Oct 29, 2008

साध्वी प्रज्ञा का होगा नार्को टेस्ट

नासिक की एक अदालत ने मालेगांव बमकांड के सिलसिले में गिरफ्तार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर का नार्को टेस्ट करने का आदेश दिया।


सूत्रों के अनुसार जांच एजेंसी आतंकवाद निरोधक दस्ते ने नासिक जिला एवं सत्र न्यायालय में अर्जी देकर साध्वी का नार्को [ब्रेन मैपिंग] और पोलीग्राफ टेस्ट [झूठ बोलने का परीक्षण] करने की अनुमति मांगी थी।

एटीएस के वकील अजय मिसर ने अदालत को बताया कि परीक्षण मुंबई में होंगे। साध्वी प्रज्ञा को 29 सितंबर को मालेगांव में हुए बम विस्फोट के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया है और वह तीन नवंबर तक पुलिस हिरासत में हैं। उक्त बम विस्फोट में छह लोग मारे गए थे और सौ से अधिक लोग घायल हुए थे।

साभार - याहू जागरण

नासिक कोर्ट ने मुंबई एटीएस को मालेगांव धमाका मामले में गिरफ्तार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर का नार्को टेस्ट करवाने की इजाजत दे दी है।


मुंबई एटीएस ने आज नासिक कोर्ट में एक अर्जी दायर कर प्रज्ञा का नार्को टेस्ट करवाने की इजाजत मांगी जिसे कोर्ट ने स्वीकार करते हुए कहा कि जांच को सही अंजाम तक पहुंचाने के लिए पुलिस नार्को टेस्ट करवा सकती है।

गौरतलब है कि मालेगांव ब्लास्ट मामले में गिरफ्तार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत दो अन्य आरोपियों पर हत्या का मामला दर्ज किया गया था। इसी साल 29 सितंबर को मालेगांव में हुए ब्लास्ट में पांच लोगों की मौत हुई थी।

मुंबई एटीएस टीम सूरत से प्रज्ञा, इंदौर से श्यामलाल साहू, शिवनारायण सिंह, दिलीप नायर तथा देवास से धर्मेद्र बैरागी को पूछताछ के लिए मुंबई ले आई थी। इन्हें शुक्रवार को गिरफ्तार कर नासिक कोर्ट में पेश किया गया। सरकारी वकील अजय मिश्रा के मुताबिक तीनों आरोपियों पर धारा 302, 307 व 326 के तहत मामला दर्ज किया गया।

साभार - दैनिक भास्‍कर

Oct 28, 2008

जमानती मामले में फंसे गरीब कैदियों को मुचलके पर छोडें

बांबे हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि किसी जमानती अपराध के सिलसिले में गिरफ्तार व्यक्ति आर्थिक तंगी के कारण जमानत दे पाने में असमर्थ हो तो उसे एक सप्ताह के भीतर निजी मुचलके पर रिहा कर दिया जाना चाहिए।


कोर्ट ने कहा है कि सीआरपीसी की धारा 436 में हुए संशोधन में इस बात के स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं। इसके अनुसार, यदि आरोपी एक हफ्ते के भीतर जमानतदार का बंदोबस्त कर पाने में अक्षम हो तो उसे निर्धन मानकर निजी मुचलके पर भी रिहा किया जा सकता है। कोर्ट ने यह चेतावनी भी दी है कि उसके इस निर्देश का पालन नहीं किया गया तो संबंधित जेल प्रभारी को अपनी जेब से मुआवजा भरना होगा।

क्यों दिया ऐसा फैसला : जस्टिस एफआई रिबेलो तथा आशुतोष कुंभकोणी की बेंच ने इस साल के प्रारंभ में महाराष्ट्र के येरवदा और रत्नागिरी की जेलों का दौरा करने के बाद पाया कि मामूली अपराध के सिलसिले में कई विचाराधीन कैदी जेल में इसलिए बंद हैं, क्योंकि वे अपने लिए जमानतदार नहीं जुटा सके। अब एक हत्या के मामले में आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि अकेले मुंबई के आर्थर रोड जेल के 2296 कैदियों में से 1660 कैदी जमानती अपराधों के सिलसिले में बंद हैं।
कोर्ट हैरान : जजों ने इस पर हैरानी जताते हुए कहा कि तीन साल पहले लागू सीआरपीसी की धारा 436 (संशोधित) के अनुसार, एक सप्ताह के भीतर जमानतदार न जुटा पाने पर आरोपी को निर्धन मान लिए जाने का प्रावधान है।

कोर्ट के निर्देश : कोर्ट ने महाराष्ट्र और केंद्र शासित क्षेत्र दीव, दमन और दादरा व नगर-हवेली को इस संशोधित प्रावधान को फौरन लागू करने को कहा है। इसके अलावा प्रमुख सेशंस जजों से भी कहा गया है कि वे निचली अदालतों से हर माह रिहा किए जाने वाले कैदियों के बारे में रिपोर्ट मांगें। बांबे हाईकोर्ट हर साल इस मामले की समीक्षा करेगी।

समाचार - भास्‍कर से साभार

राज ठाकरे की याचिका पर सुनवाई 14 नवंबर को

http://www.merikhabar.comझारखंड हाईकोर्ट ने महाराष्‍ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे की उस याचिका पर 14 नवंबर तक के लिए सुनवाई टाल दी है, जिसमें उन्‍होंने निचली अदालत द्वारा जारी गिरफ्तारी वारंट पर रोक लगाने की मांग की थी। उनके खिलाफ छठ पर्व को लेकर लोगों की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ करने का आरोप है।

राज ठाकरे के वकील नीरज राय ने बताया कि जस्टिस बी. के. सिंह की एकल खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई के लिए 14 नवंबर की तारीख मुकर्रर की है। गत 30 सितंबर को जमशेदपुर की एक अदालत ने राज ठाकरे के खिलाफ गैरजमानती गिरफ्तारी वारंट जारी किया था. इसके खिलाफ उन्‍होंने झारखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर की है।

गौरतलब है कि जमशेदपुर के एक वकील हामिद रजा ने गत 2 फरवरी को राज ठाकरे के खिलाफ मामला दर्ज करवाया था. राज पर आरोप है कि उन्‍होंने छठ पूजा के बारे में अनर्गल बयान दिया है।

http://www.merikhabar.com

Oct 27, 2008

संविधान का उल्लंघन करने वालों की खैर नहीं

कैबिनेट मंत्री शिवराज पाटिल ने मंगलवार को राज्यसभा को आश्वस्त किया कि संविधान का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ नरमी नहीं बरती जाएगी। उन्होंने बताया कि इसी क्रम में महाराष्ट्र सरकार को तीन नोटिस भी जारी किए जा चुके हैं, लेकिन विपक्षी सदस्य इससे संतुष्ट नहीं हुए और सदन से बहिर्गमन कर गए।
सदन में शून्यकाल के दौरान मुंबई में उत्तर भारतीयों पर महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के कार्यकर्ताओं द्वारा किए जा रहे हमलों पर नाराजगी जाहिर की गई। इस मामले पर विपक्षी सदस्यों के साथ कांग्रेसी सदस्यों ने भी चिंता जताई।
सदस्यों की चिंता का निराकरण करने का प्रयास करते हुए पाटिल ने सदन को बताया कि केंद्र सरकार महाराष्ट्र को इस मामले पर तीन नोटिस भी जारी कर चुकी है।
विपक्षी सदस्यों द्वारा धारा 355 के तहत कार्रवाई करने की मांग के जवाब में पाटिल ने कहा कि केंद्र सरकार जब भी किसी राज्य सरकार को नोटिस जारी करती है तो नोटिस में यह नहीं लिखा जाता कि किस धारा के तहत नोटिस दिया जा रहा है।
गृह मंत्री ने कहा कि उनके अलावा रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव ने भी राज्य के मुख्यमंत्री से व्यक्तिगत रूप से बात की थी और राज्य के गृहमंत्री से भी चर्चा कर घटना पर नाराजगी जताई थी।
उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने उन्हें सूचित किया है कि दो लाख 29 हजार आवेदकों को नोटिस देकर परीक्षा के लिए बुलाया गया था तथा 307 स्थानों पर परीक्षाएं आयोजित की गई थीं। उन्होंने कहा कि उन्हें बताया गया है कि कोई भी छात्र बिना परीक्षा दिए नहीं लौटा।
पाटिल ने बताया कि महाराष्ट्र सरकार से प्राप्त सूचना के अनुसार कुल 1861 लोगों को गिरफ्तार किया गया, 336 के खिलाफ मामले दर्ज किए गए। इसके अलावा एहतियाती तौर पर 3837 लोगों को हिरासत में लिया गया।
गृहमंत्री ने कहा कि देश के हर नागरिक को यह संविधान प्रदत्त अधिकार है कि वह देश के किसी भी प्रांत में काम कर सकता है। ऐसा करने पर अगर कोई किसी को मारता है तो वह निंदनीय है।
उन्होंने कहा कि ऐसे गलत विचार कुछ लोगों के हो सकते हैं सभी महाराष्ट्रवासियों के नहीं। पाटिल के इन आश्वासनों से असंतुष्ट विपक्षी सदस्य गृहमंत्री का आधा जवाब सुनकर ही वाकआउट कर गए।
पाटिल ने कहा कि संकीर्णतापूर्ण विचारों तथा मुद्दों पर राजनीति करने से न तो कोई लाभ होगा और न ही कोई हल निकलेगा। उन्होंने कई बार दोहराया कि संविधान का उल्लंघन करने वालों के साथ नरमी नहीं बरती जाएगी लेकिन विपक्षी सदस्य दोषियों के खिलाफ कार्रवाही की मांग करते रहे।
समाचार साभार : याहू जागरण

न्यायपालिका को धन देने में कंजूस सरकारें : अदालती आईना : एम. जे. एंटनी



न्यायपालिका को धन देने में कंजूस सरकारें

Oct 26, 2008

बहुप्रतीक्षित नया कंपनी विधेयक लोकसभा में पेश

कंपनी कार्य मंत्रालय में राज्यमंत्री प्रेमचंद गुप्ता ने चार साल की लंबी कवायद के बाद गुरुवार को लोकसभा में नया कंपनी विधेयक पेश कर दिया। कंपनी विधेयक-2008 नामक यह विधेयक वर्षों पुराने कंपनी कानून 1956 का स्थान लेगा।

लोकसभा में पेश कंपनी विधेयक-2008 में निदेशकों के कार्य तथा उनके दायित्व सुनिश्चित करने के साथ-साथ सूचीबद्ध कंपनियों में कम से कम एक तिहाई स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है।

नए कंपनी विधेयक के मुताबिक एक व्यक्ति भी कंपनी चला सकता है। इसमें कहा गया है कि किसी भी कानून सम्मत कार्य के लिए सात अथवा अधिक व्यक्ति पब्लिक कंपनी गठित कर सकते हैं। दो अथवा अधिक व्यक्ति प्राइवेट कंपनी बना सकते हैं, जबकि एक व्यक्ति भी कंपनी बना सकता है।

विधेयक में कहा गया है कि ऐसी प्रत्येक सूचीबद्ध कंपनी, जिसमें चुकता पूँजी का समावेश है, उसमें कम से कम एक तिहाई स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति होना चाहिए। इसके अलावा अन्य लोक कंपनियों के मामले में केन्द्र सरकार न्यूनतम स्वतंत्र निदेशकों की संख्या तय करेगी।
उल्लेखनीय है कि पूँजी बाजार के नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने शेयर बाजारों में सूचीबद्ध कंपनियों के निदेशक मंडल में 50 प्रतिशत स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति को अनिवार्य बना दिया है, लेकिन नए कंपनी विधेयक में इसके लिए कम से कम एक तिहाई स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति का प्रावधान रखा गया है।

सरकार का दावा है कि कंपनी विधेयक-2008 दुनियाभर में अमल में लाए जा रहे सबसे बेहतर अनुभवों के आधार पर तैयार किया गया है।

इससे भारतीय कंपनियों को आधुनिक और खुले नियमन वाले माहौल में काम करने का मौका मिलेगा। विधेयक में शेयरधारकों को अधिक लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात कहने तथा कंपनी के कामकाज में इलेक्ट्रानिक संचालन (ई-गवर्नेंस) को बढ़ावा देने के प्रावधान किए गए हैं।

कंपनियों में आंतरिक संचालन के सभी मूलभूत सिद्धांतों को इसमें शामिल किया गया है। किसी भी क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों के नियमन और उनकी स्थापना से लेकर बंदी तक के विधान इस विधेयक में समेटे गए हैं। कंपनी अधिनियम 1956 के तहत काम कर रही कंपनियों को नए कानून के दायरे में लाने तथा एक टाइप की कंपनी को दूसरे टाइप की कंपनी में बदलने के भी इसमें सरल प्रावधान किए गए हैं।

विधेयक में कंपनियों से जुड़े अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायालयों का गठन करने, कंपनियों के विलय, उनके अलग होने, पूँजी घटाने, दिवालिया तथा पुनर्वास, कंपनियों को समाप्त करने जैसे मामलों की सुनवाई के लिए राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण बनाने का भी इसमें प्रावधान किया गया है।

कारपोरेट मुकदमों में ली जाए ज्यादा कोर्ट फीस

संसदीय स्थायी समिति की सिफारिशों पर अमल हुआ तो कारपोरेट जगत को अपने लाखों-करोड़ों रुपए से संबंधित मुकदमों की सुनवाई के लिए अदालती खर्च का ज्यादा बोझ उठाना होगा। विवाद के मूल्य के मद्देनजर उनसे ज्यादा कोर्ट फीस वसूली जाएगी। खास बात यह है कि सरकारी सांविधिक निकाय भी इसके दायरे में आएंगे। 
उच्चतम न्यायालय [न्यायाधीश संख्या] संशोधन विधेयक-2008 पर विचार करने के बाद ये सिफारिशें कार्मिक, लोक शिकायत, विधि एवं न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने की है। समिति के अध्यक्ष व राज्यसभा सदस्य डा. ईएम सुदर्शन नचीयप्पन ने बुधवार को दिल्‍ली में पत्रकारों को यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि कारपोरेट क्षेत्र, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ ही केंद्र सरकार के सेबी, ट्राई और प्रतिस्पर्धा आयोग जैसे तमाम निकायों की ओर से हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में बड़ी संख्या में करोड़ों रुपए मूल्य के मुकदमे दायर किए जाते हैं। कई अधिनियम तो ऐसे हैं जिनके तहत कंपनियां अपने विवादों के निपटारे के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकती हैं। उनकी वजह से बड़ी संख्या में मुकदमे लंबित हैं। जबकि इसके लिए वे मामूली कोर्ट फीस देते हैं, जो अभी महज ढाई सौ से दो हजार रुपए तक है। 
समिति का मानना है कि कारपोरेट जगत, सरकारी गैर सरकारी निकायों के मुकदमों की सुनवाई पर अदालतों को ज्यादा समय खर्च होता है। नतीजा आम आदमी व गरीबों को न्याय के लिए वर्षों इंतजार करना पड़ता है। लिहाजा समिति ने ऐसे विवादों के कुल मूल्य के आधार पर उनसे एक से पांच प्रतिशत तक कोर्ट फीस वसूले जाने की सिफारिश की है। फौजदारी व दीवानी मामलों में 250 से दो हजार रुपए की मौजूदा कोर्ट फीस की समीक्षा की भी जरूरत है। समिति ने इसके साथ ही गरीबों, अशिक्षितों और न्याय की पहुंच से बाहर के परिवारों के लिए कोर्ट फीस को पूरी तरह माफ करने की भी सिफारिश की है। 
 
डा. नचीयप्पन ने कहा कि समिति सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या 25 के बजाय तीस करने पर राजी है। लेकिन उनकी नियुक्ति में कोलेजियम पद्धति को खत्म करके उसके स्थान पर न्यायपालिका, कार्यपालिका, प्रधानमंत्री व संसद प्रतिनिधियों को शामिल करते हुए एक एम्पावर्ड कमेटी बनाने की सिफारिश की है। समिति का कहना है कि भारत ही एक ऐसा देश है, जहां न्यायाधीश खुद को नियुक्त करते हैं। समिति ने हाईकोर्ट के जजों की सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष करने की सिफारिश की है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट में अत्यधिक लंबित मुकदमों के मद्देनजर गर्मियों में अवकाश की परिपाटी को खत्म करने की सिफारिश की है।

साभार : याहू जागरण

Oct 24, 2008

निजता के अधिकार का ख्याल रखे मीडिया

भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति के जी बालाकृष्णन ने कहा है कि पत्रकारिता को विशेषकर अपराध के क्षेत्र में लोगों की निजता के अधिकार में अतिक्रमण नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रेस की आजादी का मतलब यह है कि लोगों तक सही खबर मिले।


न्यायमूर्ति बालाकृष्णन शनिवार को बंबई हाईकोर्ट में अदालती रिपोर्टिग पर आयोजित वर्कशाप को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से लोगों की निजता की रक्षा होनी चाहिए। कभी-कभी जांच के दौरान नुकसान पहुंचाने वाली सूचना जारी कर दी जाती है। इससे निष्पक्ष सुनवाई के लोगों का अधिकार प्रभावित होता है।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कभी-कभी मीडिया पीडि़त के यौन दु‌र्व्यवहार के मामले में इतनी सूचना दे देता है कि नाम नहीं प्रकाशित करने के बावजूद कोई भी पीडि़त की पहचान कर लेता है। उन्होंने जांच के दौरान मीडिया को सूचना देने की पुलिस की प्रवृत्ति की आलोचना करते हुए कहा कि इससे निजता के अधिकार का अतिक्रमण होता है।

अदालत रिपोर्टिग के बारे में मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इन दिनों कई प्रतिभावान युवा रिपोर्टर अदालती मामलों को कवर कर रहे हैं लेकिन उन्हें इस संबंध में प्रशिक्षण की जरूरत है।

इलेक्ट्रानिक मीडिया के बारे में बालाकृष्णन ने कहा कि संपादकीय नियंत्रण का अभाव चिंतनीय पहलू है। उन्होंने कहा कि समाचार पत्र में सामग्रियों का संपादन संभव है। लेकिन जब टेलीविजन पर रिपोर्टर की बातों का सीधा प्रसारण किया जाता है, वहां कोई संपादकीय नियंत्रण नहीं है।

मीडिया की आजादी पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि प्रेस की आजादी आम लोगों का अधिकार है। मीडिया [इस मकसद के लिए] केवल एक एजेंसी है। लोगों को निश्चित तौर पर सही सूचना मिलनी चाहिए। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरिजीत पसायत ने कहा कि शीर्ष अदालत जल्दी ही प्रेस संपंर्क अधिकारी नियुक्त करेगा ताकि रिपोर्टरों को सूचना आसानी से मिल सके। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट के स्तर पर भी हम पीआरओ की नियुक्ति पर विचार कर रहे हैं।

बंबई हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश स्वतंत्र कुमार ने कहा कि हाईकोर्ट लीगल रिपोर्टिग से संबंधित विवादास्पद मामलों के संबंध में कोर्ट बार और मीडिया समिति के गठन पर विचार कर रहा है।

उन्होंने कहा कि अदालत रिपोर्टिग के लिए यूनिफार्म कोड [प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया] समय की जरूरत है।

Oct 23, 2008

नेता नहीं बन सकेंगे चुनाव एजेंट

स्वतंत्र, निष्पक्ष और हिंसा मुक्त विधानसभा चुनाव कराने के इरादे से चुनाव आयोग ने निर्देश दिया है कि केंद्र या राज्य के किसी मंत्री, सांसद या विधायक को चुनाव एजेंट नहीं बनाया जाना चाहिए। सुरक्षाकर्मियों के साथ चलने वाले प्रमुख नेताओं के कारण पोलिंग स्टेशनों पर पैदा होने वाले तनाव को टालने के इरादे से आयोग ने यह फैसला किया है।

आयोग ने कहा कि वोटिंग से जुड़े कर्मचारियों, पुलिसकर्मियों और शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात किए गए अधिकारियों के अलावा कोई भी व्यक्ति पोलिंग स्टेशन के आस-पास हथियार लेकर नहीं जा सकेगा। चुनाव आयोग ने उन सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को खत लिखकर ये निर्देश दिए हैं जहां चुनाव होने हैं। आयोग ने अपने खत में कहा है कि उम्मीदवारों की ओर से मौजूदा मंत्री, सांसद या विधायक को अपना चुनाव एजेंट नियुक्त करने की प्रवृति काफी आम है। इस तरह के व्यक्तियों को आम तौर पर सुरक्षा कवर मिला होता है।

आयोग ने कहा कि पोलिंग स्टेशनों के आस-पास हथियारों के साथ लोगों की आवाजाही से न सिर्फ चुनाव कर्मचारी और आम जनता आतंकित होंगे, बल्कि ऐसे हथियारों के गलत इस्तेमाल से हिंसा भी फैल सकती है। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों की अधिसूचना सोमवार को जारी हो रही है और आयोग के ये निर्देश काफी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। छत्तीसगढ़ के अलावा मध्य प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, मिजोरम और जम्मू-कश्मीर में भी चुनाव होने हैं।

उड़ीसा में सांप्रदायिक हिंसा के सर्वाधिक मामले

इस साल उड़ीसा में सांप्रदायिक हिंसा के 158 मामले दर्ज किए गए जो देश के सभी राज्यों में दर्ज ऐसे मामलों की तुलना में सबसे ज्यादा हैं।


केंद्र सरकार के एक बयान के अनुसार इस साल के प्रथम नौ महीनों में दर्ज ऐसे मामलों की संख्या राज्य में 2000 से 2007 के बीच दर्ज सांप्रदायिक मामलों से ज्यादा हैं।

सरकार द्वारा बनाई गई रिपोर्ट के अनुसार इस साल सितंबर तक उड़ीसा में सांप्रदायिक हिंसा के 158 मामले दर्ज हुए जबकि 2007 के अंत तक सात सालों में 151 मामले दर्ज हुए।

इस साल सांप्रदायिक दंगों में राज्य में मरने वालों का आंकड़ा भी सर्वाधिक 41 था। वर्ष 2000.-07 के दौरान राज्य हिंसा में मरने वालों की संख्या 22 थी।

उड़ीसा के बाद मध्यप्रदेश का स्थान है जहां इस साल सांप्रदायिक दंगों के 99 मामले हुए और 19 लोग मौत का शिकार बने।

बयान में कहा गया है कि छह राज्यों अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मणिपुर, मेघालय मिजोरम और नागालैंड में पिछले आठ सालों में सांप्रदायिक हिंसा का एक भी मामला सामने नहीं आया है। त्रिपुरा, उत्तरांचल और गोवा जैसे राज्यों में कभी कभार सांप्रदायिक हिंसा के मामले हुए।

कर्नाटक में इस साल सांप्रदायिक हिंसा के 76 मामले सामने आए जिसमें तीन लोगों की मौत हुई और 99 घायल हुए। कर्नाटक में पिछले आठ सालों में 580 ऐसे मामले दर्ज हुए जिसमें 64 लोग मारे गए और 2016 लोग घायल हुए।

पूरे देश के आंकड़ों से पता चलता है कि देश में हर साल सांप्रदायिक हिंसा के करीब 700 मामले सामने आ रहे हैं। वर्ष 2000 में 599 मामले दर्ज हुए जिनकी संख्या अगले साल 824 तक पहुंच गई। वर्ष 2002, 03, 04, 05, 06 और 2007 में क्रमश: 722, 711, 677, 779, 698 और 761 मामले दर्ज हुए।

Oct 22, 2008

कटारा हत्याकांड में विकास की याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को नीतीश कटारा हत्याकांड के दोषी विकास यादव की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उसने अपील प्रक्रियाओं को दिल्ली से बाहर स्थानांतरित करने की मांग की थी।


न्यायाधीश दलवीर भंडारी और न्यायाधीश एचएस बेदी की पीठ ने याचिका को विचार योग्य नहीं पाया।
विकास ने अपनी याचिका में मांग की थी कि उसे दोषी ठहराए जाने के मामले में की गई अपील पर सुनवाई दिल्ली हाईकोर्ट को छोड़कर इलाहाबाद हाईकोर्ट या फिर देश के किसी अन्य हाईकोर्ट में कराई जाए।

उसने दावा किया था कि उसकी अपील प्रक्रिया पर मीडिया की वजह से दिल्ली हाईकोर्ट में उचित ढंग से सुनवाई नहीं हो पाएगी।

नीतीश कटारा [24] की विकास और विशाल यादव द्वारा 2002 में 16-17 फरवरी की रात हत्या कर दी गई थी।

रात्रिपाली कर्मियों की सुरक्षा को लेकर याचिका

टीवी पत्रकार सौम्या विश्वनाथन की हत्या के बाद एक याचिकाकर्ता ने दिल्ली एवं आसपास के इलाकों में रात में काम करने वाले लोगों की बेहतर सुरक्षा को लेकर हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की है।


जनहित याचिका दायर करते हुए अधिवक्ता संजीव कुमार ने कहा कि दिल्ली पुलिस की विफलता के कारण महानगर में हत्या के मामले काफी बढ़ गए हैं। याचिका में रात में काम करने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केंद्र और दिल्ली सरकार को निर्देश देने का आग्रह किया गया है। संभवत: अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने वाली अपनी याचिका में उन्होंने कहा है, अगर सुरक्षा व्यवस्था नहीं बढ़ाई जाती है खासकर रात के समय बीपीओ, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और टीवी चैनल में काम करने वालों लोगों की तो निर्दोष लोगों की मौतों की संख्या में बढ़ोतरी होगी।

विश्वनाथन सहित हत्या के कई मामलों का उदाहरण देते हुए वकील ने कहा कि बर्बरतापूर्वक हत्या और बम विस्फोट सहित अपराध के मामले दिन प्रतिदिन बढ़ रहे हैं और हमारा पुलिस विभाग स्थिति से निपटने में सक्षम नहीं है। याचिकाकर्ता ने सौम्या विश्वनाथन की हत्या के मामले में सीबीआई जांच की भी मांग की है।
http://in.jagran.yahoo.com/

संपत्ति अधिकार पर महत्वपूर्ण फैसला

सुप्रीमकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि कानूनी वारिसों के बीच संपत्ति बंटवारे के मामले में मालिक द्वारा मृत्युपूर्व किए गए लेनदेन की भी जांच हो सकती है। ऐसा सिर्फ उन मामलों में होगा जहां संपत्ति की वसीयत नहीं की गई होगी। जिनमें वसीयत होगी, वहां संपत्ति का बंटवारा वसीयत के मुताबिक ही होगा।

सुप्रीमकोर्ट की इस व्यवस्था से कानूनी वारिस को मालिक द्वारा मृत्यु पूर्व किए गए लेनदेन को चुनौती देने के लिए अलग से मुकदमा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वह संपत्ति पर हक के मुकदमे में अन्य पक्षकारों के साथ उस व्यक्ति को भी पक्षकार बना सकता है जिसने संपत्ति मालिक की मृत्यु के पहले संपत्ति का लेन-देन किया हो।

न्यायमूर्ति अल्तमश कबीर व न्यायमूर्ति मार्केडेय काटजू की पीठ ने मृत्युपूर्व किए गए लेनदेन के पक्षकार को भी संपत्ति बंटवारे के विवाद में पक्षकार बनाए जाने के फैसले को सही ठहराते हुए यह व्यवस्था दी है। पीठ ने कहा है कि संपत्ति में किसी व्यक्ति के हिस्से पर विचार करते समय कोर्ट मरने वाले की कुल संपत्ति और उस पर उसके हक का आकलन करता है। संपत्ति को कानूनी वारिसों के बीच बांटे जाने पर विचार करते समय मालिक द्वारा मृत्युपूर्व किए गए लेनदेन की भी जांच हो सकती है ताकि पता चल सके कि मरने वाले का संपत्ति पर कितना हक था।
इस मामले में बालकिशन डी संघवी ने अपने पिता द्वारकादास संघवी व मां विमलाबेन संघवी की संपत्ति पर दावे के मामले में संपत्ति के अन्य कानूनी वारिस अपने भाई-बहनों को पक्षकार बनाने की अनुमति मांगी थी। इसके साथ ही उस व्यक्ति व कंपनी को भी पक्षकार बनाने की अनुमति मांगी थी जिसने उसके माता-पिता की मृत्यु के पूर्व संपत्ति का लेन-देन किया था। मुंबई हाईकोर्ट की एकलपीठ ने बालकिशन की अर्जी स्वीकार कर ली थी।
कोर्ट ने बाबूलाल खंडेलवाल व अन्य को पक्षकार बनाने की अनुमति दे दी थी। यही नहीं, हाईकोर्ट से फैसले से द्वारकादास की मृत्यु से पहले खंडेलवाल के साथ हुए लेनदेन पर भी सवाल खड़ा हो गया था।

बाबूलाल खंडेलवाल ने हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी थी। उसका कहना था कि संपत्ति बंटवारे के इस मामले में वह किसी भी तरह से जुड़ा नहीं है। ऐसे में उसे पक्षकार नहीं बनाया जा सकता है। संपत्ति का जो लेनदेन द्वारकादास की मृत्यु के पहले पूरा हो चुका है, उस पर इस मुकदमे में कैसे विचार हो सकता है। हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट दोनों का यही मानना है कि संपत्ति बंटवारे के मामले में कुल संपत्ति का आकलन करने और उस पर मरने वाले के अधिकार पर विचार करते समय, उस संपत्ति पर भी विचार किया जा सकता है जिसका लेनदेन उसकी मृत्यु के पहले पूरा हो चुका हो।

याहू जागरण 

Oct 21, 2008

लापरवाह डाक्टरों के खिलाफ चलेगा मुकदमा

इलाज के दौरान मरीजों की जान लेने वाले डाक्टरों से अब कानून सख्ती से निपटेगा। सुप्रीम कोर्ट ने एक कानून के हवाले से कहा कि यदि किसी डाक्टर की लापरवाही और जल्दबाजी के कारण गलत इलाज की वजह से किसी मरीज की मौत हो जाती है तो उस पर आपराधिक मुकदमा चल सकता है।


न्यायमूर्ति सी के ठक्कर और न्यायमूर्ति डी के जैन की पीठ ने हालांकि यह भी कहा कि डाक्टर के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का मामला नहीं चलाया जा सकता जिसके तहत कड़ी सजा का प्रावधान है। खंडपीठ ने यह फैसला एक डाक्टर के सम्मन के खिलाफ याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया जिस पर एक मरीज की मौत का मुकदमा चल रहा है। याचिका में एक रोगी की मौत के मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 304 [गैर इरादतन हत्या] के तहत अभियोजन चलाए जाने को लेकर निचली अदालत की ओर से जारी सम्मन को चुनौती दी गई थी। इसमें जहां जल्दबाजी और लापरवाह तरीके से कार्य भारतीय दंड संहिता की धारा 304 ए के तहत अधिकतम दो साल की सजा का प्रावधान है वहीं धारा 304 के तहत अधिकतम उम्रकैद की सजा दी जा सकती है।

भारतीय संविधान की धारा 304 के अनुसार डाक्टरों द्वारा जल्दबाजी और लापरवाही में अगर किसी मरीज की मौत हो जाती है तो उसे कम से कम दो वर्ष की सजा हो सकती है। इस मामले में मथुरा की एक अदालत ने एक व्यक्ति की शिकायत पर डाक्टर महादेव प्रसाद कौशिक को सम्मन दिया था। शिकायत में कहा गया था कि उसके पिता बुद्ध राम को शरीर में दर्द की शिकायत के बाद डाक्टर के पास लाया गया था। डाक्टर द्वारा तीन इंजेक्शन दिए जाने के बाद उनकी मौत हो गई।

याहू जागरण 

Oct 20, 2008

छत्‍तीसगढ़ में 132 शिक्षक बर्खास्‍त

छत्‍तीसगढ के कांकेर जिले में बहुचर्चित शिक्षक भर्ती मामले में 132 शिक्षकों को बर्खास्‍त कर दिया गया है। जांच में प्रशासन ने यह पाया था कि, रिक्तियों के विरूद्व अधिक पदों पर भर्ती कर दी गई थी।

कांकेर के कोयलीबेडा क्षेत्र में मार्च 2007 में 57 पदों की रिक्तियां बताई गई थी, लेकिन जब अगस्‍त में भर्ती सुची जारी हुई तो 132 शिक्षकों की नियुक्ति कर ली गई। जबकि 23 वे शिक्षक ऐसे भी थे जिन्‍हें बगैर किसी प्रक्रिया के सीधे नियुक्ति दे दी गई थी।    

जब मामले का खुलासा हुआ, तो शिक्षा विभाग ने इसकी जांच के आदेश दे दिये। जांच में यह पाया गया कि भर्ती किए गए 93 शिक्षकों के दस्‍तावेज फर्जी है। भारी गोलमाल को देख प्रशासन ने सूची ही निरस्‍त करने का आदेश जारी कर दिया।

इधर शिक्षकों ने इस आदेश के खिलाफ न्‍यायालय की शरण ली और एक बार फिर मामले की जांच हुई। आखिरकार प्रशासन ने 28 को पात्र पाते हुए शेष नियुक्तियां रदद कर दी है।

दरअसल शिक्षाकर्मी भर्ती प्रकिया पुरे छत्‍तीसगढ में विवादित है। भर्ती पर उठने वाले सवालों के कारण ही राज्‍य शासन ने अब शिक्षाकर्मी भर्ती जो पहले सीधे जनपद और जिला पंचायत के माध्‍यम से होती थी उसे व्‍यवसायिक परिक्षा मंडल के हवाले कर दिया है।

http://thatshindi.oneindia.in/news/2008/10/20/132-teachers-expelled-in-chhattisgarh.html

Oct 16, 2008

संदिग्ध छवि वाले जजों को निकाला जाए: चीफ जस्टिस

जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार की लगातार बढ़ती शिकायतों के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने निचली अदालतों में कार्यरत संदिग्ध छवि वाले न्यायाधीशों को जबरन रिटायर करने के लिए कहा है। उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस को लिखे पत्र में चीफ जस्टिस ने कहा है कि न्यायाधीशों के कामकाज और कंडक्ट की लगातार समीक्षा की जाए।

चीफ जस्टिस के.जी. बालाकृष्णन ने कहा है कि नियम 56 (जे) के तहत अगर जजों की नियुक्ति 35 साल की उम्र से पहले हुई है है तो 50 साल की उम्र के बाद उसके कामकाज की समीक्षा की जा सकती है। अगर जज की नियुक्ति 35 साल की उम्र के बाद हुई है तो 55 साल की आयु होने पर उसे रिटायर करने का प्रावधान है। इस नियम को लागू करने का मकसद अयोग्य और अक्षम न्यायिक अधिकारियों को रिटायरमेंट की तयशुदा उम्र से पहले ही सेवानिवृत्ति प्रदान करना है।

सीजेआई ने नियम 56 (जे) के अलावा ऑल इंडिया जज असोसिएशन केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों का भी जिक्र किया है। जज की उम्र 50 साल होने पर उसके कामकाज की समीक्षा की जाए और उसके बाद 55 साल की उम्र होने पर। एक्सटेंशन देने से पहले 58 साल की उम्र पर भी चीफ जस्टिस न्यायिक अधिकारी के जुडीशियल करियर की जांच करे।

सीजेआई ने उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस से कहा है कि अगर उनके राज्य के सर्विस रूल में इस तरह का प्रावधान नहीं हैं तो नियमों में आवश्यक संशोधन कर लिया जाए और इसका सख्ती से पालन किया जाए। सीजेआई ने यह भी स्पष्ट किया कि समय से पूर्व रिटायरमेंट न्यायिक अधिकारी पर किसी तरह का दाग नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के अफसर और कर्मचारियों की भी 50 साल की उम्र के बाद समीक्षा की जाती है और 55 साल की उम्र होने पर हर साल रिव्यू होती है।

गौरतलब है कि सीजेआई ने जिस नियमों के तहत निचली अदालतों के न्यायाधीशों पर कार्रवाई किए जाने के लिए कहा है, वह नियम हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों पर लागू नहीं होते। हायर जुडीशियरी के जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के सबूत मिलने पर भी उन्हें किसी नियम के तहत हटाया नहीं जा सकता। उन्हें सिर्फ महाभियोग के जरिए ही पद से हटाया जा सकता है।

Oct 15, 2008

धर्मशास्त्रों के आधार पर समलैंगिकता पर पाबंदी को सही न ठहराएं

दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकता पर प्रतिबंध के मामले में केंद्र सरकार की बुधवार को खिंचाई की। कोर्ट ने सरकार से कहा है कि वह इस प्रतिबंध को न्यायोचित ठहराने के लिए धार्मिक तथ्यों के बजाय वैज्ञानिक रिपोर्टे को पेश करे।
समलैंगिकता समर्थक कार्यकर्ताओं द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस एपी शाह नीत बेंच ने एडीशनल सॉलिसिटर जनरल से कहा, ‘आप उन रिपोर्टे को पेश करें, जिसमें कहा गया है कि समलैंगिकता को अपराध मानने का सुझाव दिया गया हो।’ याचिका में वयस्कों द्वारा आपसी सहमति से समलैंगिकता की तरफ कदम बढ़ाने को अपराध मानने पर रोक लगाने की मांग की गई है।

Oct 13, 2008

Supreme Court judgment

1) Limitation Act 1963 : Mere Long possesion, it is trite. for a period of 12 years without anything more doesnot ripen into a title. CGLJ Vol. 18 Aug. 2008 SC 418
2) Or. 14 R. 1 of CPC : Non framing of issue - ommission to frame an issue - wouldnot vitiate the trial in a suit when parties went to trial fully knowing the rival case and led evidence - (2008) 2 CGLJ DB SC 104
3) Succession Act 1925 - S 63 (C)- WILL - Mode of Proving : Mere proving of signatures of executors and the attesting witnesses, held, not sufficient - unlike an ordinary document it must fullfil the condition impose by section 63 (C) of the succession act and S 68 of the evidence act. 1872 (2008) 7 SCC 695
4) Arbitration & Conciliation Act 1996 S 7: Section 7 doesnot require that the aggrement be stamped or that parties sign on every page (Para 65,66) 2008 (6) Supreme Today Part 133 Supreme 230 (decided on 25.08.2008)
5) Right to hold property although no longer a fundamental right, is still a constitutional right. It is a human right. 2008 (3) Crimes 122 SC
6) Examination of Accused : Recording of the statement of the accused under section 313 CRPC is not a purposeless exercise as it establishes a direct dialogue between court and accused. Each material circumstances appearing in evidence against the accussed is required to be put to him specifically, distinctly and seperately and failure to do so amounts to a serious irregularity vitiating trial, if it shows that accussed was prejudiced. 2008 (3) Crimes 112 SC
7) Dying declaration should be of such nature as to inspire full confidence of the court in its correctness. The court has to be on guard that the statement of the deceased was not as a result of either tutoring or promting or a product of imagination. 2008 (6) Supreme 298 Supreme Today Part 135
8) Criminal Trial : Identification- Utility of sniffer dog - Identification by Sniffer dog, held, is only for the purpose of investigation and not for evidence. 2008 (5) Supreme Court Cases 697

Oct 12, 2008

तीन पूर्व वीसी के खिलाफ मुकदमा

दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम के मामले में तीन साल लंबी जांच के बाद फर्जीवाड़े का खुलासा हो गया। कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग के प्रमुख सचिव और विशेष सचिव की पड़ताल में चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डा. पीके सिंह और मेरठ और फैजाबाद के कुलपति को भी दोषी पाया गया है। वर्तमान कुलपति प्रो. वीके सूरी ने नवाबगंज थाना में इनके खिलाफ भ्रष्टाचार व धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज कराई है। विशेष सचिव ने रिपोर्ट दर्ज होने के बाद तीन दिन में कार्रवाई से अवगत कराने के निर्देश दिए हैं।

दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम के तहत वर्ष 2003 से 2007 तक प्रदेश और देश के विभिन्न राज्यों में स्टडी सेंटर खोलकर विभिन्न पाठ्यक्रमों का संचालन किया गया था। कानपुर, मेरठ और फैजाबाद विश्वविद्यालय ने उत्तर प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों में स्टडी सेंटर खोलकर लाखों छात्र-छात्राओं ने डिग्री-डिप्लोमा दिए। बाद में इन डिग्री-डिप्लोमा की विधिक मान्यता खतरे में पड़ने से छात्र-छात्राओं का भविष्य अधर में लटक गया। शासन स्तर पर इस प्रकरण की जांच के आदेश के बाद कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग के तत्कालीन प्रमुख सचिव जी. पटनायक ने पड़ताल शुरू की जिसमें चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डा. पीके सिंह के खिलाफ लगाए गए आरोप सही पाए गए।

बताते हैं कि दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम के संचालन के लिए न तो सक्षम अधिकारी की अनुमति ली गई और न ही उत्तर प्रदेश कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय अधिनियम 1958 में संशोधन किया गया। यही नहीं, कृषि विश्वविद्यालय के उक्त कार्यक्रमों के संचालन से पहले भारत सरकार द्वारा गठित दूरस्थ शिक्षा परिषद से अनुमति भी नहीं ली गई, जिसका परिणाम छात्र-छात्राओं को भुगतना पड़ा। बताते हैं कि स्टडी सेंटरों पर शिक्षण कार्य होने और छात्रों को दी जाने वाली सुविधा की छानबीन तक नहीं हुई। दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम के जरिए होने वाली आय का 75 प्रतिशत भुगतान स्टडी सेंटर के संचालकों को कर दिया गया। पटनायक की जांच के बाद कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग के तत्कालीन विशेष सचिव पीके अग्रवाल ने भी इस प्रकरण की जांच की।

उन्होंने कानपुर के कुलपति डा.पीके सिंह, मेरठ के कुलपति डा. पीपी सिंह और फैजाबाद के कुलपति डा. बीबी सिंह के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने का निर्णय लिया था। हाल ही में विशेष सचिव धीरज साहू ने वर्तमान कुलपति प्रो. वीके सूरी को मुकदमे का आदेश दिया। उन्होंने तीन दिन के भीतर कार्रवाई से अवगत कराने के निर्देश दिए हैं।

साभार

दहेज उत्पीड़न कानून पर विचार करने की जरूरत : हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा देखने में आ रहा है कि दहेज उत्पीड़न कानून का जमकर दुरुपयोग किया जा रहा है। इसलिए कानून निर्माताओं को इस कानून पर विचार करने की जरूरत है।

जस्टिस अरुणा सुरेश की पीठ ने दहेज हत्या व दहेज प्रताड़ना के आरोपी योगेश शर्मा की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की है। पीठ ने माना कि जिस तरह दहेज उत्पीड़न कानून का दुरुपयोग हो रहा है वह गंभीर चिंता का विषय है। इसके साथ ही कोर्ट ने योगेश को 40 हजार रुपये के एक जमानती पर जमानत दे दी। कोर्ट ने कहा कि पत्नी की मौत के मामले में आरोपी योगेश शर्मा के खिलाफ प्रथम दृष्टया ऐसा कोई खास सबूत नहीं है जिससे यह पता चल सके कि वह पत्‍‌नी को प्रताड़ित करता था। इसलिए आरोपी को जमानत मिलने से नहीं रोका जा सकता है।

CONSTITUTION AND CHILD ABUSE (WITH SPECIFIC REFERENCE TO CHILD IN WOMB)

Badshah Prasad Singh, Advocate
Chairman Legal Aid Committee,
State Bar Council Chhattisgarh (C.G.)

In view of judicial reforms which is the main purpose of this matter, this present thought deals only with some reasonable legislative, Judicial and Administrative Questions & few understandable solutions regarding child abuse concerning particularly with child in womb.

Article 39 (e) and (f) of the constitution of India are the provisions under the directive principles of state policy which stipulates that the tender age of the children should not be abused and children would be given opportunities and facilities to develop in a healthy manner in conditions of freedom and dignity. But this article is misinterpreted and mis-understood in matters of its implementation. Is underlivered child not a person of tender age?

For the purposes of the present convention a child means every human being below the age of 18 yrs. under the law applicable to child. Is the child in womb not a human being? Definition of child age is wrong. The concept of age as understood by legislators is erroneous in legislation.

Delivery and birth has not been correctly identified. The date of birth is the date of delivery. Mother does not give birth to a child. She delivers a child already born in her womb. Doctors also deliver child. Delivery may be classified as normal delivery and surgical delivery. This kind of distinction does not arise in matter of birth. Birthday is celebrated all over the world in ignorance. And birth and death register officially kept is not a valid record. The date of birth correctly understood will bring radical changes in all phases and fields of human life.

Justice seeks truth and truth emerges from gestalt perception. Human life has not been perceived as a whole. Noteworthy is the system of education of children in India. A great injustice is done in legislation in case of child in womb.

Article 28 recognizes the right of a child to compulsory and free primary education. The article suffers from human and social in justice. Is the child in womb is not a child? Has the child in womb not its influence on society? Does the first delivered child not increase pleasures in life of its parents and family members? Article 28 does not include prenatal education. Primary education begins after delivery. There is understandable difference between primary education and basic education. Prenatal education given to the undelivered child is basic education. Prenatal education will improve quality of life and standard of education proper management of human life without prenatal education is impossible.

Child in womb learns and has capacity to learn. Life history of Abhimaniyu, Ashtaavakra, Shukdeo and so on are past records of prenatal education. Present scientific findings too confirm this fact. Therefore in light of the above said description an amendment in article 28 of the Indira Constitution is needed without further delay to maintain dignity of undelivered child and democracy.

Idols made of stones have legal personality and legal right to sue for their claims including protection and maintenance. Though they too are dependent and functionally disabled like undelivered child who is not given legal right to sue on unjust and illogical grounds. This distinction is a disgrace of undelivered child and a mockage on human wisdom. Undelivered child is also a person equal to a person in existence. A minor has right to sue. Is undelivered child not a minor person? Undelivered child should also be considered as a legal personality and be given legal right to sue in interest of its growth and development and justice too.
For the first time in India an undelivered child of a divorced pregnant mother cried for maintenance. But the Magistrate and also District Judge refused its claim on the ground of non-existence.

A writ petition (6905/2000 group-C) undelivered, child (minor) Versus state of Uttar Pradesh and others was filed in High Court, Allahabad. A leaned advocate Nagendra Kumar Srivastava challenged the orders passed by subordinate court. His arguments was based on following grounds :

1) On the ground of Constitution of India.
2) On the ground of Law.
3) On the ground of Interpretations of statute.
4) On the ground of Medical Science.
5) On the ground of Dharma.
6) On the ground of Authentic news.
7) Meaning & difference of delivery, birth, person given in standard dictionaries.

The Advocate raised a very logical question before the court. He asked that if no person exists in womb. Then the question of damage, destruction and death not arise. Hence Sec. 316 I.P.C. is ineffective, invalid and illegal, which has made provision to extend imprisonment up to ten years and also liable to fine. The then Justice Ratnakar Das felt convinced and admitted writ in no time.

Under law undelivered child is not granted maintenance. Even child in womb of its divorced mother also does not get maintenance though he or she is quite innocent regarding the matter of divorce. Pregnant mother carries load of the child and financial load too, for maintenance of the child. Mother is caught in web to manage special diet; nutrients and medical care for the child. Father is set free from liabilities concerning the child in womb. Father should be legally bound to pay maintenance to the child. Courts of law should also expedite disposal of the cases concerning pregnant mother because the court has no right to harass an innocent child in womb.

Mother's womb is a strong chamber made by nature to save the child from all abuse, but child is not secured even in mother's womb. Materialistic, Philosophy of man, socio- economic structure of society and polluted environment hampers his physical growth and mental development even existence.

Undelivered child is mostly abused by doctors and mothers:
1. Dr's. Satanic role with child in womb.
Dr's role in human life is godly and satanic both. The sight of photos taken at the time of abortion of child in womb is extremely painful. The child reacts against the surgical instruments to save its life in womb. The doctor acts mercilessly and fights with helpless, confined and innocent child in womb with his cruel hands just for financial gains. He is a murderer not a killer. But generally he escapes strict laws against illegal abortions and protection of right of child in womb to be delivered safely under article 3 (2) - (Preamble to the Declaration of the Right of the Child adopted by the UNO on November 20,1959).
2. Heart less Mothers commits heineous crime with her own womb.

Married women for personal gratifications, better standard of living adjustment with condition of employment or pressure of husband and family members, fear of dowry etc. prefer deliberate miscarriage and use abortifacient or rush to the doctor who are professionally involved in this sin. Child who is in the womb of unmarried mothers are hard-hit. Unmarried mothers for her social prestige throw their wombs (national assets) as garbage. To develop healthy attitude towards unwanted delivery, pregnant women need guidance and counselling, through psychologist, social reformers, judges, advocates and trained government personnel.

सलवा जुडूम पर छत्तीसगढ़ को क्लीनचिट

छत्तीसगढ़ में नक्सली, जनजातीय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में परेशानियां खड़ी कर रहे हैं। ये लोगों पर ज्यादतियां करने के साथ उन्हें अपने से जुड़ने के लिए भी विवश कर रहे हैं। यह खुलासा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को सौंपी अपनी रिपोर्ट में किया है।


रिपोर्ट में आत्मरक्षा की खातिर हथियार उठाने के लिए सलवा जुड़ूम आंदोलन और छत्तीसगढ़ सरकार को क्लीनचिट दी गई है। डीआईजी सुधीर चक्रवर्ती की अगुवाई में गठित आयोग के तीन सदस्यीय पैनल ने रिपोर्ट में कहा है कि कानून जब अप्रभावी साबित हों तो जनजातियों को आत्मरक्षा का अधिकार देने से इनकार नहीं किया जा सकता।

झूठे पाए गए आरोप

पैनल ने सलवा जुड़ूम कार्यकर्ताओं की ज्यादती को लेकर मिली 550 शिकायतों में से 168 की जांच की और इन्हें फर्जी पाया। जिन ग्रामीणों को सलवा जुड़ूम कार्यकर्ताओं या सुरक्षा बलों द्वारा मारा बताया गया था, दरअसल वे नक्सलियों की गोली का शिकार बने थे। आयोग ने अहिंसक सलवा जुड़ूम आंदोलन को हिंसक रूप देने के लिए भी नक्सलियों को दोषी माना है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का मानना है कि नक्सली समस्या का संबंध बहुत कुछ सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन से है और राज्य में बेराजगारी बहुत अधिक है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिकाओं में लगे उन आरोपों पर सख्त रुख अपनाया था, जिसमें कहा गया था कि सलवा जुड़ूम कार्यकर्ता हिंसा और ज्यादती में लिप्त हैं।

क्या है सलवा जुडूम

सलवा जुड़ूम आंदोलन नक्सली हिंसा का अहिंसक विरोध करने के लिए शुरू किया गया था। बाद में नक्सलियों की ज्यादतियों के प्रतिकार और आत्मरक्षा के लिए राज्य सरकार ने जनजातीय लोगों को हथियार उपलब्ध कराए।


सलवा जुडूम पर छत्तीसगढ़ को क्लीनचिट


राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने सुप्रीमकोर्ट में सौंपी एक रिपोर्ट में नक्सलियों की गतिविधियों पर काबू पाने के लिए शुरू किए गए सलवा जुडूम को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार को क्लीन चिट दी है।


आयोग के तीन सदस्यीय पैनल ने 118 पृष्ठों की रिपोर्ट में कहा है कि कानून को लागू करने वाले जब स्वयं अप्रभावी हो या मौके पर मौजूद नहीं रहे तो ऐसी स्थिति में जनजातियों को आत्मरक्षा का अधिकार दिए जाने से इंकार नहीं किया जा सकता। उप महानिरीक्षक सुधीर चौधरी के नेतृत्व वाले दल ने नक्सलवाद से निपटने के लिए जनजातियों को हथियार देने पर छत्तीसगढ़ सरकार को क्लीन चिट दी है। रिपोर्ट के अनुसार सलवा जुडूम कार्यकर्ताओं के विरूद्ध 550 शिकायतें मिलीं थी जिनमें से 168 की जांच गई और ये सभी शिकायतें फर्जी पाई गई क्योंकि जिन ग्रामीणों के सलवा जुडूम अभियान के तहत या सुरक्षा बलों द्वारा मारे जाने की शिकायत की गई थी वास्तव में उनकी हत्या नक्सलियों ने की थी।

सलवा जुडूम अभियान के तहत राज्य सरकार ने लोगों को विशेषकर जनजातियों को नक्सलियों के विरूद्ध आत्म रक्षा के लिए हथियार दिए हैं। आयोग के दल ने अपनी रिपोर्ट में अहिंसक सलवा जुडूम आंदोलन को हिंसक बनाने की कोशिशों के लिए नक्सलियों को जिम्मेदार ठहराया है।

रिपोर्ट में सलवा जुडूम की तारीफ करते हुए कहा गया है कि आंदोलन के कार्यकर्ताओं को नक्सली चुन चुन कर मार रहे हैं तथा सलवा जुडूम के नेताओं की रैलियों पर हमले हो रहे हैं। रिपोटोर् के अनुसार अनेक मामलों में दर्ज पुलिस प्राथमिकताओं की जांच करने पर पाया गया है कि जिन लोगों को मृत बताया गया है उनमें अनेक लोग जीवित हैं। बहुत से लोगों की स्वाभाविक मृत्यु भी फर्जी ढग से आंदोलन कार्यकर्ताओं द्वारा हत्या बताई गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका में उन आरोपों पर गंभीर रुख अपनाया था जिनमें कहा गया है कि सलमा जुडूम कार्यकर्ता निर्दोष लोगों पर जुल्म ढा रहे हैं और लोगों से जबरन धन वसूली में लिप्त हैं। मानवाधिकार आयोग ने कहा है कि नक्सली हिंसा की समस्या का मूल कारण लोगों का बेरोजगारी की वजह से सामाजिक आर्थिक विकास से वंचित रहना है। इस समस्या से निपटने के लिए बहुस्तरीय रणनीति बनाने की आवश्यकता है। आयोग के पैनल ने जनहित याचिका में लगाए गए आरोपों की कडी भ‌र्त्सना की है। अध्ययन के दौरान पैनल के सदस्यों पर नक्सलियों ने तीन बार हमला भी किया था।

समाचार साभार  - दैनिक भास्‍कर, याहू जागरण

Oct 11, 2008

FIR a must? SC's own order called for preliminary probe first

New Delhi: After "cracking the whip" on cops refusing to immediately register FIRs on receipt of complaints pertaining to commission of a cognizable offence, the Supreme Court on Wednesday hit an air, pocket on finding that its earlier judgment had allowed preliminary inquiry prior to registration of FIRs.

Senior advocate Shekhar Naphade, appearing for Maharashtra, pointed out the dichotomy to a bench comprising Justices B N Agrawal and G S Singhvi, saying that in a 2007 judgment in Rajinder Singh Katoch case, the SC had allowed preliminary probe "in appropriate cases" before registration of an FIR.

Naphade said the state was ready to abide by the bench's latest directive putting the onus on police for immediate registration of FIR, but it would be difficult to punish errant cops who were sure to take refuge under the 2007 judgment that allowed them to exercise discretion.

The bench agreed with him that the judgment was definitely an impediment to its August 8 order prescribing stringent action against cops refusing to register FIRS and wanted the counsel for states to find out the law laid down by the apex court on this issue. "We were under the impression that the provisions of Criminal Procedure Code left no scope for any dilly-dallying on registration of an FIR But, it seems we have created confusion through the 2007 judgment," the bench said.
Unless "what is an appropriate case" is defined and guidelines laid down, it would be difficult to catch the culprit, Naphade said. This plea drew support from Tamil Nadu, Orissa, Chandigarh, Haryana and Puducherry.

Arguing for Chandigarh administration, advocate Kamini Jaiswal contended that making registration of FIRS mandatory would increase the misuse of anti-dowry provisions and confer a power that would surely be misused by police for extorting money. "We have seen complaints under 498A of IPC being filed not only against the husband but aged parents-in-law and all other in-laws that led to arrest of even people on the death bed. Making registration of FIRS mandatory will make the situation worse," she said.

Agreeing with Jaiswal, Naphade said one has to be careful in registering FIRs during polls when reckless allegations are made by political rivals as well as in civil disputes and matrimonial matters. Convinced that the matter required elaborate hearing, not only on what the law provided but also on the interpretations given by the apex court, the bench adjourned hearing on the matter asking the counsel to research the issue thoroughly.
Source : Times of India

(by T.P.C. Gupta, Advocate)

Oct 10, 2008

PRACTICING ENGLISH LANGUAGE IN NORMAL DISCOURSE

Nikhilesh Banerjee, Advocate

The impact of English is not only continuing but also increasing. According to latest survey there are about more than 2500 Indian newspapers in circulation with different objectives from all walks of grasps within 63 yrs. of our status of Independence and within a span of 58 yrs. of our language schedule in the Constitution of India. Such a candid expression was made notice a few days ago by the orators in the symposium organized in our Ratanchand Surana Law College at Durg by the respected and learned speakers, all are centered in practicing of law, particularly keeping their keen eyes on the society and the judicial fraternity.


The process of producing English-bilinguals in India began with the Minute of 1835, which officially endorsed T. B. Macaulay's goal of forming --- a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern-a class of person, Indians in blood and colour but English in taste, in opinion, in morals, and in intellect, Obviously English became the official and academic language of India by the early loth century. We gather from the different media and forerunners that only about 6% to 7% of India's population speak English , but they are individuals who lead India's economic, industrial, professional, political and social life; roughly they can be equated as the super-imposed authority propagating jago-India-jago. In South India, where English serves as a universal language in the way that Hindi does in the North (although their inner circle pursue English, Hinglish, Regenglish and amalgamated dialect with English). The trend has now permeated into the membrane of our refined thought.


Such a modified admixture of English flows into the veins of other recognizable lofty languages in the world with concoction of handy pronunciation for becoming a unified umbrella of languages, in the world. Indian English is very much of their own . Simply by virtue of the strength of population it has successfully exported its vast and rich culture and expressions through many a prize winning contributions abroad the horizon has spotted the glittering presence of it. Then why should we remain to dropout in the race of reaching the bull target or become an indispensable progressive lingua; not a far propogation without surrendering our native languages. Many a Christian missionaries during British rule and our independent rule welcome such a variety of our languages irradiating faculty. Nevertheless the importance of the ability to speak or write English has become the de-facto standard. Learning English language has become popular; according it has become standard not because it has been approved by any standard organisation but because it is widely used by all the major players of economy competing with world or through their different medium or communicative apparatus or imparting education. Including the system of administration of justice with the panorama of 1.2 billion people. A wisdom foresees that as long as the English language is universal, it will always Indian, cannot now be dissociated in any attempt whatsoever.

Barrister Mahatma Gandli in his impressive nonchalant manner says “I, therefore, think that our European friends may rest assured that the future Federal Court will not sent them away empty-handed, as we expect to away empty -handed, if we do not have the favour of the Ministers, who are the present advisors of His Majesty, “Next he deplores that dreams of Supreme Court and other courts did not come into being even after more than six decades of India’s becoming a republic is granting justice in accordance with Official Languages Act, the ambiguity of which still persists by the courts of justice that is weak interpreting the principles of justice mostly percolating through the Engilsh language. Policing, is part of delivery of justice - pro-activism against injustices, taxes, fees and incidentals are paid only of half the decisions remains satisfactory even between the litigants heeling for years. Legal profession mostly in all privacy has become a vested interest, the onlookers are the weakened parties and reflecting judicial decisions that might be put on over burdened dispensation. The role of the over-fragnant English is the key communicator to abridge the gap and fullfillment of judiciary which without reservation does not inch in as should be or could have been in mitigating our pain and grief.

Oct 9, 2008

एससी/एसटी कानून और धारदार बनेगा

नई दिल्ली। केंद्र सरकार अनुसूचित जाति और जनजाति पर अत्याचार रोकने वाले मौजूदा कानून को और धारदार बनाने पर विचार कर रही है। कांग्रेस के नेतृत्ववाली गठबंधन सरकार की इस योजना को आगामी लोकसभा चुनावों में अपने परंपरागत वोटबैंक पर नजर से जोड़कर देखा जा रहा है।
सरकार ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निरोधक कानून 1989 में कुछ संशोधन के प्रस्ताव रखे हैं और इस पर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग [एनसीएससी] से विचार मांगा है। इस संबंध में केंद्र सरकार संसद के आगामी सत्र में एक विधेयक पेश करने जा रही है। इन संशोधनों को सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री मीरा कुमार ने अपनी मंजूरी दे दी है।
संभावना जताई जा रही है कि एनसीएससी के सदस्य इस माह के अंत में होने वाली अपनी औपचारिक बैठक में मंत्रालय के संशोधनों पर विचार करेंगे। मंत्रालय ने संविधान के अनुच्छेद-338 के उप बंध-9 के प्रावधानों के तहत इस वर्ष 8 जुलाई को आयोग के विचारों को ध्यान में रखा था। मौजूदा कानून की दो धाराओं में संशोधन का प्रस्ताव है। मंत्रालय ने दोनों धाराओं में एक-एक उपधारा जोड़ने का प्रस्ताव रखा है। संशोधन के तहत ऐसे मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए राज्य सरकार हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की सहमति से अधिसूचना जारी कर हर जिले में एक विशेष सत्र न्यायालय की स्थापना करेगी।

साभार - दैनिक जागरण

अनैतिक देह व्यापार निवारण कानून [आईटीपीए] में प्रस्तावित संशोधन

यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए चकलाघरों का रुख करने वाले रंगीले लोग सावधान कहीं आपको इसके लिए जेल की हवा न खानी पडे़। जी हां, देश में अनैतिक देह व्यापार निवारण कानून [आईटीपीए] में प्रस्तावित संशोधन विधेयक संसद के आगामी सत्र में यदि पारित हो जाता है तो यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए कोठों पर जाने वालों को तीन से छह महीने जेल में भी बिताना पड़ सकता है।

संबंधित प्रस्तावित संशोधन विधेयक 2006 से ही संसद में रखा गया था लेकिन देश भर के यौनकर्मियों और उनके कल्याण से जुड़े संगठनों द्वारा इसमें वर्णित नए-नए प्रावधानों पर अंगुलियां उठाए जाने के कारण सरकार ने इस पर पुनर्विचार का फैसला किया था। गृहमंत्री शिवराज पाटिल की अध्यक्षता में इससे संबंधित मंत्रियों के समूह [जीओएम] ने संबंधित संशोधन विधेयक को हरी झंडी प्रदान कर दी है, जिस पर जल्दी ही केंद्रीय मंत्रिमंडल विचार करेगा।
यदि जीओएम की रिपोर्ट पर अमल करते हुए सरकार ने संसद में रखे आईटीपीए संशोधन विधेयक को मंजूरी प्रदान करा ली तो यौन इच्छाओं की पूर्ति करते हुए वेश्याओं के कोठे से पहली बार पकड़े जाने पर गिरफ्तार व्यक्ति को तीन महीने की सजा या बीस हजार रुपये का जुर्माना या दोनों हो सकता है।

प्रस्तावित संशोधिन कानून की धारा पांच [सी] में किए गए प्रावधानों के तहत पहली बार कोठों और चकलाघरों से गिरफ्तार होने वाले व्यक्तियों को तीन माह की सजा या बीस हजार रुपये जुर्माना या दोनों हो सकता है, जबकि दूसरी बार या इससे अधिक बार गिरफ्तार किए जाने पर उन्हें छह माह के लिए जेल भेजा जा सकता है या पचास हजार रुपये का जुर्माना हो सकता है या दोनों तरह की सजा हो सकती है। हालांकि जीओएम में शामिल केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री अंबुमणि रामदास ने जीओएम की बैठक में इस धारा का यह कहते हुए विरोध किया था कि ग्राहकों के लिए जेल का प्रावधान करने के कारण यौनकर्मी भूमिगत हो जाएंगी, जिसकी वजह से एचआईवी/एड्स की रोकथाम के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रमों पर विपरीत असर पड़ेगा।
उल्लेखनीय है कि इससे पहले यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए चकलाघर का रुख करने वाले व्यक्तियों को गिरफ्तार नहीं किया जाता था। अबतक केवल यौनकर्मियों को ही पुलिस गिरफ्त में लेने का ही प्रावधान है। अनैतिक देह व्यापार निवारण कानून 1956 के तहत पुरुषों को तभी गिरफ्तार किया जाता रहा है, जब वे सार्वजनिक स्थानों पर यौन संबंध बना रहे हों। हालांकि यौनकर्मियों और उनके कल्याण से जुड़े संगठनों का यह तर्क है कि इससे यौनकर्मियों के समक्ष आजीविका की समस्या खड़ी हो जाएगी। जेल और जुर्माने के डर से कोठों पर ग्राहकों का आना धीरे-धीरे कम हो जाएगा और इसका सीधा असर यौनकर्मियों की रोजी-रोटी पर पड़ेगा। इन संगठनों में नई दिल्ली स्थित भारतीय पतिता उद्धार सभा [बीपीयूएस] नाज फाउंडेशन कोलकाता की संस्था दरबार महिला समन्वय समिति और अशोदया समिति शामिल हैं।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने इसे इस प्रकार परिभाषित किया है- आर्थिक, सामाजिक या धार्मिक कारणों से वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाएं और लड़कियां, अनैतिक देह व्यापार से जुड़ी यौनकर्मियों की श्रेणी में रखी गई हैं। हालांकि सिब्बल और रामदॉस ने धारा पांच ए और पांच सी को अस्पष्ट करार देते हुए अपनी दलीलें जरूर पेश कीं। लेकिन जीओएम ने उनकी दलीलों को दरकिनार करते हुए इसे हरी झंडी प्रदान कर दी है।
जीओएम की दलील है कि धारा पांच ए के तहत अनैतिक देह व्यापार को नए रूप में परिभाषित करने तथा धारा पांच सी के तहत ग्राहकों के जेल भेजे जाने का प्रावधान करने से बगैर प्रतिबंध लगाए देह व्यापार पर रोक लगाई जा सकती है। हालांकि प्रस्तावित संशोधन विधेयक में धारा आठ को हटाए जाने का विभिन्न संगठनों ने स्वागत किया है। सरकार ने देह व्यापार में लिप्त महिलाओं को दलालों, एजेंटों और धोखेबाजों द्वारा दबाव या धमकी देकर गुमराह किए जाने की घटनाओं पर विराम लगाने के उद्देश्य से धारा आठ को समाप्त करने का फैसला लिया गया है। धारा आठ के हट जाने से पुलिस अब यौनकर्मियों को पकड़कर थाने नहीं ले जा सकेगी। ज्यादातर महिलाओं का इसी धारा के तहत चालान किया जाता था।

साभार - दैनिक जागरण

विष्‍फोटक कानूनों में संशोधन संभव

अहमदाबाद और दिल्ली के ब्लास्ट में आतंकियों द्वारा अमोनियम नाइट्रेट के धड़ल्ले से इस्तेमाल को देखते हुए केंद्र सरकार इस रसायन का विस्फोटक प्रभाव कम करने पर विचार कर रही है। इस सिलसिले में एक अमेरिकी कंपनी से संपर्क साधने का फैसला किया गया है।
जिस अमेरिकी कंपनी से संपर्क साधने पर विचार किया जा रहा है, उसके पास इसके प्रभाव को कम करने का पेटेंट है। कंपनी से परमिट मिलने के बाद सरकार इसमें एक खास रसायन मिलाने का आदेश जारी करेगी। इससे अमोनियम नाइट्रेट को सिर्फ उर्वरक बनाने के काम में ही इस्तेमाल किया जा सकेगा और उसमें विस्फोट की संभावना बहुत कम रहेगी।

कानून में संशोधन : केंद्रीय मंत्रिमंडल ने विस्फोटकों का दुरुपयोग रोकने के लिए कानून में संशोधन करने की भी अनुमति दे दी है। संशोधित कानून के दायरे में अमोनियम नाइट्रेट को लाया जाएगा। आरडीएक्स तैयार करने में इसको महत्वपूर्ण घटक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

साभार - दैनिक भास्‍कर

बीमा में एफडीआई 49 फीसदी करने का विधेयक होगा पेश

निजी बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा मौजूदा 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी करने के लिए व्यापक बीमा विधेयक संसद के आगामी सत्र में पेश किए जाने की संभावना है। वित्त मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि कानून मंत्री फिलहाल मसौदे की समीक्षा कर रहे हैं और मंत्रालय से स्वीकृति मिलने पर इसे मंत्रिमंडल के पास मंजूरी के लिए भेज दिया जाएगा। संसद का सत्र 17 अक्टूबर से शुरू होना है।

पिछले महीने विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता वाले मंत्री समूह ने एफडीआई की सीमा 49 फीसदी करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। प्रस्तावित बदलावों में इरडा अधिनियम-1999 और एलआईसी अधिनियम-1956 समेत कई अन्य कानूनों में संशोधन किया जाएगा। साल 2000 में बीमा क्षेत्र को खोलने के बाद, देश में करीब तीन दर्जन निजी कंपनियों ने अपना परिचालन शुरू किया। उनमें से कई को 26 फीसदी की एफडीआई सीमा की बाध्यता का सामना करना पड़ा और वे विदेशी निवेश सीमा बढ़ाने की मांग करती आई हैं।

बीमा कारोबार के बाजार में 65 फीसदी हिस्सेदारी वाली कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) सरकार की पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी है। जनरल इंश्योरेंस कंपनियों में चार सरकारी कंपनियां : न्यू इंडिया इंश्योरेंस, ओरिएंटल इंश्योरेंस, नैशनल इंश्योरेंस और यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस हैं।

साभार - नवभारत टाईम्‍स

तो कैदियों को वोट डालने का हक क्यों नहीं!

देश का कानून जेलों में बंद कैदियों को वोट देने के लायक नहीं समझता। हालांकि उन्हें चुनाव लड़ने का अधिकार देता है। यही वजह है कि अब तक कई कैदी लोकसभा और विधानसभाओं में पहुंच चुके हैं। अब मध्यप्रदेश जेल मुख्यालय ने इस संबंध में संविधान संशोधन का प्रस्ताव संसद को भेजा है। संविधान संशोधन का अधिकार संसद के पास है।

मध्य प्रदेश के पुलिस उप महानिरीक्षक [विधि जेल] आरएस विजयवर्गीय ने बताया कि भारतीय संविधान में विचाराधीन कैदियों को वोट डालने का हक नहीं दिया गया है। हालांकि वे कैदी जिन्हें तीन साल से अधिक की सजा हुई है, चुनाव नहीं लड़ सकते। उन्होंने बताया कि कैदियों को वोट देने का अधिकार दिलाने के लिए जेल मुख्यालय ने संविधान संशोधन का प्रस्ताव संसद को भेजा है। उन्होंने बताया कि घर से दूर रहने वाला एक आम मतदाता भी पूर्व अनुमति लेकर डाक से वोट दे सकता है।

सूत्रों के अनुसार इस समय मध्यप्रदेश की जेलों में 35 हजार से अधिक विचाराधीन कैदी हैं। हर बार की तरह इस बार भी ये कैदी दो महीने बाद होने जा रहे विधानसभा चुनाव में वोट नहीं डाल पाएंगे। चुनाव तक कैदियों की संख्या एक लाख पहुंच जाएगी। क्योंकि चुनाव के समय शांति व्यवस्था के नाम पर कथित असामाजिक तत्वों को ढूंढ़-ढूंढ़कर जेल पहुंचा दिया जाता है। जेल में रहकर चुनाव जीतने के बाद यदि इन्हें जेल में ही रहना पड़े तब भी सरकार के संकट के समय सदन में जाकर वोट दे सकते हैं। पिछले दिनों मनमोहन सरकार पर आए संकट के समय जेल में बंद लगभग आधा दर्जन सांसदों ने वोट देकर सरकार बचाने में भूमिका निभाई थी।

साभार - दैनिक जागरण

हत्यारोपी के प्रत्यर्पण मामले में 15 तक दलीलें पेश करने का आदेश

अमेरिका में पत्‍‌नी की हत्या करने के बाद भारत भाग कर आने वाले अवतार सिंह ग्रेवाल के प्रत्यर्पण के लिए अमेरिकी सरकार की तरफ से दायर अर्जी पर पटियाला हाउस कोर्ट ने सरकारी पक्ष को कहा है कि वह इस मामले में अपनी लिखित दलीलें 15 अक्टूबर तक दे सकता है। जिसके बाद संभावना है कि अदालत इस अर्जी पर अपना फैसला सुरक्षित रख ले।


ज्ञात हो कि पिछली सुनवाई पर आरोपी के वकील ने अर्जी को खारिज किए जाने की मांग की थी। अदालत में दायर अंतिम दलील में आरोपी के वकील का कहना था कि उसके मुवक्किल के खिलाफ अभियोजन पक्ष द्वारा पेश सबूत उसके प्रत्यर्पण के लिए पर्याप्त नहीं है। प्रथम दृष्टया आरोपी पर यह मामला बनता ही नहीं है। पटियाला हाउस कोर्ट स्थित अतिरिक्त मुख्य महानगर दंडाधिकारी ए.के.कोहार की अदालत में अमेरिकी सरकार ने विदेश मंत्रालय के जरिए अर्जी दायर कर आरोपी ग्रेवाल के प्रत्यर्पण की मांग की है। इस मामले में अभियोजन पक्ष का कहना है कि आरोपी ने शक के आधार पर अपनी पत्‍‌नी की हत्या कर दी थी। उसने एक पत्र भी पत्‍‌नी के नाम लिखा था। कहा था कि पत्‍‌नी ने उसकी जिंदगी तबाह कर दी है। इसलिए वह उसे कभी माफ नहीं करेगा। पेश मामले में आरोपी ग्रेवाल 29 मार्च 2007 को अपनी पत्‍‌नी की हत्या कर भारत भाग आया था। 30 मार्च 2007 को उसे आईजीआई एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया गया था।

साभार - याहू जागरण

हाईकोर्ट ने पूछा- समलैंगिकता पर केंद्र का रुख क्या ?

आपसी सहमति के आधार पर वयस्कों में समलैंगिक संबंधों को गैर आपराधिक कृत्य घोषित किया जाए या नहीं, इस मुद्दे पर गृह और स्वास्थ्य मंत्रालय के बीच मतभेद बरकरार है। रुख न तय कर पाने पर हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार की खिंचाई की है। समलैंगिकता को लेकर कानून के मुद्दे पर सरकार की ओर से दो तरह के विचार सामने आने पर नाराजगी जाहिर करते हुए चीफ जस्टिस एपी शाह व जस्टिस डॉ. एस मुरलीधर की पीठ ने कहा कि दोनों मंत्रालयों ने अब भी अलग-अलग हलफनामा दायर कर दो तरह की बातें कही हैं। आखिरकार, इसके पीछे सरकार का रुख क्या है? पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पीपी मल्होत्रा से कहा कि क्या आप केंद्र के रुख को लेकर स्पष्ट हैं? इस पर मल्होत्रा ने साफ जवाब नहीं दिया। पिछली सुनवाई में मल्होत्रा ने कहा था कि दोनों मंत्रालयों में सहमति बनाने के लिए जल्द ही कैबिनेट में फैसला ले लिया जाएगा। हालांकि शुक्रवार को केंद्र की तरफ से पेश हुए पीपी मल्होत्रा ने कहा कि पुरुष-पुरुष या स्त्री-स्त्री में यौन संबंध बनाना आईपीसी में अपराध माना गया है, इसलिए इसे कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती है। मल्होत्रा ने कहा कि याची का यह कहना कि इसे कानूनी मान्यता देने से एड्स की बीमारी खत्म हो जाएगी, गलत है। इससे एड्स और अधिक फैलेगा।
ज्ञात हो कि अदालत इस मामले में कई गैर सरकारी संगठनों की जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। इनमें निवेदन किया गया है कि आपसी सहमति के आधार पर दो वयस्कों के बीच समलैंगिक संबंध बनें, तो इन्हें अपराध के दायरे से बाहर रखा जाए और इसके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 377 में संशोधन करने के संबंध में सरकार को निर्देश दिए जाएं। इस धारा के तहत उम्रकैद तक का प्रावधान है। इस मामले में केंद्रीय गृह व स्वास्थ्य मंत्रालय का रुख अलग-अलग है। गृह मंत्रालय जहां सजा का समर्थन कर रहा है, वहीं स्वास्थ्य मंत्रालय दंड का प्रावधान हटाने के पक्ष में है।

साभार - दैनिक जागरण

Oct 8, 2008

भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन आवश्‍यक : सोनिया गॉंधी

परमाणु करार की राजनीतिक ऊर्जा और संप्रग सरकार की उपलब्धियों के सहारे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उत्तरप्रदेश से अगले लोकसभा चुनाव का बिगुल बजा दिया है। इस क्रम में वे संप्रग की सबसे कमजोर नस आतंकवाद के मुद्दे पर भले बचाव की मुद्रा में दिखीं, मगर उनका असली राजनीतिक हमला भाजपा पर नहीं बल्कि उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती पर रहा। उन्होंने कहा कि केंद्र यूपी को हजारों करोड़ रुपये दे रहा है। प्रदेश सरकार के भ्रष्टाचार की वजह से लोगों को इसका फायदा नहीं मिल रहा।

वोट के लिहाज से अहम किसानों को रिझाने की भी कांग्रेस अध्यक्ष ने कोशिश की। उन्हें अधिग्रहण में बेहतर 'डील' दिलवाने का सपना दिखा कानून में संशोधन का भरोसा दिया। मायावती के गृह नगर दादरी के मिहिर भोज कालेज मैदान पर सोनिया गांधी ने जो भाषण दिया उसका राजनीतिक संदेश स्पष्ट था। केंद्र की कामयाबी और माया सरकार की कथित नाकामी यूपी में मुख्य चुनावी मुद्दा होगा। इनके बल पर और सपा का साथ लेकर कांग्रेस यूपी में 'हाथी' की राजनीतिक चाल पर ब्रेक लगाने की कोशिश करेगी।

सोनिया गांधी ने जिस चतुराई से इस रैली के दौरान केंद्र में सत्ता की दूसरी मुख्य दावेदार भाजपा पर हमला करने से परहेज किया, उसके राजनीतिक मायने साफ हैं। कांग्रेस मान रही है कि गठबंधन के इस दौर में अगले चुनाव में भी केंद्र की सत्ता की चाबी उत्तर प्रदेश के हाथों में है। इसीलिए सोनिया ने भाजपा पर प्रहार नहीं किया ताकि यूपी का चुनावी मुकाबला सीधे-सीधे कांग्रेस-सपा बनाम बसपा के बीच होने का संदेश जाए। कांग्रेस अध्यक्ष ने केंद्र की हजारों करोड़ रुपये की योजनाओं में प्रदेश शासन के स्तर पर हो रहे भ्रष्टाचार की बात उठाई। कांग्रेस की झोली को बेदाग ठहराने के लिए करार के साथ-साथ नरेगा, स्वास्थ्य बीमा योजना, असंगठित क्षेत्र कानून सहित संप्रग की तमाम उपलब्धि्यां गिनाई।

दादरी और ग्रेटर नोएडा के किसानों की उचित मुआवजे के बिना भूमि अधिग्रहण की नीति के विरोध में यह रैली आयोजित की गई थी। सोनिया गांधी ने स्थानीय किसानों से हमदर्दी जताते हुए माया सरकार को निशाना बनाया और कहा कि मुआवजे के बदले किसानों को गोली मारी गई। इस संदर्भ में ही उन्होंने भू-अधिग्रहण कानून में संशोधन का वादा किया, ताकि भूमि के औद्योगिक इस्तेमाल के लिए अधिग्रहण में किसानों की भागीदारी हो और नियम पारदर्शी बनें। इस संदर्भ में हरियाणा के कांग्रेस के माडल को आदर्श साबित करने के लिए सोनिया ने वहां के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को दादरी की जनता के सामने पेश किया।

कांग्रेस अध्यक्ष ने परमाणु करार को आम आदमी के जीवन और रोजगार से जोड़कर पेश किया। उससे साफ है कि यह संप्रग के सबसे अहम चुनावी मुद्दों में एक होगा। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में करार की मंजूरी के बाद सोनिया गांधी का इस पर यह पहला बयान था। उन्होंने कहा कि करार से बिजली आएगी जिससे खेती बढ़ेगी और लोगों को रोजगार मिलेगा। आतंकवाद पर जरूर वह बचाव की मुद्रा में दिखीं। उन्होंने कहा कि इसके खिलाफ लड़ाई में राजनीतिक संकीर्णता से ऊपर उठना होगा।

दैनिक जागरण से साभार

आतंकवाद के मामलों में विशेष अदालत हो

विधि आयोग की सलाह को ध्यान में रखते हुए केंद्र की ओर से नियुक्त वीरप्पा मोइली पैनल ने आतंकवाद से जुड़े मामलों के त्वरित निबटारे के लिए विशेष अदालतों की स्थापना की सिफारिश की है।


द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की आतंकवाद से मुकाबला पर रिपोर्ट में कहा गया है कि नए समग्र आतंकवाद निरोधी कानून में सिर्फ आतंकवाद संबंधित मामलों की सुनवाई के लिए विशेष फास्ट ट्रैक अदालतों के गठन का प्रावधान होना चाहिए। आयोग ने इस रिपोर्ट में इंगित किया है कि टाडा में अधिसूचित मामलों की सुनवाई के लिए एक या एक से अधिक विशेष अदालतों के गठन का प्रावधान किया गया था।

टाडा में यह भी प्रावधान किया गया था कि अधिनियम के तहत इस तरह की विशेष अदालत में किसी अपराध की सुनवाई को उसी आरोपी के खिलाफ अन्य अदालतों में चल रहे मामलों में वरीयता मिलेगी और उसे अन्य मामलों के मुकाबले तरजीह दी जाएगी। पोटा तक में विनिर्दिष्ट मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन का प्रावधान किया गया था। अब जब कि टाडा और पोटा को वापस ले लिया गया है 185 पन्नों की मोइली रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा गैरकानूनी गतिविधियां [उन्मूलन] संशोधन अधिनियम में इस तरह की विशेष अदालतों का प्रावधान खत्म कर दिया गया। रिपोर्ट में यह बात रेखांकित की गई है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि अनुचित विलंब से बचने के लिए सरकार को और विनिर्दिष्ट अदालतों का गठन करना चाहिए ताकि विचाराधीन कैदी जेलों में नहीं सड़ें और मामले तेजी से निबटाए जाएं।

आतंकवाद संबंधित अनेक मामलों में सुस्त कार्यवाही से चिंतित केंद्र ने राज्यों से उन मामलों को तेजी से निबटाने के लिए विशेष या अलग से अदालतें गठित करने को कहा है। समझौता एक्सप्रेस पर हमला और वाराणसी संकटमोचन मंदिर विस्फोट जैसे आतंकी हमले के कुछ प्रमुख मामलों के देश की विभिन्न अदालतों में लंबे अरसे लंबित रहने की पृष्ठभूमि में केंद्र ने राज्य सरकारों से कहा है कि वे संबंधित हाई कोर्ट से सलाह कर इस तरह की विशेष अदालतें गठित करें।

साभार - दैनिक जागरण

पारिवारिक करार की विवाद में कोई भूमिका नहीं : मुकेश

रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक मुकेञ्श अंबानी ने आज अदालत में स्पष्ट किया कि उनके कृञ्ष्णा गोदावरी गैस फील्ड से प्राप्त प्राकृञ्तिक गैस को अनिल अंबानी के रिलायंस नैचुरल रिसोर्सेज लिमिटेड (आरएनआरएल) को आपूर्ति के विवाद में पारिवारिक करार की कोई भूमिका नहीं हो सकती।

न्यायाधीश जे.एन. पटेल और न्यायाधीश के.के. तातेड की खंडपीठ के समक्ष आरआईएल के वकील हरीश साल्वे ने कहा कि इस मामले में अदालत के सामने पारिवारिक करार पहले नहीं लाया गया था, तो अब कैसे और क्‍यों लाया जा रहा है। श्री सालवे ने कहा कि पारिवारिक करार इस मामले को सुलझाने में प्रमाण नहीं बन सकता। श्री सालवे की जिरह अधूरी रह गयी और कल वह इसे पूरा करेंगे। इससे पूर्व अदालत ने आरआईएल को आरएनआरएल और सरकारी एनटीपीसी को छोड़कर अन्य पक्षों से गैस बिक्री करार करने पर रोक लगाई हुई है।

साभार - जनपथ समाचार

सिमी पर प्रतिबंध मामला सुप्रीम कोर्ट की नयी पीठ के हवाले

स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया (सिमी) पर से प्रतिबंध हटाने के दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली केन्‍द्र सरकार की याचिका पर आगामी 13 अक्‍टूबर को उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति एस.बी. सिन्हा की अध्यक्षता वाली नयी पीठ सुनवाई करेगी।

मुख्‍य न्यायाधीश के.जी. बालाकृञ्ष्णन की अध्यक्षता वाली पीठ ने हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय के गत पांच अगस्त के आदेश पर रोक लगा दी थी। उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति गीता मित्‍तल ने अपने आदेश में कहा था कि सिमी पर प्रतिबंध को न्यायोचित ठहराने के वास्ते दिये गये साक्ष्य अपार्यप्त और कमजोर हैं। उच्चतम न्यायालय ने इस मामले की अंतिम सुनवाई के दौरान सिमी पर प्रतिबंध को अक्‍टूबर के दूसरे सप्ताह तक बढ़ा दिया था। अब इस मामले पर दशहरे की छुट्टी के बाद 13 अタटूबर को सुनवाई होगी।

केन्‍द्र सरकार ने गत आठ फरवरी को जारी अधिसूचना में सिमी की आंतकवादी और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में कथित संलिप्तता के मद्देनजर प्रतिबंध को दो वर्ष के लिये बढ़ा दिया गया था, जिसे सिमी ने दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति सिन्हा की पीठ में दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश पर लगायी गयी रोक के विरूद्ध सिमी द्वारा दाखिल याचिका पर भी सुनवाई करेगी। इस बीच केन्‍द्र सरकार उच्चतम न्यायालय से इस मामले के अंतिम निपटारे तक सिमी पर प्रतिबंध को जारी रखने का आग्रह भी करने जा रही है।

साभार - जनपथ समाचार

अबू सलेम ने मोनिका को नोटिस भेजा

.जेल में बंद माफिया डॉन अबू सलेम ने मोनिका बेदी को अपनी पत्नी बताते हुए कानूनी नोटिस भेजा है। नोटिस में कहा गया है कि अगर मोनिका को तलाक चाहिए तो सलेम से बात करे या फिर मीडिया के सामने यह संबंध स्वीकार करे।
सलेम के वकील राजा ठाकुर के मुताबिक नोटिस में दावा किया गया है कि 20 नवंबर 2000 को लांस एंजेलिस में सलेम की मोनिका से शादी हुई है। सलेम ने नोटिस में कहा, ‘मोनिका मेरी पत्नी है और वह इस रिश्ते से इनकार नहीं कर सकती।’

सलेम ने नोटिस ऐसे समय पर भेजा है, जब मोनिका बिग बॉस-2 में फिर एंट्री करने जा रही हैं। माना जा रहा है कि सलेम को मोनिका से राहुल महाजन की नजदीकी खल रही है। गौरतलब है कि बिग बॉस शो के दौरान और शो से बाहर होने पर मोनिका ने कई बार बयान दिया कि वह सलेम की पत्नी नहीं है। संभवत: यह पता चलने पर ही सलेम ने नोटिस भेजा है।

साभार - दैनिक भास्‍कर

संदेह पर भी तय किए जा सकते हैं आरोप

सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने कहा है कि अगर दर्ज सबूत किसी व्यक्ति की अपराध में संलिप्तता के संदेह को जन्म देते हैं तो अभियुक्त के खिलाफ आरोप तय किए जा सकते हैं। न्यायालय के लिए मामले में अभियुक्त के दोषी होने की संभावना पर इस चरण में विचार करने की आवश्यकता नहीं है।
न्यायमूर्ति अरिजीत पसायत और न्यायमूर्ति मुकुंदकम शर्मा की पीठ ने कहा कि अगर अपराध में अभियुक्त की संलिप्तता का संदेह पुख्ता है तो अदालत के लिए आरोप तय करने के लिए यह पर्याप्त है।

उन्होंने कहा, इस मौके पर अभियुक्त के दोषी होने की संभावना पर राय बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है। न्यायालय ने यह आदेश मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को निरस्त करते हुए दिया जिसमें उसने कुछ लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी और विश्वास हनन के आपराधिक आरोपों को खारिज कर दिया था।


निचली अदालत ने संजय चौधरी और अन्य के खिलाफ सांघी बंधुओं की शिकायत पर आरोप तय किया था। साघी बंधुओं ने आरोप लगाया था किअभियुक्तों ने 45 डंपर वाहन तथा चार हल्के वाणिज्यिक वाहन नवंबर 1988 में लीज पर लिए थे लेकिन इनमें से आठ वाहनों को उन्होंने कथित तौर पर बेच दिया। इस संबंध में सांघी बंधुओं ने अभियुक्तों पर धोखाधड़ी और विश्वास हनन का आरोप लगाया था।

साभार - दैनिक जागरण

संदेह पर भी तय किए जा सकते हैं आरोप

सुप्रीमकोर्ट ने कहा है कि अगर दर्ज सबूत किसी व्यक्ति की अपराध में संलिप्तता के संदेह को जन्म देते हैं तो अभियुक्त के खिलाफ आरोप तय किए जा सकते हैं। न्यायालय के लिए मामले में अभियुक्त के दोषी होने की संभावना पर इस चरण में विचार करने की आवश्यकता नहीं है।

न्यायमूर्ति अरिजीत पसायत और न्यायमूर्ति मुकुंदकम शर्मा की पीठ ने कहा कि अगर अपराध में अभियुक्त की संलिप्तता का संदेह पुख्ता है तो अदालत के लिए आरोप तय करने के लिए यह पर्याप्त है।

उन्होंने कहा, इस मौके पर अभियुक्त के दोषी होने की संभावना पर राय बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है। न्यायालय ने यह आदेश मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को निरस्त करते हुए दिया जिसमें उसने कुछ लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी और विश्वास हनन के आपराधिक आरोपों को खारिज कर दिया था।

निचली अदालत ने संजय चौधरी और अन्य के खिलाफ सांघी बंधुओं की शिकायत पर आरोप तय किया था। साघी बंधुओं ने आरोप लगाया था किअभियुक्तों ने 45 डंपर वाहन तथा चार हल्के वाणिज्यिक वाहन नवंबर 1988 में लीज पर लिए थे लेकिन इनमें से आठ वाहनों को उन्होंने कथित तौर पर बेच दिया। इस संबंध में सांघी बंधुओं ने अभियुक्तों पर धोखाधड़ी और विश्वास हनन का आरोप लगाया था।

साभार - दैनिक जागरण

शिक्षा की मुख्य धारा से जोडा जाय

राष्ट्रीय बालक अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. शान्ति सिन्हा ने कहा कि सम्पूर्ण देश में बच्चों को बाल श्रम से बचाकर शिक्षा की मुख्य धारा से जोडा जाय यह सभी राज्य सरकार, स्वयंसेवी संस्थाएं एवं हम सबकी अहम जिम्मेदारी है। 

डॉ. सिन्हा सोमवार को ओ.टी.एस. के सभाकक्ष में श्रम विभाग राजस्थान सरकार, यूनिसेफ, एन.सी.पी.सी.आर. एवं एन.सी.एल.पी. के संयुक्त तत्वावधान में बाल श्रम उन्मूलन एवं शिक्षा के अधिकार पर दो दिवसीय सेमिनार के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि पद से बोल रही थीं। 


उन्होंने कहा कि बाल श्रम उन्मूलन के लिये शून्य सहन शक्ति बनाते हुए एक जन आन्दोलन के रूप में लें कि बच्चा शिक्षा से वंचित नहीं रह सके तथा देश में 18 मिलियन्स बच्चे स्कूलों से बाहर हैं उन्हें शिक्षा से जोडा जाये जिससे उन्हें सामाजिक बराबरी, न्याय एवं यथोचित स्थान मिल सके। डॉ. सिन्हा ने कहा कि देश में बाल श्रम के लिये गरीबी की लडाई एवं जंग में हम सभी की भागीदारी आवश्यक है।
 

इस अवसर पर श्रम मंत्री श्री रामकिशोर मीणा ने कहा कि राजस्थान राज्य में कोई भी बच्चा बाल श्रम के अभिशाप से ग्रस्त न हो वरन् शिक्षा से जुडकर आफ और हमारे बच्चों की तरह देश का एक अच्छा नागरिक बने। उन्होंने कहा कि समाज का केवल एक अंग चाहे वो सरकार हो, चाहे वो समाज हो या कोई एक स्वयंसेवी संस्था हो बाल श्रम उन्मूलन का कार्य अकेला नहीं कर सकता है। इसके लिये आवश्यक है कि सरकारी एवं गैर सरकारी दोनों तंत्रों के पूर्ण समन्वय के साथ कार्यवाही की जाये। उन्होंने कहा कि बाल श्रम अधिनियम की धारा 16 में यह प्रावधान है कि न केवल श्रम निरीक्षक या पुलिस निरीक्षक, कोई भी सजग नागरिक या संस्था 14 वर्ष से कम उम्र के बाल श्रम को नियोजित करने वाले नियोजक के विरुद्घ सशक्त न्यायालय में कार्यवाही कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि जन सहभागिता से बाल श्रम नियोजित करने वाले नियोजकों के विरुद्घ कार्यवाही कर बाल श्रम के विरुद्घ एक माहौल तैयार किया जा सकता है।
 

श्री मीणा ने कहा कि राजस्थान के सुदूर दक्षिणी जिलों -डूंगरपुर, बांसवाडा में वहां के बच्चों को गुजरात के बी.टी. कॉटन क्षेत्रों में जाकर बाल मजदूरी कराये जाने से रोकने में सफलता प्राप्त की है इन जिलों में जिला कलेक्टरों की अध्यक्षता में टास्क कोर्स समितियां गठित की गई हैं। टास्क फोर्स द्वारा सभी विभागों एवं स्वयंसेवी संगठनों में आपसी समन्वय स्थापित कर न केवल बच्चों को बाल श्रम की बेडियों से मुक्त कराया है वरन् उनका पुनर्वासन भी किया जा रहा है।
 

इस अवसर पर प्रमुख शासन सचिव डॉ. ललित के. पंवार ने राजस्थान राज्य में बाल श्रम की स्थिति एवं उनके समाधान के लिये किये जा रहे प्रयासों की जानकारी दी तथा शिक्षा से वंचित बाल श्रमिक बच्चों के लिये शिक्षा, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के मध्य समन्वय कर सर्वशिक्षा अभियान का पूर्ण लाभ इन बच्च को दिलाये जाने के लिये एक कार्य नीति पर बल दिया। श्रम आयुक्त श्री सूरजमल मीणा ने कहा कि इस सेमिनार से बाल श्रम बच्चों को अपने अधिकारों की जानकारी मिल सकेगी तथा बाल श्रमिकों को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोडा जायेगा।


साभार - प्रेस नोट डाट इन

हिमाचल उच्च न्यायालय की आलोचना : उच्चतम न्यायालय ने जताया अफसोस

उच्चतम न्यायालय ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के उस रवैये की आलोचना की है, जिसमें बलात्कार के एक आरोपी को रिहा किए जाने के खिलाफ अपील की मंजूरी के राज्य सरकार के अनुरोध को खारिज कर दिया गया।

न्यायमूर्ति अरिजित पसायत और मुकुंदकम शर्मा की पीठ ने अफसोस व्यक्त किया कि उच्च न्यायालय ने सरकार के अनुरोध को खारिज करते हुए कोई कारण नहीं बताया।

न्यायालय ने फैसले में कहा कि सुनवाई अदालत को किसी नतीजे पर पहुँचने के पहले सभी सबूतों पर विचार करना चाहिए था। अगर निचली अदालत की ओर से खामी हुई तो उच्च न्यायालय को अपील पर विचार करना चाहिए था।

गौरतलब है कि मनोज के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और 511 के तहत मामले थे और सुनवाई अदालत ने उसे रिहा कर दिया था। 
 
साभार - वेबदुनिया 

बच्चों को मुफ्त शिक्षा का रास्ता साफ

छह से चौदह साल तक के बच्चों को अनिवार्य और मुंफ्त शिक्षा दिलाने का रास्ता साफ हो गया। अब इसके लिए कानून बनाया जाएगा।
बीते लगभग दो साल से तरह-तरह की दिक्कतों में फंसे प्रस्तावित शिक्षा का अधिकार विधेयक को आखिरकार मंत्रियों के समूह ने मंगलवार को हरी झंडी दे दी।
सूत्रों के मुताबिक मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह के आवास पर मंत्रियों के समूह की हुई बैठक में सदस्यों ने शिक्षा का अधिकार विधेयक को मौजूदा स्वरूप में ही लाए जाने पर सहमति जताई है। बताते हैं कि अर्जुन सिंह की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में सदस्यों ने प्रस्तावित विधेयक में कुछ तकनीकी व कानूनी शब्दावली में मामूली फेरबदल की बात तो की, लेकिन उसके मूल स्वरूप में बदलाव को कोई राजी नहीं हुआ। लिहाजा पहले से ही कई बार संशोधित हो चुके इस विधेयक को हरी झंडी मिल गई।
प्रस्तावित विधेयक के मुताबिक छह से चौदह साल तक के बच्चों को सरकार न सिर्फ मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा दिलाएगी, बल्कि उसकी गुणवत्ता भी सुनिश्चित करेगी। एक शिक्षक पर मानक के तहत निश्चित छात्र संख्या, पढ़ाने के तौर-तरीके, स्कूलों में बुनियादी समुचित संसाधनों के साथ ही क्वालिटी के लिए मानीटरिंग कमेटी का प्रावधान किया जाएगा। अभिभावक-शिक्षक एसोसिएशन को भी पढ़ाई पर नजर रखने का अधिकार होगा और वे उसकी समीक्षा भी कर सकेंगे। खासतौर से गरीब तबके के बच्चों को बाकी बच्चों के बराबर लाने के लिए उनका खास खयाल रखा जाएगा। इतना ही नहीं, गरीब बच्चों के लिए निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत आरक्षण का भी प्रावधान किया जाएगा, जबकि बच्चों को दाखिला सुनिश्चित कराना क्षेत्रीय शिक्षा अधिकारी की जिम्मेदारी होगी।
गौरतलब है कि बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा के लिए कानून को अमल कराने में खर्चे को लेकर राज्यों ने हाथ खड़े कर दिए थे। बाद में दूसरी योजनाओं की तरह केंद्र व राज्यों के बीच खर्च के बंटवारे का रास्ता निकालने की बात आई तो वित्त मंत्रालय ने कुछ आपत्तियां उठा दीं। प्रधानमंत्री की दखल के बाद नए सिरे से कार्रवाई के तहत विधेयक का संशोधित मसौदा बना तो कानून मंत्रालय ने कानूनी पचड़े बढ़ने की आशंका जताते हुए कई सवाल उठा दिये। बाद में मामला कैबिनेट में गया और वहां सहमति न बनने पर प्रधानमंत्री ने इसे मुकाम तक पहुंचाने के लिए अर्जुन सिंह की अध्यक्षता में मंत्रियों का समूह गठित कर दिया। समूह ने मंगलवार को उसे हरी झंडी दे दी।

साभार - याहू जागरण 

पार्ट टाइमर भी कर सकते हैं हक का दावा

पार्ट टाइमर यानी अंशकालिक भी कानून की निगाह में कर्मचारी हैं और अदालत में अपने हक का दावा कर सकते हैं। सुप्रीमकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि अंशकालिक कर्मचारी भी औद्योगिक विवाद अधिनियम में 'वर्कमैन' की परिभाषा में आएंगे और अगर कानून में दी गई शर्तें पूरी करते हैं तो इस कानून के तहत नियमित नौकरी व गैरकानूनी ढंग से हटाए जाने पर हक का दावा कर सकते हैं।
न्यायमूर्ति तरुण चटर्जी व न्यायमूर्ति एचएस बेदी की पीठ ने ये फैसला न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी की याचिका खारिज करते हुए सुनाया है। पीठ ने कहा है कि अंशकालिक कर्मचारी को औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 [एस] के तहत वर्कमैन माना जाएगा। वह धारा 25बी में नियमित नौकरी तथा धारा 25एफ का [छंटनी या नौकरी से निकाले जाने से पहले कानून में दी गई निर्धारित प्रक्रिया का पालन] लाभ दिए जाने की मांग कर सकता है। अधिनियम में दी गई धारा 2 [एस] [वर्कमैन] और धारा 25बी की परिभाषा सिर्फ पूर्णकालिक कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। बल्कि देखने वाली बात यह है कि जो कर्मचारी लगातार नौकरी में रहने का दावा कर रहे हैं वे इन दोनों धाराओं में दी गई शर्तों व अन्य शर्ताें को पूरा करते हैं कि नहीं, जिससे कि वे धारा 25एफ का लाभ मांग सकें।
इस मामले में ए. शंकरलिंगम को जनवरी 1986 में त्रिवेंद्रम में 130 रुपये प्रतिमाह के वेतन पर न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के क्षेत्रीय प्रबंधक के कार्यालय में सफाई व पानी पिलाने के पद पर नियुक्त किया गया। वह काम करता रहा। उसने कंपनी से नौकरी नियमित करने का अनुरोध किया लेकिन नियमित करने के बजाय कंपनी ने 15 मार्च 1989 को मौखिक आदेश सुना उसे नौकरी से निकाल दिया। जब नौकरी पर वापस लेने की गुहार सरकार ने नहीं सुनी तो मामला औद्योगिक विवाद ट्रिब्युनल पहुंचा। ट्रिब्युनल ने फैसला दिया कि वह धारा 2एस के तहत वर्कमैन की परिभाषा में नहीं आता है क्योंकि वह अंशकालिक या कहा जाए तो तदर्थ सेवा में था। शंकरलिंगम ने ट्रिब्युनल के फैसले को मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट की एकलपीठ ने ट्रिब्युनल का फैसला निरस्त कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 2(एस) की परिभाषा सिर्फ पूर्णकालिक कर्मचारी तक सीमित नहीं है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यहां सवाल शंकरलिंगम की नौकरी नियमित करने का नहीं है बल्कि यह देखा जाएगा कि उसे नौकरी से निकालते समय धारा 25एफ की शर्तों का पालन हुआ है कि नहीं। हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी को गैरकानूनी ठहराते हुए शंकर लिंगम को पूर्ण बकाया लाभों के साथ वापस नौकरी पर रखने का आदेश दिया। हालांकि कोर्ट ने सेवा नियमित करने के मामले में कंपनी को कानून के मुताबिक फैसला लेने की छूट दे दी। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने भी इस फैसले पर मुहर लगा दी जिसके बाद कंपनी सुप्रीमकोर्ट पहुंची थी। सुप्रीमकोर्ट ने उच्च न्यायालयों व सुप्रीमकोर्ट के एक पूर्व फैसले के आधार पर यह फैसला सुनाया है।

साभार - याहू जागरण 

Oct 7, 2008

छत्तीसगढ़ को सलवा जुडूम मामले में क्लीन चिट

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने उच्चतम न्यायालय में सौंपी एक रिपोर्ट में नक्सलियों की गतिविधियों पर काबू पाने के लिए शुरू किए गए सलवा जुडूम को लेकर छत्तीसगढ सरकार को क्लीन चिट दी है। आयोग के तीन सदस्यीय पैनल ने 118 पृष्ठों की रिपोर्ट में कहा है कि कानून को लागू करने वाले जब स्वयं अप्रभावी हो या मौके पर मौजूद नहीं रहे तो ऐसी स्थिति में जनजातियों को आत्म रक्षा का अधिकार दिए जाने से इंकार नहीं किया जा सकता। 

साभार - हिन्‍दुस्‍तान दैनिक 

पाक ने दी भारत को कोर्ट में ले जाने की धमकी

पाकिस्तान ने धमकी दी है कि अगर भारत चिनाब नदी से उसके हिस्से का पानी न छोड़कर सिंधु जल समझौते का उल्लघंन करता रहा तो वह मामले को मध्यस्थता न्यायालय या फिर तटस्थ विशेषज्ञों के पास ले जाएगा। उसके अनुसार इसके बाद दोनों देशों को इन विशेषज्ञों के निर्णय को मानना पड़ेगा।
इस बीच, खबर है कि जल बंटवारे के मुद्दे पर बातचीत के लिए पाकिस्तान के सिंधु जल आयुक्त सईद जमात अली शाह के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल 8 से 24 अक्टूबर के बीच भारत के दौरे पर आने वाला है। यह प्रतिनिधिमंडल इस दौरान बगलिहार बांध का भी निरीक्षण करेगा।
शाह ने कहा कि भारत को पाकिस्तान के हिस्से का पानी छोड़ना चाहिए, क्योंकि उसके पास इस बात के दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं कि चिनाब नदी से उसे मिलने वाला पानी चुरा लिया गया है।
एक पाकिस्तानी न्यूज चैनल से बातचीत में उन्होंने कहा कि भारत को यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि उसने सिंधु जल समझौते का उल्लघंन किया है। अगर भारत इस बात को कबूल नहीं करता है तो इससे यह संदेश जाएगा कि वह संधि को लेकर गंभीर नहीं है।
गौरतलब है कि पहले भी पाकिस्तान के अधिकारियों ने भारत पर बगलिहार डैम में चिनाब का पानी जमा करने का आरोप लगाया था। हालांकि भारत ने इससे इनकार कर दिया था।

साभार - दैनिक भास्‍कर

My Blog List