Showing posts with label सुप्रीम कोर्ट. Show all posts
Showing posts with label सुप्रीम कोर्ट. Show all posts

Sep 4, 2010

सुप्रीम कोर्ट का छग शासन को नोटिस

छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा भर्ती एवं पदोन्नति नियम २००८ को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। इस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ शासन को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

शिक्षक अनिल शुक्ला एवं अन्य ने प्राचार्य के रिक्त पदों को भरने पदोन्नति परीक्षा लिए जाने के खिलाफ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी। इसमें कहा गया कि छत्तीसगढ़ शासन ने छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा (शालेय स्तरीय) भर्ती व पदोन्नति नियम २००८ बनाया है। इसमें प्राचार्य पद की भर्ती के लिए पदोन्नति परीक्षा का प्रावधान किया गया है। याचिका में कहा गया कि ७५ प्रतिशत पदों को वरिष्ठता के आधार पर हेडमास्टर व व्याख्याताओं को प्रमोशन देकर भरा जाना है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पहली बार याचिका को २९ जुलाई २००९ को खारिज कर दिया। इसके बाद पुनर्विचार याचिका प्रस्तुत की गई। दूसरी बार हाईकोर्ट ने ५ फरवरी २०१० को याचिका को खारिज कर दिया। इस पर अधिवक्ता मो. फखरुद्दीन व राहुल बीरथरे के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई गई है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए छत्तीसगढ़ शासन से जवाब मांगा है।

आरंभ में पढ़ें : -
रौशनी में आदिम जिन्दगी : भाग 1
रौशनी में आदिम जिन्दगी : भाग 2
रौशनी में आदिम जिन्दगी : भाग 3
रौशनी में आदिम जिन्दगी : भाग 4

Jul 22, 2010

छत्तीसगढ़ सरकार का आधे राज्य में नहीं चलता शासन : हिन्‍दुस्‍तान लाईव

उच्चतम न्यायालय ने पिछले शुक्रवार को वस्तुत: माओवादी हिंसा से प्रभावित छत्तीसगढ़ की सरकार की खिंचाई करते हुए कहा कि उसका शासन आधे राज्य में नहीं चलता है।

न्यायमूर्ति आरवी रवींद्रन और एचएल गोखले ने छत्तीसगढ़ शासन से पूछा, 50 फीसदी जिलों में आपकी सरकार भी नहीं है। अधिनियम को आपके लागू करने का सवाल कहां उठता है। पीठ ने यह टिप्पणी उस वक्त की जब छत्तीसगढ़ सरकार के वकील ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दावा किया कि राज्य सरकार परिश्रम से बाल न्याय अधिनियम, 2000 को लागू कर रही है। उन्होंने दावा किया कि राज्य ने जिला कल्याण बोर्ड और बाल कल्याण समिति का गठन किया है। इसने पीठ को टिप्पणी करने पर बाध्य किया।

छत्तीसगढ़ हाल के महीनों में माओवादी हिंसा का केंद्र रहा है। वहां इस साल छह अप्रैल को नक्सली हिंसा में सीआरपीएफ के 76 जवान मारे गए थे। उसके बाद गत 29 जून को नारायणपुर में नक्सली हमले में 26 अन्य जवान मारे गए थे।

आरंभ मा पढव : -
बिस्‍वजीत बोरा की फिल्‍म : आदिवासी के दूत
बिना शीर्षक : राजकुमार सोनी के प्रथम कृति का प्रकाशन

Apr 3, 2010

मारुति कोलवाशरी को करें कोयला सप्लाई : सुप्रीम कोर्ट

मारुति कोलवाशरी को छत्तीसगढ़ के कटघोरा क्षेत्र में वाशरी स्थापित करने के लिए जमीन आबंटित की गई है, लेकिन अभी तक यहां काम शुरू नहीं हो सका है, जबकि मारुति के पक्ष में न्यायालय से आदेश हो चुका है। इस मामले में दायर याचिका में मारुति ने कहा है कि एसईसीएल द्वारा कोयला उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है, जबकि मारुति ने कोलवाशरी लगाने में करीब १०० करोड़ का विनियोग कर दिया है। साथ ही पर्यावरण मंत्रालय, विद्युत मंडल के कामर्शियल टैक्स विभाग, फैक्ट्री एक्ट सहित सभी संबंधित विभागों से कोलवाशरी प्रारंभ करने के लिए अनुमति प्राप्त कर ली है।

सुप्रीम कोर्ट ने 31 मार्च 2010 को जारी अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया है कि आगे चलकर यदि जमीन के स्वामित्व का फैसला एसईसीएल के पक्ष में होता है, तो भी एसईसीएल को मारुति को कानूनी आधार पर जमीन लीज पर देनी होगी। साथ ही कहा गया है कि कोर्ट में मामला लंबित रहने पर मारुति कोलवाशरी के संचालन को बंद नहीं किया जा सकेगा और इस तरह मारुति को शीघ्र कोलवाशरी शुरू करने का आदेश दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश डॉ. केजी बालकृष्णन सहित जस्टिस चौहान व जस्टिस पांचाल की बेंच में हुई। याचिकाकर्ता की तरफ से सीनियर एडवोकेट मुकुल रस्तोगी व रंजीतकुमार ने की। मालूम हो कि छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकास निगम (सीएसआईडीसी) ने वर्ष 2002 में मारुति कोलवाशरी को कोरबा जिले के कटघोरा क्षेत्र के ग्राम रतीजा में दस मिलियन टन वार्षिक क्षमता की वाशरी स्थापित करने के लिए 37.91 एकड़ जमीन आबंटित की थी।कंपनी का कहना था कि यह जमीन राज्य शासन ने उसे आवंटित की थी।

सीएसआईडीसी से जमीन आबंटन की प्रक्रिया पूरी होते ही आपत्ति करते हुए हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं दायर की गईं। इन याचिकाओं में कहा गया है कि उक्त जमीन वन विभाग की है। लिहाजा उसे कोलवाशरी के लिए देना अवैधानिक है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए 2006 में फैसला दिया कि मारुति को आबंटित जमीन फारेस्ट लैंड नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं पर एक लाख रूपए जुर्माना भी किया था। इधर, 2004 में एसईसीएल ने भी उक्त जमीन पर अपना हक जताते हुए सिविल सूट फाइल कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इस मामले की सुनवाई छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में हुई। हाईकोर्ट ने 5 मार्च 2010 को एसईसीएल के सिविल सूट को खारिज कर दिया।

साबित नहीं कर सका एसईसीएल -  जमीन पर हक जताते हुए एसईसीएल ने कहा था कि उसे शासन द्वारा पहले ही जमीन का आवंटन किया जा चुका है, इसलिए वह उसकी है। शासन द्वारा आवंटन निरस्त न करने पर एसईसीएल ने कटघोरा के सिविल कोर्ट में याचिका दायर की। एसईसीएल का मामला सिविल कोर्ट में प्रकरण लंबित रहने के दौरान मारुति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने मामले के महत्व के मद्देनजर उसे हाईकोर्ट को स्थानांतरित कर कहा था कि उसकी सुनवाई किसी ऐसी बेंच से कराई जाए, जिसमें हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस भी हों। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने तथ्य और प्रमाण देखने के बाद पाया कि एसईसीएल यह साबित करने में विफल रहा कि जमीन उसे मिली है।

My Blog List