Sep 28, 2009

नक्सली क्षेत्रों की गुमशुदा लोगों की जानकारी एवं बंदीप्रत्यक्षीकरण याचिका पर हुई सुनवाई

बिलासपुर हाईकोर्ट ने एक बंदीप्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई करते हुए मानव अधिकार आयोग की रिपोर्ट व सुझाव पर की गई कार्रवाई की जानकारी मांगी है। आयोग ने शासन को नक्सली क्षेत्रों की गुम इंसानों की जानकारी सूचीबद्घ करने सहित अन्य सुझाव दिए हैं। प्रकरण की अगली सुनवाई २० अक्टूबर को होगी। बीहड़ नक्सली क्षेत्र एर्राबोर थाना अंतर्गत ग्राम गरभागुड़ा निवासी बेकोसिन्ना ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की है। इसमें कहा गया है कि अप्रैल-मई २००८ में १०० से अधिक सलवा जुड़ूम के कार्यकर्ता, एसपीओ सहित पुलिस के जवान उनके गांव को घेर लिया। इस दौरान वे याचिकाकर्ता के पिता व बहन सहित अन्य महिलाओं को पकड़कर अपने साथ ले गए। उनके डर से गांव वाले गांव छोड़कर भाग गए।

याचिका के अनुसार नक्सली क्षेत्र के ग्रामीण नक्सलियों से ज्यादा पुलिस से भयभीत रहते हैं। घटना के कुछ दिन बाद याचिकाकर्ता के पिता की लाश एर्राबोर कैम्प में लाई गई। इसकी सूचना याचिकाकर्ता को भी दी गई। इसी तरह घटना के दौरान पकड़ी गईं महिलाओं को भी छोड़ दिया गया। बेकोसिन्ना अपनी बहन के बारे में वहां पूछताछ करता रहा, लेकिन किसी ने कुछ नहीं बताया। पुलिस के डर से वह दोबारा थाने में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। इसके बाद वह जेल, अस्पताल सहित अन्य जगहों में अपनी बहन की खोज की। उसने २९ दिसंबर २००८ को एसपी को पत्र लिखकर शिकायत कर जांच की मांग की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। उसे थक हार कर हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में गुरूवार को इस मामले की सुनवाई हुई। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को विलंब से आने के कारण परिस्थितियों में बदलाव होने की बात कही।

सुनवाई के दौरान सलवा जुडूम से संबंधित सुप्रीम कोर्ट में नंदिनी सुंदरम्‌ व हाईकोर्ट में लंबित एक प्रकरण में मानव अधिकार आयोग के सुझाव पर चर्चा की गई। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मानवाधिकार आयोग ने जांच रिपोर्ट के अलावा सुझाव दिए हैं। इस पर राज्य शासन को अमल करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके तहत गृह सचिव ने पुलिस महानिदेशक को पत्र जारी किया है। इसमें नक्सल प्रभावित क्षेत्र के गुमइंसानों की सभी जानकारियांरखने के निर्देश का हवाला दिया गया है।

Sep 27, 2009

वाणिज्यिक कर और वैट कर वसूली मामले में : छ.ग. हाईकोर्ट नें ९ अक्टूबर तक शासन से मांगा जवाब

५०० करोड़ रूपए के वाणिज्यिक कर और वैट कर वसूली के एक मामले में तेंदूपत्ता व्यापारियों की याचिका पर छत्‍तीसगढ हाईकोर्ट ने राज्य शासन को ९ अक्टूबर तक जवाब देने का आदेश दिया है। प्रकरण की अंतिम सुनवाई २५ नवंबर को होगी। राज्य शासन द्वारा वसूले जा रहे वाणिज्यिक कर व वेट कर (वेल्यू एडेड टैक्स) के खिलाफ प्रदेशभर के तेंदूपत्ता व्यापारियों ने अलग-अलग याचिकाएं दायर की हैं।

सभी मामले वर्ष २००२ से हाईकोर्ट में लंबित हैं। याचिकाओं में तेंदूपत्ता व्यापारियों ने २५ फीसदी टैक्स वसूली करने के निर्णय को चुनौती दी है। उनका कहना है कि तेंदूपत्ता व्यापारी एक निर्यातक के रूप में काम कर रहे हैं। उन्होंने राज्य शासन से इन्हीं शर्तों के आधार पर तेंदूपत्ता खरीदी करने के लिए समझौता किया है कि तेंदूपत्ता को अन्य राज्यों में बेचा जाएगा। इस तरह से यह एक अंतराज्यीय व्यापार है, जिस पर २५ प्रतिशत टैक्स वसूलना गलत है। याचिका में शासन के इस निर्णय को अवैधानिक बताया गया है। हाईकोर्ट में दायर सैकड़ों याचिकाओं पर अलग-अलग स्थगन आदेश दिए गए हैं। इसके साथ ही २००९ में दाखिल मामलों में भी स्थगन आदेश जारी किया गया है। सभी पुराने मामलों में शासन ने जवाब व प्रतिजवाब प्रस्तुत कर दिए हैं।

Sep 25, 2009

शासन नें जवाब के लिए 9 बार समय लिया कोर्ट नें 9 हजार जुर्माना किया

एक याचिका पर नौ बार अवसर मिलने के बाद भी जवाब देने पर छत्‍तीसगढ हाईकोर्ट ने राज्य शासन पर 9 हजार रुपए जुर्माना किया है। जस्टिस अग्निहोत्री की सिंगल बेंच ने जुर्माने की रकम जवाब देने के लिए दोषी अधिकारी से वसूल करने के निर्देश दिए हैं। लोक निर्माण विभाग बिलासपुर में सहायक ग्रेड-2 के पद से रिटायर सीएल कौशिक से विभाग ने वसूली के आदेश दिए थे। उनके खिलाफ चार लाख रुपए की रिकवरी का आदेश निकाला गया था। यह राशि उनकी पेंशन, ग्रेच्यूटी रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले अन्य भुगतान से वसूल करने का आदेश दिया गया था। विभाग का कहना था कि सर्विस में रहने के दौरान श्री कौशिक के कार्यो से विभाग को नुकसान हुआ है। इसकी भरपाई उनसे की जा रही है।

इस कार्रवाई के खिलाफ श्री कौशिक ने वर्ष 2005 में हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इसे प्राकृतिक न्याय सिद्धांत के खिलाफ कहा था। उनका कहना था कि कार्रवाई के पहले तो उन्हें कोई नोटिस दिया गया और ही यह बताया कि उनके किन कार्यों से विभाग को नुकसान हुआ है। बिना बतलाये सीधे वसूली की कार्रवाई शुरू कर दी गई। कोर्ट ने सुनवाई के बाद राज्य शासन लोक निर्माण विभाग को नोटिस जारी कर जवाब देने कहा। कई बार नोटिस देने के बाद भी शासन की ओर से जवाब नहीं दिया गया। सुनवाई के दौरान हर बार शासन की ओर से जवाब के लिए समय ले लिया जाता था। पिछले दिनों कोर्ट में मामला सुनवाई के लिए आया तो शासन की ओर से जवाब के लिए फिर समय मांगा गया।

कोर्ट ने जानना चाहा कि अब तक जवाब क्यों प्रस्तुत नहीं किया गया और कितनी बार जवाब के लिए समय लिया जा चुका है। कोर्ट को बताया गया कि शासन की ओर से जवाब के लिए 9 बार समय लिया गया है। इसे गंभीरता से लेते हुए कोर्ट ने शासन पर 9 हजार रुपए जुर्माना किया है।

Sep 23, 2009

महाभारत काल से चली आ रही है मध्यस्थता की परंपरा

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के तत्वावधान में छत्‍तीसगढ की राजधानी रायपुर के एक निजी होटल में तीन दिनों से चल रहे राज्य स्तरीय मध्यस्थता प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के न्यायाधीश टी.पी. शर्मा की उपस्थिति में सोमवार को हुआ। समारोह में छत्तीसगढ़ शासन के विधि एवं विधायी विभाग के प्रमुख सचिव आरएस शर्मा, राज्यपाल के विधिक सलाहकार टीके चक्रवर्ती, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के एडिशनल रजिस्ट्रार राजेश श्रीवास्तव उपस्थित थे।

श्री शर्मा ने कहा कि मध्यस्थता की प्रथा शुरु से रही है और मध्यस्थ की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। महाभारत काल में भगवान कृष्ण पांडवों के लिए पांच गांव मंगाने के लिए कौरवों के पास आए थे। उसी तरह भगवान राम ने भी युद्ध प्रारंभ होने के पूर्व अंगद को मध्यस्थ बनाकर रावण के पास भेजा था और ऐसे आदमी की मध्यस्थ चुना गया जो विश्वास पात्र था। उन्होंने कहा कि यह मध्यस्थता प्रशिक्षण कार्यक्रम का प्रथम चरण था, द्वितीय चरण भी जल्द ही होगा। तीन दिवसीय मध्यस्थता प्रशिक्षण शिविर में दिल्ली से विशेष योग्यता प्राप्त ट्रेनर डॉ. सुधीर कुमार जैन, डॉ. रेणु अग्रवाल, केके माखीजा ने मध्यस्थता की तथा विभिन्न पहलुओं से अवगत कराया।

उन्होंने मध्यस्थता से किस तरह दोनों पक्ष से विजय प्राप्त करते हुए हमेशा के लिए अपने विवाद का अंत स्वयं के द्वारा सुझाए गए समाधान से करते है, इसके लिए कई तरह के स्लाइड, रोल प्ले के माध्यम से ट्रेनर द्वारा प्रशिक्षण दिया गया। कार्यक्रम में राज्य अधिवक्ता संघ के सदस्य केके शुक्ला एवं विधिक सहायता पेनल के अधिवक्ताओं ने हिस्सा लिया।

Sep 21, 2009

छ.ग. कृषि सर्वेयरों के वेतन विसंगति दूर करने हाईकोर्ट ने माह भर का समय दिया


छत्तीसगढ़ शासन द्वारा कृषि सर्वेयरों के वेतन विसंगति दूर करने बिलासपुर हाईकोर्ट के फैसले से कृषि सर्वेयरों में खुशी की लहर हैं। यह आदेश 17 सितंबर को जारी किया गया है, जिसके अनुसार शासन को माह भर का समय दिया गया है। छग भूमि संरक्षण कृषि सर्वेयर संघ द्वारा वेतन विसंगति दूर करने हेतु लगाई उक्‍त याचिका पर उच्च न्यायालय बिलासपुर ने फैसला सुनाते हुए प्रमुख सचिव एवं कृषि उत्पादन आयुक्त छग शासन, रायपुर सचिव कृषि छग शासन रायपुर एवं सामान्य प्रशासन विभाग को निर्देश दिया है कि सर्वेयरों की वेतन विसंगति का निराकरण 30 दिनों की समयावधि में आवश्यक रूप से करें। उपरोक्त संदर्भ में ज्ञातव्य है कि म.प्र. कृषि सर्वेयर संघ द्वारा जबलपुर उच्च न्यायालय में दायर याचिका 1992 एवं 1999 के परिपेक्ष्य में जबलपुर हाईकोर्ट ने म.प्र. शासन को सर्वेयरों की वेतन विसंगति दूर करने का निर्देश दिया था। म.प्र. शासन ने उच्च न्यायालय के निर्णय के परिपेक्ष्य में म.प्र. कृषि सर्वेयरों का वेतन रू. 3500-5200 के स्थान पर 4500-7000 पांचवे वेतनमान में संशोधित कर दिया हैं। मगर छग में शासन द्वारा उक्त निर्णय अमल न करने पर संघ द्वारा बिलासपुर उच्च न्यायालय में याचिका प्रस्तुत की थी। बिलासपुर उच्च न्यायालय के फैसले से सर्वेयरों में हर्ष व्याप्त है। कृषि सर्वेयर संघ के प्रांताध्यक्ष अशोक शर्मा एवं संघर्ष समिति के अध्यक्ष आरपी गौतम ने छग शासन से न्यायालय के निर्णय के परिपेक्ष्य में शीघ्र आदेश प्रसारित करने का निवेदन किया है।

Sep 19, 2009

छत्‍तीसगढ पीएससी के पुराने मामलों की सुनवाई बढ़ी

छत्‍तीसगढ पीएससी के पुराने मामलों की सुनवाई कल शुक्रवार को हाईकोर्ट में हुई। इस दौरान एक याचिकाकर्ता की ओर से समय मांगने पर सुनवाई चार सप्ताह के लिए बढ़ा दी गई। वर्ष 2003 व 2005 में हुई पीएससी परीक्षा में गड़बड़ी को लेकर भी पूर्व में कई याचिकाएं दायर की गईं हैं। इनमें भी पीएससी की परीक्षा प्रणाली, आरक्षण, गलत उत्तरों के आधार पर परिणाम घोषित करने सहित कई मुद्दे उठाकर परीक्षा निरस्त कर नए सिरे से चयन प्रक्रिया शुरू करने की मांग की गई है।

इनमें याचिकाकर्ता वर्षा डोंगरे, चमनलाल सिन्हा सहित एक जनहित याचिका भी दायर की गई है। जनहित याचिका में वर्ष 2005 की परीक्षा को पूरी तरह अवैध बताते हुए इसे निरस्त करने की मांग की गई है। याचिका में बताया गया है कि 2005 की पूरी परीक्षा ही गलत तरीके से ली गई। इसमें किसी नियम का पालन नहीं किया गया। इस दौरान अध्यक्ष को हटाया गया, पीएससी के कई अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर भी हुई।

इसलिए इस परीक्षा के बाद हुई नियुक्तियों को वैध नहीं ठहराया जा सकता। ये सभी मामले आज चीफ जस्टिस राजीव गुप्ता, जस्टिस एसके सिन्हा की डिविजन बेंच में सुनवाई के लिए प्रस्तुत हुए। जनहित याचिका दायर करने वाले वकील द्वारा समय मांगने पर सभी मामलों की सुनवाई बढ़ा दी गई। गौरतलब है कि वर्ष 2008 की पीएससी परीक्षा की मुख्य परीक्षा हाईकोर्ट ने पहले ही आगामी आदेश तक स्थगित करते हुए अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को तय की है।

राजीव गांधी शिक्षा मिशन में संकुल समन्वयकों की नियुक्ति हाईकोर्ट के आदेश अनुसार


छत्तीसगढ़ शासन के अवर सचिव ने एक सरकुलर जारी कर कहा था कि राजीव गांधी शिक्षा मिशन में संकुल समन्वयकों के पदों पर उच्च श्रेणी शिक्षक व शिक्षाकर्मी वर्ग-2 को ही लिया जाएगा। इस सरकुलर को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में कई संकुल समन्वयकों ने अलग-अलग याचिकाएं दायर की गईं थीं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि अवर सचिव को विभाग के संबंध में सरकुलर या दिशा-निर्देश जारी करने का अधिकार नहीं है। इसकी वजह है कि मिशन केंद्र द्वारा संचालित है। उसके निर्देश पर ही यह अलग विभाग बनाया गया है जिसमें सोसायटी एक्ट के तहत कामकाज होता है। मुख्यमंत्री इसके सभापति होते हैं। आदिम जाति कल्याण, शिक्षा विभाग, महिला व बाल विकास विभाग के मंत्री इसके उप सभापति होते हैं। प्रदेश के मुख्य सचिव व उक्त तीनों विभागों के सचिव सदस्य और शिक्षा सचिव मिशन संचालक होते हैं। इस विभाग का अलग सेटअप होता है। मिशन के सभापति, सदस्य और संचालक बैठक कर ही इस विभाग के संबंध में कोई फैसला ले सकते हैं।

अवर सचिव का उक्‍त सरकुलर या आदेश संविधान के अनुच्छेद 166 का भी उल्लंघन करता है। इसके अनुसार इस तरह के सरकुलर पर राज्यपाल की सहमति जरूरी है। जिसमें स्पष्ट तौर पर राज्यपाल के आदेशानुसार लिखा जाता है। याचिकाओं में यह भी कहा गया कि पहले से कार्यरत संकुल समन्वयकों को भी नए सिरे से परीक्षा देने को कहा जा रहा है, यह भी गलत है क्योंकि वे वर्षो से यह काम कर रहे हैं और नए लोगों को इसकी ट्रेनिंग भी देते हैं। इस याचिका पर कोर्ट के द्वारा भेजे गए नोटिस पर राज्य शासन ने कहा था कि यह नीतिगत निर्णय है। शासन नियम बना सकता है। इस पर सुनवाई के बाद सिंगल बेंच ने याचिका खारिज कर दी थी।

ईश्वर प्रसाद तिवारी व एक अन्य कोआर्डिनेटर ने इसे खिलाफ डिविजन बेंच में अपील की थी। युगलपीठ ने याचिका स्वीकार कर प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हुए नियुक्ति पर कोर्ट का आदेश लागू करने का फैसला दिया। राजीव गांधी शिक्षा मिशन में संकुल समन्वयकों (कोआर्डिनेटर) की नियुक्ति पर हाईकोर्ट का निर्णय लागू होगा। चीफ जस्टिस राजीव गुप्ता, जस्टिस एसके सिन्हा की डिविजन बेंच ने शिक्षकों की रिट अपील पर यह फैसला दिया।

Sep 18, 2009

छत्‍तीसगढ में जरूरतमंदों की मदद के लिए तीसरे न्याय सदन का लोकार्पण

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा बिलासपुर शहर में स्थापित न्याय सदन का लोकार्पण बुधवार को राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यकारी अध्यक्ष जस्टिस धीरेन्द्र मिश्रा ने किया। इस अवसर पर जस्टिस मिश्रा ने कहा कि न्याय सदन की स्थापना से जरूरतमंदों को न्याय पाने में मदद मिलेगी। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण कार्यालय, बिलासपुर में न्याय सदन का लोकार्पण करते हुए जस्टिस मिश्रा ने कहा कि न्याय सदन की उपयोगिता को समझने के लिये जिला, राज्य एवं राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के उद्देश्यों को समझना होगा। विधिक सेवा प्राधिकरण के गठन का उद्देश्य यह है कि राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक किसी भी तरीके से न्याय प्राप्ति से वंचित न रहे। ऐसे प्रयास किए जाएं जिससे जरूरतमंद लोगों को नि:शुल्क न्याय मिल सके।

न्याय सदन की उपयोगिता तभी है जब वह इन लक्ष्यों की प्राप्ति में सहयोगी हो। जस्टिस मिश्रा ने बताया कि यह छत्तीसगढ़ राज्य का तीसरा न्याय सदन है। प्रथम न्याय सदन दंतेवाड़ा और दूसरा राजनांदगांव जिले में स्थापित किया जा चुका है। राज्य के अन्य जिलों में भी न्याय सदन निर्माण की प्रक्रिया चल रही है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए हाईकोर्ट के जज जस्टिस सुनील कुमार सिन्हा ने कहा कि कोई भी भवन कितना भी सुसज्जित हो जाए उससे तब तक लाभ नहीं मिलता, जब तक वह अपने उद्देश्यों को प्राप्त न करे। उन्होंने न्याय सदन की तुलना एक मंदिर से की। जिस तरह भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा के बिना मंदिर का कोई महत्व नहीं होता, उसी तरह न्याय के मंदिर में न्याय नहीं मिले तो उसका कोई अर्थ नहीं है।

जस्टिस मिश्रा ने विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यो पर प्रकाश डालते हुए बताया कि विधिक निरक्षता को दूर करने के लिए विधिक जागरूकता अभियान चलाने व आम आदमी के हितों के लिये बनाए गए विधिक नियमों की जानकारी देने, पक्षकारों में समझौते कराने के लिए जागरूकता पैदा करने का कार्य किया जाता है। कई कार्य प्राधिकरण के जिम्मे हैं, जिनमें विधिक साक्षरता अभियान बड़े पैमाने पर संपूर्ण राज्य में जारी है। जज, वकील स्वयंसेवी संगठनों के सहयोग से गांवों में विधिक जागरूकता लाने का काम कर रहे हैं!

कार्यक्रम में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की अध्यक्ष तथा जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्रीमती अनिता झा ने कहा कि न्याय सदन अशिक्षा और शोषण के खिलाफ अपनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाएगा। स्वागत भाषण देते हुए प्राधिकरण के सदस्य सचिव गौतम चौरड़िया ने न्याय सदन के उद्देश्य की प्राप्ति के लिये सभी के सहयोग की अपेक्षा की। कार्यRम में हाईकोर्ट के जज जस्टिस सतीश के. अग्निहोत्री, टी.पी. शर्मा, नवलकिशोर अग्रवाल,आर.एल. चन्द्राकर, आर.एल. झंवर, प्रीतिंकर दिवाकर, हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल अरविन्द श्रीवास्तव, न्यायिक अधिकारी प्रशिक्षण केन्द्र के डायरेक्टर जी. मिन्हाजुद्दीन, कुटुम्ब न्यायालय की न्यायाधीश श्रीमती अनुराधा खरे, असिस्टेंट सॉलीसिटर जनरल फौजिया मिर्जा, एडिशनल कलेक्टर धनंजय देवांगन व टीके वर्मा उपस्थित थे।

Sep 17, 2009

छत्‍तीसगढ के न्‍यायाधीशों व न्यायिक अधिकारियों का तबादला

छत्‍तीसगढ हाईकोर्ट ने एक एडिशनल रजिस्ट्रार जनरल व पांच जिला जजों का तबादला किया है। जारी आदेश के अनुसार हाईकोर्ट के अतिरिक्त रजिस्ट्रार जनरल गनपत राव को बिलासपुर से रायपुर अतिरिक्त जिला व सत्र न्यायाधीश बनाया गया है.
अतिरिक्त जिला, सत्र न्यायाधीश जयदीप विजय निमोलकर को बिलासपुर से सूरजपुर, ओंकार प्रसाद गुप्ता को दुर्ग से रायपुर, कांता मार्टिन को रायपुर से दुर्ग, शैलेष कुमार कोंडागांव से भानुप्रतापपुर और के. विनोद कुजूर को भानुप्रतापपुर से कोंडागांव स्थानांतरित किया गया है.

‘बाबर' फिल्म में नकारात्मक चित्रण के आरोप के साथ याचिका दायर

पिछले हफ्ते रिलीज हुई ‘बाबर' फिल्म में मुसलमानों का कथित तौर पर ‘नकारात्मक चित्रण' किये जाने को लेकर इस फिल्म पर रोक लगाने के लिये आज बंबई उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गयी। इस फिल्म के खिलाफ जनहित याचिका दायर करने वाले मुंबई के व्यवसायी अमर हुसैन मुकेरी ने सेंसर बोर्ड से इसे मिले अनुमोदन पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि इस फिल्म के कुछ पात्र और घटनायें वास्तविक जीवन के मुलायम सिंह यादव और मायावती जैसी शख्सियतों से स्पष्ट रूप से मेल खाते हैं। इस फिल्म का प्रसारण लोगों में सौहार्द को बिगाड़ेगा।

आशु‍ त्रिखा द्वारा निर्दे‍शित फिल्म ‘बाबर’ के खिलाफ अदालत में मुंबई के अनवर हुसैन मुकेरी ने याचिका दायर की है। ‘बाबर’ की कहानी है एक 12 साल के बच्चे की, जिसने इस छोटी सी आयु में एक खून कर दिया और फिर अपराध के इस सफर पर चलते हुए वो उत्तर प्रदेश का माफिया बन गया। अनवर हुसैन मुकेरी ने फिल्म के निर्माता, निर्देशक, सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ फिल्म सर्टिफिकेशन, भारत सरकार व महाराष्ट्र राज्य को कठघरे में खडा किया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि ''बाबर'' ऐसी फिल्म है जिसमें निर्माता ने मुस्लिम समाज का गलत चित्रण किया है। मुस्लिम परिवार, जिसमें बच्चे भी शामिल हैं को अपराध में लिप्त दिखाया है। उन्हें इस बात पर भी आपत्ति है कि फिल्म में पूरा मुसलमान मोहल्ला हिंसा व अपराध करता है, इसके अलावा कुछ नहीं करता। यह समाज अपने बच्चे को शिक्षा नहीं देता, बस अपराध करने के लिए प्रोत्साहित करता है। उन्हें आश्चर्य है कि कैसे निर्माता, निर्देशक ऐसी फिल्म बना सकते हैं और कैसे सेंसर बोर्ड ने इस सर्टिफिकेट दे दिया, जिसमें एक बच्चे को अपराध करता दिखाया है।

इस फिल्म का निर्माण ऋद्धि सिद्धि फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड ने किया है। इसमें ओमपुरी और मिथुन चक्रवर्ती ने भूमिका निभाई है। याचिकाकर्ता ने कहा है कि सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन को इसे ‘ए' प्रमाणपत्र के साथ भी लोगों को देखने के लिये अनुमोदित नहीं करना चाहिये था। उन्होंने फिल्म में मुसलमानों को ‘हिंसक' और ‘समाज विरोधी' चित्रित करने को लेकर आपत्ति जताई है। याचिकाकर्ता ने इस फिल्म पर तुरंत रोक लगाने की मांग करते हुए कहा कि इस फिल्म ने उनकी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाया है और अन्य मुसलमान भी इसे लेकर ऐसा ही महसूस कर सकते हैं। इस याचिका पर सुनवाई की तिथि आज 17 सितंबर को नियत है।

एनटीपीसी व रिलायंस विवाद में हमें भी पक्ष बनयें : अनिल अंबानी समूह

मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडिस्ट्रीज (आरआईएल) पर अपने और सरकारी कंपनी एनटीनपीसी के साथ गैस आपूर्ति गैस आपूर्ति अनुबंधं का उल्लंघन करने का आरोप लगाते हुए अनिल अंबानी समूह की कंपनी आरएनआरएल ने उच्चतम न्यायालय से कहा कि मुकेश की कंपनी के साथ उसके मुकदमे में सरकारी बिजली कंपनी (एनटीपीसी) को भी एक पक्ष बनाया जाए। अनिल अंबानी समूह ने सरकारी विद्युत कंपनी, राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (एनटीपीसी) और मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज के बीच कृष्णा-गोदावरी बेसिन से प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को लेकर पैदा हुए विवाद में एक पक्ष बनने के लिए सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। एनटीपीसी ने यह याचिका बंबई उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए की है, जिसने मुकेश अंबानी समूह की कंपनी को वहां अपनी याचिका में संशोधन की मंजूरी दी थी।
एनटीपीसी के मामले का ब्‍यौरा देते हुए आरएनआरएल ने कहा, ‘आरआईएल ने आरएनआरएल और एनटीपीसी के साथ हुए गैस आपूर्ति समझौते में अपनी शर्तें जोडड़ने के लिए एक ही तरह की प्रक्रिया अपनाई है ताकि वह उन्हें गैस अपूर्ति करने के की जिम्मेदारी से मुक्त हो सके। यह पूर्ण रूप से व्यावसायिक लालच का नतीजा है क्योंकि गैस की कीमतो में बढ़ोतरी शुरू हो गई है। समूह की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि 17 वर्षो के लिए 2.34 डॉलर प्रति यूनिट की दर से प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को लेकर रिलायंस इंडस्ट्रीज के साथ अनिल अंबानी समूह की रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेज और एनटीपीसी का विवाद एक समान है।
आरएनआरएल और एनटीपीसी दोनों आरआईएल के केजीडी 6 से 2.34 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू की दर से गैस की मांग कर रही हैं, जबकि आरआईएल अब ह दलील दे रहा है कि वह किसी को सरकार द्वारा निर्धारित कीमत पर ही गैस देने को बाध्‍य् है। आरएनआरएल ने यह आवेदन सर्वोच्‍य न्यायालय में 20 अक्तूबर को शुरू होने वाली इस मामले की अंतिम सुनावाई से पहले किया है। याचिका में कहा गया है, "ऐसा महसूस किया गया है कि एनटीपीसी द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दर्ज किए गए मामले में जिन मुद्दों को उठाया गया है वे मुद्दे सीधे तौर पर रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेज बनाम रिलायंस इंडस्ट्रीज के मामले को प्रभावित करते हैं।" याचिका में यह भी कहा गया है, "ऐसे में यह आवश्यक है कि रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेज को इस मामले में एक पक्ष बनने की अनुमति प्रदान की जाए।"

Sep 16, 2009

छत्‍तीसगढ़ उच्‍च न्‍यायालय बेंच व बार की खबरें

वकीलों की मदद का प्रस्ताव 5 माह से ठंडे बस्ते में

छत्‍तीसगढ़ हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष वीजी तामस्कर द्वारा लगभग पांच महीने पहले दिए गए एक प्रस्ताव पर वकीलों ने ध्यान ही नहीं दिया। उन्होंने वकीलों से एक फंड के लिए अंशदान देने का प्रस्ताव रखा था। इस फंड से मृतक वकीलों के परिजनों को तत्काल मदद देना तय किया गया था। बार कौंसिल व राज्य शासन के अंशदान को मिलाकर मृत वकीलों के परिजनों को एक लाख 75 हजार रुपए आर्थिक मदद के तौर पर दिए जाते हैं। यह रकम तुरंत नहीं मिलती, बल्कि मृतक वकीलों के कई मामले एक साथ कौंसिल की समिति में रखे जाते हैं। वहां विचार करने के बाद प्रकरण स्वीकृत होते हैं। शासन से भी अंशदान स्वीकृत कराया जाता है। इसके बाद ही परिजनों तक मदद पहुंच पाती है। बार एसोसिएशन की ओर से तुरंत मदद करने की सोच के तहत अध्यक्ष श्री तामस्कर ने मार्च-अप्रैल में एसोसिएशन के पदाधिकारियों व सदस्यों के समक्ष यह प्रस्ताव रखा। प्रस्ताव के अनुसार एसोसिएशन की ओर से फंड तैयार कर सभी वकील स्वेच्छा से इसमें कुछ रकम देंगे। यह राशि बैंक में जमा की जाएगी।

किसी वकील के आकस्मिक निधन पर इसमें से निर्धारित रकम उसके परिजनों को तत्काल उपलब्ध कराई जाएगी। इससे तत्कालिक तौर पर अंतिम संस्कार व अन्य कार्यो के लिए परिजनों को राशि का इंतजाम करने के लिए दौड़-धूप नहीं करनी पड़ेगी। इस प्रस्ताव पर अब तक वकीलों में सहमति नहीं बन पाई। जिससे यह ठंडे बस्ते में है।

जजों के सम्मान व विदाई पर मतभेद

जजों के सम्मान और विदाई समारोह को लेकर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों में मतभेद दिख रहा है। एसोसिएशन के अध्यक्ष सहित कुछ सदस्य ऐसे आयोजनों के खिलाफ हैं, जबकि कुछ सदस्य आयोजन कराना चाहते हैं। बार एसोसिएशन में जजों की नियुक्ति या रिटायरमेंट के बाद होने वाले आयोजन को लेकर मतभेद है। अध्यक्ष वीजी तामस्कर का मानना है कि इसमें खर्च होने वाली राशि का उपयोग वकीलों के हित में किया जाना चाहिए। इस बीच एसोसिएशन द्वारा 15 सितंबर को आयोजित कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया था.

इस कार्यक्रम में हाल ही में नियुक्त चार जजों जस्टिस आरएन चंद्राकर, एनके अग्रवाल, आरएल झंवर, प्रीतिंकर दिवाकर का सम्मान और रिटायर्ड जज दिलीप रावसाहेब देशमुख को विदाई दी जानी थी।

म.प्र. के शक्कर व्यापारियों को हाईकोर्ट से भी राहत नहीं मिल सकी



जिला कलेक्टर न्यायालय, ग्‍वालियर ने 7 सितंबर के एक आदेश में कहा था कि शालू ट्रेडर्स ने मप्र शासन शक्कर व्यापारी अनुज्ञापन तथा नियंत्रण आदेश 2009 की शर्र्तो का उल्लंघन किया है जिसके फलस्वरूप जब्तशुदा शक्कर शासन के हित में राजसात की जाती है। शक्कर क्षयशील पदार्थ है, इस कारण इसे अधिक दिनों तक नहीं रखा जा सकता और जमाखोरी पर नियंत्रण के लिए इसकी लोकहित में उचित मूल्य पर बिक्री की जाए। शक्कर मार्केटिंग सोसाइटी मुरार एवं जिला सहकारी थोक उपभोक्ता भंडार के माध्यम से प्रत्येक माह प्रति पखवाड़े एक राशनकार्ड पर दो किलो शक्कर 28 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बेची जाए।

मैसर्स शालू ट्रेडर्स, मोहना के प्रोपराइटर लज्जाराम राठौर ने उच्च न्यायालय में याचिका प्रस्तुत कर कहा था कि कलेक्टर ने उनकी 160 क्विंटल शक्कर जब्त कर ली थी। लज्जाराम राठौर ने याचिका में खाद्य व नागरिक आपूर्ति विभाग के सचिव व कलेक्टर को प्रतिवादी बनाया था। म.प्र. उच्‍च न्‍यायालय के ग्‍वालियर खण्‍डपीठ के न्यायमूर्ति एस. के. गंगेले ने इस टिप्पणी के साथ याचिका खारिज कर दी कि आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 की धारा 6 (ग) के तहत अपील जिला न्यायालय में करने का प्रावधान है। उन्होंने याचिका के साथ स्थगन आदेश का आवेदन भी खारिज कर दिया है। इस मामले में शासन का पक्ष अतिरिक्त महाधिवक्ता श्याम बिहारी मिश्रा ने रखा.

Sep 15, 2009

छ.ग.उच्‍च न्‍यायालय द्वारा सूचना के अधिकार के तहत केन्‍द्र को नोटिस

सूचना के अधिकार के तहत जमीन संबंधी जानकारी न देने पर हाईकोर्ट ने केंद्र व राज्य सरकार, बिलासपुर कमिश्नर, सूचना आयोग को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने जवाब के लिए 6 सप्ताह का समय दिया है। जांजगीर-चांपा जिले के ग्राम बुधरा में सीलिंग एक्ट के तहत वर्ष 1976 में 83 एकड़ जमीन 60 लोगों को आबंटित की गई थी। इसमें गांव के अघोरी दास व कचरा दास को भी जमीन आबंटित की गई। क्षेत्र में बांध बनाने के लिए सिंचाई विभाग ने कई लोगों को जमीन आबंटित की। इसमें अघोरी व कचरा की जमीन भी शामिल थी। इनके मुआवजे का प्रकरण शासन के समक्ष विचाराधीन है।

इसी बीच दोनों ने ही सूचना के अधिकार के तहत जमीन के कागजात उपलब्ध कराने के लिए राजस्व विभाग के जनसूचना अधिकारी (तहसीलदार) को आवेदन दिया। निर्धारित समय पर कागजात न मिलने पर उन्होंने कलेक्टर के समक्ष सेकंड अपील की। वहां से भी जानकारी न मिलने पर राज्य सूचना आयोग के समक्ष अपील की। आयोग ने प्रतिवादी को कमिश्नर के समक्ष उपस्थित होकर जवाब देने कहा, लेकिन प्रतिवादी न उपस्थित हुए और न ही चाही गई जानकारी ही उपलब्ध कराई। इसके बाद आवेदक लगातार कमिश्नर के समक्ष आवेदन करते रहे। कमिश्नर ने कलेक्टर को और कलेक्टर, तहसीलदार को आदेश जारी करते रहे, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। इसी बीच कमिश्नर ने तहसीलदार पर 1000 रुपए जुर्माना व आवेदक को मानसिक क्षतिपूर्ति बतौर 250 रुपए देने का आदेश किया। इस आदेश का भी असर न होने पर अघोरी व कचरादास ने वकील मीना शास्त्री के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की। सुनवाई के बाद कोर्ट ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया।

Sep 13, 2009

एंट्री टैक्स के खिलाफ छत्‍तीसगढ उच्‍च न्‍यायालय में दायर याचिका खारिज

छत्‍तीसगढ हाईकोर्ट ने एंट्री टैक्स के खिलाफ दायर लगभग 65 याचिकाएं पिछले गुरुवार को खारिज कर दी। जस्टिस धीरेंद्र मिश्रा, आरएन चंद्राकर की डिविजन बेंच ने पूर्व में सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित किया था। गुरुवार को इस संबंध में फैसला होने के बाद राज्य शासन को सैकड़ों करोड़ रुपए सालाना राजस्व मिलने का रास्ता साफ हो गया। एंट्री टैक्स के खिलाफ अलग-अलग लगभग 65 याचिकाएं हाईकोर्ट में दायर की गई थीं। याचिकाकर्ताओं में स्टील अथारिटी आफ इंडिया, भिलाई स्टील प्लांट, प्रकाश इंडस्ट्रीज, अल्ट्राटेक, सेंचुरी सीमेंट, बालको, ग्रासिम, बीएसएनएल सहित देश की कई प्रमुख कंपनियां शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि राज्य शासन एंट्री टैक्स वसूल रही है लेकिन उस अनुपात में सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा रही।

नगर-निगम व पालिका द्वारा जो सुविधाएं दी जाती हैं, वे नागरिक सुविधाएं हैं जो सभी लोगों को मिलती हैं और इसके एवज में शासन व नगरीय निकाय कई टैक्स वसूलते हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील रविंद्र श्रीवास्तव, देबी पाल, एचएस श्रीवास्तव, मनिंद्र श्रीवास्तव, संजय के. अग्रवाल ने तर्क दिए थे कि शासन औद्योगिक टैक्स अलग से लेती है। इसके बाद एंट्री टैक्स लेना अवैध है। जिंदल स्ट्रीप्स विरुद्ध हरियाणा सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट एंट्री टैक्स अधिनियम को अवैध ठहरा चुका है। जून महीने में इन याचिकाओं पर लगभग एक सप्ताह तक सुनवाई चली।

राज्य शासन की ओर से सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट सीएस वैद्यनाथन व महाधिवक्ता प्रशांत मिश्रा ने पैरवी करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट व मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अलग-अलग मामलों में एंट्री टैक्स अधिनियम को वैध ठहराते हुए इसके खिलाफ दायर औद्योगिक संस्थानों की याचिकाएं खारिज की हैं। राज्य शासन की ओर से यह भी कहा गया कि इस टैक्स से मिली राशि से शहरी इलाकों में सड़क, बिजली का मेंटनेंस किया जाता है। सुनवाई के बाद कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट व मध्यप्रदेश हाईकोर्ट द्वारा याचिकाएं खारिज करने का हवाला देते हुए कहा कि उसी मामले को फिर चुनौती नहीं दी सकती।

स्टील अथारिटी आफ इंडिया व प्रकाश इंडस्ट्रीज को लगभग 350 करोड़ रुपए टैक्स देना है। कोर्ट ने पूर्व में उनके पक्ष में स्थगन दिया था। याचिकाएं खारिज होने के बाद उन्हें यह देनदारी चुकानी होगी। प्रदेश में एंट्री टैक्स बड़े देनदारों में बालको भी शामिल है। टैक्स का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा बालको से ही मिलता है।

Sep 12, 2009

जेट के पायलटों को अवमानना नोटिस

बंबई उच्च न्यायालय ने पायलटों को हडताल पर नहीं जाने के आदेश दिए थे जिसके बावजूद जेट एयरवेज के 400 से भी अधिक पायलट लगातार हड़ताल पर हैं। इस कारण जेट की सैकड़ों उड़ानें रद्द की जा चुकी हैं और यात्रियों को काफी परेशानी उठानी पड़ रही है पायलटों के इस व्‍यवहार के खिलाफ न्यायालय की अवमानना की याचिका दायर कर दी गई है। मुंबई उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ ने नेशनल एविएटर्स गिल्ड (एनएजी) के खिलाफ न्यायालय की अवमानना का नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है। इस पर सोमवार को सुनवाई होगी।

विदित हो कि इस मसले को सुलझाने के लिए बुधवार देर रात पायलटों और प्रबंधन की वार्ता विफल हो जाने की वजह से गतिरोध बरकरार है। हड़ताली पायलट अपने सहकर्मियों की सेवाएं बहाल करने की मांग कर रहे हैं। 8 सितंबर, 2009 के अपने आदेश में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार और न्यायमूर्ति ए.एम. खानवेलकर ने एनएजी को औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 22 और 23 के तहत अवैध हड़ताल पर नहीं जाने को कहा था। दो वरिष्ठ पायलटों की बर्खास्तगी के विरोध में 7 सितंबर को पायलटों के सामूहिक चिकित्सा अवकाश पर जाने के बाद जेट ने बंबई उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। अपने आदेश में खंडपीठ ने कहा था कि याचिकाकर्ता जेट एयरवेज औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत सार्वजनिक सुविधा सेवा मुहैया करवा रही है। इसलिए न्यायालय ने पायलटों की यूनियन को हड़ताल पर नहीं जाने को कहा था।

इस मसले को सुलझाने में सरकार गुरुवार को योगदान दे सकती है। सरकार इस सिलसिले में अनिवार्य सेवाएं अनुरक्षण अधिनियम (एस्मा) भी लगाने पर विचार कर सकती है और हड़ताली पायलटों से भी मुलाकात कर सकती है। जेट प्रबंधन ने जोर दिया है कि सामूहिक तौर पर चिकित्सा अवकाश पर गए पायलटों को अपनी बीमारी का चिकित्सा प्रमाण पत्र देना होगा। उधर पायलटों का कहना है कि वे काम पर तभी लौटेंगे जब उनके पांच सहकर्मियों को बहाल किया जाएगा।

रायगढ़ में आज व कल वकीलों और जजो की कार्यशाला

छत्‍तीसगढ़ के न्‍यायप्रिय व प्रजापालक राजघराने की धरती रायगढ़ में जिले में त्‍वरित न्‍याय के उद्देश्‍य से अधिवक्‍ताओं एवं न्‍यायाधीशों की दो दिवसीय कार्यशाला आज व कल हो रही है। इसमें वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता एवं जिले के सभी न्‍यायाधीश भाग लेंगे। 12 व 13 सितंबर को होने जा रही इस कार्यशाला में दिल्ली के उच्च न्यायिक सेवा अधिकारी राजीव मेहरा व राजीव गुप्ता के साथ बिलासपुर हाई कोर्ट के जस्टिस धीरेन्द्र मिश्रा शिरकत करने जा रहे हैं। जो रायगढ़ व जशपुर जिले के तकरीबन 22 जजों के साथ वरिष्ठ वकीलों को भी इस कार्यशाला में मध्यस्तता एवं सुलह वैकल्पिक विवाद समाधान विषय पर संबोधित करेंगे।
जानकारी के अनुसार कार्यशाला का उद्घाटन बिलासपुर हाई कोर्ट के जस्टिस धीरेन्द्र मिश्रा करेंगे। शनिवार को पहले दिन जजेस के अलावा वकीलों की कार्यशाला होगी और दूसरे दिन केवल जजेस वर्ग के लिए यह सेमीनार रहेगा। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से आयोजित यह सेमीनार प्रत्येक जिले में अलग-अलग तिथियों में किए जाने से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस कार्यक्रम में रायगढ़ व जशपुर जिले के कितने सीनियर्स भाग लेंगे। फिलहाल, इनकी संख्या अभी नहीं बताई गई है। विदित हो कि कुछ वर्ष पूर्व भी प्रदेश के कई जिलों के जजों की एक कार्यशाला का आयोजन जिला पंचायत में किया गया था।

Sep 4, 2009

उम्रकैद की सजा सुनते ही मजिस्ट्रेट पर जूता फेंका


विदित हो कि छत्‍तीसगढ़ के दुर्ग न्‍यायालय में पिछले वर्ष एक अपराधी नें इसी तरह से न्यायाधीश की ओर अपना जूता उछाल दिया था तब से दुर्ग न्‍यायालय में अपराधियों को न्‍यायालय बिना जूते के लाया जाता है।
छत्‍तीसगढ के बलौदाबाजार व्यवहार न्यायालय के द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पर एक आरोपी ने भरी अदालत में जूता फेंका। हत्या के मामले में उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। कटघरे में खड़े-खड़े ही कुछ बड़बड़ाते हुए वह आक्रोशित हो गया। पुलिस ने उसके खिलाफ विभिन्न धाराओं में पृथक से अपराध पंजीबद्ध किया हैं।

घटना के संबंध में जानकारी देते हुए स्थानीय बलौदाबाजार पुलिस ने बताया कि व्यवहार न्यायालय में बुधवार को हत्या के एक प्रकरण में फैसले पर सुनवाई चल रही थी उक्त प्रकरण में भाई की हत्या के आरोपी ग्राम लटुआ निवासी लोकनाथ पिता प्रेमलाल साहू (23 वर्ष) को कटघरे में खड़ा किया गया। न्यायालय के द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश अनिल कुमार गायकवाड़ ने जैसे ही उसे उम्रकैद की सजा सुनाई उसने क्रुध होकर न्‍यायाधीश की ओर जूता फेंका। हालांकि जूता न्‍यायाधीश को नहीं लगा, बल्कि उसी समय डायस पर किसी कार्य से न्‍यायाधीश के बगल में खड़े चपरासी के कंधे से लगकर गवाही वाले कटघरे में जा गिरा। 

घटना के वक्त अभियुक्त एवं अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता सहित अन्य वकील एवं न्यायालय के कर्मचारी भी कोर्ट में मौजूद थे। घटना के तत्काल बाद अभिरक्षा में तैनात पुलिस कर्मियों ने आरोपी को दबोच लिया। न्‍यायाधीश ने अभियुक्त द्वारा की गई इस हरकत पर कड़ी फटकार लगाते हुए कड़ी कार्रवाई के निर्देश पुलिस को दिये। इधर बलौदाबाजार पुलिस ने आरोपी लोकनाथ साहू के खिलाफ धारा 228, 332 एवं 353 भादवि के तहत अपराध दर्ज कर गिरफ्तार कर लिया। उसे उम्रकैद की सजा के तहत ही जेल भेज दिया गया। घटना की खबर कोर्ट सहित पूरे शहर में फैल गई थी।

Sep 1, 2009

लवलीन भ्रष्टाचार घोटाले में केरल राज्यपाल के निर्णय को चुनौती

लवलीन भ्रष्टाचार घोटाले में माकपा नेता पी विजयन को दंडित करने के केरल राज्यपाल के निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने आज सीबीआई और अन्य को नोटिस जारी किए। याचिका माकपा नेता पी विजयन ने दाखिल की थी। न्यायमूर्ति आर वी रवीन्द्रन और न्यायमूर्ति बी सुदर्शन रेड्डी की एक पीठ ने कहा कि वह अन्य बातों के अलावा इस बात का भी परीक्षण करेंगे कि किसी राज्यपाल द्वारा इस तरह का फैसला करने के बाद अदालतों को क्या इस तरह की याचिकाओं पर विचार करने का अधिकार प्राप्त है। माकपा नेता पी विजयन ने इस सवाल के साथ रिट याचिका दाखिल की है कि मंत्रिपरिषद की नामंजूरी के बाद क्या राज्यपाल अपनी मंजूरी दे सकते हैं। राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने अदालत में कहा कि राज्य पी विजयन के रख का समर्थन करता है।

विगत दिनों कैबिनेट की बैठक के बाद मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन ने संवाददाताओं को बताया था कि सरकार ने इस मुद्दे पर अपना निर्णय कर लिया है और इस संबंध में राज्यपाल को अवगत कराया जाएगा। हालांकि उन्होंने राज्यपाल को भेजे गये संदेश का खुलासा करने से इंकार कर दिया था। अच्युतानंदन ने कहा था कि हमने इस मुद्दे पर निर्णय कर लिया है। लेकिन मैं इसे मीडिया के साथ साझा नहीं करना चाहता। मामले की जांच करने वाली सीबीआई ने विजयन और दो अधिकारियों पर मुकदमा चलाने के लिए राज्यपाल आर एस गवई से अनुमति मांगी थी। सीबीआई ने पूर्व मंत्री को नौवें अभियुक्त के रूप में आरोपित करना चाहा था। विदित हो कि लवलीन मामला राजनैतिक रूप से काफी संवेदनशील है जिसमें एक कनाडाई फर्म ‘एसएनसी लवलीन’ को ठेका देने के संबंध में भ्रष्टाचार का आरोप है। यह मामला वर्ष 1997 का है जब विजयन राज्य के उर्जा मंत्री थे और उन्होंने तीन पनबिजली उर्जा संयंत्रों के जीर्णोद्धार का ठेका उक्त कनाडाई फर्म को दिया था।

न्यायमूर्ति आर. वी. रवीन्द्रन और न्यायमूर्ति जस्टिस बी. एस. सुदर्शन रेड्डी ने यह कहते हुए विजयन की याचिका स्वीकार कर ली कि इसमें कानून संबंधी कई महत्वपूर्ण सवाल उभरते हैं। इसमें यह सवाल भी है कि कोई भी राजनीतिक दल या उसका अध्यक्ष अपनी ही पार्टी की सरकार पर कितना प्रभाव डाल सकता है। उल्लेखनीय है कि विजयन पर आरोप है कि उन्होंने गलत तरीके से इस कनाडियाई कंपनी को तीन ऊर्जा संयंत्रों के उन्नयन के लिए ठेका दिया था। विजयन उस वक्त राज्य के ऊर्जा मंत्री थे। राज्यपाल आर. एस. गवई ने गत जून महीने में सीबीआई कार्यालय के प्रमुख को अपने आवास पर बुलाया था और विजयन मामले से जुड़ी 148 पृष्ठों की रिपोर्ट उन्हें सौंपी थी और मामले की जांच आगे बढ़ाने की अनुमति दी थी। इसके बाद विजयन के खिलाफ केरल में सीबीआई की एक विशेष अदालत में मामला दर्ज किया गया था। विजयन को 24 सितम्बर को अदालत में उपस्थित होने का कहा गया है।

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