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Jul 3, 2010

बार कौंसिल अध्यक्ष का चुनाव कल : समान्य सभा के निर्वाचित २५ सदस्य ही करेंगे मतदान

बिलासपुर स्टेट बार कौंसिल के अध्यक्ष पद का चुनाव ४ जुलाई को हाईकोर्ट के सभाकक्ष में होगा। इसमें समान्य सभा के निर्वाचित २५ सदस्य ही भाग लेंगे। चुनाव संपन्न कराने की तैयारी पूर्ण कर ली गई है।

दुर्ग के निर्वाचित सदस्य श्री संतोष वर्मा जी नें बतलाया है कि राज्य अधिवक्ता परिषद का चुनाव ५ वर्ष के लिए होता है। हाईकोर्ट स्थापना के बाद वर्ष २०० में पहला चुनाव हुआ था। इसमें प्रदेशभर के विधि व्यवसाय से जुड़े अधिवक्ताओं ने मतदान कर समान्य सभा के सदस्यों का चुनाव किया। इन्हीं सदस्यों द्वारा केसी पंत को अध्यक्ष चुना गया। अध्यक्ष का कार्यकाल ढाई वर्ष का होता है। ढाई वर्ष पूरा होने पर समान्य सभा के सदस्य अगले ढाई वर्ष के लिए अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। श्री पंत के कार्यकाल के बाद बाइनियल इलेक्शन में प्रशांत मिश्रा अध्यक्ष चुने गए। उनका कार्यकाल दो वर्ष का रहा। इसके बाद के चुनाव में विवेक रंजन तिवारी राज्य अधिवक्ता परिषद के अध्यक्ष चुने गए। उनका ढाई वर्ष का कार्यकाल जून में पूरा हो गया है। इसके बाद आने वाले ढाई वर्ष के लिए नए अध्यक्ष का चुनाव ४ जुलाई को होगा। इसमें परिषद की समान्य सभा के निर्वाचित २५ सदस्य मतदान करेंगे। चुनाव कराने परिषद ने सभी तैयारी पूर्ण कर ली गई है। एक नाम पर सभी सदस्यों की सहमति मिलने पर मतदान नहीं होगा। एक से अधिक नाम होने पर गुप्त मतदान से चुनाव कराया जाएगा।

बताया जाता है कि अध्यक्ष पद के दावेदारों में वर्तमान अध्यक्ष विवेकरंजन तिवारी के अलावा अवध त्रिपाठी, रामनारायण व्यास, शैलेंद्र दुबे, वाईसी दुबे शामिल हैं। सभी दावेदारों ने सघन संपर्क अभियान चलाया गया है।

बाइनियल इलेक्शन के बाद वर्ष २०१२ में परिषद के नए सदस्यों के लिए आम चुनाव होगा। वर्तमान में परिषद के पंजीकृत लगभग २३ हजार सदस्य हैं। इसके अलावा दो वर्ष में सदस्यों की संख्या में और वृद्धि होने की संभावना है।

Apr 20, 2010

वकील की वकालत करने पर प्रतिबंध : स्टेट बार कौंसिल की बैठक में हुआ निर्णय

दूसरी बार रकम लेने के बाद भी पैरवी नहीं करने की शिकायत पर छत्तीसगढ स्टेट बार कौंसिल ने बलौदाबाजार के वकील की प्रैक्टिस करने पर तीन वर्ष के लिए रोक लगा दी है। इस अवधि तक वे किसी भी न्यायालय में वकालत नहीं कर सकते हैं।

स्टेट बार कौंसिल ने एक विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि बलौदाबाजार के वकील संजय गुप्ता के खिलाफ रायपुर जिले के बिलाईगढ़ थाना क्षेत्र के ग्राम धनसीर निवासी श्रीमती बोधिन बाई पति सम्मेलाल साहू ने छत्तीसगढ़ राज्य अधिवक्ता परिषद बिलासपुर से शिकायत की थी कि एक प्रकरण में आवेदिका बोधिन की मां ने बलौदाबाजार न्यायालय में पैरवी करने के लिए वकील संजय गुप्ता को फीस, वकालतनामा सहित अन्य दस्तावेज दिए थे। इसी बीच उसकी मां की मौत हो गई। प्रकरण में न्यायालय से फैसला नहीं आने पर वकील ने बोधिन से पुनः ८० हजार व ३० हजार रुपए फीस लेने के बाद उसके पक्ष में फैसला कराने की गारंटी दी। प्रकरण की सुनवाई के दौरान श्री गुप्ता स्वयं ने उपस्थित होने के बजाय दूसरे वकील को खड़ा कर दिया। बाद में फीस लेकर भी पैरवी करने से इनकार कर फाइल वापस कर दी गई। इसे गंभीरता से लेते हुए परिषद ने अनुशासन समिति के पास शिकायत को भेजा। समिति के अध्यक्ष पदम अग्रवाल, सदस्य कोषराम साहू एवं सह सदस्य रजनीश निषाद ने शिकायत की जांच की। इसमें वकील श्री गुप्ता पर लगाए गए आरोप सिद्ध पाए गए। बीते १८ अप्रैल को अधिवक्ता अधिनियम १९६१ की धारा ३५ (३) स के तहत तीन वर्ष के लिए विधि व्यवसाय से उन्हें निलंबित किया गया है।

वकीलों ने कहा अब न सहेंगे..

अदालत में वकीलों के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए छत्तीसगढ स्टेट बार कौंसिल ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। कौंसिल की विशेषाधिकार समिति ने शनिवार को प्रस्ताव पारित कर वकीलों को अदालत द्वारा बोलने से रोकने, पूरी बात सुने बिना आदेश पारित करने या भरी अदालत में र्दुव्‍यवहार को विशेषाधिकार का हनन माना है। इस संबंध में प्रस्ताव पारित कर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सहित सभी अधीनस्थ अदालतों को इसकी कॉपी भेजी है। स्टेट बार कौंसिल प्रिविलेज कमेटी (विशेषाधिकार समिति) की 17 अप्रैल को कौंसिल के दफ्तर में हुई बैठक कई मायनों में क्रांतिकारी रही। समिति के अध्यक्ष अब्दुल वहाब खान सहित उपस्थित सभी सदस्यों ने सर्वसम्मति से वकीलों की स्थिति बदलने के लिए प्रस्ताव पारित किए। इसमें वकीलों के विशेषाधिकारों पर चर्चा की गई। सदस्यों ने कहा कि राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में वकालत कर रहे वकीलों से यह शिकायत मिली है कि पक्षकारों द्वारा अधिकृत करने के बाद भी अदालतें और संबंधित पीठासीन अधिकारी वकीलों को बिना सुने या पूरी बात सुने बिना आदेश पारित कर देते हैं।

वकीलों द्वारा मामलों में समय न मांगने के बाद भी ‘वकील द्वारा समय चाहा गया’ लिखकर मामले को आगे बढ़ा दिया जाता है। जबकि प्रकरण के आगे बढ़ने का कारण कोर्ट के पास समय न रहना या अन्य वजह होती है। संबंधित अदालतों के पीठासीन अधिकारियों द्वारा वकीलों की पेशी बढ़ाने का कारण बनाने से उनकी छवि खराब होती है। बैठक में चर्चा के दौरान सदस्यों ने कहा यह शिकायत भी मिली है कि अदालतों के पीठासीन अधिकारी पैरवी कर रहे वकीलों से भरी अदालत में इस लहजे में बात करते हैं। दुर्व्यवहार  की श्रेणी में आता है। यहां तक कि वकीलों की फाइल तक फेंक दी जाती है। यह स्थिति राजस्व न्यायालय, सिविल कोर्ट, दंड प्रक्रिया संहिता सहित सभी मामलों से संबंधित अदालतों की है। वकील सहनशीलता और शालीनता का परिचय देते हुए सब कुछ चुपचाप सहन कर लेते हैं। व्यवसाय पर असर न पड़े इसलिए पीठासीन अधिकारी की शिकायत भी नहीं कर पाते। भारत के न्यायालय खुली अदालतें हैं, जहां किसी भी सामान्य व्यक्ति को कोर्ट की कार्रवाई देखने से नहीं रोका जा सकता।

भरी अदालत में न्यायाधीशों या पीठासीन अधिकारियों का व्यवहार यदि वकील के खिलाफ होता है तो उसे पक्षकारों और अन्य लोगों के सामने बेइज्जत होना पड़ता है। इससे वकीलों को मानसिक परेशानी होती है और उनके व्यवहार व कार्यक्षमता पर भी असर पड़ता है। अगर अदालत द्वारा कहे जा रहे शब्दों या लहजे में वकील बोलें तो यह न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आ जाता है। वकील कोर्ट अफसर होता है, पीठासीन अधिकारी या जज को उससे गरिमापूर्ण व्यवहार करना चाहिए। यह प्रस्ताव पारित करने के बाद समिति ने इसकी कापी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, रजिस्ट्रार जनरल, सभी जिला व सत्र न्यायाधीश, कलेक्टर, राजस्व मंडल अध्यक्ष, कमिश्नर, सभी अनुविभागीय अधिकारी, राज्य उपभोक्ता परिषद, न्याधिकरणों व अन्य अदालतों को भेजने का निर्णय लिया। बैठक में समिति के अध्यक्ष श्री खान, सदस्य लीलाधर सिंह चंद्रा सहित बार कौंसिल सदस्य प्रवीण गुप्ता, सुशील चतुर्वेदी, अरुण कोचर, बादशाह प्रसाद सिंह आदि उपस्थित थे।

समिति ने बैठक में अपने क्षेत्राधिकार पर भी चर्चा की। एडवोकेट एक्ट 1961 की धारा 6 में स्टेट बार कौंसिल के कार्यो का उल्लेख है। एक्ट की धारा 6 (1) (घ) के अनुसार स्टेट बार कौंसिल अपने रजिस्टर्ड वकीलों के अधिकारों, विशेषाधिकारों और हितों की रक्षा करेगी। कौंसिल की विभिन्न समितियों का गठन भी इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया गया है। इस अनुसार समिति का प्रमुख कार्य और क्षेत्राधिकार वकीलों के हितों और विशेषाधिकारों की रक्षा करना है।

"पिछले 10 सालों में इस दिशा में पहल नहीं हुई, जबकि राज्य के वकीलों से इस तरह की शिकायतें लगातार मिल रही हैं। हाईकोर्ट में भी यह समस्या है। इसके मद्देनजर इस पर ध्यान देना और समस्या के समाधान के लिए पहल करना जरूरी था।"  
अब्दुल वहाब खान, अध्यक्ष विशेषाधिकार समिति

Feb 7, 2010

बार एसोसिएशन वकीलों की मदद हेतु सदैव तत्पर रहेगा

छत्तीसगढ हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की नई कार्यकारिणी बनने के बाद से ही नए अध्यक्ष वीजी तामस्कर ने आपात स्थिति में आर्थिक तौर पर कमजोर वकीलों के लिए मदद का प्रस्ताव रखा था। इसके अनुसार दुर्घटना या निधन पर वकीलों को तुरंत मदद देने का प्रावधान करने को कहा गया था। एसोसिएशन की कार्यकारिणी इसे अमल में लाने की तैयारी कर रही है। इसके तहत प्रारंभिक तौर पर बार एसोसिएशन अधिवक्ता कल्याण कोष का स्टेट बैंक में खाता खोल दिया गया है। इसमें वकील स्वेच्छा से राशि जमा करा सकेंगे। इसके लिए हाईकोर्ट की स्टेट बैंक शाखा में खाता खोल लिया गया है।

साथ ही सरकारी, अर्ध सरकारी संस्थाओं से भी मदद ली जाएगी। वकीलों को अभी बार कौंसिल की ओर से मदद दी जाती है लेकिन यह राशि उन्हें तुरंत नहीं मिल पाती। इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाता है। दुर्घटना, मृत्यु या बीमारी पर तत्काल राहत दिलाने की जरूरत महसूस करते हुए एसोसिशन ने तय किया है कि इन परिस्थितियों में कल्याण कोष से वकील को तुरंत आर्थिक मदद उपलब्ध कराई जाएगी ताकि परिजनों पर बोझ न पड़े। इसमें वकीलों की आर्थिक स्थिति का खासतौर पर ध्यान रखा जाएगा और मदद उन्हीं को दी जाएगी, जिनको वास्तव में जरूरत है। किन परिस्थितियों में कितनी रकम देनी है और इसके लिए मापदंड क्या होंगे, यह तय कर लिया गया है और इस संबंध में बनाए गए नियमों को पारित कर लिया गया है। इस संबन्ध मे बार कौंसिल से और जानकारी लेने के बाद हम उसे प्रकाशित करने का प्रयाश करेंगे. 

Nov 3, 2009

छत्तीसगढ़ स्टेट बार कौंसिल द्वारा व्यावसायिक कदाचरण के आरोप पर तीन वकील निलंबित

छत्तीसगढ़ स्टेट बार कौंसिल ने व्यावसायिक कदाचरण के आरोप सिद्ध होने पर राज्य के तीन वकीलों को निलंबित कर दिया है। स्टेट बार कौंसिल अनुशासन समिति की रविवार को हुई बैठक में वकीलों के व्यावसायिक कदाचरण संबंधी मामले प्रस्तुत किए गए। इसमें समिति के अध्यक्ष पद्म कुमार अग्रवाल, सदस्य कोषराम साहू और सह सदस्य रजनीश निषाद की पीठ ने मामलों की सुनवाई की।

सुनवाई के बाद तीन वकील बिलासपुर के विजयशंकर तिवारी, दुर्ग के वकील नवजीत कुमार रमन और राजनांदगांव के वकील शफीर अहमद को व्यावसायिक कदाचरण का दोषी पाते हुए निलंबित कर दिया गया। इनमें से वकील श्री तिवारी पर अधिवक्ता कल्याण निधि के टिकट के मुद्दे पर वकीलों को गुमराह और भयभीत करने वाले बयान प्रकाशित कराने और बार कौंसिल की छवि धूमिल करने का प्रयास करने का आरोप लगाया गया। कौंसिल ने इसे प्रथम दृष्टया व्यावसायिक कदाचरण मानते हुए स्वप्रेरणा से संज्ञान लेकर अधिवक्ता अधिनियम 1961 की धारा 35 के तहत मामले को अनुशासन समिति के समक्ष प्रस्तुत किया। समिति ने मामले की छानबीन के बाद श्री तिवारी को व्यावसायिक कदाचरण का दोषी पाते हुए एक नवंबर से पांच साल की अवधि के लिए निलंबित कर दिया।

दूसरे मामले में राजनांदगांव जिले के डोंगरगांव निवासी वकील शफीर अहमद के खिलाफ एक अन्य वकील सुरेंद्र कुमार दुबे ने शिकायत की थी कि श्री अहमद ने डोंगरगांव तहसील में नोटरी की नियुक्ति के लिए फर्जी अनुभव प्रमाणपत्र और अन्य फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत किए। वकील होते हुए भी उन्होंने अपना लाइसेंस निरस्त कराए बिना वर्ष 2001-02 में नगर पंचायत डोंगरगांव के माध्यम से तालाबों का ठेका ले लिया।इस मामले की सुनवाई के बाद कदाचरण समिति ने आरोपों को सही पाते हुए वकील श्री अहमद का सात साल के लिए वकील के तौर पर प्रेक्टिस करने पर प्रतिबंध लगा दिया। तीसरा मामला दुर्ग जिले के वकील नवजीत कुमार रमन का है। दुर्ग निवासी भुवनेश्वर लाल वर्मा व अन्य ने वकील के खिलाफ शिकायत की थी कि वे लोक निर्माण विभाग के बेमेतरा संभाग में श्रमिक के तौर पर कार्यरत हैं।

आवेदक और उसके 35 साथियों ने परिवर्तनशील महंगाई भत्ते के दावे के लिए श्रम न्यायालय दुर्ग में वर्ष 2001 में याचिका प्रस्तुत की। इसमें उन्होंने वकील सत्येंद्रनाथ साधू को वकील नियुक्त किया।वकील नवजीत श्री साधु के सहायक बतौर काम करते थे। उनकी मौत के बाद नवजीत ने खुद को श्री साधु का पुत्र बताया। जिस आधार पर आवेदकों ने उन्हें नए सिरे से अपना वकील नियुक्त किया। इसके बाद से नवजीत कुमार मामले का जल्दी फैसला कराने सहित विभिन्न बहाने से काफी रकम ऐंठ ली। इसकी शिकायत बार कौंसिल से की गई। कौंसिल ने सुनवाई के बाद आरोप सही पाने के बाद वकील को तीन साल के लिए प्रेक्टिस करने पर रोक लगाने का आदेश जारी किया।

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