर सकता है.




१०. यह कि द्वितीय पक्ष, प्रथम पक्ष एवं शांतिनिकेतन,परिसर प्रबंधन से हुये साफ सफाई एवं सुरक्षा, सुन्दरता संबंधी अनुबंध के नियम एवं शर्तों का पालन करेगा एवं समय-समय पर परिसर प्रबंधन द्वारा जारी किये गये निर्देशों का भी पालन करना पड़ेगा एवं इस हेतु निर्धारित किया गया मैंटिनेंस चार्ज की राशि का भुगतान परिसर प्रबंधन को प्रति माह करना होगा.

११. यह कि द्वितीय पक्ष किरायेदार नें प्रथम पक्ष को सुरक्षा राशि के रुप में रु. .............../- अक्षरी रुपये ..................... मात्र चेक क्र. ..................., बैंक ......................., दिनांक ........ के द्वारा भुगतान कर दिया है जिसे प्रथम पक्ष स्वीकार करता है जिस पर किसी भी प्रकार का ब्याज देय नहीं होगा, इस राशि को किरायेदारी की समाप्ती के बाद उक्त फ्लैट क्र. .......... के संबंध में किसी भी प्रकार की देनदारी को काटकर बचत राशि का भुगतान कर दिया जावेगा.

यह किराया अनुबंध दोनों पक्षों नें सोंच समझ कर तथा पूरे होशो हवाश में निम्नलिखित गवाहों के समक्ष लिख दिया ताकि वक्त पर काम आवे.
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गवाह :-
प्रथम पक्ष





द्वितीय पक्ष

न्यायालय अवमान : नये दृष्टिकोण की आवश्यकता

द्वारा
माननीय न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू
न्यायाधीश, भारतीय उच्चतम न्यायालय

न्यायालय अवमान का विषय बहुधा ही विवेचन एवं टिप्पणी करने के लिये आता है । कुछ अवमान विधि में सुधार करने की बात करते हैं ।अन्य पूर्ण रुप से न्यायालयों की इस शक्ति का उन्मूलन करने का सुझाव देते हैं, इत्यादि । इस विषय पर व्यापक संख्या में पुस्तकें और लेख हैं ।

यहां प्रयास, मौलिक सिद्धांतों की जांच करके विषय को नया द्यिष्टकोण प्रदान करने का है ।

लोकतंत्र में आधारभूत सिद्धांत यह है कि लोग सर्वोच्च है । इसका तात्पर्य यही है कि सभी प्राधिकारी, चाहे वे न्यायाधीश, विधायक, मंत्री, नौकरशाह, इत्यादि हों, लोगों के सेवक है ।

इस प्रकार भारतीय संविधान की उद्देशिका यह अधिकथित करती है :

‘हम भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्ण सम्प्रभुता-सम्मान समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिये तथा उसके समस्त नागरिकों को :
सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक न्याय
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म उपासना की स्वतन्त्रता:
प्रास्थिति एवं अवसर की समानता
उपाप्त कराने के लिये तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा एवं राष्ट्र की एकता तथा अखण्डता सुनिश्चित करने वाला भाई-चारा बढाने के लिये,

दृढ संकल्पित होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख २६ नवम्बर, १९४९ ई. को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित एवं आत्म समर्पित करते हैं ।‘

ये शब्द हमारे संविधान के गणतन्त्रात्मक लक्षण पर बल देते हैं और यह दर्शित करते हैं कि सभी शक्तियां अन्ततोगत्वा लोगों से उद्भूत होती है ।

यदि एक बार लोकप्रिय प्रभुत्व-सम्पन्नता की इस अवधारणा द्य्ढतापूर्वक ध्यान में रखी जाती है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत के लोग मालिक है और भारत में सभी प्राधिकारी (न्यायालयों को शामिल करके) उनके सेवक हैं । निश्चित रुप से, मालिक को सेवक की आलोचना करने का अधिकार है, यदि सेवक उचित ढंग से कार्य नहीं करता या व्यवहार नहीं करता । इसका तार्किक रुप से यही अर्थ होना प्रतीत होता है कि लोकतंत्र में लोगों को न्यायाधीशों की आलोचना करने का अधिकार है । तब यह पूछा जा सकता है कि न्यायालय अवमान अधिनियम क्यों होना चाहिये, जो कुछ सीमा तक तो लोगों को न्यायाधीशों की आलोचना करने या अन्य कुछ करने से निवारित करता है, जिन्हें न्यायालय अवमान माना जाता है ? यह एक ऐसा प्रश्न है, जो सूक्ष्म परीक्षण की अपेक्षा करता है और इसका ही यहां प्रयास किया जाता है ।

नि:संदेह संविधान को लोगों द्वारा निर्मित किया गया है । परन्तु, इस लिखत ने ही न्यायालयों को सृजित किया है, जिसका तात्पर्य यही है कि लोग अपनी बुद्धिमत्ता में यही महसूस किया कि ऐसे फोरमों (या फोरम) को होना चाहिये, जहां लोगों के बीच विवादों का निपटारा किया जा सके और लोगों की शिकायतों का शान्तिपूर्ण ढंग से प्रतितोष प्रदान किया जा सके ।

यह चीजों की प्रकृति में होता है कि प्रत्येक समाज में लोगों के बीच विवाद और लोगों की शिकायतें होंगी । यदि इन विवादों का समाधान करने के लिये और शान्तिपूर्वक ढंग से इन शिकायतों का प्रतितोष प्रदान करने के लिये कोई फोरम नहीं है, तो उनका समाधान हिंसात्मक रुप से बमों, बन्दुआें, चाकुआें एवं लाठियों से किया जायेगा । अत: न्यायपालिका ही इसके लिये उत्कृष्ट सुरक्षा-वाल्व है । शिकायत रखने वाले व्यक्ति की सुनवायी करके और स्थापित विधिक सिद्धान्तों के आधार पर उसे निर्णय प्रदान करके, न्यायालय उस व्यक्ति को शान्त करता है, अन्यथा शिकायत का उग्रता से विस्फोट हो सकता है । इस प्रकार, न्यायपालिका समाज में शान्ति बनाये रखती है और कोई भी समाज इसके बिना नहीं चल सकता ।

इस द्यिष्टकोण से अवलोकन करने पर, कोई भी व्यक्ति तत्काल ही इसका अनुभव कर सकता है कि लोकतंत्र में न्यायालय अवमान शक्ति का प्रयोजन केवल न्यायालय को कार्य करने के लिये समर्थ बनाना ही हो सकता है । शाक्ति मालिक (लोगों) को अपने सेवक (न्यायधीशों) की आलोचना करने से निवारित करने के लिये नहीं है, यदि पाश्चात्वर्ती उचित रुप से कार्य नहीं करता या अवचार कारित करता है ।

संविधान का अनुच्छेद १९ (१) (क) सभी नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है । परन्तु अनुच्छेद १२९ एवं २१५ उच्चतर न्यायपालिका को न्यायालय अवमान की शक्ति प्रदान करते हैं और यह शक्ति अनुच्छेद १९ (१ (क) द्वारा प्रदत्त स्वतन्त्रता को सीमित करती है । कैसे इन दोनों प्रावधानों में सामंजस्य स्थापित किया जाना चाहिये ?

मेरी राय में, यदि एक बार यह स्वीकार कर लिया जाता है कि भारत एक लोकतंत्र है और यह कि लोकतंत्र में लोग सर्वोच्च होते हैं, तो सामंजस्य अनुच्छेद १९ (१) (क) के अधीन स्वतंत्र वाक् एवं अभिव्यक्ति के नागरिकों के अधिकारों को प्रमुख होना और अवमान की शक्ति को अधीनस्थ होना मानकर प्रभावी किया जा सकता है । अन्य शब्दों में, लोग स्वतंत्र हैं और लोगों को न्यायाधीशों की आलोचना करने का अधिकार है, किन्तु उन्हें न्यायपालिका के कार्यो को असम्भव या अत्यधिक कठिन बनाने की सीमा तक नहीं जाना चाहिये ।

इस प्रकार मेरी राय में यह अवधारित करने का परीक्षण, कि क्या कार्य न्यायालय अवमान की कोटि में आता है या कि नहीं, यही है : यह यह न्यायाधीशों के कार्य को असम्भव या अत्यधिक कठिन बना देता है ? यदि यह कठिन नहीं बनाता, तो यह न्यायालय अवमान की कोटि में नहीं आता, यदि वह कठोर आलोचना भी हो ।

हमारी अवमान विधि में से अधिकतर ब्रिटिश शासन से जारी है । परन्तु, ब्रिटिश शासन के अधीन, भारत स्वतंत्र एवं लोकतन्त्र नहीं था और लोग सर्वोच्च नहीं थे, बल्कि ब्रिटिश शासन ही सर्वोच्च थे । उस समय ऐसा कोई संविधान भी नहीं था, जिसमंे अनुच्छेद १९ (१) (क) की तरह का प्रावधान अन्तर्विष्ट होता । तब कैसे उन दिनों की विधि आज भी लागू हो सकती है ?

तीन उच्च न्यायालयों (इलाहाबाद, मद्रास एवं दिल्ली) में न्यायाधीश के रुप में, मैंने बहुधा खुले न्यायालय में अधिवक्ताओं को यही बताया है कि मेरी आलोचना न्यायालय के भीतर या उसके बाहर अपने हृदय की सन्तुष्टि तक उतनी कर सकते थे, जितनी वे चाहें, किन्तु मैं न्यायालय अवमान की कोई कार्यवाही प्रारंभ नहीं करुंगा । या तो आलोचना सहीं थी, जिस मामले में मैं उसके योग्य था या वह मिथ्या थी, जिस मामले में मैं उसकी उपेक्षा करुंगा । कुछ लोग तो जानबूझकर न्यायाधीश को न्यायालय अवमान कार्यवाही प्रारम्भ करने के लिये प्रकोपित करते हैं, उनका सम्पूर्ण खेल ही प्रचार-प्रसाद प्राप्त करने का होता है । ऐसे व्यक्तियों से संव्यवहृत होने का सर्वोत्तम ढंग उनकी उपेक्षा करना ही हो होगा और इस प्रकार उन्हें उस प्रचार-प्रसार से वंचित करना होगा, जिसकी वे वास्तव में इप्सा कर रहे हैं । मैं बहुधा न्यायालय में यही अधिकथित करता हू कि अवमान शक्ति केवल ‘पात्र’ (योग्य व्यक्ति) पर प्रयुक्त किये जाने वाला एक ‘ब्रम्हास्त्र’ है और मैं आपको उसका ‘पात्र’ नहीं मानता ।

मैं यह भी अधिकथित करता था कि एकमात्र स्थिति, जहां मुझे कुछ कार्यवाही करनी होगी, यही थी कि यदि न्यायाधीश के रुप में मेरा कार्य असम्भव बनाया गया हो, उदाहरणार्थ यदि कोई व्यक्ति न्यायालय के मंच पर कूद पड़ता है और न्यायालय की पत्रावती को साथ लेकर लागने लगता है या न्यायालय में शोर मचाना था चीत्कार करना जारी रखता है अथवा पक्षकार या साक्षी को धमकी देता है । कुल मिलाकर, मुझे वही करार्य करना है, यदि मैं अपने वेतन को न्यायोचित ठहराने की इच्छा रखता हूँ ।

‘अवमान विधि- क्या इसका अत्यधिक विस्तार हो रहा है ?’ विषय पर जयपुर में १.१२.२००१ को दिये गये व्याख्यान में, वरिष्ठ भारतीय अधिवक्ता, श्री फली नरीमन ने कहा ‘न्यायालय को कलंकित करने’ का अपराध अस्थिर अधिकारिता है, जिसमें कोई नियम नहीं है और कोई अवरोध नहीं है । मैं उस व्याख्यान से सम्पूर्ण लम्बे परिच्छेद को उत्कथित कर सकता है :

‘जेरेनी बेन्थम (सैद्धान्तिक न्यायविद्) ने ही सामान्य विधि को ‘श्वान-विधि’ के रुप में चित्रित किया था ।‘

‘जब आपका कुत्ता ऐसा कुछ करता है, तब आप उससे सम्बन्ध समाप्त कर लेते हैं । (उन्होंने १८२३ में यह लिखा था) अत: तब तक आप प्रतिक्षा करते हैं, जब तक वह उसे करता है और इसके पश्चात् आप उसे उसके लिये पीटते हैं । यह वह ढंग है, जिसके द्वारा आप अपने कुत्ते के लिये विधि निर्मित करते हैं ।और यही वह ढंग है, जिसके द्वारा न्यायाधीश आपके और मेरे लिये विधि निर्मित करते हैं ।‘

आंग्ल-सैक्सन न्यायशास्त्र में विगत में इंग्लैण्ड में और विगत तथा वर्तमान में भारत में दोनों में ही न्यायालय अवमान की विधि श्वान-विधि से अधिक कुछ नहीं है, कम नहीं है । ऐसा कोई नियम, कोई अवरोध-कोई स्पष्ट परिस्थितियां नहीं हैं, जब न्याय-प्रशासन को अवमान में लाया जाता है । निर्णय सामान्य नीरस बातों के साथ विस्तारित किया जाता है, जो सम्पादक, व्याख्याकार, अधिवक्ताआें एवं सामान्य जनता के सदस्यों को अल्प मार्गनिर्देश देते हैं, अवमान विधि का यह भाग यद्यपि आवश्यक है, फिर भी स्वतंत्र अभिवाक् के लिये एक विद्यमान धमकी है । यह विशिष्ट न्यायाधीश (या न्यायाधीशों) के विवेकाधिकार पर बहुत कुछ छोड़ता है । और उस मसय विनिश्चय यह निरोधात्मक भावना उत्पन्न करते हैं कि जो व्यक्ति न्यायालय को कलंकित करता है, शायद उसकी भी प्रतिष्ठा अन्ततोगत्वा परिणाम को प्रभावित करती हो ।

एक पदस्थ केैबिनेट मंत्री ने १९८८ में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के विरुद्ध व्यापक एवं अनुचित टिप्पणी की थी । उन्होंने कहा था :

‘गोलकनाथ की तरह जमींदारों (वह गोलकनाथ मामले पर बोल रहे थे) ने भी भारत के उच्चतम न्यायालय के सिवाय सम्पूर्ण देश में कहीं भी सहानुभूतिपूर्ण श्रृंखला उत्पन्न नहीं कर पायी थी और बैंक संचालकों, इस देश की सम्भ्रान्त संस्कृति के प्रतिनिधियों, जिनका सामर्थ्यपूर्वक उद्योगपतियों, स्वतंत्रता के लाभार्थियों द्वारा समर्थन किया गया था, ने कपूर के मामले (१९७०) में उच्चतम न्यायालय के मध्यक्षेप से अत्यधिक प्रतिकार प्राप्त किया था । समाज विरोधी तत्वों, फेरा उल्लंघनकर्ताओ, वधू जलाने वालों और प्रतिक्रियावादियों के एक सम्पूर्ण समूह ने उच्चतम न्यायालय में अपना प्रतितोष प्राप्त किया है ।‘
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इसके पश्चात् मन्त्री ने यह भी कहा चूंकि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की सम्पन्नता के लिये प्रकट सहानुभूति थी (जो असम्पन्न के विरुद्ध है), इसलिये उन्होंने अभिव्यक्ति प्रतिकार का उसी ढंग में निर्वचन किया, जिसमें उन्होंने किया था, यह स्पष्ट रुप से लाक्षणिक हेतुक है ।

और फिर भी दो न्यायाधीशों की पीठ (डूडा के मामले, ए.आई.आर. १९८८ एस.सी १२०८ में) उसे अभिमुक्त क र दिया था । हम आपके समक्ष उसे उद्धृत करेंगे, जिसे खण्डपीठ ने अधिकथित किया :

‘मूलगांवकर के मामले, ए आईआर १९७८ एस सी ७२७, में न्यायमूर्ति, कृष्णा अय्यर के निर्णय द्वारा स्थापित अवमान विघि की प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुये (वे उदर प्रवृत्ति से निर्णय दे रहे थे), मन्त्री के व्याख्यान को उसके समुचित परिप्रेक्ष्य में पढा जाना चाहिये और जब इस तरह पढा जाता है, तो वह न्याय प्रशासन के प्रति न्याय प्रशासन की कुख्याति या क्षति उत्पन्न नहीं करती थी । मंत्री न्यायालय के अवमान के दोषी नहीं है ।‘

प्रशंसनीय, उत्कृष्ट, स्वतंत्र व्याख्यान को मान्य ठहराया गया था । परन्तु, कोई भी व्यक्ति यह आश्चर्य व्यक्त करने में सहायक नहीं कर सकता कि क्या माननीय महोदय इतना उदार तब भी हुये होते, यदि आलोचना केै बिनेट मंत्री से कम महत्वपूर्ण व्यक्ति द्वारा की गयी होती ।

पुन: जब महत्वपूर्ण मान्य व्यक्ति, श्री मोहम्मद यूनुस, अध्यक्ष भारतीय व्यापार मेला प्राधिकरण ने, जो उस समय प्रधानमंत्री के अत्यधिक निकट होने के लिये ज्ञात थे, जेहोवाह साक्षी के मामले में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा यह अवधारित करने वाले परिदत्त निर्णय की आलोचना की थी कि ईसाई के विशिष्ट पन्थ के लिये राष्ट्रगान का गाना अनिवार्य नहीं था । श्री मु. युनुस ने यह कहा था कि इस न्यायाधीश (न्यायमूर्ति, चिन्नप्पा रेड्डी) को ‘या तो भारतीय या न्यायाधीश कहलाने का कोई अधिकार नहीं है ।‘

व्यक्तियों के संगम ने, जिसे कान्सेन्सियस-ग्रुप कहा जाता है, इस निर्देश की इप्सा करते हुये याचिका दाखिल की थी कि श्री यूनुस की अवमान के लिये निन्दा की जानी चाहिये । परन्तु, न्यायमूर्ति, चिन्नप्पा रेड्डी के साथ प्रतिदिन बैठने वाले उनके निकट सहयोगी ने भी स्वयं को श्री मोहम्मद यूनुस से इस तकनीकी आधार का स्पष्टीकरण मांगने में आचनक शक्तिहीन पाया था कि जब महान्यायवादी से अपनी स्वीकृति देने के लिए याचीगण द्वारा सम्पर्क किया गया, तब उन्होंने उससे इन्कार कर दिया और महासॉलिसीटर ने भी आपत्ति की थी, देखें कान्सेस्यिस-ग्रुप बनाम मोहम्मद यूनुस एवं अन्य, ए आई आर १९८७ एस सी १४५१.

वे यह जानते थे कि किसी अवमान के लिये स्वप्रेरणा से नोटिस जारी करने की शक्ति सामान्य थी (महान्यायवादी या महासॉलिसीटर) के अधिदेश पर निर्भर नहीं थी) फिर भी उन्होंने इसका आश्रय न लेने का ही चुनाव किया था, यद्यपि उच्चतम न्यायालय के पदस्थ न्यायाधीश को ऐसे व्यक्ति के रुप में वर्णित किया गया था, जो भारतीय होने के लिये उपयुक्त नहीं है, न्यायाधीश होने के लिये उपयुक्त नहीं है ।

फिर भी पश्चात्वर्ती मामले में (जो भी प्रकाशित है) जो इतने महत्वपूर्ण वादकर नहीं थे, यह कहने के लिये दोषी निर्णीत किया गया था कि न्यायाधीश राष्ट्रद्रोही था । जब प्रकीर्ण आवेदन की सुनवायी करने वाली भारतीय उच्चतम न्यायालय की पीठ ने यह अधिकथित किया था कि वह यह विचार करने की इच्छुक थी कि विशिष्ट मामले को उस पीठ के समक्ष जाना चाहिये, जिसने पहले इसमें कुछ आदेश पारित किये थे, तब सामान्य जनता का अपारिणामिक सदस्य, मोहम्मद जहीर खान (वादकर) ने न्यायालय को उंची आवाज में इस प्रकार सम्बोधित किया था :

‘या तो वह राष्ट्रद्रोही है या न्यायाधीश राष्ट्रद्रोही है ।‘

‘नोटिस जारी की गयी तथा वादकार को न्यायालय अवमान का दोषी पाया गया था और उसे एक मास तक का कारावास भुगतने का दण्ड दिया गया था, देखें, मोहम्मद जहीर खान बनाम विजय सिंह एवं अन्य, १९९२ सप्ली (२) एस सी सी ७२, ये उदाहरण अपने न्यायाधीशों का उपहास करने या पूर्व विनिश्ययों की आलोचना करने के लिये नहीं दिये गये हैं । यह केवल सजीव ढंग से यही स्पष्ट करने के लिये है कि अवमान अधिकारिता के इस पहलू की वास्तविक प्रकृति अस्थिर, अकाल्पनिक-विभिन्न मामलों में और उसी न्यायालय में विभिन्न न्यायाधीशों द्वारा भिन्न-भिन्न ढंग से प्रयोग किये जाने योग्य है (और इसीलिये वास्तव में प्रयोग किया गया है) ।
और विक्षुब्धकारी प्रवृत्ति अभी भी जारी है ।‘

अवमान विधि से सम्बन्धित मामलों की अनिश्चित स्थिति के बारे में श्री नरीमन की टीका-टिप्पणी न्यायोचित होनी प्रतीत होता है ।

उदाहरण के लिये पी.एन. डूडा बनाम पी. शिवशंकर, ए आई आर १९८८ एस सी १२०८ में, सारांशत: तत्कालीन संघ विधि मंत्री, श्री पी.शिव शंकर द्वारा दिया गया व्याख्यान तत्कालीन केरल के मुख्यमंत्री श्री नन्बूबदीपाद द्वारा दिये गये व्याख्यान के समान था । लेकिन, श्री नम्बूदरीपाद को तो न्यायालय अवमान का दोषी होना निर्णीत किया गया था (देखें ए आई आर १९७० एस सी २०१५) किन्तु श्री शिव शंकर को नहीं । क्या विधि में अनिश्चितता नहीं है ?

इस पर ध्यान दिया जा सकता है कि श्री नम्बूदरीपाद ने अपने व्याख्यान में न्यायाधीशों पर समृद्ध लोगों के पक्ष में एवं निर्धनों के विरुद्ध पक्षपाती होने का अभियोग लगाया था । सारांशत: यह वहीं अभिकथन था, जिसे श्री शिव शंकर द्वारा किया गया था (जिसके व्याख्यान का उद्धरण उपर निर्दिष्ट है) ।

श्री नरीमन एवं अन्य यह कहने में पूर्ण रुप से सही है कि विधि में निश्चितता होनी चाहिये, न कि अनिश्चितता । कुल मिलाकर, नागरिकों को यह जानना चाहिये कि वह कहां पर स्थित है ।

मेरी राय में, न्यायालय अवमान विधि में अनिश्चितता दो कारणों से थी : (१) न्यायालय अवमान अधिनियम, १९५२ में, अवमान को परिभाषा नहीं थी । (२) जब परिभाषा न्यायालय अवमान अधिनियम, १९७१ द्वारा (धारा २ के द्वारा) पुन:स्थापित की भी गयी, तो ऐसी कोई परिभाषा नहीं थी, न्यायालय को कलंकित करने को क्या गठित करता है या न्याय के अनुक्रम पर क्या प्रतिकूल प्रभाव डालता है या क्या हस्तक्षेप करता है । जिसे प्रारम्भ में कलंकात्मक माना जा सकता था, उसे आज कलंकात्मक नहीं माना जा सकता और जिसे पहले न्याय के अनुक्रम पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले या हस्तक्षेप करने के रुप में माना जा सकता था, उसे आज इस तरह से नहीं माना जा सकता ।

इस लेख में, अवमान विधि में इस अनिश्चितता का निराकरण करना ही इप्सित है और यह विषय पर गहन विश्लेषण की अपेक्षा करता है ।

अवमान शक्ति के बारे में मत को पहले इंग्लेण्ड में न्यायमूर्ति, विल्मोट द्वारा १७६५ में उस निर्णय में अधिकथित किया गया था, जिसे वास्तव में कभी भी परिदत्त हीं नहीं किया गया था ।(आर बनाम आल्मन) उस राय में, न्यायमूर्ति विल्मोट ने यह सम्परीक्षण किया था कि न्यायालयों में यह शक्ति उनके प्राधिकारों का समर्थन करने के लिये थी और यह उनके आधार एवं संस्थान के साथ समकालीन थी और न्याय के न्यायालय का आवश्यक लक्षण था । इसके पश्चात् उक्त सिद्धान्त का अनुसरण उत्तरवर्ती न्यायालयों द्वारा न केवल इंग्लैण्ड में, बल्कि अन्य देशों में भी किया गया था ।

इस प्रकार, यह अधिकथित किया गया था कि अवमान की शक्ति की अपेक्षा न्यायालय की गरिमा को बनाये रखने और उसके प्राधिकार का समर्थन करने के लिये की गयी थी ।

परन्तु, कब से न्यायालय का यह प्राधिकार एवं गरिमा आयी है? इंग्लैण्ड में यह सम्राट से आरम्भ हुयी है । न्यायिक कार्य सम्प्रभुता सम्पन्न कार्य है । सम्राट ही न्याय का स्रेात था और पहले तो वहीं स्वयं मामलों का विनिश्चय करता था । केवल बाद में जब सम्राट के पास कई अन्य कार्य (सैन्य, प्रशासनिक, इत्यादि) हो गये थे, तब उसने अपने प्रत्यायोजिती को, जिसे न्यायाधीश कहा जाने लगा था, न्यायिक कृत्य प्रत्यायोजित कर दिये ।

इस प्रकार, राजतंत्र में न्यायाधीश वास्तव में सम्राट के प्रत्यायोजित कृत्यों का ही प्रयोग करता है और इसके लिए वह उसी गरिमा तथा सम्प्रभुता की अपेक्षा करता है जैसे कि सम्राट को अपनी प्रजा से अपनी आज्ञा का पालन कराने के लिये रखनी चाहिये ।

स्थिति लोकतंत्र में पूर्णतया भिन्न हो जाती है, जिसमें लोग ही सर्वोच्च है, न कि सम्राट । यहां न्यायाधीश लोगों द्वारा न कि सम्राट द्वारा स्वयं को प्रत्यायोजित प्राधिकार प्राप्त करते हैं ।

हम इसका अल्प गहराई से विश्लेषण कर सकते हैं । राजतंत्र मंे सम्राट ही सर्वोच्च सत्तावान होता है, जबकि लोग, उसकी प्रजा होने के नाते निम्न सत्तावान् होते हैं । चूंकि न्यायाधीश वास्तव में सम्राट के प्रत्यायोजित कृत्यों का निर्वहन कर रहे होते हैं, इसलिये उन्हें उसी सम्प्रभुता तथा गौरव की आवश्यकता होती है, जैसे कि सम्राट को अपनी प्रजा से आज्ञा-पालन को सुनिश्चित कराने की आवश्यकता थी ।

दूसरी तरफ, लोकतंत्र में, लोग ही सर्वोच्च होते हैं और इसलिये वे ही सर्वोच्च सत्तावान है, जबकि सभी राज्य प्राधिकारी (न्यायधीशों को शामिल करके) लोगों के सेवक होने के नाते निम्न सत्तावान् है ।

अत:, लोकतंत्र में न्यायधीश को अपने प्राधिकार का समर्थन कराने या सम्प्रभुता अथवा शान का प्रदर्शन करने की आवश्यकता नहीं है । उनके प्राधिकार लोक विश्वास से उत्पन्न हांेगे और यह उनके स्तर से उनके आचरण, उनकी सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता, ज्ञान एवं सरलता का परिणाम होगा । न्यायाधीशों द्वारा लोकतंत्र में किसी अन्य समर्थन की अपेक्षा नहीं है और उनके लिये सम्प्रभुता तथा प्राधिकार का प्रदर्शन करने की आवश्यकता भी नहीं है ।

उक्त अभिव्यक्त मत को वास्तव में अब इंग्लैण्ड में भी स्वीकार कर लिया गया है । जैसा कि लार्ड सालमॉन द्वारा ए.जी. बनाम बी. बी.बी. (१९८१) ए सी ३०३ : (१९८०) ३ साल ई आर १६१ (१७०),में सम्परीक्षण किया गया है:

‘नि:सन्देह, शब्दों न्यायालय अवमान का ऐतिहासिक आधार है, किन्तु यह फिर भी भ्रामक नहीं है । इसका उद्देश्य न्यायालयों की गरिमा का संरक्षण करना नहीं, बल्कि न्याय प्रशासन का संरक्षण करना है ।‘

यही वह बहुमुल्य शोध-पत्र है, जिसे इस लेख में प्रतिपादित करना इप्सित है । लोकतंत्र में अवमान शक्ति न्यायालय को केवल कार्य करने में समर्थ बनाने के लिये ही है, न कि अपने प्राधिकार का समर्थन कराने एवं गरिमा को बनाये रखने के लिये ।

आल्मन के मामले में, जिसे हम पहले ही निर्दिष्ट कर चुके हैं, प्रतिवादी ने लार्ड मैन्सफील्ड, माननीय मुख्य न्यायमूर्ति पर अनौपचारिक ढंग से, मनमाने ढंग से और अविधिक ढंग से कार्य करने का अभियोग लगाने वाले पम्फलेट प्रकाशित किये थे । न्यायमूर्ति, विल्मोट ने इस प्रकार सम्परीक्षण किया था :

‘लोगों के मस्तिष्क में सभी न्यायिक अवधारणाआें से सामान्य असन्तोष उत्प्रेरित होता है और उनके मस्तिष्क को उनका अनुपालन करने के लिये अनुपयुक्त बनाता है और जब की विधि के प्रति मनुष्यों की निष्ठा मूल रुप से अस्थिर हो जाती है, तो यही अत्यधिक घातक होता है और न्याय का अत्यधिक परिसंकटमय अवरोध होता है और मेरी राय में यह किसी अन्य अवरोध की अपेक्षा, चाहे जो भी हो, अधिक तीव्र और तात्कालिक प्रतितोष की अपेक्षा करता है, न कि गैर-सरकारी व्यक्तियों के रुप में न्यायाधीशों के लिये, बल्कि इस कारण कि वे अनुक्रम है, जिसके द्वारा सम्राट या न्याय लोगों को दिया जाता है । निष्पक्ष होने के लिये और इस प्रकार सार्वभौमिक विचार होने के लिये दोनों ही आत्यन्तिक रुप से आवश्यक है ।‘
(देखें, मिलर्स कन्‍टेंम्‍ट आफ कोर्ट, तृतीय संस्‍करण, पृष्‍ट 568)

न्यायमूर्ति, विल्मोट की राय १७६५ में अभिव्यक्त की गयी थी । क्या इसे आज इंग्लैण्ड में न्यायालय अवमान की विधि होना कहा जा सकता है । यद्यपि इंग्लैण्ड में कोई लिखित संविधान नहीं है और इसीलिये अनुच्छेद १९ (१) (क) की तरह कोई मूल अधिकार भी नहीं है, न्यायालय अवमान का वह पुराना द्यिष्टकोण भी आज इंग्लैण्ड में पूर्णतया परिवर्तित हो गया है और अब अंगीकृत द्यिष्टकोण लार्ड सालमॉन का द्यिष्टकोण है, जैसा कि उपर वर्णित है ।

लार्ड एटिकन ने यह अधिकथित किया है कि न्याय बन्द कमरे का गुण नहीं है तथा उसकी संवीक्षा की जानी चाहिये और सामान्यजन की कृत टिप्पणियों का सामना करना चाहिये । वास्तव में आलोचना होने से वह केवल न्यायपालिका को उसे कमजोर करना तो दूर रहा उसे मजबूत बनाता है ।

जैसा कि आर. बनाम पुलिस आयुक्त, (१९६८) २ क्यू बी १५०, में लार्ड डेनिंग द्वारा सम्परीक्षण किया गया है :

‘मुझे तुरन्त यह कहना है कि हम अपनी स्वयं की गरिमा को कायम रखने के लिये साधन के रुप में इस अधिकारिता का कभी भी प्रयोग नहीं करेंगे । उसे अपेक्षाकृत निश्चित आधार पर आधारित होना चाहिये । न तो हम उन्हें दबाने के लिये उसका प्रयोग करेंगे, जो हमारे विरुद्ध बोलता है । हम आलोचना से भयभीत नहीं होते हैं और न ही हम उससे नाराज होते हैं । क्योंकि अपेक्षाकृत उससे भी कुछ अधिक महत्वपूर्ण चीज दांव पर लगी है । यह स्वयं वाक् की स्वतंत्रता से कम नहीं है ।

प्रत्येक व्यक्ति का संसद मंे या उसके बाहर, प्रेस में या प्रसारण पर सार्वजनिक हित के मामलों पर निष्पक्ष सामान्य स्पष्ट टीका-टिप्पणी करने का अधिकार होता है । जो टिप्पणी करते हैं, वे निष्ठा से उन सभी चीजों से संव्यवहृत हो सकते हैं, जिसे न्यायालय में किया जाता है । वे यह कह सकते हैं कि हमने त्रुटि की है और हमारे विनिश्चय त्रुटिपूर्ण है, चाहे वे अपील के अध्यधीन हों या नहीं । वह सब जो हम पूछना चाहेंगे, यही है कि जो हमारी आलोचना करते हैं, वे इसका स्मरण रखेंगे कि हम अपने पद की प्रकृति से, उनकी आलोचनाआें का उत्तर नहीं दे सकते । हम सार्वजनिक संविवाद की जांच नहीं कर सकते । उस पर भी सबसे कम तो राजनैतिक संविवाद की । हमें स्वयं अपना ही समर्थन करने के लिये अपने आचरण पर विश्वास करना चाहिये ।‘

न्यायाधीश का सर्वोत्तम कवच एवं शास्त्रगार सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता एवं ज्ञान की उसका ख्याति है । इमानदार न्यायाधीश को शायद ही अपने न्यायिक जीवन में अवमान की शक्ति का प्रयोग करने की आवश्यकता होगी । अत्यधिक विरल और अतिरेक मामलों में ही इस शक्ति का प्रयोग किये जाने की आवश्यकता होगी और वह भी केवल न्यायाधीश को कर्तव्य करने के लिये समर्थ बनाने हेतु न कि अपनी गरिमा या सम्प्रभुता को बनाये रखने के लिये ।

कभी-कभी एक इमानदार एवं विद्वान न्यायाधीश की भी अन्यायोचित ढंग से आलोचना की जाती है । परन्तु, इमानदार न्यायाधीश की आलोचना करने वाले एक ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, सैकड़ों लोग तत्काल ही उसकी प्रतिरक्षा में सामने आयेंगे (न्यायाधीश द्वारा ऐसी प्रतिरक्षा के लिये कहे बिना भी) । तब क्यों न्यायाधीशों को आलोचना से विचलित होना चाहिये या भयभीत होना चाहिये विशिष्ट रुप से तब, जब हम लोकतंत्र में रह रहे हों ? जब तक न्यायाधीश को कार्य करने की अनुज्ञा दी जाती है, तब तक उसके लिये सर्वोत्तम अनुक्रम आधारहीन आलोचना की उपेक्षा करना है (परन्तु, इमानदारीपूर्ण और सही आलोचना पर ध्यान देना है) ।

मुझे स्मरण है कि जब मैं मद्रास उच्च न्यायालय का मुख् न्यायमूर्ति था, तब न्यायालय के दो माननीय न्यायाधीश (जिनका मैं अत्यधिक सम्मान करता हूँ) एक दिन भोजनावकाश के दौरान मेरे कक्ष में आये । वे अत्यधिक विचलित एवं विक्षुब्ध लग रहे थे । स्पष्ट रुप से किसी ने न्यायालय में उनके विरुद्ध कुछ अभियोग लगाते हुए इश्तहार वितरित किये थे । मैंने इश्तहारों का अवलोकन किया और इसके पश्चात् उनसे पूछा । क्या आपका अन्तर्विवेक स्पष्ट है ? उन्होंने कहा स्पष्ट है । इसके पश्चात् मैं हँसा और उनसे इश्तहार की उपेक्षा करने के लिये कहा, अन्यथा उनका रक्तचाप बए जायेगा । जब मैंने यह कहा , तब वे भी हंसने लगे, इश्तहार फाड़ दिये अरौर उन्हें रद्दी की टोकरी में फंेक दिया । मैंने उनसे कहा कि यह केवल न्यायाधीश का व्यावसायिक परिसंकट था और लोकतंत्र में तो लोग सभी प्रकार की चीजें कहते हैं, जिन्हें न्यायाधीश को तब तक उनकी उपेक्षा करना सीखना चाहिये, जब तक उसका अन्तर्विवेक स्पष्ट हो ।

‘अमेरिकन जूरिस्प्रूडेन्स’ (१९६४ द्वितीय संस्करण, खण्ड १७, पृष्ठ ६) में यह अधिकथित किया गया है :

‘न्यायालय अवमान को न्यायालय के प्राधिकार, न्याय या गरिमा की निन्दा करने के रुप में परिभाषित किया गया है । सामान्य बोलचाल में, जिसका आचरण विधि के प्राधिकार एवं प्रशासन के प्रति असम्मान या अवमानना उत्पन्न करने के लिये प्रवृत्त हो, अवमान का दोषी है.... । न्यायालय के अवमान को किसी ऐसे आचरण के रुप में भी वर्णित किया गया है जो विधि, न्यायिक कर्तव्य निर्वहन में न्यायालय या न्यायिक अधिकारी के प्राधिकार एवं गरिमा के विरुद्ध अपराध गठित करता है ।‘

सम्यक् सम्मान सहित, यह परिभाषा लोकतंत्र में आधुनिक समय में व्यापक रुप से उचित है । यह पुरातन एवं अप्रचलित ब्रिटिश अवमान विधि का विस्तार है, जो उस समय उत्पन्न हुआ था, जब ब्रिटिश साम्राज्य सर्वोच्च था और न्यायाधीश उसके अभिकर्ता थे ।

लोकतंत्र में, यह कुछ व्यक्तियों की आलोचना नहीं है, जो न्यायाधीश को अपकीर्ति में लाता हो या उसके प्राधिकार को अस्थिर करता हो, यह उसका आचरण (या अपेक्षाकृत अवचार) है, जो ऐसा कर सकता है । यदि न्यायाधीश इमानदार और सही है (और लेग न्यायाधीश की सत्यनिष्ठा के बारे में अत्यन्त शीघ्रता से जानते है), तो अपनिर्देशित और आधारहीन आलोचना की कोई मात्रा उसे अपकीर्ति में नहीं ला सकता या उसके प्राधिकार को स्थिर नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसा प्राधिकार व्यापक रुप से जनता के विश्वास से ही आता है ।

अब हम पुन: इस लेख के केन्द्रीय बिन्दु पर वापस आते हैं । मैं यह निवेदन करता हूँ कि न्यायालय अवमान विधि एक बार तब तो निश्चित बनायी जा सकती है, यदि यह स्वीकार कर लिया जाता है कि अवमान शक्ति का प्रयोजन न्यायालय के प्रभुत्व का समर्थन करने या उसकी गरिमा को कायम रखने के लिये नहीं है (क्योंकि इसका स्वत: न्यायाधीश के उचित आचरण से समर्थन होता है तथा इसे कायम रखा जाता है न कि अवमान के प्रयोग की धमकी से ) बल्कि केवल न्यायालय को कार्य करने के लिये समर्थ बनाने हेतु । अवमान शक्ति का प्रयोग केवल विरल एवं अत्यधिक असाधारण स्थिति में ही किया जाना चाहिये, जहां उसका प्रयोग किये बिना न्यायालय के लिये कार्य करना असम्भव या अत्यधिक दुरुह बना दिया गया हो । ऐसी विरल और असाधारण स्थितियों में भी, अवमान शक्ति का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिये, यदि उसका प्रयोग करने की केवल धमकी ही पर्याप्त हो ।

नि:संदेह, न्यायालय अवमान अधिनियम, १९७१ की धारा २ (ग) में यह उल्लेख किया गया है कि ऐसा कोई कार्य, जो किसी न्यायालय के प्राधिकार को कलंकित करता है या कलंकित करने के लिये प्रवृत्त है या कम करता है या कम करने के लिये प्रवृत्त है, न्यायालय का अवमान है ।

किन्तु ‘कलंकित करने’ का क्या अर्थ है ? शब्दों का अर्थ एवं हमारा सिद्धान्त समय-अन्तराल के साथ-साथ परिवर्तित होता रहा है । उदाहरण के लिये, कई चीजें जिन्हें पहले अश्लील माना गया था, अब आज अश्लील नहीं माने जाते (उदाहरण के लिये, डी. एच.लॉरेस की पुस्तक-लेडी चैटर्लीज लवर) ।

क्या न्यायाधीश को मुख कहना उसे कलंकित करता है ? इस संबंध में हम स्पाईकेंचर के मामले में हाउस ऑफ लाड्र्स के विनिश्चल को निर्दिष्ट कर सकते हैं, देखें अटार्नी जनरल बनाम गार्जियन न्यूजपेपर, १९८७ (३) ए ई आर ३१६ (एच एल) ।

मामले के तथ्य ये थे कि पूर्व जासूस पीटर राइट ने ब्रिटिश आसूचना अभिकरण एम.१५ में अपनी अवधि के बारे में एक पुस्तक लिखी थी जिसका शीर्षक स्पाईकेंचर था । ब्रिटिश सरकार ने पुस्तक के प्रकाशन को अवरुद्ध करने के लिये इस आधार पर व्यादेश-वाद दाखिल किया, कि पुस्तक की सामग्री गोपनीय थी और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रतिकूल थी । हाउस ऑफ लार्डस में ३-२ के बहुमत द्वारा व्यादेश मंजूर किया था ।

प्रेस आहत हुआ था । उदाहरण के लिये, द डेली मिरर ने अगले दिन बहुमत के न्यायाधीशों के अस्त-व्यस्त छाया-चित्र और शीर्षक आप मूर्ख के साथ एक महाशीर्ष प्रकाशित किया था ।

श्री नरीमन, जो उस समय इंग्लैण्ड में थे, लार्ड टेम्पलमैन (बहुमत में वरिष्ठ न्यायाधीश) से यह पूछा कि कोई अवमान कार्यवाही क्यों न प्रारम्भ कर दी जाये । लार्ड टेम्पलमैन मुस्कराये और कहा कि इंग्लैण्ड में न्यायाधीश व्यक्तिगत अपमान का संज्ञान नहीं लेते । यद्यपि उन्होंने इस पर विश्वास किया था कि वे मुर्ख नहीं थे, अन्य अपनी राय के हकदार थे ।
इस प्रकार, ‘न्यायालय को कलंकित करना’ की अवधारणा परिवर्तित हो गयी । पूर्व समय में, जिस व्यक्ति ने इंग्लैण्ड में न्यायाधीश को मुर्ख कहा होता, उसे निश्चित रुप से अवमान से दण्डित किया गया होता, आज वह दण्डित नहीं किया जायेगा । और जैसा कि लार्ड सॉलमन ने निर्दिष्ट किया है, इस परिवर्तन का कारण यही है कि आज अवमान शक्ति का प्रयोग न्यायाधीश के प्राधिकार का समर्थन करने के लिये नहीं, बल्कि केवल उसे कार्य करने के लिये समर्थ बनाये जाने के लिये ही किया जाता है । उदाहरण के लिये, यदि व्यक्ति मेरे न्यायालय में बारम्बार शोर मचाता है या सीटी बजाता है और मेरे बारम्बार अनुरोध किये जाने के बावजूद वह ऐसा करना नहीं रोकता, तब स्पष्ट रुप से मुझे कार्य करने के लिये स्वयं को समर्थ बनाने हेतु कुछ कार्य करना होगा । कुल मिलाकर, लोग करों का भुगतान कर रहे हैं, जिससे ही मैं अपना वेतन और परिलब्धियों प्राप्त करता हूँ और मुझे उनके विवादों का विनिश्चय करके इस वेतन को न्यायोचित ठहराना है । इसी तरह, यदि कोई व्यकित किसी दशा में पक्षकार या साक्षी को धमकी देता है, तो मैं निश्चित रुप से कार्यवाही करुंगा । परन्तु, यदि व्यक्ति मुझे मूर्ख कहता है, चाहे न्यायालय के भीतर या उसके बाहर, तब मैं इस एक के लिये कार्यवाही नहीं करुंगा, क्योंकि यह मुझे कार्य करने से निवारित नहीं करता और मैं साधारणतया टीका टिप्पणी की उपेक्षा ही करुँगा या यह भी कहूंगा (लार्ड टेम्पलमैन की तरह) कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी राय का हकदार है । मुल मिलाकर शब्द किसी अस्थि को नहीं तोड़ते महत्व को नष्ट नहीं करते ।

बालोघ बनाम क्राउन कोर्ट एट सेण्ट अलबन्स, ९७५ क्यू बी ३७३, मंे प्रतिवादी ने न्यायालय में न्यायाधीश को यह बताया था आप विनोदहीन स्वचलन है । क्यों आप स्वयं को विनष्ट नहीं कर देते ? लार्ड डेनिंग ने यह कहा था कि ऐसे अपमान को सर्वोत्तम ढंग से घृणा के साथ माना जाता है और कोई कार्यवाही नहीं की थी ।

वास्तव में, इस बारे में मतभिन्नता हो सकती है, कि कौन सा कार्य न्यायाधीश को कार्य करने से निवारित करता है या उसे अत्यधिक कठिन बना देता है । उदाहरण के लिये, सामान्य जनता (अधिवक्ताआें, पत्रकारों, इत्यादि को शामिल करके) टिप्पणी करना या समाचार-माध्यम में लम्बित मामले के बारे में प्रकाशत न्यायाधीश को कार्य करने से निवारित करता है या अत्यधिक कठिन बना देता है ? मैं एक कारण से यह सोचने का इच्छुक हूँ कि यह एैसा नहीं करता । न्यायाधीश को किसी भी स्थिति में अविचिलित एवं अक्षुब्ध बने रहने के लिये धैर्य तथा आन्तरिक शक्ति धारण करनी चाहिये ।

इस संबंध में मैं अपने पितामह स्वर्गीय डॉ. के.एन. काटजू की मृत्यु पर तत्कालीन उ.प्र. के महाधिवक्ता श्री के.एल. मिश्रा द्वारा १९.२.१९६८ को दिये गये व्याख्यान को सन्दर्भित कर सकता हूँ, जिसमें उन्होने कहा था :

‘कम से कम उन दिनों अधिवक्ताआें का कोई भी नेतृत्व विधि को गम्भीर विद्वत्ता और ज्ञान की पृष्ठभूमि के बिना सम्भव ही नहीं था । मैं अत्यधिक हूबहू रुप से १९४३ के बाद में लगभग तीन या चार वर्षो के बन्दीकरण के बाद न्यायालय में उनके आने का स्मरण करता हॅँ, जब वे एडवोकेट्स एसोसिएशन के एक कोने में बैठे हुये थे और इसके पश्चात् कुछ दिनों के भीतर ही न्यायालय से उनकी अनुपस्थिति के समय के दौरान ही ब्रिटिश न्यायालयों द्वारा विनिश्चत किये गये सम्पूर्ण मामलों का अध्ययन किया । मैं उनके निकट गया । उन्होंने मुझे बुलाया और मेरे समक्ष सम्राट खण्डपीठ के निर्णय को रखा, जिसे मैंने तल्लीनता से पढा, निर्णय में मुल्य और कीमत के बीच अन्तर पर अत्यधिक विद्वत्तापूर्ण विवेचन था । डॉ. काटजू ने मुझसे पूछा कौन सी ऐसी महत्वपूर्ण चीज है, जिसे आपने इस निर्णय के बारे में समझा है । मैंने उसे पुन: उनके समक्ष पढा और उन्हें यह बताने का प्रयास किया कि निर्णय का सार क्या था । उन्होंने कहा, नहीं, नहीं निर्णय की तारीख को देखा । इसके पश्चात उन्होंने मुझे उस ओर संकेत किया जहां तारीख थी, जिस तारीख को निर्णय परिदत्त किया गया था, उस विद्वत्तापूर्ण और घनिष्ठतम विचलन के साथ ऐसा उन दिनों के दौरान हुआ था, जब जर्मनी वायुसेना, उसके बमवर्षक स्क्वैड्न व्यापक रुप से इंग्लैण्ड में विनाश और विध्वंश कर रहे थे । उन्होंने मुझसे कहा कि यही विचलन सत्य-न्यायाधीश की मानसिकता को निर्मित करता है ।‘

अब यदि उसके नजदीक गिरने वाले बमों ने सत्य-न्यायाधीश को विक्षुब्ध नहीं किया होता, तो क्यांे उसे केवल ऐसी टिप्पणी या प्रचार-प्रसार करना चाहिये ? न्यायाधीश के कन्धे विचलित या प्रभावित हुये बिना ऐसे टिप्पणी या प्रचार-प्रसार अमान्य करने के बोझ को सहन करने हेतु पर्याप्त सामर्थ्यवान् होने चाहिये ।

इसलिये, मेरी राय में, अभिव्यक्ति न्यायाधीश को कार्य करने से निवारित करने या उसे अत्यधिक कठिन बनाने को साामन्यतया न्यायाधीश के प्रसंग के साथ ही समझा जाना चाहिये, जिसके पास सत्य-न्यायाधीश की भावना से विलग्न, शान्त, धैर्य के साथ और विचलित हुये बिना आधारहीन आलोचना या उसे प्रभावित रखने के प्रयत्न को अमान्य करने के लिये व्यापक पर्याप्त शक्ति हो ।

मेरी राय में एक नया एक आधुनिक लोकतांत्रिक द्यिष्टकोण की, जैसा कि इंग्लैण्ड, संयुक्त-राज्य अमेरिका और राष्ट्र मण्डल देशों में है, जब भारत में भी पुराने कालदोसीय द्यिष्टकोण को दूर भगाने के लिये अपेक्षित है । ‘अवमान अधिकारिता का अब शायद ही इन पश्चिमी देशों में प्रयोग किया जाता हो । इस प्रकार प्रतिरक्षा सचिव बनाम समाचार-पत्र संरक्षक, (१९८५) १ ए सी ३३९ (३४७) में, लार्ड डिप्लॉक ने यह सम्परीक्षण किया कि अवमान की प्रजातियां, जिसमें न्यायाधीशों को कलंकित करना भी शामिल है, वास्तव में इंग्लेैण्ड में अप्रचलित है और उसकी उपेक्षा की जा सकती है ।‘

इसके अतिरिक्त, यह सदैव स्मरण रखा जाना चाहिये कि अवमान-अधिकारिता वैवेकिक-अधिकारिता है । न्यायाधीश अवमान की कार्यवाही करने के लिये बाध्य नहीं है, यदि अवमान वास्तव में कारित भी किया गया हो ।

इसका रुचिकर उदाहरण लार्ड डेनिंग द्वारा उनकी पुस्तक द ड्यू प्रासेज ऑफ लॉ में पृष्ठ६ पर दिया गया है, जहां उन्होंने लिखा है :

‘प्रत्येक सोमवार को सुबह मैं वादकारों को व्यक्तिगत रुप से सुनता हॅँू । मिस स्टोन बहुधा वहां होती थी । उसने हमारे समक्ष आवेदन किया था । हमने उसे नामंजूर किया था । उसकी अपनी पहुंच के भीतर पुस्तक-अलमारी हो, इस तरह से वह अगली पंक्ति में बैठी हुयी थी । वह बटरवर्थ की वर्कमेन्स कम्पेनसेशन केसेज की पुस्तकों में से एक पुस्तक उठायी और उसे हम पर फेंक दी थी । वह न्यायमूर्ति लार्ड डिप्लॉक और मेरे बीच से निकल गयी । उसने एक अन्य पुस्तक उठायी । वह भी अत्यधिक दूरी पर गिरी । उसने कहा मैं गोला-बारुद को समाप्त कर रही हूँ हमने उस पर थोड़ा सा ध्यान दिया । उसने यह आशा की थी कि हम न्यायालय अवमान के लिये-उसकी ओर अपेक्षाकृत अधिक ध्यान आकर्षित करने हेतु उसे सुपुर्द कर देंगे । जैसा कि उस पर हमने कोई ध्यान ही नहीं दिया, अत: वह दरवाजे की ओर गयी । वह वहां से यह कहते हुये प्रस्थान कर गयी मैं माननीय न्यायाधीशों को क्रोध के अधीन भी उनकी शान्ति पर बधायी देती हूँ ।‘

अन्त करने के पूर्व, मैं डेविड पैनिक की पुस्तक ‘न्यायाधीश’ का यहां सन्दर्भ दे सकता हूँ, जिसमें उन्होंने अधिकथित किया है :

‘कुछ राजनीतिज्ञ एवं कुछ न्यायविद् यह तर्क देते हैं कि न्यायपालिका के बारे में सत्य को बताना अबुद्धिमत्तापूर्ण अथवा कभी-कभी तो परिसंकटमय भी है । संयुक्त राज्य अपीलीय न्यायालय के न्यायमूर्ति, जेरोम फ्रेन्क ने बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से इसकी व्याख्या की थी कि उनको उस सुझाव से थोड़ा सा धैर्य बंधा था या उन्हें उसके प्रति सम्मान था । मैं.... समझने में असमर्थ हूँ कि लोकतंत्र में सरकार की किसी शाखा के कार्यो के बारे में वास्तविकता से सामान्य जनता को परिचित कराना कभी भी बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं हो सकता । सामान्य जनता को शिशु के रुप में मानना सम्पूर्ण रुप से अलोकतान्त्रिक ही है, जो जननिर्मित संस्थाआें की....अपरिहार्य कमियों को स्वीकार करने में असमर्थ है.... । हमारी न्यायिक प्रणाली की उन कमियों का, जिनका उन्मूलन किये जाने योग्य है, उन्मूलन करने का सर्वोत्तम ढंग अपने सभी नागरिकों को यही अवगत कराना है कि कैसे वह प्रणाली अब कार्य करती है । इसलिये, अज्ञानता के माध्यम से हमारे न्यायालयों के लिये सार्वजनिक सम्मान स्थापित करने और उसे बनाये रखने का प्रयास करना त्रुटि है ।‘

इस संबंध में न्यायालय अवमान अधिनियम में हुये नवीनतम संशोधन (न्यायालय अवमान संशोधन अधिनियम, २००६) का सन्दर्भ दिया जा सकता है, जिसने नई धारा १३ (ख) को पुन:स्थापित किया है, जो अधिकथित करती है:

‘न्यायालय, न्यायालय अवमान की किसी कार्यवाही में सत्य से न्यायोचित की वैध प्रतिरक्षा के रुप में अनुमति दे सकता है, यदि उसे यह समाधान हो जाता है कि यह सार्वजनिक हित में है और उक्त प्रतिरक्षा का आश्रय लेने का अनुरोध वास्तविक है ।‘

इस प्रकार, सत्य अब न्यायालय अवमान कार्यवाहियों में प्रतिरक्षा है, यदि वह लोकहित में है और वास्तविक है । यह संशोघन उचित दिशा में है और लम्बे समय से ऐसा किये जाने योग्य था ।

May 31, 2007

भूमि अर्जन अधिनियम, 1894

१. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-
२. निरसन
३. परिभाषायें-
४. प्रारंभिक अधिसूचना का प्रकाशन और ऐसा होने पर अधिकारियों की शक्तियाँ-
५. नुकसान के लिये संदाय-
५-क. आक्षेपों की सुनवाई-
६. इस बात की घोषणा की भूमि लोक प्रयोजन के लिये अपेक्षित है-
७. कलेक्टर घोषणा के पश्चात् अर्जन कार्यवाही करेगा-
८. उस भूमि का चिन्ह मापन और रेखांकन किया जायेगा-
९. हितबद्ध व्यक्तियों को सूचना-
१०. नामों और हितों के संबंध मं कथन अपेक्षित और प्रचलित करने की शक्ति-
११. कलेक्टर द्वारा जांच तथा अधिनिर्णय-
११-क. वह अवधि जिसके भीतर अधिनिर्णय किया जायेगा-
१२. कलेक्टर का अधिनिर्णय कब अंतिम होगा-
१३. जांच का स्थगन-
१३-क. लिपिकीय भूलों का सुधार-
१४. साक्षियों का समन करने और उसकी हाजिरी और दस्तावेजों की पेशी प्रदर्शित करने की शक्ति
१५. वे बातें जिन पर ध्यान दिया जावेगा, और जिनकी अपेक्षा की जायेगी-
१५-क. अभिलेखों आदि को बुलाने की शक्ति-
१६. कब्जा करने की शक्ति-
१७. अत्यांयिकता की दशाओ में विशेष शक्तियां-
१८. न्यायालय को निर्देश-
१९. न्यायालय के लिये कलेक्टर का कथन-
२०. सूचना की तामिल-
२१. कार्यवाहियों के प्रविषय पर निर्बन्धन-
२२. कार्यवाहियां खुले न्यायालय में होगी-
२३. प्रतिकार अवधारित करने में ली जाने वाली बातें-
२४. वे बातें जिनकी प्रतिकार अवधारित करने में उपेक्षा की जायेगी-
२५. न्यायालय के द्वारा अधिनिर्णीत प्रतिकार की रकम का कलेक्टर के द्वारा अधिनिर्णित रकम से कम न होना-
२६. अधिनिर्णयों का प्रारुप-
२७. खर्चें-
२८. अतिरिक्त प्रतिकार पर ब्याज देने का निर्देश कलेक्टर को दिया जा सकेगा-
२८-क. न्यायालय के अधिनिर्णय के आधार पर प्रतिकार की राशि का पुन: अवधारण-
२९. प्रभाजन की विशिष्टियां विनिर्दिष्ट की जायेंगी-
३०. प्रभाजन संबंधी विवाद-
३१. प्रतिकार का संदाय या उसका न्यायालय के निक्षेप-
३२. अन्य संक्रमण करने के लिये सक्षम व्यक्तियों की भूमियों लेखे निक्षिप्त धन का विनिधान-
३३. अन्य मामलों में धन का विनिधान-
३४. ब्याज का संदाय-
३५. बजट या कृषि भूमि का अस्थाई अधिभोग जबकि प्रतिकार के संबंध में मतभेद है, तब प्रक्रिया-
३६. प्रवेश करने और लेने की शक्ति और प्रत्यावर्तन पर प्रतिकार-
३७. भूमि की दशा के संबंध में मतभेद-
३८. विलोपित-
३८.-क. औद्योगिक समूत्थान की बाबत् कुछ प्रयोजनों के लिये यह समक्षा जाना कि वह कंपनी है-
३९. समुचित सरकार की पूर्व सम्मति की और करार के निष्पादन की शक्तियां-
४०. पूर्ववर्ती जांच-
४१. समुचित सरकार के साथ जांच-
४२. करार का प्रकाशन-
४३. धारा ३९ से लेकर धारा ४२ तक की धारायें वहां लागू नहीं होगी जहां कि सरकार कंपनियों को भूमि देेने के लिये करार से आबद्ध है-
४४. रेल कंपनी के साथ करार कैसे साबित किया जा सकेगा-
४४.-क अन्तरण आदि पर निर्बन्धन-
४४.-ख. सरकारी कंपनियों से भिन्न प्राइवेट कम्पनियों के लिये इस भाग के अधीन भूमि का अर्जन प्रयोजन विशेष के लिये किये जाने के सिवाय न किया जाना-
४५. सूचनाओ की तामिल-
४६. भूमि के अर्जन में बाधा डालने के लिये शास्ति-
४७. मजिस्ट्रेट अभ्यर्पण प्रवर्तित करायेगा-
४८. अर्जन पूरा करना अनिवार्य नहीं है, किन्तु यदि अर्जन पूरा न भी किया जाये तो भी प्रतिकार अनिनिर्णीत किया जायेगा-
४९. गृह या निर्माण के एक भाग का अर्जन-
५०. किसी स्थानीय प्राधिकारी या कम्पनी के खर्च पर भूमि का अर्जन-
५१. स्टाम्प शुल्क का फीस से छुट-
५१.-क . प्रमाणित प्रतिलिपि की साक्ष्य के रुप में स्वीकृति-
५२. अधिनियम के अनुसरण में की गई किसी बात के लिये वादों की दशा में सूचना-
५३. न्यायालय के साथ वाली कार्यवाही पर कोड ऑफ सिविल प्रोसिजर का लागू करना-
५४. न्यायालय में हुई कार्यवाहियों में अपीलें-
५५. नियम बनाने की शक्ति

May 19, 2007

भूमि अधिग्रहण अधिनियम : “लोक प्रयोजन” का व्यूह

१७ मई को देश के समाचार पत्रो मे भूमि अभिग्रहण के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के नजरिये पर रिपोर्ट देखने को मिला जिस पर १८ मई को मित्रो ने इस पर अपनी अपनी प्रतिक्रिया प्रस्तुत की है ।

दिल्ली से अधिवक्ता मित्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार रिट पिटीशन नं २२४/२००७, कर्नाटक भूमिहीन किसान संगठन व अन्य विरुद्ध भारत सरकार व अन्य दिनाक ११ मई को न्यायाधिपति आर वी रविंद्रन व एच एस बेदी के बेंच में नियत ईस प्रकरण की प्रारंभिक सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधिपति के जी बालकृशनन ने प्रकरण मे निहित विधि के प्रश्न “लोक प्रयोजन” पर कहा कि केंद्र व राज्य शासन को लोक प्रयोजन के मसले पर प्रस्तुत पिटीशनो पर भूमि अधिग्रहण अधिनियम के अन्य उपबंधों के तहत प्रस्तुत पिटीशनो से ज्यादा गम्भीरता पुर्वक अपने दायित्वों को समझना चाहिये इस संबंध मे न्यायालया ने सभी राज्यो के मुख्य सचिव व कृषि मंत्रालय को नोटिस भेजा है ।

इस प्रकरण में भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा ३च, ४ व ६ एवं संविधान की धारा १४ समानता का अधिकार, २१ जीवन की व्यक्तिगत स्वतंत्रता सहित अन्य विधिक मुद्दे पर प्रश्न उठाये गये है जो पिछले माह समाचार मे छाये रहने वाले सेज, नंदीग्राम के विवाद के आधार है ईस पिटिशन में अतिरिक्त रूप से भारी मात्रा में भूमि अधिग्रहण व अधिनियम की धारा ३च लोक प्रयोजन के अर्थांवयन पर जोर दिया गया है । देखे अधिग्रहण समाचारो के अंश -

''ग्रामीण विकास मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थाई समिति ने देश की बदली हुई आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने की पुरजोर माँग की है और इस परिवर्तन की खातिर इच्छाशक्ति की कमी के लिए सरकार की खिंचाई की है।
भाजपा के वरिष्ठ नेता कल्याण सिंह की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने अपनी २४वीं रिपोर्ट में कहा कि १८९४ में बना भूमि अधिग्रहण कानून अब पुराना और अप्रासंगिक हो गया है और ऐसे में बढ़ती हुई परिस्थतियों को देखते हुए इसमें पर्याप्त संशोधन की जरुरत है। रिपोर्ट में कहा गया है कि समिति पहले भी इस कानून में संशोधन के लिए दबाव डालती रही है और संशोधन का प्रस्ताव मंत्रालय में काफी समय से लंबित पड़ा है। गौरतलब है कि देश में एसईजेड तथा तीव्र औद्योगिकरण के लिए भूमि अधिग्रहण को लेकर किसानों और सरकार के बीच विवाद बढते जा रहे हैं तथा राजनीतिक दल और नेता भी इस कानून में बदलाव की माँग करने लगे हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ग्रामीण विकास मंत्रालय के सचिव की यह दलील है कि भूमि राज्य का विषय है और इसलिए इस संबंध में केंद्रीय कानून नहीं बनना चाहिए। भूमि अधिग्रहण संशोधित कानून २००४ के मसौदे को राज्य सरकारों के पास भेजा गया है पर अभी तक सभी राज्यों ने इस पर अपनी राय नहीं भेजी है। इसलिए यह मसौदा अभी तक खटाई में पड़ा है।''

अब हम देखें भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत धारा ३ च का सहारा शासन कैसे लेती है और जनता इसमें कैसे पिसती है । धारा ३ च, भूमि के अधिग्रहण के कारण को बतलाने वाली धारा है जिसमें अधिग्रहण का कारण है ``लोक प्रयोजन`` अब लोक प्रयोजन का अर्यान्वयन क्या होना चाहिए यही से खेल प्रारंभ होता है यह विधि का प्रश्न है हजारों प्रकरण इसी तालमेल में कलेक्टर से जिला न्यायालय, जिला न्यायालय से उच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय तक बरसों से चर्चा के विषय में रहे हैं । अलग-अलग प्रकरणों में न्यायालय ने ``लोक प्रयोजन`` को परिभाषित किया है पर पिटीशनर को सफलता जब तक मिलती है तब तक मामला ठंडा हो जाता है और राज्य शासन के पास इस अधिनियम का डंडा बजाने की शक्ति पुन: जीवित हो जाती है, लोग अपने ही प्रयोजन के लिए रचित सरकारी तानेबाने में पिसते रहते है ।


मै इस समाचार को छत्तीसगढ के नजरिये से देखते हुये अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता हूं यहा शासन ने लोक प्रयोजन शब्द को अपने हित मे अर्थान्वयन करवाने के लिये जो व्यूह रची यह देखे :-

छत्तीसगढ में अभी टाटा के संयंत्र के लिये भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया जारी है जहा अधिग्रहण पूरी तरह से विवादित है नक्सलियो की जन अदालत की तर्ज पर ग्राम सभा मे प्राप्त किसानों की स्वीकृति व १३ लकीरों मे छिन चुकी आदिवासियो की भूमि पर आप रोज पढ रहे होंगे हम इस संबध मे कुछ भी नही कहेंगे ।

नये राज्य की राजधानी के लिये भारी मात्रा मे किये जा रहे भूमि अधिग्रहण के मसले पर हम कुछ नजर दौडायें, नया रायपुर विकास प्राधिकरण द्वारा नये रायपुर का मास्टर प्लान प्रकाशित किया जा चुका है एवं उस पर दावा आपत्ति भी स्वीकार करने का समय समाप्त हो चुका है । नया रायपुर विकास प्राधिकरण एवं छ.ग. शासन के द्वारा नये रायपुर के लिये भी अधिग्रहित की जाने वाली भारी मात्रा में भूमि को टाटा संयंत्र की भांति विवाद से परे रखने के लिए रणनीति के तहत आज दिनांक तक भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना जारी नहीं की गई है बल्कि भूमि अधिग्रहण के पिछले द्वार से प्रवेश की कार्यवाही आपसी सहमति के जरिये की जा रही है यह शासन की भूमि अधिग्रहण के पचडे से बचने की एक सोची समझी चाल है । हुडा (हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण) के नीतियों पर अमल करते हुए छ.ग. शासन, वहां आई व्यावहारिक दिक्कतों को प्रशासनिक तौर पर दूर करने के उददेश्य से आपसी समझौते पर ही ज्यादा जोर दे रही है क्योंकि भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत भूमि अधिग्रहण् में विभिन्न राज्य सरकारें सर्वोच्च न्यायालय के कटघरे में है एवं जनता भी अधिग्रहण के रास्ते में नित नये रोडे अटका रही है । ऐसे में विकास की धारा को विवादों से गंदला करने के बजाय दूसरे वैकल्पि रास्तों को प्रभावी बनाना सरकार की विवशता है ।

नया रायपुर विकास प्राधिकरण द्वारा नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम के तहत प्रकाशित डाफट, भूमि अधिग्रहण के पूर्व किसानों के अटकलों पर एवं छुटपुट उठते विरोधों को दबाने का एक अस्त्र के रूप में प्रयोग है । छोटे किसान जिनके रोजी-रोटी का साधन उसकी भूमि है, पर शासन पिछले चार वर्षो तक विक्रय पंजीकरण नहीं करने का
आदेश तो दे ही चुकी थी । समाचारों में रोज छपता रहा कि किसी की बेटी का ब्याह तो किसी का और अन्य अहम आवश्यकता की पूर्ति उनके स्वयं की भूमि को विक्रय नहीं कर पाने के कारण हो नहीं पाई थी, सरकार के इस मार से किसान पहले से ही आधा हो गया था आपसी सहमती का चोट ऐसे ही समय में गरम लोहे पर हथौडा मारने वाला काम था, अब वे सभी किसान इस डर से राजीनामा कर पैसा ले लिए कि पता नहीं कल क्या तुगलकी फैसला हो और उन्हें फिर पांच साल तक बिना पैसे का गुजारा करना पडे ।

ऐसा करके शासन अधिकांशत: जमीन अधिग्रहित कर लेगी बाकी बचे जमीन राज्य शासन द्वारा अधिनियम के तहत अधीसूचना जारी कर डंडे के जोर पर छीन ली जायेगी । क्योंकि तब बहुसंख्यकों का विरोध सरकार को नहीं झेलना पडेगा और बिना विवाद काम निपट जायेगा । इस चाल का एक और पेंच है चीफ कमिशनर देहली एडमिनिस्ट्रेशन बनाम धन्ना सिंह 1987 के केस में न्यायालय नें मास्टर प्लान के लिए अधिग्रहण को लोक प्रयोजन की कोटि का माना है तो मास्टर प्लान यदि स्वीकृत हो गया तो सरकार की दिक्कते अपने आप सुलझ जायेगी । यहा नये रायपुर परिक्षेत्र मे आने वाले गाव के लोग समझ रहे है कि अभी तो धारा 4 की अधिसूचना तो जारी ही नही हुयी है जब जारी होगी तो लोक प्रयोजन की आपत्ति लगायेगे मगर तब तक देर हो चुकी होगी लोक प्रयोजन सिद्ध हो चुका होगा, यही है अधिनियम को अपने पक्ष मे करने का गुपचुप तरीका । हमने इस स्थिति को भांप कर 5 मइ 2007 तक गांवो के किसानो को जोडा और मास्टर प्लान ड्राफ्ट पर आपत्ति लगाया है हमारे साथ 400 से 500 लोगो ने आपत्ति लगाया है पर वे सभी सरकार की मंशा को समझ रहे है हमें नही लगता ।

सन १८९४ में बने अधिनियम की प्रयोज्यता के संबंध में जो प्रयोग हो रहे हैं वह प्रशंसनीय है नये परिस्थितियों के अनुसार इस अधिनियम में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है । कृषि प्रधान देश में कृषि भूमि का भारी मात्रा में अर्जन कहां का लोक प्रयोजन है यह परिस्थितियां एवं इस अधिनियम के पुर्ननिर्माण के लिए गठित कमेटी ही बतलायेगी ।

May 10, 2007

भारतीय दण्ड संहिता, १८६०

अधयाय १
प्रस्तावना

उद्देशिका
धारा १ संहिता का नाम और उसके प्रर्वतन का विस्तार
धारा २ भारत के भीतर किए गये अपराधों का दण्ड
धारा ३ भारत से परे किए गये किन्तु उसके भीतर विधि के अनुसार
विचारणीय अपराधों का दण्ड
धारा ४ राज्य-क्षेत्रातीत अपराधों पर संहिता का विस्तार
धारा ५ कुछ विधियों पर इस आििनधयम द्वारा प्रभाव न डाला जाना

अध्याय २
साधारण स्पष्टीकरण




धारा ६ संहिता में की परिभाषाओं का अपवादों के अध्यधीन समझा जाना
धारा ७ एक बार स्पष्टीकृत पद का भाव
धारा ८ लिंग
धारा ९ वचन
धारा १० पुरूष, स्त्री
धारा ११ व्यक्ति
धारा १२ लोक
धारा १३ निरसित
धारा १४ सरकार का सेवक
धारा १५ निरसित
धारा १६ निरसित
धारा १७ सरकार
धारा १८ भारत
धारा १९ न्यायाधीश
धारा २० न्यायालय
धारा २१ लोक सेवक
धारा २२ जंगम सम्पत्ति
धारा २३ सदोष अभिलाभ
सदोष अभिलाभ
सदोष हानि
सदोष अभिलाभ प्राप्त करना/सदोष हानि उठाना
धारा २४ बेईमानी से
धारा २५ कपटपूर्वक
धारा २६ विश्वास करने का कारण
धारा २७ पत्नी, लिपिक या सेवक के कब्जे में सम्पत्ति
धारा २८ कूटकरण
धारा २९ दस्तावेज
धारा २९ क इलेक्ट्रानिक अभिलेख
धारा ३० मूल्यवान प्रतिभूति
धारा ३१ विल
धारा ३२ कार्यों का निर्देश करने वाले शब्दों के अन्तर्गत अवैध लोप आता है
धारा ३३ कार्य, लोप
धारा ३४ सामान्य आशय को अग्रसर करने में कई व्यक्तियों द्वारा किये गये कार्य




धारा ३५ जब कि ऐसा कार्य इस कारण अपराधित है कि वह अपराध्कि ज्ञान या
आशय से किया गया है
धारा ३६ अंशत: कार्य द्वारा और अंशत: लोप द्वारा कारित परिणाम
धारा ३७ किसी अपराध को गठित करने वाले कई कार्यों में से किसी एक
को करके सहयोग करना
धारा ३८ अपराधिक कार्य में संपृक्त व्यक्ति विभिन्न अपराधों के दोषी हो सकेंगे
धारा ३९ स्वेच्छया
धारा ४० अपराध
धारा ४१ विशेष विधि
धारा ४२ स्थानीय विधि
धारा ४३ अवैध, करने के लिये वैध रूप से आबद्ध
धारा ४४ क्षति
धारा ४५ जीवन
धारा ४६ मृत्यु
धारा ४७ जीव जन्तु
धारा ४८ जलयान
धारा ४९ वर्ष, मास
धारा ५० धारा
धारा ५१ शपथ
धारा ५२ सद्भावनापूर्वक
धारा ५२ क संश्रय




अध्याय ३
दण्डों के विषय में

धारा ५३ दण्ड
धारा ५३ क निर्वसन के प्रति निर्देश का अर्थ लगाना
धारा ५४ लघु दण्डादेश का लघुकरण
धारा ५५ आजीवन कारावास के दण्डादेश का लघुकरण
धारा ५५ क समुचित सरकार की परिभाषा
धारा ५६ निरसित
धारा ५७ दण्डावधियों की भिन्ने
धारा ५८ निरसित
धारा ५९ निरसित
धारा ६० दण्डादिष्ट कारावास के कतिपय मामलों में संपूर्ण कारावास या
उसका कोई भाग कठिन या सादा हो सकेगा
धारा ६१ निरसित
धारा ६२ निरसित
धारा ६३ जुर्माने की रकम
धारा ६४ जुर्माना न देने पर कारावास का दण्डादेश
धारा ६५ जबकि कारावास और जुर्माना दोनों आदिष्ट किये जा सकते हैं, तब जुर्माना
न देने पर कारावास, जबकि अपराध केवल जुर्माने से दण्डनीय हो
धारा ६६ जुर्माना न देने पर किस भंति का कारावास दिया जाय
धारा ६७ जुर्माना न देने पर कारावास, जबकि अपराध केवल जुर्माने से दण्डनीय हो
धारा ६८ जुर्माना देने पर कारावास का पर्यवसान हो जाना
धारा ६९ जुर्माने के आनुपातिक भाग के दे दिये जाने की दशा में कारावास का पर्यवसान
धारा ७० जुर्माने का छ: वर्ष के भीतर या कारावास के दौरान में उदग्रहणीय होना
धारा ७१ कई अपराधों से मिलकर बने अपराध के लिये दण्ड की अवधि
धारा ७२ कई अपराधों में से एक के दोषी व्यक्ति के लिये दण्ड जबकि निर्णय में यह
कथित है कि यह संदेह है कि वह किस अपराध का दोषी है
धारा ७३ एकांत परिरोध
धारा ७४ एकांत परिरोध की अवधि
धारा ७५ पूर्व दोषसिदि्ध के पश्च्यात अध्याय १२ या अध्याय १७ के अधीन कतिपय अपराधें
के लिये वर्धित दण्ड




अध्याय ४
साधारण अपवाद

धारा ७६ विधि द्वारा आबद्ध या तथ्य की भूल के कारण अपने आप को विधि द्वारा
आबद्ध होने का विश्वास करने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य
धारा ७७ न्यायिकत: कार्य करने हेतु न्यायाधीश का कार्य
धारा ७८ न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में किया गया कार्य
धारा ७९ विधि द्वारा न्यायानुमत या तथ्य की भूल से अपने को विधि द्वारा न्यायानुमत होने
का विश्वास करने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य
धारा ८० विधिपूर्ण कार्य करने में दुर्घटना
धारा ८१ कार्य जिससे अपहानि कारित होना संभाव्य है, किन्तु जो आपराधिक आशय के बिना
और अन्य अपहानि के निवारण के लिये किया गया है
धारा ८२ सात वर्ष से कम आयु के शिशु का कार्य
धारा ८३ सात वर्ष से उपर किन्तु बारह वर्ष से कम आयु अपरिपक्व समझ के शिशु का कार्य
धारा ८४ विकृतिचित्त व्यक्ति का कार्य
धारा ८५ ऐसे व्यक्ति का कार्य जो अपनी इच्छा के विरूद्ध मत्तता में होने के कारण निर्णय
पर पहुंचने में असमर्थ है
धारा ८६ किसी व्यक्ति द्वारा, जो मत्तता में है, किया गया अपराध जिसमें विशेष आशय या
ज्ञान का होना अपेक्षित है
धारा ८७ सम्मति से किया गया कार्य जिसमें मृत्यु या घोर उपहति कारित करने का आशय
हो और न उसकी सम्भव्यता का ज्ञान हो
धारा ८८ किसी व्यक्ति के फायदे के लिये सम्मति से सदभवनापूर्वक किया गया कार्य जिससे
मृत्यु कारित करने का आशय नहीं है
धारा ८९ संरक्षक द्वारा या उसकी सम्मति से शिशु या उन्मत्त व्यक्ति के फायदे के लिये
सदभवनापूर्वक किया गया कार्य
धारा ९० सम्मति उन्मत्त व्यक्ति की सम्मति
शिशु की सम्मति
धारा ९१ एसे कार्यों का अपवर्णन जो कारित अपहानि के बिना भी स्वत: अपराध है
धारा ९२ सम्मति के बिना किसी ब्यक्ति के फायदे के लिये सदभावना पूर्वक किया गया कार्य
धारा ९३ सदभावनापूर्वक दी गयी संसूचना
धारा ९४ वह कार्य जिसको करने के लिये कोई ब्यक्ति धमकियों द्धारा विवश किया गया है
धारा ९५ तुच्छ अपहानि कारित करने वाला कार्य




निजी प्रतिरक्षा के अधिकार के विषय में

धारा ९६ निजी प्रतिरक्षा में दी गयी बातें
धारा ९७ शरीर तथा सम्पत्ति पर निजी प्रतिरक्षा का अधिकार
धारा ९८ ऐसे ब्यक्ति का कार्य के विरूद्ध निजी प्रतिरक्षा का अधिकार जो विकृतख्त्ति आदि हो
धारा ९९ कार्य, जिनके विरूद्ध निजी प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है
इस अधिकार के प्रयोग का विस्तार
धारा १०० शरीर की निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार मृत्यु कारित करने पर कब
होता है
धारा १०१ कब ऐसे अधिकार का विस्तार मृत्यु से भिन्न कोई अपहानि कारित करने तक का होता है
धारा १०२ शरीर की निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारंभ और बने रहना
धारा १०३ कब सम्पत्ति की निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार मृत्यु कारित करने तक
का होता है
धारा १०४ ऐसे अधिकार का विस्तार मृत्यु से भिन्न कोई अपहानि कारित करने तक का
कब होता है
धारा १०५ सम्पत्ति की निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारंभ और बने रहना
धारा १०६ घातक हमले के विरूद्ध निजी प्रतिरक्षा के अधिकार जबकि निर्दोश व्यक्ति को अपहानि होने की जोखिम है




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अध्याय ५
दुष्प्रेरण के विषय में

धारा १०७ किसी बात का दुष्प्रेरण
धारा १०८ दुष्प्रेरक
धारा १०८ क भारत से बाहर के अपराधों का भारत में दुष्प्रेरण
धारा १०९ दुष्प्रेरण का दण्ड, यदि दुष्प्रेरित कार्य उसके परिणामस्वरूप किया जाए, और जहां तक कि उसके दण्ड के लिये कोई अभिव्यक्त उपबंध नही है
धारा ११० दुष्प्रेरण का दण्ड, यदि दुष्प्रेरित व्यक्ति दुष्प्रेरक के आशय से भिन्न आशय से
कार्य करता है
धारा १११ दुष्प्रेरक का दायित्व जब एक कार्य का दुष्प्रेरण किया गया है और उससे भिन्न कार्य किया गया है
धारा ११२ दुष्प्रेरक कब दुष्प्रेरित कार्य के लिये और किये गये कार्य के लिए आकलित दण्ड से दण्डनीय है
धारा ११३ दुष्प्रेरित कार्य से कारित उस प्रभाव के लिए दुष्प्रेरक का दायित्व जो दुष्प्रेरक दवारा आशयित से भिन्न हो
धारा ११४ अपराध किए जाते समय दुष्प्रेरक की उपस्थिति
धारा ११५ मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण यदि अपराध नही किया जाता
यदि अपहानि करने वाला कार्य परिणामस्वरूप किया जाता है
धारा ११६ कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण अदि अपराध न किया जाए
यदि दुष्प्रेरक या दुष्प्रेरित व्यक्ति ऐसा लोक सेवक है, जिसका कर्तव्य अपराध निवारित करना हो
धारा ११७ लोक साधारण दवारा या दस से अधिक व्यक्तियों दवारा अपराध किये जाने
का दुष्प्रेरण
धारा ११८ मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध करने की परिकल्पना को छिपाना
यदि अपराध कर दिया जाए - यदि अपराध नहीं किया जाए
धारा ११९ किसी ऐसे अपराध के किए जाने की परिकल्पना का लोक सेवक दवारा छिपाया जाना, जिसका निवारण करना उसका कर्तव्य है
यदि अपराध कर दिया जाय
यदि अपराध मृत्यु, आदि से दण्डनीय है
यदि अपराध नही किया जाय
धारा १२० कारावास से दण्डनीय अपराध करने की परिकल्पना को छिपाना
यदि अपराध कर दिया जाए - यदि अपराध नही किया जाए
अध्याय ५ क
आपराधिक षडयंत्र




धारा १२० क आपराधिक षडयंत्र की परिभाषा
धारा १२० ख आपराधिक षडयंत्र का दण्ड

अध्याय ६
राज्य के विरूद्ध अपराधें के विषय में

धारा १२१ भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध करना या युद्ध करने का प्रयत्न करना या युद्ध करने का दुष्प्रेरण करना
धारा १२१ क धारा १२१ दवारा दण्डनीय अपराधों को करने का षडयंत्र
धारा १२२ भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध करने के आशय से आयुध आदि संग्रह करना
धारा १२३ युद्ध करने की परिकल्पना को सुनकर बनाने के आशय से छुपाना
धारा १२४ किसी विधिपूर्ण शक्ति का प्रयोग करने के लिए विवश करने या उसका प्रयोग अवरोपित करने के आशय से राट्रपति, राज्यपाल आदि पर हमला करना
धारा १२४ क राजद्रोह
धारा १२५ भारत सरकार से मैत्री सम्बंध रखने वाली किसी एशियाई शक्ति के विरूद्ध
युद्ध करना
धारा १२६ भारत सरकार के साथ शान्ति का संबंध रखने वाली शक्ति के राज्य क्षेत्र में
लूटपाट करना
धारा १२७ धारा १२५ व १२६ में वर्णित युद्ध या लूटपाट दवारा ली गयी सम्पत्ति प्राप्त करना
धारा १२८ लोक सेवक का स्व ईच्छा राजकैदी या युद्धकैदी को निकल भागने देना
धारा १२९ उपेक्षा से लोक सेवक का ऐसे कैदी का निकल भागना सहन करना
धारा १३० ऐसे कैदी के निकल भागने में सहायता देना, उसे छुडाना या संश्रय देना




अध्याय ७
सेना, नौसेना और वायुसेना से सम्बन्धित अपराधें के विषय में

धारा १३१ विद्रोह का दुष्प्रेरण का किसी सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक को कर्तव्य से विचलित करने का प्रयत्न करना

क्रमशः

Apr 26, 2007

जस्टिस जगदीश भल्ला : छत्तीसगढ के बासी मे उबाल

छत्तीसगढ समाचार के २७ अप्रेल के अंक में शुभ्राशु चौधरी ने एक सार्गर्भित व जन मानस को झकझोर देने वाला आलेख लिखा है “क्या छत्तीसगढ दोयम दर्जे का राज्य है” उसी के अंश व दूसरे साईट के जुगाड खोज कर छत्तीसगढ के सुधियो के लिये प्रस्तुत कर रहे हैं, छत्तीसगढ समाचार सांध्य दैनिक होने के कारण सबेरे के अखबार से कम पढा जाता है जिसके कारण इतना गम्भीर लेख सब के सम्मुख प्रस्तुत करने के उद्देश्य से हम इसे इस चिठ्ठे मे पेश कर रहें हैं

छत्तीसगढ उच्च न्यायालय में एक नये न्यायाधीश की नियुक्ति से बहुत सारे सवाल उठ खडे हुए हैं क्योंकि इस न्यायाधीश को लेकर पहले से काफी विवाद चल रहे थे औरा उन विवादों को वजन इस बात से आंका जा सकता है कि इस न्यायाधीश को पदोन्नति देने की फाईल राष्ट्रपति नें वापस कर दी थी । वे इस पदोन्नति से सहमत नही थे । लेकिन सर्वोच्च न्यायालय में इन प्रशासनिक कार्यों के लिए जो कमेटी है उसने राष्ट्रपति की आपत्ति से असहमति जताते हुए फिर से इस जज का नाम भेजा है - शुभ्राशु चौधरी का आलेख प्रस्तुत करते हुए सांध्य दैनिक छत्तीसगढ, रायपुर नें लिखा है । सम्पुर्ण लेख छत्तीसगढ समाचार के २७ अप्रेल के अंक में देखा जा सकता है “क्या छत्तीसगढ दोयम दर्जे का राज्य है - शुभ्राशु चौधरी”

ज्ञात हो कि शुभ्राशु चौधरी बी बी सी के पूर्व पत्रकार एवं छत्तीसगढ के एकमात्र अंतरजाल सिटिजन जर्नलिस्ट के प्रयोगधर्मी साईट http://www.cgnet.in/ से जुडे हैं । सीजी नेट मे अनूप साहा के साईट का लेख है

शुभ्राशु चौधरी नें लिखा है “इन दिनों केरल और दिल्ली में छत्तीसगढ की बडी चर्चा है पर आश्चर्य की बात यह है कि जिस छत्तीसगढ को लेकर चर्चा जोरों पर है वह स्वयं खामोश है . . .”

किस्सा है लखनउ उच्च न्यायालय बेंच के न्यायाधीश जगदीश भल्ला का ।

क्या हैं चर्चा -
१. २१ जुलाई २००३ को जस्टिस भल्ला की पत्नी श्रीमती रेणु भल्ला नें नोएडा में ५ लाख रूपये में एक प्लाट खरीदा जिसका बाजार भाव ७.२ करोड रूपये था ।

२. दिल्ली के समीप दादरी में जहां रिलायंस एनर्जी का प्लांट लगने वाला है जिसके विरूद्ध रैली, घरना, प्रदर्शन पूर्व प्रधान मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में किया जाना था. इस कार्य को रोकने हेतु रिलायंस एनर्जी के दवारा कार्यालयीन समय के बाद लखनउ बेंच में ७ जुलाई को गैर तारांकित मामले की सुनवाई एक जज के घर में हुई जबकि वह मामला लखनउ बेंच की अधिकारिता में नही आता । देर रात हुए फैसले के जोर पर ही पुलिस नें प्रदर्शनकारी किसानों पर जमकर लाठियां भांजी, वी पी सिंह को भी सभा स्थल पर पहुंचने नही दिया गया । उक्त दमनकारी फैसले में रिलायंस एनर्जी के वकील आरोही भल्ला नें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और वकील आरोही भल्ला जस्टिस जगदीश भल्ला के पुत्र हैं ।

३. जुलाई ०५ में ग्रेटर नोएडा में भू आबंटन की लाटरी में जस्टिस जगदीश भल्ला के बेटे आरोही भल्ला के नाम आबंटन एवं उसके उपरांत उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय के उक्त आबंटन पर रोक लगाने के आदेश को सर्वोच्च न्यायालय नें खारिज कर दिया इस पर भी विवाद हैं जबकि इस आबंटन एवं प्रक्रियाओं में जस्टिस सबरवाल की बहू श्रीमती शीबा सबरवाल का भी नाम है ।


११ जुलाई २००६ को सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वाई के सबरवाल को प्रख्यात वकील रामजेठमलानी, वर्तमान मुख्य न्यायाधीश बालकृष्णन सहित दो पूर्व केन्द्रीय मंत्रियों की समिति कोजा (कमेटी आन जुडिसियल एकाउंटिबिलिटी) नें जस्टिस जगदीश भल्ला के विरूद्ध गंभीर अनियमितता का आरोप लगाते हुए उन पर महाभियोग चलाने की अपील की थी । छ: माह बाद भी उस अपील पर कोई कार्यवाही नही की गयी तब इस समिति नें जस्टिस जगदीश भल्ला के विरूद्ध एफ आई आर दायर करने की अनुमति की मांग भी की थी ।

तहलका से उपलब्ध जानकारी के अनुसार बताया जाता है कि जस्टिस जगदीश भल्ला के संबंध में सीबीआई से रिपोर्ट भी मंगाई गयी थी जिसके बाद ही राष्ट्रपति नें उनकी फाईल वापस कर दी थी ।
इधर अपने रिटायरमेंट के समय मुख्य न्यायाधीश वाई के सबरवाल नें पत्रकारों द्धारा पूछे गये सवाल के जवाब में जस्टिस जगदीश भल्ला को क्लीन चिट दे दिया था – “जस्टिस भल्ला के खिलाफ लगे आरोपों में कोई दम नही है ।“

अस्तु जस्टिस जगदीश भल्ला को केरल उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाये जाने की कवायद शुरू हो गयी इस बीच केरल के ही एक न्यायाधीश बालकृष्णन जो जस्टिस भल्ला के विरूद्ध शिकायत करने वाली कमेटी कोजा के सदस्य थे, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बनाये गये। तदैव जस्टिस जगदीश भल्ला को केरल के बजाय छत्तीसगढ भेजा जाना तय हो गया, अब राष्ट्रपति जी को फाईल पुन: प्रेषित की गयी है जिसमें उन्हे हस्ताक्षर करना ही है यही हमारा संविधान कहता है । ईसी सम्बंध में परंजय गुहा की भी बातें देखिये ।


न्यायाधीशों की कमी व लंबिंत मामलों से जूझते छत्तीसगढ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का तबादला केरल कर दिया गया और यहां मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त हो गया सो जस्टिस भल्ला के लिए छत्तीसगढ का रास्ता साफ हो गया ।

डा सुकुमार ओझिकोड, (पूर्व उप कुलपति, कालिकट विश्वविद्यालय, कालम लेखक) देशाभिमानी, सीपीएम का आमुख अखबार में लिखा जिसका अनुवाद शुभ्राशु चौधरी नें बासी में उबाल में लिखा है – “जस्टिस भल्ला को केरल न भेजा जाना एक अच्छा फैसला है । . . . क्या इस देश में दो तरह के प्रदेश हैं यदि जस्टिस भल्ला को केरल न भेजना एक उचित फैसला है तो उन्हे छत्तीसगढ का मुख्य न्यायाधीश कैसे बनाया जा सकता है ।“

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