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Nov 29, 2010

असमंजस के कटघरे में सुप्रीम कोर्ट : कनक तिवारी

संविधान सभा की तीन वर्षों की बहस में तीन सौ से ज्‍यादा सदस्यों ने भारत के भविष्य का राजनीतिक पंचांग तैयार किया। पहली बार स्वतंत्र न्‍यायपालिका संविधान में स्थापित हुई। प्राचीन भारतीय व्यवस्था में शासक ही न्‍याय प्रमुख था। शासन प्रमुख के रूप में लिए गए निर्णयों और व्यवस्था के कार्यों की जवाबदेही लेते हुए उसे न्‍यायोन्‍मुख आत्‍म समीक्षा करनी होती थी। उसे नैतिक बनाए रखने के लिए गुरुकुल, आश्रम, राजमहल और दरबार में निष्पक्ष लोगों की उपस्थिति होती थी। मौजूदा संविधान पूरी तौर पर यूरो-अमेरिकी आधुनिक अवधारणा पर आधारित है। ब्रिटिश शासनकाल में प्रशासक ही निचले स्तर पर न्‍याय अधिकारी होते थे। कालांतर में न्‍याय पालिका और कार्यपालिका को अलग किया गया। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट संविधान-जनित होने के बावजूद संविधान की व्याख्या करने और जरूरत पडऩे पर विधायिकाओं के अधिनियमों को निरस्त करने में समर्थ हैं। उन्‍हें अमेरिकी नस्ल के मूल अधिकारों के भारतीय रूपांतरण पर विचार करते हुए अंगरेजी पद्धति के अनुतोश और राहत देने के अधिकार हैं। संविधान में हाईकोर्ट का क्षेत्राधिकार सुप्रीम कोर्ट से ज्‍यादा विस्तृत है। यह बात स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने कही है। सुप्रीम कोर्ट केवल मूल अधिकारों के क्षतिग्रस्त होने पर हस्तक्षेप करता है। वैधानिक, नागरिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक आधारों पर हाई कोर्ट को अधिकारिता होती है। इन संविधान न्‍यायालयों को गठित करने का मकसद यही था कि आजाद देश में यह महसूस हो कि मनुष्य ज्‍यादा गरिमामय हो गया है। वह ब्रिटिश काल का दोयम दर्जे का भारतीय नहीं रहा। वह हर सरकारी अन्‍याय के खिलाफ अदालतों का दरवाजा खटखटा सकता है। अदालतें संविधान की आयतों के अनुरूप फौरी न्‍याय भी देंगी। हमारे संविधान निर्माता अतीन्‍द्रीय, भोले और निस्पृह लोग थे। उन्‍हें नहीं मालूम था कि उनके वंशज दुष्ट-परंपरा के होंगे।
भारतीय शासक अपनी जनता को शायद अंगरेजों से भी ज्‍यादा हेय दृष्टि से देखेंगे। जनता के विवेक को लाठियों से हकालेंगे, गोलियां भी बरसाएंगे। थानेदार से लेकर पुलिस महानिदेशक तक घूसखोरी, शराबखोरी और वेश्यावृत्ति भी करेंगे। सेनानायक शहीदों के परिवारों के मकान हड़प लेंगे। बहादुरों के शवों के ताबूतों की खरीद में घोटाले होंगे। नेता जानवरों का चारा खा जाएंगे। खदानों के पट्टे औने-पौने में मंत्री बेच देंगे। ठेकेदार चूहों की तरह देश को खोखला कर देंगे। देश को लाखों करोड़ रुपयों के कर्जों और नीलामियों में फंसा देंगे। देश का सोना विदेशों में गिरवी रख देंगे। नेता और उद्योगपति दुनिया में सबसे ज्‍यादा भ्रष्ट होकर स्विस बैंकों में काला धन रखने में विश्व कीर्तिमान बना देंगे। गोरी चमड़ी के देशों में देश की अस्मिता को बेचने की प्रतियोगिताएं आयोजित करेंगे। भारतीय भाषाओं को चपरासियों, बाबुओं और जानवरों की कहेंगे। सांसद सवाल पूछने के लिए घूस खाएंगे। नेता सपरिवार हर राष्ट्रीय आयोजन में छीना झपटी करेंगे। न्‍यायाधीश अश्लील हरकतें तक करेंगे और राज्‍यपाल भी। इसके बाद भी आदमखोर भद्रजनों का यह गिरोह मूंछें मुड़वाकर मूंछों पर ताव देगा।
स्वतंत्र न्‍याय पालिका की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट और उच्‍च न्‍यायालयों ने स्वस्थ परंपराएं विकसित की। कुछ विश्व-स्तरीय प्रणम्य न्‍याय निर्णय हुए। बहुत से उच्‍च कुलीन न्‍यायाधीश इंग्‍लैंड में ही पढ़े थे। उनकी तात्विक समझ बर्तानवी विधि में होने के बावजूद उन्‍होंने देशज तर्कशीलता के अच्‍छे उदाहरण प्रस्तुत किए। फिर प्रयोगधर्मी दौर आया, जब ब्रिटिश विधि में पारंगत न्‍याय विदों ने विशेषकर संपत्ति के अधिकार को अहमियत देनी शुरू की। इससे नवधनाड्य उद्योगपतियों और भारतीय कंपनियों को फायदा हुआ। इंदिरा युग में राष्ट्रीयकरण का नारा इसलिए बुलंद हुआ। संविधान को ही बुनियादी तौर पर परिवर्तित करने के प्रयत्न हुए। आपातकाल में लेकिन सुप्रीम कोर्ट की मुश्कें कस दी गईं। तत्‍कालीन मुख्य न्‍यायाधीश वी.वाई.चंद्रचूड़ ने बाद में आत्‍मग्‍लानि के साथ यह स्वीकार भी किया कि न्‍याय पालिका आपातकाल में खौफजदा हो गई थी।
देश और सुप्रीम कोर्ट एक साथ मिलकर कई अवरोधों से लड़ चुके हैं। जस्टिस कृष्‍णण अय्यर, पी.एन. भगवती, के.के. मै.यू, सगीर अहमद, चिन.पा रेड्डी आदि ने कई मोर्चों पर जनहित याचिकाओं और न्‍यायिक सक्रियता के मानदंड स्थिर किए। फिर वैश्विक बाजारवाद का शिकंजा भारत पर कसता गया। राजीव गांधी की हत्‍या महज र्दुघटना, इत्‍तफाक या संयोग नहीं है। उनके बाद ऐसी विचारधारा सस्‍थामूलक हुई जो वैश्विक बाजार के अनुकूल है। भारत का संविधान अब दरकिनार है। संसद को धीरे-धीरे अप्रासंगिक बनाया जा रहा है। मतदाता उपभोक्ता में तब्‍दील हो रहा है। संस्कृति बाजारवाद में विक्रय योग्‍य वस्तु है। राजनेता यूरो-अमेरिकी अर्थनीति के दलाल बनते लग रहे हैं। ऐसी भयावह स्थिति में आशा की एक किरण सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में जनता को दिखाई देती है। हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आपको कुछ अनुदार अवधारणओं में बद्धमूल कर लिया है। वह असमंजस के कटघरे में है। इनमें से कुछ इस तरह हैं:-
1. राज्‍य के नीति विषयक मामलों में न्‍यायालय को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
2. न्‍यायिक सक्रियता और जनहित याचिकाओं के कारण न्‍याय प्रशासन प्रभावित हुआ है। अतएव इस पर पुनर्विचार जरूरी है।
3. अदालतें सरकार के ऊपर अपीलीय न्‍यायालय नहीं हैं। इसलिए कई मुद्दों पर उन्‍हें अनदेखी करनी चाहिए।
4. अवधारणाओं और परंपराओं के लिहाज से भारतीय अदालतों को अंगरेजी विधि के सिद्धांतों का अनुसरण करना चाहिए।
5.न्‍यायालयों का कार्य कार्यपालिका की भूमिका को ले लेना नहीं है। उन्‍हें आत्‍मसंतुलन बनाए रखना चाहिए।
बहुत सी अनुदार ब्रिटिश अवधारणाओं के चलते न्‍यायालयों ने अपनी भूमिकाओं का परिष्कार, संशोधन या विस्तार नहीं किया है। देश में लाखों टन अनाज सड़ रहा हो और सुप्रीम कोर्ट केवल हल्की सी चेतावनी दे कि ऐसा अनाज गरीबों में मुफ्त बांट देना चाहिए। देश के कारखाने, नदियों, हवा, शहरों और जंगलों में प्रदूषण की मितली उगल रहे हों। कभी-कभार किसी समाजचेता व्यक्ति के कहने पर कुछ अदालती निर्देश जारी हों। बाद में लेकिन यह भी कह दिया जाए कि ऐसे व्यक्ति जनहित के बदले अपना प्रचार प्रसार चाहते हैं। अंबानी के पक्ष में फैसला हो। न्‍यायाधीश का बेटा अंबानी का वकील हो। प्रदेश का मुख्यमंत्री न्‍यायाधीश के परिवार को करोड़ों की भूमि कौडिय़ों के मोल दे दे। देश के मुख्य न्‍यायाधीश उस मामले को सुनें जिससे संबंधित पक्षकार कंपनी में उनके शेयर हों। देश के मुख्य न्‍यायाधीश के सरकारी आवास को उनके डेवलपर बेटे अपनी कंपनी का पंजीकृत मुख्यालय लिखें। न्‍यायाधीश मनोरंजन के नाम पर सार्वजनिक जगह पर बैठकर धींगा मस्ती करें। हाईकोर्ट के न्‍यायाधीश अपने गृह राज्‍य में निजी आवास के लिए सरकारी मदों से खरीदी करें। लाखों रुपयों के सरकारी धन को निजी खाते में रखने वाले न्‍यायाधीश भी हैं। दलाल आलीशान होटलों में रुकें। न्‍यायाधीश से लगातार बातें करें। रिकॉर्ड उपलब्‍ध हो जाने पर समाचार प्रकाशित करने वाली मीडिया को अदालत की
अवमानना करने के नोटिस जारी किए जाएं।
पूर्व मुख्य न्‍यायाधीश खुले आम कह चुके हैं कि उच्‍च न्‍यायालयों के बीस प्रतिषत न्‍यायाधीश तो भ्रष्ट हैं ही। न्‍यायाधीशों के बच्‍चे और रिश्तेदार उन्‍हीं हाई कोर्ट में प्रेक्टिस कर रहे हैं। वेतन, भत्‍ते और सुविधाएं बढ़ाने को लेकर अदालतें खुद आदेश पारित कर लें। न्‍यायाधीशों के बच्‍चे और बीवियां सरकारी वकील बना दिए जाएं और नामी गिरामी कंपनियों के भी।
आम जनता से जुड़े उन फौजदारी मामलों तक में न्‍यायालय जमानत नहीं देते जिनसे ज्‍यादा गंभीर मामलों में अंगरेज जज टेनिस खेलते-खेलते जमानत दे देते थे। उन पार्टियों में भी न्‍यायाधीश जाते हैं, जहां संदिग्‍ध चरित्र के लोग आते हैं। कई न्‍यायाधीशों की भाषा और कानूनी समझ को लेकर यह प्रमाणपत्र नहीं दिया जा सकता कि उनकी नियुक्ति ठीक-ठाक हुई है। कभी-कभार न्‍यायाधीश सभ्‍य-पुरुषों को हड़का भर देते हैं। जनता की स्मृति क्षीण होती है। उसे पता नहीं होता कि बाद में क्‍या हुआ। आर्थिक घोटालों, अवैध प्‍लॉट आवंटनों और गरीबों की जमीनें हड़पने में भी न्‍यायाधीशों की संलग्‍नता होती है। एक राजा के प्रकरण के बहाने सुप्रीम कोर्ट को इतिहास रचने का अवसर मिला है। जंगलों
की सुरक्षा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, चिकित्‍सा कॉलेजों में भर्ती जैसे कई प्रकरणों में सुप्रीम कोर्ट मॉनिटरिंग कर ही रहा है। अयोग्‍यों का मसला भी उसके पाले में है। जस्टिस भगवती ने मेनका गांधी वाले मामले में व्यक्ति की आजादी के नए आयाम गढ़े थे। केशवानंद भारती के प्रसिद्ध मुकदमे में छह बनाम सात के बहुमत से सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के बुनियादी ढांचे को समझाने की कोशिश की है। शिक्षा के मसले को लेकर ग्‍यारह सदस्यीय संविधान पीठ ने अधिकारों का स्थिरीकरण किया है। रतलाम नगरपालिका वाले प्रकरण में जस्टिस कृष्णा अय्यर ने मानवीय गरिमा के नए फलक को ढूंढा है। आपातकाल लगाने के फैसले की वैधता को जांचने वाली पीठ में अल्पमत के फैसले के लेखक न्‍यायमूर्ति एच.आर. खन्ना ने मानव अधिकारों की अद्भुत मीमांसा की है। मौजूदा सुप्रीम कोर्ट में भी कई न्‍यायाधीश हैं जो न्‍यायिक इतिहास के नए परिच्‍छेद लिख सकते हैं। उम्मीद है कि कर्तव्य बोध, नैतिक शक्ति और सत्‍य के प्रति आग्रह की अंत:सलिला बहती रहे।
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के अस्तित्‍व के बावजूद कार्यपालिकाओं को गुमान हो गया है कि अदालतें उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं। अधिकारी खुलेआम अवैध आदेश पारित कर पीडि़त व्यक्ति से कहते हैं कि वह अदालत चला जाए। जब तक कार्यापालिका को यह अहसास रहेगा कि अदालतें उसके साथ हैं, तब तक लोकतंत्र के ऊपर विनाश के बादल मंडराते रहेंगे। एक बार इतिहास न्‍यायिक सक्रियता और जनहित याचिकाओं की वापसी के युग में फिर आ सकता है। यह भी है कि कई न्‍यायाधीश वक्त के साथ नहीं चल पा रहे हैं। उनका ज्ञान संकीर्ण, दृष्टिकोण बासी, समझ पूंजीपतियों की तरह है। लोकतंत्र में तो सुप्रीम कोर्ट को भी जनता की नुमाइंदगी करनी होती है। मौजूदा सुप्रीम कोर्ट के कई न्‍यायाधीश अपनी पीड़ा के साथ ऐसा इजहार भी करते रहते हैं। हवाला कांड का निर्णय सुधारात्‍मक न्‍यायिक प्रहार बनकर याद रहेगा। शब्‍दों से खिलवाड़ वकीलों और न्‍यायालयों
का शगल नहीं होना चाहिए। वक्त आ गया है जब भारतीय न्‍यायपालिका को आगे बढ़कर वृहत्‍तर भूमिका में इस सवाल का जवाब देना होगा।

कनक तिवारी 
वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता, 
छत्‍तीसगढ़ उच्‍च न्‍यायालय
मो. 94252-20737, 99815-08737

'संविधान का सच' श्री कन‍क तिवारी जी की भारतीय संविधान से संबंधित लेखमाला आप यहां से आनलाईन पढ़ सकते हैं - 'संविधान का सच' 

Sep 13, 2010

न्यायिक सुधारों की मंशा स्पष्ट हो

रामप्रसाद दूबे
वकील, इलाहाबाद हाईकोर्ट

हाईकोर्ट, सुप्रीमकोर्ट निर्णय करती हैं कि किसी मामले का निस्तारण डिस्ट्रिक मजिस्ट्रेट एक महीने में करें। इसके बाद भी मामलों का संज्ञान लेने में कई महीने लग जाते हैं। सरकार न्यायिक सुधार की बात तो करती है, लेकिन ये बातें केवल कागजों में ही दिखाई पडती है। सरकार चाहे तो लंबित मुकदमों की संख्या में कटौती हो सकती है। हाईकोर्ट, सुप्रीमकोर्ट निर्णय करती है कि किसी मामले का निस्तारण डिस्ट्रिक मजिस्ट्रेट एक महीने में करे। इसके बाद भी मामलों का संज्ञान लेने में कई महीने लग जाते हैं। वादी को फिर से ऑर्डर की कॉपी लेने के लिए अधिकारी के पास दौडा दिया जाता है। एक तरह से मामला फिर सरकारी अधिकारी के पास ही चला जाता है, जिसे बाद में अधिकारी खारिज कर देता है। अगर कोर्ट ने किसी कर्मचारी की बहाली का आदेश पारित किया हो, तो सरकार की मंशा होती है कि इस मामले को लंबे समय तक लटकाकर रखा जाए। मामले को वह निचली अदालत से हाईकोर्ट में लेकर चली जाती है। यह कहकर की मामला ऊपरी अदालत में लंबित है, नियुक्ति पर रोक लगा दी जाती है। यों भी सरकारी मुकदमों की कोई समय सीमा तो निर्धारित होती नहीं। कोर्ट में मुकदमों का बोझ बढता जा रहा है। जितने भी लोक अभियोजक अदालतों से जुडे हैं, उनका आम आदमी से तो साबका पडता नहीं। ऐसे मामलों में अधिकांश सरकारी नियुक्तियां ही होती हैं, हाईकोर्ट या सत्र न्यायालय से तो नियुक्ति के समय सहमति लेने का सवाल ही नहीं उठता। सरकार नियुक्ति कर अदालतों में भेज देती है। ऐसे में अधिकांश ऐसे लोग ही चले आते हैं, जिन्हें न्यायिक प्रक्रिया की ज्यादा जानकारी होती नहीं। इसके कारण केसों की पेंडेसी पर भी असर पडता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की ही बात करें तो यहां जजों के 140 से ज्यादा पद हैं, लेकिन इस समय केवल 72 जज ही हैं। लखनऊ हाईकोर्ट में इस मामले को लेकर जनहित याचिका भी दायर की गई। इन जजों की नियुक्ति नहीं करने के कारण भी मामलों की संख्या बढती जा रही है। आम आदमी झेल रहा है। अब सरकार सस्ता न्याय लोगों को दिलाना चाहती है, दूसरी तरफ कोर्ट की फीस बढाेत्तरी की जा रही है। एक तरफ तो न्याय जन-जन तक पहुंचाने की बात की जा रही है, दूसरी तरफ सस्ते और सुलभ न्याय की पहुंच से लोगों को दूर किया जा रहा है। जरूरत है कि न्यायिक सुधार को लेकर सरकार की मंशा साफ हो।

देशबंधु से साभार

आरंभ में पढ़ें:-
ठेठरी खुरमी
फरा

Sep 12, 2010

क्या है 'प्लेजर डॉक्ट्रिन'

राष्ट्रपति की मर्जी (डॉक्ट्रिन ऑफ प्लेजर) का सिध्दांत कानून के शासन से शासित प्रजातंत्र में नहीं चल सकता। कोर्ट का मत है कि यह सामंतवादी सिध्दांत है जिसकी प्रजातंत्र में कोई जगह नहीं है। किसी भी सरकार और अथॉरिटी को अपनी खुशी के लिए कार्य करने का अधिकार नहीं है
इस डॉक्ट्रीन में स्पष्ट है कि रायपाल अनुच्छेद 156 (1) के तहत पांच वर्ष के लिए राष्ट्रपति की ओर से नियुक्त होता है, इसलिए उसे सिर्फ इस आधार पर नहीं हटाया जा सकता कि वह सत्ता में मौजूद पार्टी के विचारों से भिन्न विचार रखता है। राष्ट्रपति की मर्जी (डॉक्ट्रिन ऑफ प्लेजर) का सिध्दांत कानून के शासन से शासित प्रजातंत्र में नहीं चल सकता। कोर्ट का मत है कि यह सामंतवादी सिध्दांत है जिसकी प्रजातंत्र में कोई जगह नहीं है। किसी भी सरकार और अथॉरिटी को अपनी खुशी के लिए कार्य करने का अधिकार नहीं है। काम सदैव राजनैतिक स्थायित्व के लिए होनी चाहिए। 'डॉक्ट्रिन ऑफ प्लेजर' की सरकारी सेवा क्षेत्र में भी विचारणीय कटौतियां की गई हैं। अनुच्छेद 310 का उप अनुच्छेद 2 तथा अनुच्छेद 311 के उप अनुच्छेद 1 और 2 में प्रभावी तरीके से इस सिध्दांत को कमतर किया गया है। राय का रायपाल केंद्र का कर्मचारी, एजेंट या किसी पार्टी का हिस्सा नहीं होता, वह राय का संवैधानिक प्रमुख होता है। मंत्रिपरिषद और अटॉर्नी जनरल के मामले इससे अलग होते हैं। मंत्रीगण प्रधानमंत्री के चुने हुए व्यक्तिहोते हैं। प्रधानमंत्री और मंत्रियों के बीच विशुध्द राजनीतिक रिश्ता होता है। वहीं अटॉर्नी जनरल और एडवोकेट जनरल का संबंध भी सरकार के साथ मुवक्किल और वकील का होता है। यदि सरकार का उनसे विश्वास उठ जाए या वह ऐसे काम करने लगे जो सरकार की नीति के विरुध्द हों तो उन्हें विश्वास हनन के कारण हटाया जा सकता है। लेकिन रायपाल के मामले में यह आधार कतई उपयुक्त नहीं कहा जा सकता।

देशबंधु से साभार. 

आरंभ में पढ़ें :-
कठफोड़वा और ठेठरी खुरमी
गांव के सुगंध के साथ फरा

Sep 11, 2010

कब पूरी होगी सस्ते इंसाफ की आस

दुर्घटना में मारे गए व्यक्ति के परिजन कर्ज लेकर मुकदमा लडते रहते हैं और जब मुआवजा मिलता है तो उनके हिस्से कुछ खास नहीं आता, क्योंकि मुआवजे की रकम कर्ज चुकाने में चली जाती है। बिल्कुल स्पष्ट और उचित बात है। अगर सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दाखिल करने का न्यूनतम खर्च देखा जाए तो वह भी करीब 10 हजार रुपए बैठता है। मुश्किल से दो जून की रोटी कमाने वाले कर्मचारी के लिए यह आसान नहीं है लेकिन इंसाफ लेने की लडाई में और अपनी रोजी-रोटी बचाने के लिए कई आम लोग सुप्रीम कोर्ट तक अपना मुकदमा लडते हैं। ऐसी परिस्थिति में या तो वह न्याय की आस छोडे या फिर अपनी जमीन-जायदाद बेच कर न्याय की मनुहारी करे। ऐसे में जरूरी है कि न्याय हो भी और न्याय होते भी दिखे। चाहे वह कोई भी न्यायालय हो सुस्पष्ट, सक्षम, निर्भय तथा विधि सिध्दांतो का सही पालन करके ही आम जनता को शीघ्र, सरल एवं संतुष्टिजनक न्याय दिलाया जा सकता है। इससे संबंधित जवाबदेही की बात करें तो सभी राय सरकारों का कर्तव्य है कि वह संविधान में दी गई मर्यादाओं का पालन करते हुए त्वरित न्याय के अपने इस कर्तव्य को निभाए
मु कदमेबाजी की भी अपनी एक आर्थिकी है। क्या अमीर क्या गरीब सभी इसकी शरण में आते हैं। न्याय पाने की इच्छा सभी को अदालत की देहरी तक खींच कर लाती है। जब महंगाई ने जीवन के किसी हिस्से को अछूता नहीं छोडा तो फिर विधि-विधान इससे कैसे बची रह सकती है। इंसाफ भी काफी महंगा हो चुका है। चूंकि मुकदमे की पेंच में समाज का हरेक तपका फंसता है, देखने वाली बात है कि इसका ज्यादा प्रभाव किस वर्ग पर पडता है। देश के सर्वोच्च व्यवसायिक गद्दी पर बैठे अंबानी भाइयों का मुकदमा सभी देख चुके हैं। मामला सुलझाने के लिए दोनों भाइयों ने मुकदमेबाजी में करोडों रुपए स्वाहा किए। यह अलग बात है कि बाद में उन्हें भान हुआ कि ऐसे मसले कोर्ट से ज्यादा अच्छी तरह से आपस में मिल-बैठ कर निबटाए जा सकते हैं। अदालती खर्च पर विराम लगाकर मामला बाहर सुलझाया गया। लेकिन जरा गरीबों के बारे में सोचें। कोई गरीब अपनी कमाई के हिस्से से रोजी-रोटी चलाए या फिर मुकदमेबाजी पर खर्च करे। एक अदना सुनवाई पर हजारों खर्च करने पडते हैं। इस बाबत कह सकते हैं कि सस्ता इंसाफ गरीबों के लिए मुश्किल है। कई विशेषज्ञ तो नक्सलवाद जैसी समस्याओं की जड में महंगे इंसाफ को भी देखते हैं। कई बार कोर्ट इस बात की ओर सरकार का ध्यान आकृष्ट कर चुकी है कि आदिवासी लंबी दूरी की यात्रा कर अगर अदालती कार्रवाई के लिए जाते हैं तो न्याय पाने के अलावा मुकदमे पर होने वाली खर्च की भी चिंता होती है।
उसमें भी अगर तारीख पर तारीख पडते जाएं तो फिर उनके न्याय की आस धूमिल होती जाती है। न्याय पर से उठते विश्वास का एक कारण महंगे खर्च भी हैं। यह अच्छी बात है कि मुफ्त कानूनी सहायता के तहत गरीबों को मुकदमा लडने के लिए वकील तो सरकार देती है लेकिन जमानत की रकम और जमानती धन का इंतजाम हर अभियुक्त को खुद करना पडता है जो गरीबों के लिए आसान बात नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि कैसे हो गरीबों की मुश्किल का हल? इस हल की दिशा में हम सरकार को निष्क्रिय साबित नहीं कर सकते। यह कतई उचित नहीं होगा, क्योंकि पूर्व में ऐसे कई निर्णय लिए गए हैं ताकि गरीबों को जल्दी, सस्ता और सुलभ न्याय मिल सके। मोबाइल अदालतें इसी की ओर एक अच्छी कदम मानी जा सकती है। इसके तहत अदालतों को सुझाव दिया गया कि उनका उद्देश्य ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों के लोगों को जल्द न्याय दिलाना है। धीमी न्याय प्रक्रिया और अदालतों की कमी के कारण लंबित पड़े ढाई से तीन करोड़ मुकदमों को देखते हुए मोबाइल अदालतें बनाने का यह सुझाव बेहद उपयोगी मानी जा सकती है। यह योजना समग्र न्याय दिलाने के यूपीए सरकार की जवाबदेही का हिस्सा है। इसके प्रावधानों को देखें तो केंद्र सरकार का इरादा ग्राम न्यायालय अधिनियम-2008 के तहत पंचायत स्तर पर 5 हजार से यादा अदालतें स्थापित करने का भी है, ताकि ग्रामीण आबादी को उसके दरवाजे पर ही न्याय दिलाया जा सके। इन अदालतों में सरल कानूनी प्रक्रिया अपना कर मुकदमों की सुनवाई 90 दिन के अंदर निबटाई जा सकती है। जहां तक मोबाइल अदालतों की बात है, तो 'कोर्ट ऑन वील्स' नाम की इस योजना में न्यायिक सेवा के अधिकारी एक विशेष ट्रेन से देश के अलग-अलग हिस्सों में जाएंगे। लेकिन इस प्रावधान को लेकर एक उचित सवाल उठाई जा सकती है। सवाल रेलवे ट्रैक के विस्तार की है। देश के कितने ऐसे क्षेत्र हैं जहां रेलवे लाइन तो क्या, कच्ची-पक्की सडक़ें तक नहीं हैं। बाढ क़े दिनों की बात तो छोड ही दें, अमूमन सूखे के दिनों में लोगों को माथे पर गठरी रखे मीलों की यात्रा कर प्रमुख सडक़ मार्ग तक आना पडता है। उन क्षेत्रों में इन मोबाइल कोर्ट का क्या औचित्य? सवाल जायज है। हल हमारे विधि-विधाताओं को ढूंढना है। या तो पहले रेलवे लाइन बिछाएं फिर कोर्ट ऑन व्हील की बात करें। हमें इंतजार करना होगा कि रेलवे लाइन बिछे और उन दूरदराज के क्षेत्रों में कचहरी लगे। बात तो यह हो रही है कि लोक अदालतों और ग्राम न्यायालयों की तरह ही काम करने वाली इन मोबाइल अदालतों से गांव-देहात में रहने वाले गरीबों के मामले उन्हीं के इलाके में निबटाए जाएंगे और तेजी से निबटाए जाएंगे। लेकिन जहां रेलवे की सुविधा ही नहीं, वहां किस बात का त्वरित न्याय। अभी ऐसे इलाकों में रहने वाले लोगों को किसी मुकदमे के सिलसिले में 20-50 किलोमीटर दूर स्थित अदालत में जाना पड़ता है। इससे उनके वक्त और धन, दोनों का नुकसान होता है। इस दौरान उन्हें अपनी खेती-मजदूरी गंवानी पड़ती है। अगर कोई केस लंबा खिंच जाए तो गरीब के खेत-मकान तक बिकने की नौबत आ जाती है। कोर्ट ऑन वील्स की इस योजना से लाखों छोटे-मोटे मुकदमों के निबटारे की गति बढाए जाने की बात हो रही है। लेकिन यह बात तो तभी सार्थक होगी जब इससे संबंधित इंफ्रास्ट्रक्चर की मांगें पूरी की जाएं। इसलिए हमें देखने की जरूरत होगी कि यह योजना कहीं राजनीतिक शिगूफा साबित नहीं हो जाए और इससे सस्ते न्याय की गरीबों की जरूरत में अडंग़ा न लग जाए। हम सुनते आए हैं कि भारतीय विधि सत्यम शिवम, सुन्दरम पर आधारित है। क्या इन तीन शब्दों का पालन आज हो रहा है।
ध्यान देने वाली बात है कि यहां बात वैसे लोगों के इंसाफ की हो रही है जिनके लिए सस्ता इंसाफ आज भी एक दु:स्वप्न ही है। भारतीय विधि में यह बात भी समाहित है कि न्याय में विलम्ब न हो और शीघ्र से शीघ्र न्याय लोगों को प्राप्त हो लेकिन मामालों की लंबी संख्या, अधिवक्ताओं, न्यायाधिशों एवं साक्षियों के समय पर उपस्थित नहीं हो पाने के कारण शीघ्र न्याय का सिध्दांत भी केवल कहने-सुनने की बात हो गई है। जस्टिस डिलेड, जस्टिस डिनाइड। इसका तात्पर्य है न्याय देरी से प्राप्त होना, न्याय को नकारना कहा जाता है लेकिन आज आम जनों के समक्ष ऐसी कई सारी परेशानियां खडी हो जाती हैं जिससे समय से उन्हें न्याय नहीं मिल पाता है। शीघ्र, सस्ता और सुलभ न्याय का सिध्दांत तो ऐसा लग रहा है जैसे दूर की कौडी हो। सस्ते इंसाफ की ओर देश की राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने भी सबका ध्यान खींचा है। उनका कहना है कि मुकदमेबाजी गरीबों के लिए कोई सस्ता विकल्प नहीं है। कोर्ट फीस और वकील की फीस को ध्यान में रखते हुए न्याय तक गरीबों की पहुंच को आसान किया जाना जरूरी है। हालांकि महंगे न्याय का अहसास विधि आयोग को बखूबी है। एक मोटर वाहन दुघर्टना मामले पर अपनी रिपोर्ट में आयोग ने कहा कि दुर्घटना में मारे गए व्यक्ति के परिजन कर्ज लेकर मुकदमा लडते रहते हैं और जब मुआवजा मिलता है तो उनके हिस्से कुछ खास नहीं आता, क्योंकि मुआवजे की रकम कर्ज चुकाने में चली जाती है। बिल्कुल स्पष्ट और उचित बात है। अगर सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दाखिल करने का न्यूनतम खर्च देखा जाए तो वह भी करीब 10 हजार रुपए बैठता है। मुश्किल से दो जून की रोटी कमाने वाले कर्मचारी के लिए यह आसान नहीं है लेकिन इंसाफ लेने की लडाई में और अपनी रोजी-रोटी बचाने के लिए कई आम लोग सुप्रीम कोर्ट तक अपना मुकदमा लडते हैं। ऐसी परिस्थिति में या तो वह न्याय की आस छोडे या फिर अपनी जमीन-जायदाद बेच कर न्याय की मनुहारी करे। ऐसे में जरूरी है कि न्याय हो भी और न्याय होते भी दिखे। चाहे वह कोई भी न्यायालय हो सुस्पष्ट, सक्षम, निर्भय तथा विधि सिध्दांतो का सही पालन करके ही आम जनता को शीघ्र, सरल एवं संतुष्टिजनक न्याय दिलाया जा सकता है। इससे संबंधित जवाबदेही की बात करें तो सभी राय सरकारों का कर्तव्य है कि वह संविधान में दी गई मर्यादाओं का पालन करते हुए त्वरित न्याय के अपने इस कर्तव्य को निभाए। यह सच है कि नई बेंच बनाने में खर्चा होगा, किन्तु विधि आयोग ने स्पष्ट किया है कि- 'यह राय सरकार का कर्तव्य है कि वह नागरिक को सस्ता, सुलभ और त्वरित न्याय दिलाए।' इसलिए अर्थ की व्यवस्था का प्रश्न असंगत सा ही लगता है। जन-जन तक न्याय को सुलभ कराना गांधीजी का स्वप्न था, हम पूरा प्रयास कर राष्ट्रपिता के प्रति अपनी श्रध्दांजलि अर्पित कर सकते हैं।

देशबंधु सं साभार

आरंभ में पढ़ें : -

Sep 10, 2010

संपत्ति जब्त करने का कानून बने

प्रभात कुमार, पूर्व राज्यपाल
लूट-पाट का अर्जन तभी रुकेगा जब ऐसी काली कमाई को 'कंपल्सरी एक्वायर' किया जाए। भ्रष्टाचारियों के दिमाग में कम से कम यह डर तो बैठे कि लूटने के बाद उसे जब्त करने का भी प्रावधान है। जब प्रावधान ही नहीं है, तो फिर डर किस बात का। देश में ऐसी जब्ती का कोई कानून का नहीं होना, भ्रष्टाचार को और विद्रूप करता जा रहा है।
भ्र ष्टाचार का कैंसर पूरी व्यवस्था को जकड चुका है। अपराध का मामला इतना संगीन हो चला है कि कोई विभाग इससे अछूता नहीं रहा। मैं तो एक ही शब्द में कहूंगा कि अपराधियों को फांसी पर लटका देना चाहिए। बांबे हाईकोर्ट ने सरकारी बाबुओं के भ्रष्टाचार के संदर्भ में आजीवन कारावास की बात कही। लेकिन यह सलाह सिर्फ बाबुओं के लिए ही क्यों? इस सजा के तहत वे सारे लोग आने चाहिए जो किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार करते हैं या फिर अपरोक्ष तरीके से उसे बढावा देने में मदद करते हैं। भ्रष्टाचार का आरोपी कोई भी हो, कानून सबके लिए एक है। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए मौजूदा कानूनी प्रावधान नाकाफी है। दोषी पाए जाने पर सजा तो हो जाती है, लेकिन भ्रष्ट आचरण से कमाई गई संपत्ति का कुछ नहीं होता। वह तो यूं ही स्वामित्व में बनी रहती है। इस कारण आगे गलती करने में एक तरह से प्रोत्साहन मिलता है। इस प्रोत्साहन को जड से समाप्त करने का उपाय होना जरूरी है। कई सारे मामले सामने आए हैं जिसमें राजनेता, सरकारी अधिकारी, बैंकर या फिर सार्वजनिक जीवन के लोग भ्रष्ट कारनामों से संपत्ति अर्जित किए हैं। अर्जित धनराशि की मात्रा भी ऐसी कि लोग सुनते ही दांतों तले उंगली दबा लें। परिणाम भी सामने आए लेकिन उन्हें हुआ कुछ भी नहीं। लूट-पाट का अर्जन तभी रुकेगा जब ऐसी काली कमाई को 'कंपल्सरी एक्वायर' किया जाए। भ्रष्टाचारियों के दिमाग में कम से कम यह डर तो बैठे कि लूटने के बाद उसे जब्त करने का भी प्रावधान है। जब प्रावधान ही नहीं है, तो फिर डर किस बात का। देश में ऐसी जब्ती का कोई कानून का नहीं होना, भ्रष्टाचार को और विद्रूप करता जा रहा है। मौजूदा हालात को देखते हुए यह आवश्यक है कि अपराध के दंड के प्रावधान के साथ-साथ भ्रष्ट कमाई को भी जब्त करने पर कारगर कदम उठाए जाएं। संपत्ति जब्त करने का कोई कानून हाल-फिलहाल में बनते नहीं दिखता, क्योंकि सरकार में इतनी हिम्मत नहीं कि वह कोई कठोर कदम उठाए। हालांकि विधि आयोग ने इस संदर्भ में एक बिल भी सरकार को दिया है, लेकिन उस पर विचार कहां हो रहा है। सरकार को इसे प्राथमिक अहमियत देते हुए अविलंब विचार करना चाहिए।

आरंभ में पढ़ें : -
रौशनी में आदिम जिन्दगी : भाग 1
रौशनी में आदिम जिन्दगी : भाग 2
रौशनी में आदिम जिन्दगी : भाग 3
रौशनी में आदिम जिन्दगी : भाग 4

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