May 31, 2007

भूमि अर्जन अधिनियम, 1894

१. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-
२. निरसन
३. परिभाषायें-
४. प्रारंभिक अधिसूचना का प्रकाशन और ऐसा होने पर अधिकारियों की शक्तियाँ-
५. नुकसान के लिये संदाय-
५-क. आक्षेपों की सुनवाई-
६. इस बात की घोषणा की भूमि लोक प्रयोजन के लिये अपेक्षित है-
७. कलेक्टर घोषणा के पश्चात् अर्जन कार्यवाही करेगा-
८. उस भूमि का चिन्ह मापन और रेखांकन किया जायेगा-
९. हितबद्ध व्यक्तियों को सूचना-
१०. नामों और हितों के संबंध मं कथन अपेक्षित और प्रचलित करने की शक्ति-
११. कलेक्टर द्वारा जांच तथा अधिनिर्णय-
११-क. वह अवधि जिसके भीतर अधिनिर्णय किया जायेगा-
१२. कलेक्टर का अधिनिर्णय कब अंतिम होगा-
१३. जांच का स्थगन-
१३-क. लिपिकीय भूलों का सुधार-
१४. साक्षियों का समन करने और उसकी हाजिरी और दस्तावेजों की पेशी प्रदर्शित करने की शक्ति
१५. वे बातें जिन पर ध्यान दिया जावेगा, और जिनकी अपेक्षा की जायेगी-
१५-क. अभिलेखों आदि को बुलाने की शक्ति-
१६. कब्जा करने की शक्ति-
१७. अत्यांयिकता की दशाओ में विशेष शक्तियां-
१८. न्यायालय को निर्देश-
१९. न्यायालय के लिये कलेक्टर का कथन-
२०. सूचना की तामिल-
२१. कार्यवाहियों के प्रविषय पर निर्बन्धन-
२२. कार्यवाहियां खुले न्यायालय में होगी-
२३. प्रतिकार अवधारित करने में ली जाने वाली बातें-
२४. वे बातें जिनकी प्रतिकार अवधारित करने में उपेक्षा की जायेगी-
२५. न्यायालय के द्वारा अधिनिर्णीत प्रतिकार की रकम का कलेक्टर के द्वारा अधिनिर्णित रकम से कम न होना-
२६. अधिनिर्णयों का प्रारुप-
२७. खर्चें-
२८. अतिरिक्त प्रतिकार पर ब्याज देने का निर्देश कलेक्टर को दिया जा सकेगा-
२८-क. न्यायालय के अधिनिर्णय के आधार पर प्रतिकार की राशि का पुन: अवधारण-
२९. प्रभाजन की विशिष्टियां विनिर्दिष्ट की जायेंगी-
३०. प्रभाजन संबंधी विवाद-
३१. प्रतिकार का संदाय या उसका न्यायालय के निक्षेप-
३२. अन्य संक्रमण करने के लिये सक्षम व्यक्तियों की भूमियों लेखे निक्षिप्त धन का विनिधान-
३३. अन्य मामलों में धन का विनिधान-
३४. ब्याज का संदाय-
३५. बजट या कृषि भूमि का अस्थाई अधिभोग जबकि प्रतिकार के संबंध में मतभेद है, तब प्रक्रिया-
३६. प्रवेश करने और लेने की शक्ति और प्रत्यावर्तन पर प्रतिकार-
३७. भूमि की दशा के संबंध में मतभेद-
३८. विलोपित-
३८.-क. औद्योगिक समूत्थान की बाबत् कुछ प्रयोजनों के लिये यह समक्षा जाना कि वह कंपनी है-
३९. समुचित सरकार की पूर्व सम्मति की और करार के निष्पादन की शक्तियां-
४०. पूर्ववर्ती जांच-
४१. समुचित सरकार के साथ जांच-
४२. करार का प्रकाशन-
४३. धारा ३९ से लेकर धारा ४२ तक की धारायें वहां लागू नहीं होगी जहां कि सरकार कंपनियों को भूमि देेने के लिये करार से आबद्ध है-
४४. रेल कंपनी के साथ करार कैसे साबित किया जा सकेगा-
४४.-क अन्तरण आदि पर निर्बन्धन-
४४.-ख. सरकारी कंपनियों से भिन्न प्राइवेट कम्पनियों के लिये इस भाग के अधीन भूमि का अर्जन प्रयोजन विशेष के लिये किये जाने के सिवाय न किया जाना-
४५. सूचनाओ की तामिल-
४६. भूमि के अर्जन में बाधा डालने के लिये शास्ति-
४७. मजिस्ट्रेट अभ्यर्पण प्रवर्तित करायेगा-
४८. अर्जन पूरा करना अनिवार्य नहीं है, किन्तु यदि अर्जन पूरा न भी किया जाये तो भी प्रतिकार अनिनिर्णीत किया जायेगा-
४९. गृह या निर्माण के एक भाग का अर्जन-
५०. किसी स्थानीय प्राधिकारी या कम्पनी के खर्च पर भूमि का अर्जन-
५१. स्टाम्प शुल्क का फीस से छुट-
५१.-क . प्रमाणित प्रतिलिपि की साक्ष्य के रुप में स्वीकृति-
५२. अधिनियम के अनुसरण में की गई किसी बात के लिये वादों की दशा में सूचना-
५३. न्यायालय के साथ वाली कार्यवाही पर कोड ऑफ सिविल प्रोसिजर का लागू करना-
५४. न्यायालय में हुई कार्यवाहियों में अपीलें-
५५. नियम बनाने की शक्ति

May 19, 2007

भूमि अधिग्रहण अधिनियम : “लोक प्रयोजन” का व्यूह

१७ मई को देश के समाचार पत्रो मे भूमि अभिग्रहण के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के नजरिये पर रिपोर्ट देखने को मिला जिस पर १८ मई को मित्रो ने इस पर अपनी अपनी प्रतिक्रिया प्रस्तुत की है ।

दिल्ली से अधिवक्ता मित्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार रिट पिटीशन नं २२४/२००७, कर्नाटक भूमिहीन किसान संगठन व अन्य विरुद्ध भारत सरकार व अन्य दिनाक ११ मई को न्यायाधिपति आर वी रविंद्रन व एच एस बेदी के बेंच में नियत ईस प्रकरण की प्रारंभिक सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधिपति के जी बालकृशनन ने प्रकरण मे निहित विधि के प्रश्न “लोक प्रयोजन” पर कहा कि केंद्र व राज्य शासन को लोक प्रयोजन के मसले पर प्रस्तुत पिटीशनो पर भूमि अधिग्रहण अधिनियम के अन्य उपबंधों के तहत प्रस्तुत पिटीशनो से ज्यादा गम्भीरता पुर्वक अपने दायित्वों को समझना चाहिये इस संबंध मे न्यायालया ने सभी राज्यो के मुख्य सचिव व कृषि मंत्रालय को नोटिस भेजा है ।

इस प्रकरण में भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा ३च, ४ व ६ एवं संविधान की धारा १४ समानता का अधिकार, २१ जीवन की व्यक्तिगत स्वतंत्रता सहित अन्य विधिक मुद्दे पर प्रश्न उठाये गये है जो पिछले माह समाचार मे छाये रहने वाले सेज, नंदीग्राम के विवाद के आधार है ईस पिटिशन में अतिरिक्त रूप से भारी मात्रा में भूमि अधिग्रहण व अधिनियम की धारा ३च लोक प्रयोजन के अर्थांवयन पर जोर दिया गया है । देखे अधिग्रहण समाचारो के अंश -

''ग्रामीण विकास मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थाई समिति ने देश की बदली हुई आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने की पुरजोर माँग की है और इस परिवर्तन की खातिर इच्छाशक्ति की कमी के लिए सरकार की खिंचाई की है।
भाजपा के वरिष्ठ नेता कल्याण सिंह की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने अपनी २४वीं रिपोर्ट में कहा कि १८९४ में बना भूमि अधिग्रहण कानून अब पुराना और अप्रासंगिक हो गया है और ऐसे में बढ़ती हुई परिस्थतियों को देखते हुए इसमें पर्याप्त संशोधन की जरुरत है। रिपोर्ट में कहा गया है कि समिति पहले भी इस कानून में संशोधन के लिए दबाव डालती रही है और संशोधन का प्रस्ताव मंत्रालय में काफी समय से लंबित पड़ा है। गौरतलब है कि देश में एसईजेड तथा तीव्र औद्योगिकरण के लिए भूमि अधिग्रहण को लेकर किसानों और सरकार के बीच विवाद बढते जा रहे हैं तथा राजनीतिक दल और नेता भी इस कानून में बदलाव की माँग करने लगे हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ग्रामीण विकास मंत्रालय के सचिव की यह दलील है कि भूमि राज्य का विषय है और इसलिए इस संबंध में केंद्रीय कानून नहीं बनना चाहिए। भूमि अधिग्रहण संशोधित कानून २००४ के मसौदे को राज्य सरकारों के पास भेजा गया है पर अभी तक सभी राज्यों ने इस पर अपनी राय नहीं भेजी है। इसलिए यह मसौदा अभी तक खटाई में पड़ा है।''

अब हम देखें भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत धारा ३ च का सहारा शासन कैसे लेती है और जनता इसमें कैसे पिसती है । धारा ३ च, भूमि के अधिग्रहण के कारण को बतलाने वाली धारा है जिसमें अधिग्रहण का कारण है ``लोक प्रयोजन`` अब लोक प्रयोजन का अर्यान्वयन क्या होना चाहिए यही से खेल प्रारंभ होता है यह विधि का प्रश्न है हजारों प्रकरण इसी तालमेल में कलेक्टर से जिला न्यायालय, जिला न्यायालय से उच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय तक बरसों से चर्चा के विषय में रहे हैं । अलग-अलग प्रकरणों में न्यायालय ने ``लोक प्रयोजन`` को परिभाषित किया है पर पिटीशनर को सफलता जब तक मिलती है तब तक मामला ठंडा हो जाता है और राज्य शासन के पास इस अधिनियम का डंडा बजाने की शक्ति पुन: जीवित हो जाती है, लोग अपने ही प्रयोजन के लिए रचित सरकारी तानेबाने में पिसते रहते है ।


मै इस समाचार को छत्तीसगढ के नजरिये से देखते हुये अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता हूं यहा शासन ने लोक प्रयोजन शब्द को अपने हित मे अर्थान्वयन करवाने के लिये जो व्यूह रची यह देखे :-

छत्तीसगढ में अभी टाटा के संयंत्र के लिये भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया जारी है जहा अधिग्रहण पूरी तरह से विवादित है नक्सलियो की जन अदालत की तर्ज पर ग्राम सभा मे प्राप्त किसानों की स्वीकृति व १३ लकीरों मे छिन चुकी आदिवासियो की भूमि पर आप रोज पढ रहे होंगे हम इस संबध मे कुछ भी नही कहेंगे ।

नये राज्य की राजधानी के लिये भारी मात्रा मे किये जा रहे भूमि अधिग्रहण के मसले पर हम कुछ नजर दौडायें, नया रायपुर विकास प्राधिकरण द्वारा नये रायपुर का मास्टर प्लान प्रकाशित किया जा चुका है एवं उस पर दावा आपत्ति भी स्वीकार करने का समय समाप्त हो चुका है । नया रायपुर विकास प्राधिकरण एवं छ.ग. शासन के द्वारा नये रायपुर के लिये भी अधिग्रहित की जाने वाली भारी मात्रा में भूमि को टाटा संयंत्र की भांति विवाद से परे रखने के लिए रणनीति के तहत आज दिनांक तक भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना जारी नहीं की गई है बल्कि भूमि अधिग्रहण के पिछले द्वार से प्रवेश की कार्यवाही आपसी सहमति के जरिये की जा रही है यह शासन की भूमि अधिग्रहण के पचडे से बचने की एक सोची समझी चाल है । हुडा (हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण) के नीतियों पर अमल करते हुए छ.ग. शासन, वहां आई व्यावहारिक दिक्कतों को प्रशासनिक तौर पर दूर करने के उददेश्य से आपसी समझौते पर ही ज्यादा जोर दे रही है क्योंकि भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत भूमि अधिग्रहण् में विभिन्न राज्य सरकारें सर्वोच्च न्यायालय के कटघरे में है एवं जनता भी अधिग्रहण के रास्ते में नित नये रोडे अटका रही है । ऐसे में विकास की धारा को विवादों से गंदला करने के बजाय दूसरे वैकल्पि रास्तों को प्रभावी बनाना सरकार की विवशता है ।

नया रायपुर विकास प्राधिकरण द्वारा नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम के तहत प्रकाशित डाफट, भूमि अधिग्रहण के पूर्व किसानों के अटकलों पर एवं छुटपुट उठते विरोधों को दबाने का एक अस्त्र के रूप में प्रयोग है । छोटे किसान जिनके रोजी-रोटी का साधन उसकी भूमि है, पर शासन पिछले चार वर्षो तक विक्रय पंजीकरण नहीं करने का
आदेश तो दे ही चुकी थी । समाचारों में रोज छपता रहा कि किसी की बेटी का ब्याह तो किसी का और अन्य अहम आवश्यकता की पूर्ति उनके स्वयं की भूमि को विक्रय नहीं कर पाने के कारण हो नहीं पाई थी, सरकार के इस मार से किसान पहले से ही आधा हो गया था आपसी सहमती का चोट ऐसे ही समय में गरम लोहे पर हथौडा मारने वाला काम था, अब वे सभी किसान इस डर से राजीनामा कर पैसा ले लिए कि पता नहीं कल क्या तुगलकी फैसला हो और उन्हें फिर पांच साल तक बिना पैसे का गुजारा करना पडे ।

ऐसा करके शासन अधिकांशत: जमीन अधिग्रहित कर लेगी बाकी बचे जमीन राज्य शासन द्वारा अधिनियम के तहत अधीसूचना जारी कर डंडे के जोर पर छीन ली जायेगी । क्योंकि तब बहुसंख्यकों का विरोध सरकार को नहीं झेलना पडेगा और बिना विवाद काम निपट जायेगा । इस चाल का एक और पेंच है चीफ कमिशनर देहली एडमिनिस्ट्रेशन बनाम धन्ना सिंह 1987 के केस में न्यायालय नें मास्टर प्लान के लिए अधिग्रहण को लोक प्रयोजन की कोटि का माना है तो मास्टर प्लान यदि स्वीकृत हो गया तो सरकार की दिक्कते अपने आप सुलझ जायेगी । यहा नये रायपुर परिक्षेत्र मे आने वाले गाव के लोग समझ रहे है कि अभी तो धारा 4 की अधिसूचना तो जारी ही नही हुयी है जब जारी होगी तो लोक प्रयोजन की आपत्ति लगायेगे मगर तब तक देर हो चुकी होगी लोक प्रयोजन सिद्ध हो चुका होगा, यही है अधिनियम को अपने पक्ष मे करने का गुपचुप तरीका । हमने इस स्थिति को भांप कर 5 मइ 2007 तक गांवो के किसानो को जोडा और मास्टर प्लान ड्राफ्ट पर आपत्ति लगाया है हमारे साथ 400 से 500 लोगो ने आपत्ति लगाया है पर वे सभी सरकार की मंशा को समझ रहे है हमें नही लगता ।

सन १८९४ में बने अधिनियम की प्रयोज्यता के संबंध में जो प्रयोग हो रहे हैं वह प्रशंसनीय है नये परिस्थितियों के अनुसार इस अधिनियम में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है । कृषि प्रधान देश में कृषि भूमि का भारी मात्रा में अर्जन कहां का लोक प्रयोजन है यह परिस्थितियां एवं इस अधिनियम के पुर्ननिर्माण के लिए गठित कमेटी ही बतलायेगी ।

May 10, 2007

भारतीय दण्ड संहिता, १८६०

अधयाय १
प्रस्तावना

उद्देशिका
धारा १ संहिता का नाम और उसके प्रर्वतन का विस्तार
धारा २ भारत के भीतर किए गये अपराधों का दण्ड
धारा ३ भारत से परे किए गये किन्तु उसके भीतर विधि के अनुसार
विचारणीय अपराधों का दण्ड
धारा ४ राज्य-क्षेत्रातीत अपराधों पर संहिता का विस्तार
धारा ५ कुछ विधियों पर इस आििनधयम द्वारा प्रभाव न डाला जाना

अध्याय २
साधारण स्पष्टीकरण




धारा ६ संहिता में की परिभाषाओं का अपवादों के अध्यधीन समझा जाना
धारा ७ एक बार स्पष्टीकृत पद का भाव
धारा ८ लिंग
धारा ९ वचन
धारा १० पुरूष, स्त्री
धारा ११ व्यक्ति
धारा १२ लोक
धारा १३ निरसित
धारा १४ सरकार का सेवक
धारा १५ निरसित
धारा १६ निरसित
धारा १७ सरकार
धारा १८ भारत
धारा १९ न्यायाधीश
धारा २० न्यायालय
धारा २१ लोक सेवक
धारा २२ जंगम सम्पत्ति
धारा २३ सदोष अभिलाभ
सदोष अभिलाभ
सदोष हानि
सदोष अभिलाभ प्राप्त करना/सदोष हानि उठाना
धारा २४ बेईमानी से
धारा २५ कपटपूर्वक
धारा २६ विश्वास करने का कारण
धारा २७ पत्नी, लिपिक या सेवक के कब्जे में सम्पत्ति
धारा २८ कूटकरण
धारा २९ दस्तावेज
धारा २९ क इलेक्ट्रानिक अभिलेख
धारा ३० मूल्यवान प्रतिभूति
धारा ३१ विल
धारा ३२ कार्यों का निर्देश करने वाले शब्दों के अन्तर्गत अवैध लोप आता है
धारा ३३ कार्य, लोप
धारा ३४ सामान्य आशय को अग्रसर करने में कई व्यक्तियों द्वारा किये गये कार्य




धारा ३५ जब कि ऐसा कार्य इस कारण अपराधित है कि वह अपराध्कि ज्ञान या
आशय से किया गया है
धारा ३६ अंशत: कार्य द्वारा और अंशत: लोप द्वारा कारित परिणाम
धारा ३७ किसी अपराध को गठित करने वाले कई कार्यों में से किसी एक
को करके सहयोग करना
धारा ३८ अपराधिक कार्य में संपृक्त व्यक्ति विभिन्न अपराधों के दोषी हो सकेंगे
धारा ३९ स्वेच्छया
धारा ४० अपराध
धारा ४१ विशेष विधि
धारा ४२ स्थानीय विधि
धारा ४३ अवैध, करने के लिये वैध रूप से आबद्ध
धारा ४४ क्षति
धारा ४५ जीवन
धारा ४६ मृत्यु
धारा ४७ जीव जन्तु
धारा ४८ जलयान
धारा ४९ वर्ष, मास
धारा ५० धारा
धारा ५१ शपथ
धारा ५२ सद्भावनापूर्वक
धारा ५२ क संश्रय




अध्याय ३
दण्डों के विषय में

धारा ५३ दण्ड
धारा ५३ क निर्वसन के प्रति निर्देश का अर्थ लगाना
धारा ५४ लघु दण्डादेश का लघुकरण
धारा ५५ आजीवन कारावास के दण्डादेश का लघुकरण
धारा ५५ क समुचित सरकार की परिभाषा
धारा ५६ निरसित
धारा ५७ दण्डावधियों की भिन्ने
धारा ५८ निरसित
धारा ५९ निरसित
धारा ६० दण्डादिष्ट कारावास के कतिपय मामलों में संपूर्ण कारावास या
उसका कोई भाग कठिन या सादा हो सकेगा
धारा ६१ निरसित
धारा ६२ निरसित
धारा ६३ जुर्माने की रकम
धारा ६४ जुर्माना न देने पर कारावास का दण्डादेश
धारा ६५ जबकि कारावास और जुर्माना दोनों आदिष्ट किये जा सकते हैं, तब जुर्माना
न देने पर कारावास, जबकि अपराध केवल जुर्माने से दण्डनीय हो
धारा ६६ जुर्माना न देने पर किस भंति का कारावास दिया जाय
धारा ६७ जुर्माना न देने पर कारावास, जबकि अपराध केवल जुर्माने से दण्डनीय हो
धारा ६८ जुर्माना देने पर कारावास का पर्यवसान हो जाना
धारा ६९ जुर्माने के आनुपातिक भाग के दे दिये जाने की दशा में कारावास का पर्यवसान
धारा ७० जुर्माने का छ: वर्ष के भीतर या कारावास के दौरान में उदग्रहणीय होना
धारा ७१ कई अपराधों से मिलकर बने अपराध के लिये दण्ड की अवधि
धारा ७२ कई अपराधों में से एक के दोषी व्यक्ति के लिये दण्ड जबकि निर्णय में यह
कथित है कि यह संदेह है कि वह किस अपराध का दोषी है
धारा ७३ एकांत परिरोध
धारा ७४ एकांत परिरोध की अवधि
धारा ७५ पूर्व दोषसिदि्ध के पश्च्यात अध्याय १२ या अध्याय १७ के अधीन कतिपय अपराधें
के लिये वर्धित दण्ड




अध्याय ४
साधारण अपवाद

धारा ७६ विधि द्वारा आबद्ध या तथ्य की भूल के कारण अपने आप को विधि द्वारा
आबद्ध होने का विश्वास करने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य
धारा ७७ न्यायिकत: कार्य करने हेतु न्यायाधीश का कार्य
धारा ७८ न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में किया गया कार्य
धारा ७९ विधि द्वारा न्यायानुमत या तथ्य की भूल से अपने को विधि द्वारा न्यायानुमत होने
का विश्वास करने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य
धारा ८० विधिपूर्ण कार्य करने में दुर्घटना
धारा ८१ कार्य जिससे अपहानि कारित होना संभाव्य है, किन्तु जो आपराधिक आशय के बिना
और अन्य अपहानि के निवारण के लिये किया गया है
धारा ८२ सात वर्ष से कम आयु के शिशु का कार्य
धारा ८३ सात वर्ष से उपर किन्तु बारह वर्ष से कम आयु अपरिपक्व समझ के शिशु का कार्य
धारा ८४ विकृतिचित्त व्यक्ति का कार्य
धारा ८५ ऐसे व्यक्ति का कार्य जो अपनी इच्छा के विरूद्ध मत्तता में होने के कारण निर्णय
पर पहुंचने में असमर्थ है
धारा ८६ किसी व्यक्ति द्वारा, जो मत्तता में है, किया गया अपराध जिसमें विशेष आशय या
ज्ञान का होना अपेक्षित है
धारा ८७ सम्मति से किया गया कार्य जिसमें मृत्यु या घोर उपहति कारित करने का आशय
हो और न उसकी सम्भव्यता का ज्ञान हो
धारा ८८ किसी व्यक्ति के फायदे के लिये सम्मति से सदभवनापूर्वक किया गया कार्य जिससे
मृत्यु कारित करने का आशय नहीं है
धारा ८९ संरक्षक द्वारा या उसकी सम्मति से शिशु या उन्मत्त व्यक्ति के फायदे के लिये
सदभवनापूर्वक किया गया कार्य
धारा ९० सम्मति उन्मत्त व्यक्ति की सम्मति
शिशु की सम्मति
धारा ९१ एसे कार्यों का अपवर्णन जो कारित अपहानि के बिना भी स्वत: अपराध है
धारा ९२ सम्मति के बिना किसी ब्यक्ति के फायदे के लिये सदभावना पूर्वक किया गया कार्य
धारा ९३ सदभावनापूर्वक दी गयी संसूचना
धारा ९४ वह कार्य जिसको करने के लिये कोई ब्यक्ति धमकियों द्धारा विवश किया गया है
धारा ९५ तुच्छ अपहानि कारित करने वाला कार्य




निजी प्रतिरक्षा के अधिकार के विषय में

धारा ९६ निजी प्रतिरक्षा में दी गयी बातें
धारा ९७ शरीर तथा सम्पत्ति पर निजी प्रतिरक्षा का अधिकार
धारा ९८ ऐसे ब्यक्ति का कार्य के विरूद्ध निजी प्रतिरक्षा का अधिकार जो विकृतख्त्ति आदि हो
धारा ९९ कार्य, जिनके विरूद्ध निजी प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है
इस अधिकार के प्रयोग का विस्तार
धारा १०० शरीर की निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार मृत्यु कारित करने पर कब
होता है
धारा १०१ कब ऐसे अधिकार का विस्तार मृत्यु से भिन्न कोई अपहानि कारित करने तक का होता है
धारा १०२ शरीर की निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारंभ और बने रहना
धारा १०३ कब सम्पत्ति की निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार मृत्यु कारित करने तक
का होता है
धारा १०४ ऐसे अधिकार का विस्तार मृत्यु से भिन्न कोई अपहानि कारित करने तक का
कब होता है
धारा १०५ सम्पत्ति की निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारंभ और बने रहना
धारा १०६ घातक हमले के विरूद्ध निजी प्रतिरक्षा के अधिकार जबकि निर्दोश व्यक्ति को अपहानि होने की जोखिम है




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अध्याय ५
दुष्प्रेरण के विषय में

धारा १०७ किसी बात का दुष्प्रेरण
धारा १०८ दुष्प्रेरक
धारा १०८ क भारत से बाहर के अपराधों का भारत में दुष्प्रेरण
धारा १०९ दुष्प्रेरण का दण्ड, यदि दुष्प्रेरित कार्य उसके परिणामस्वरूप किया जाए, और जहां तक कि उसके दण्ड के लिये कोई अभिव्यक्त उपबंध नही है
धारा ११० दुष्प्रेरण का दण्ड, यदि दुष्प्रेरित व्यक्ति दुष्प्रेरक के आशय से भिन्न आशय से
कार्य करता है
धारा १११ दुष्प्रेरक का दायित्व जब एक कार्य का दुष्प्रेरण किया गया है और उससे भिन्न कार्य किया गया है
धारा ११२ दुष्प्रेरक कब दुष्प्रेरित कार्य के लिये और किये गये कार्य के लिए आकलित दण्ड से दण्डनीय है
धारा ११३ दुष्प्रेरित कार्य से कारित उस प्रभाव के लिए दुष्प्रेरक का दायित्व जो दुष्प्रेरक दवारा आशयित से भिन्न हो
धारा ११४ अपराध किए जाते समय दुष्प्रेरक की उपस्थिति
धारा ११५ मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण यदि अपराध नही किया जाता
यदि अपहानि करने वाला कार्य परिणामस्वरूप किया जाता है
धारा ११६ कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण अदि अपराध न किया जाए
यदि दुष्प्रेरक या दुष्प्रेरित व्यक्ति ऐसा लोक सेवक है, जिसका कर्तव्य अपराध निवारित करना हो
धारा ११७ लोक साधारण दवारा या दस से अधिक व्यक्तियों दवारा अपराध किये जाने
का दुष्प्रेरण
धारा ११८ मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध करने की परिकल्पना को छिपाना
यदि अपराध कर दिया जाए - यदि अपराध नहीं किया जाए
धारा ११९ किसी ऐसे अपराध के किए जाने की परिकल्पना का लोक सेवक दवारा छिपाया जाना, जिसका निवारण करना उसका कर्तव्य है
यदि अपराध कर दिया जाय
यदि अपराध मृत्यु, आदि से दण्डनीय है
यदि अपराध नही किया जाय
धारा १२० कारावास से दण्डनीय अपराध करने की परिकल्पना को छिपाना
यदि अपराध कर दिया जाए - यदि अपराध नही किया जाए
अध्याय ५ क
आपराधिक षडयंत्र




धारा १२० क आपराधिक षडयंत्र की परिभाषा
धारा १२० ख आपराधिक षडयंत्र का दण्ड

अध्याय ६
राज्य के विरूद्ध अपराधें के विषय में

धारा १२१ भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध करना या युद्ध करने का प्रयत्न करना या युद्ध करने का दुष्प्रेरण करना
धारा १२१ क धारा १२१ दवारा दण्डनीय अपराधों को करने का षडयंत्र
धारा १२२ भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध करने के आशय से आयुध आदि संग्रह करना
धारा १२३ युद्ध करने की परिकल्पना को सुनकर बनाने के आशय से छुपाना
धारा १२४ किसी विधिपूर्ण शक्ति का प्रयोग करने के लिए विवश करने या उसका प्रयोग अवरोपित करने के आशय से राट्रपति, राज्यपाल आदि पर हमला करना
धारा १२४ क राजद्रोह
धारा १२५ भारत सरकार से मैत्री सम्बंध रखने वाली किसी एशियाई शक्ति के विरूद्ध
युद्ध करना
धारा १२६ भारत सरकार के साथ शान्ति का संबंध रखने वाली शक्ति के राज्य क्षेत्र में
लूटपाट करना
धारा १२७ धारा १२५ व १२६ में वर्णित युद्ध या लूटपाट दवारा ली गयी सम्पत्ति प्राप्त करना
धारा १२८ लोक सेवक का स्व ईच्छा राजकैदी या युद्धकैदी को निकल भागने देना
धारा १२९ उपेक्षा से लोक सेवक का ऐसे कैदी का निकल भागना सहन करना
धारा १३० ऐसे कैदी के निकल भागने में सहायता देना, उसे छुडाना या संश्रय देना




अध्याय ७
सेना, नौसेना और वायुसेना से सम्बन्धित अपराधें के विषय में

धारा १३१ विद्रोह का दुष्प्रेरण का किसी सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक को कर्तव्य से विचलित करने का प्रयत्न करना

क्रमशः

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